नेचर और नर्चर विमर्श पुराना है लेकिन इस विवाद में रोज़ इक नया अध्याय /विचार /प्रेक्षण जुड़ जाता है .अब साइंसदान कह रहें हैं इक दिमागी रसायन की कम या सटीक मात्रा तय करती है आपका दर्शन -आप निराशावादी /नकारात्मक सोच रखतें हैं या सकारात्मक और आशावादी .यह रसायन है इक मोलिक्युल जिसका नाम है 'न्यूरो -पेप्टाइड -वाई '/एन पी -वाई ।
इस रसायन की मात्रा जेनेटिक प्रोग्रेमिंग तय करती है .इससे मनो -विकारों की जल्दी शिनाख्त /रोग निदान /डायग्नोसिस होने और फिर इलाज़ को नै दिशा मिल सकती है ।
अपने अध्ययन में मिशिगन यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने स्वयंसेवियों के दिमाग में चलने वाली ब्रेन एक्टिविटी का उस समय जायजा -लिया जब इन्हें "ख़ूनी "जैसे नकारात्मक अक्षर इक परदे पर दिखलाए गये .ब्रेन एक्टिविटी दर्ज़ करने पर पता चला जिनके दिमाग में इस मोलिक्युल की मात्रा कम थी उन्होंने निगेतिवली चार्ज्ड शब्दों के प्रति ज्यादा एक्टिविटी प्रदर्शित की ,ज्यादा रेस्पोंस दिया संवेगों का संशाधन करने वाले प्री फ्रंटल कोर्टेक्स में इनके ज्यादा एक्टिविटी दर्ज़ हुई .जबकि सटीक मात्रा इस अणु की जिन स्वयं सेवियों के दिमाग में थी उनकी रेस्पोंस कमज़ोर रही ।
पहले वर्ग के लोगों का स्त्रेस्फुल(तनाव पूर्ण क्षणों में ) सिच्युएशन में अवसाद ग्रस्त होने का ख़तरा ज्यादा रहा बरक्स दूसरे वर्ग के स्वयं सेवियों के ।
मेजर डिप्रेसिव डिस -ऑर्डर्स से ग्रस्त ओगों के दिमाग में इस अणु का स्तर कमतर रहा .पता चला जिनके दिमाग में इस अणु की कमतर मात्रा रहती है उनके अवसाद ग्रस्त होने के मौके ज्यादा रहतें हैं ।
सन्दर्भ -सामिग्री :पेसिमिज्म इज इन दी जींस .पीपल विद लोवर लेविल्स ऑफ़ न्यूरो -पेप -टाइड आर मच मोर निगेटिव :स्टडी (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,फरवरी ९ ,२०११ ,पृष्ठ २५ ).
बुधवार, 9 फ़रवरी 2011
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