मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

मनो -विश्लेषण चिकित्सा का उद्भव THE BRGINNINGS OF PSYCHOTHERAPY

मनो -विश्लेषण चिकित्सा का उद्भव (आदि )

कैसे आरम्भ हुई साइकोथिरेपी ?

सिग्मंड  फ़्रायड  की दूर -दृष्टिता  का परिणाम थी मनो -विश्लेषण चिकित्सा ,बाइनाकुलर विज़न था फ़्रॉयड  महोदय के पास ।इनकी पहली मरीज़ा एक महिला थीं जो रूप परिवर्तन भावोन्माद (कन्वर्जन हिस्टीरिया ,Conversion Hysteria )से ग्रस्त हो गईं थीं।

इस स्थिति में महिलायें भावात्मक चोट (सदमे )को भौतिक समस्याओं के रूप में समझने -भोगने  लगतीं हैं। मसलन उन्हें लगता है उनके किसी अंग को फालिज मार गया है। आज कहते हैं मन से ही होते हैं काया के रोग। मनोकायिक रोग रहा है यह भाव -उन्माद भी। मनो -कायिक बोले तो साइको -सोमाटिक। 

फ्रायड के गुरु रहे  जोज़फ़ ब्रुएर ने आर्म -पेरेलिसिस का पहला ऐसा मामला दर्ज़ किया बतलाया जाता है। मरीज़ा अन्ना   ओ.  नाम की एक महिला  थीं। भौतिक जांच के बाद पता चला इनमें पेरेलिसिस के कैसे भी भौतिक लक्षण ही नहीं थे। इन्हें ब्रुएर के पास मनो -विश्लेषण चिकित्सा के लिए लाया गया। ब्रुएर ने सम्मोहन तकनीक को इनके ऊपर आज़माया साथ ही फ्री -एशोशिएशन टेक्नीक का  भी इस्तेमाल किया। 


What is Free Association?

Free association is a technique used in psychoanalytic therapy to help patients learn more about what they are thinking and feeling. It is most commonly associated with Sigmund Freud, who was the founder of psychoanalytic therapy. Freud used free association to help his patients discover unconscious thoughts and feelings that had been repressed or ignored. When his patients became aware of these unconscious thoughts or feelings, they were better able to manage them or change problematic behaviors.
अन्ना अपने मरणासन्न ( मृत्यु -आसन्न ) पिता के सिरहाने खड़ी थीं। खड़ी -खड़ी ही ये निद्रा में चली गईं जब इनकी आँख खुली इनके पिता मर चुके थे। आपको गहरी मानसिक वेदना पहुंची इस हादसे से ,एक हीन -भावना,अपराध -बोध भी आपके मन में बैठ गया  आप पिता की मृत्यु के लिए खुद को कुसूरवार मान ने लगीं। लेकिन आपने इन मनोभावों को दबाये रखा ,भाव -शमन किया अपनी रागात्मकता का मनो -संवेगों का; मनोविज्ञान की भाषा में यही रिपरैशन कहलाता है। उनकी मनोव्यथा रूपांतरित होकर उनके द्वारा कल्पित भौतिक लक्षणों में तब्दील हो गई उन्हें लगा उनका बाज़ू अब संवेदना शून्य है। 

 मनो -विश्लेषण चिकित्सा ने एक मर्तबा फिर उन्हें उस  सदमे का स्मरण करवाया और सम्मोहन द्वारा उस असर को हटा दिया। 
अन्ना अब आगे की मनो -विश्लेषण चिकित्सा का आधार बन गईं। ऐसे शुरुआत हुई मनो -विश्लेषण चिकित्सा या साइकोथिरेपी की। निष्कर्ष निकाला गया सारे भौतिक लक्षण मनो -संवेगों के दमन (शमन )का परिणाम होते हैं। शमन को हटाते ही मन की गांठ के खुलते ही लक्षण भी गायब हो जाते हैं।उनका बाजू लकवा भी दुरुस्त था अब। 
लेकिन धीरे -धीरे फिर शोध से यह भी पता चला शमन या दमन (repression )का हटा लेना निर्मूल करना सभी मामलों में कामयाब नहीं होता है।फ्रायड महोदय ने यहीं से मनो -विश्लेषण को एक व्यापक आधार दिया जिसके तहत असर ग्रस्त व्यक्ति के बारे में व्यापक (विस्तृत ,गहन ) जानकारी जुटानी आरम्भ  की गई।

Now Freud broadened his focus .He referred to psychoanalysis as an educational process ,which focused on "insight ".
Insight or the recognition of patterns and historical generative events ,became the cure for all ailments.

इसके तहत पहले व्यक्ति की संज्ञानात्मक क्षमताओं ,बोध प्रक्रिया ,सोच ,की पड़ताल की गई ,इसी दरमियान एक मरीज़ ने बतलाया मुझे बरसों हो गए ये परामर्श चिकित्सा लेते- लेते मैं समझता भी सब कुछ हूँ लेकिन फायदा या हासिल अभी तक कुछ हुआ नहीं है। फ्रायड अब ये जान चुके थे इस प्रकार की वैयक्तिक गहन पड़ताल का आंशिक फायदा ही पेशेंट्स तक पहुँच पा रहा है। 

Recognizing one's patterns ,history ,and vulnerability was important ,but hardly curative.There were problems.

मरीज़ में रचनात्मक बदलाव का आना  दो और चीज़ों पर निर्भर करता है :

(१ )उसकी सोच के अलावा उसका रागात्मक भाव जगत ,उसकी संवेदनाएं बड़े मायने रखतीं हैं। 

(२ )रोज़मर्रा के हिसाब से रोज़ -ब -रोज़ हमें अपने जीवन को जीने का ढर्रा जीवन शैळी में बदलाव लाने की आदत डालनी होगी। केवल सोचने और सोचने से कुछ नहीं होना -हवाना है। 

गहन जानकारी जुटाना व्यक्ति विशेष की बस  एक संज्ञानात्मक परख है ,उसकी बोध प्रक्रिया की पड़ताल भर है। ये प्रक्रियाएं मस्तिष्क के बाएं अर्द्धगोल से ताल्लुक रखतीं हैं। एहम का ,हमारे ego -mind का ,यही प्राकृत आवास है।तर्कणा शक्ति ,सारे तर्क  और भाषा का वाग्जाल यहीं है।एक किस्म की  रेखीय बूझ है यहां।  

The left brain houses the ego -mind and is linear ,logical and linguistic .

सूचना संशाधन और सूचना को व्यवस्थिति करने ऑर्गेनाइज करने का काम दिमाग का यही हिस्सा करता है ,यादें और विचार सरणी भी यहीं हैं लेकिन यहां जीवन और जगत का सीधा बोध प्राप्त नहीं है।
It does not experience the world directly .

सीधा अनुभव दिमाग का दायां हिस्सा करता है यह ज्ञानेंद्रिय के पीछे -पीछे हो लेता है संवेदनाओं की प्रावस्थाओं को देखता समझता  है। लेकिन ये अनुभव भी पल दो पल के ही होतें हैं यहां कोई चेक या फ़िल्टर नहीं है। टोटैलिटी रूप में ही हैं एक अनुभव होता है बस । 

यानी ये सब भी कच्चा माल ही होता है जिसको  दिमाग का बांया हिस्सा अवधारणाओं में तब्दील कर लेता है। बस धारणाएं पुख्ता होने लगतीं हैं। 

मनो -विश्लेषण चिकित्सा को इन सब पर नज़र रखनी पड़ेगी। यानी बोध प्रक्रिया ,विचार सरणी तथा मरीज़ की संवेदनाओं संवेगों की भी गहन पड़ताल करनी पड़ेगी। 
जो हो साइकेट्रिक ड्रग्स चिकित्सा   के संग -संग मनो -विश्लेषण चिकित्सा (साइको -थिरेपी )को आनुषंगिक चिकित्सा का दर्ज़ा आज भी प्राप्त है। दोनों साथ -साथ चलतीं हैं। बेशक कुछ मनो -दशाओं में यह उतनी कारगर न भी हो।
संदर्भ -सामिग्री :
The Beginnings of Psychotherapy -Dr .Michael Abramsky
He is a licensed psychologist with 35 yrs of experience treating adolescents and adults for anxiety,depression and trauma .He is nationally Board Certified in both Clinical and  Forensic psychology ,has a MA in Comparative Religions ,and has practiced and taught Buddhist Meditation for 25 yrs .You may call him at 248 644 7398 







  








Can Diabetes Be Helped ?

क्या आप जानते है ,मधुमेह एक अपविकासी  (degenerative disease)जीवन शैली रोग है ?

क्या डायबिटीज़ से बचाव संभव है ?क्या इस दिशा में वाकई कुछ हो सकता है ,कहीं से कोई टेका(इमदाद ,help ) मिल सकता   है। इससे जुड़ी वह जानकारी क्या है जो बिरले ही किसी को मालूम होगी वह भी उसे जो बे -हिसाब मेडिकल शोध की खिड़की को खंगलाता होगा ?

बे -शक हम सभी जानते हैं - मधुमेह रोग का दायरा लगातार सुरसा के मुंह सा फैलता जा रहा है फिर चाहे वह अमरीका जैसे खुशहाल खाते पीते दीखते लोग हों या गरीब देश। 

यह भी बहुतों ने सोचा होगा शक़्कर का बे -हिसाब इस्तेमाल इस महामारी की  वजह बनता है।आइये कुछ बातों पर गौर करते हैं :

(१ )हमारे शरीर में खुद को दुरुस्त कर लेने की क्षमता विद्यमान रही आई है और रहती है। जैसे कटी -फटी ऊँगली अपने आप ठीक हो जाती है वैसे ही हमारा अग्नाश्य (अग्नाश्य ग्रंथि ,pancreas )खुद को दुरुस्त कर लेने की क्षमता लिए रहता  है। लेकिन अगर आप अदबदाकर उस गर्म तवे को बारहा हाथ लगाते रहेंगे जो आपको जला देता है ,फिर आपका अल्लाह ही मालिक है कमान आपके हाथ से निकल जाएगी। 

शुगर और हाईग्लाईकेमिक इंडेक्स (G.I)वाला खाद्य वही काम करता है। High -glycemic foods )खाद्य ऐसे तमाम खाद्य हैं प्रसंस्करित खाद्य हैं ,जो जल्दी ही सिंपल सुगर्स में टूट जाते है अपचयित हो जाते है और तुरत फुरत हमारे खून में ग्लूकोज़ के स्तर को ऊपर ले आते हैं। नतीजा होता है हाई -ब्लड -शुगर ,भले कुछ समय के लिए ही सही। 

वाइट फूड्स से आप बाकायदा परिचित हैं फिर भी :

(१ )वाइट राइस (पोलिश वाला परिष्कृत ताजमहल सा जगमग ,लालकिले सा मशहूर देहरादून सा बासमती )

(२ )वाइट ब्रेड 

(३ )वाइट फ्लोर (मैदा )

(४ )वाइट -पोटेटो  

अलबत्ता वाइट स्किन लोग (गोर -चिट्टे नर -नारी )इस लिस्ट से बाहर ही रखे जाएंगे। 

ये तमाम खाद्य उस दर से आपके ब्लड सुगर में देखते ही देखते इज़ाफ़ा कर देते हैं जो सामान्य दर नहीं कही जाएगी। 

ऐसे में बेचारे अग्नाश्य पर दवाब बनता है  उसे अप्रत्याशित तौर पर इन्सुलिन का सैलाब लाना पड़ता है। मामला क्लाउड ब्रस्ट की तरह है हमारे पेन्क्रियेज़ के लिए। ऐसा इसलिए है ,कुदरती प्राकृत अवस्था में हमारे शरीर को शक्कर के बढ़ने की दर का इल्म ही नहीं होता है ,सब कुछ स्वयंचालित व्यवस्था करती रहती है। 

बे -चारे शरीर को ऐसे में मालूम ही कहाँ है यहां मांजरा कुछ और है- ब्लड सुगर बढ़ती ही जाती है बढ़ती ही जाती है। अगर मालूम हो के ये वृद्धि तात्कालिक है ,थम जाएगी तो पेन्क्रियेज़ इन्सुलिन का बे -हिसाब स्राव ही क्यों करे ?

अब इतना फ़ालतू इन्सुलिन तो अपना रंग दिखायेगा वह भी शक़्कर को जलाता ही जाएगा ठिकाने लगाता ही जाएगा और नतीजा होगा -हाइपोग्लाइसेमिया -इस स्थिति में आपके खून में तैरती शक्कर का स्तर एक दम से गिर कर निम्न हो जाएगा। 

बारहा शक्कर के स्तर में आकस्मिक घट-बढ़ धमनियों पर कालांतर में भारी पड़ती है। मैंने डायबिटीज़ के ऐसे मरीज़ बहुत करीब से देखें हैं उनकी चिकित्सा व्यवस्था का पूरा निगरानी तंत्र करीब से देखा है ,जिनकी डायबिटीज़  तीस -पैंतीस  साला हो गई है। 

 इन्हें बार -बार एंजियोग्रेफी की जरूत पेश आ जाती है ,लेकिन  बारहा एंजियोग्रेफी के लिए धमनी ही हाथ नहीं आती बीच में ही कहीं खो जाती है।पूरे परिवार का रोग बन जाता है मधुमेह जीवन- शैली -रोग। अब ऐसे में अग्नाश्य ही बे -चारा कहाँ बचेगा। 

उसका अपविकास होगा के नहीं होगा ?पेंक्रियाज़ डिजेनरेट करेगी या नहीं करेगी।मरता क्या न करता इस अपविकासी  स्थिति आने  से पहले अग्नाश्य अति -सक्रीय (hyperactive )हो जाता है। ताकि कुछ  ले दे के उसका काम तो ठप्प न हो।लेकिन होता उल्ट ही है। आपका ब्लड शुगर लेवल अब जल्दी जल्दी सामन्य से बहुत नीचे स्तर पर आने लगता है।ऐसे में आप एक टाइम का भोजन मिस कर जाएँ वक्त ही न निकाल पाए भोजन का चर्या में से फिर देखिये क्या होता है आपके साथ। 

हाइपो -ग्लाइसीमिया आपके लिए खतरे की घंटी हो सकता है ,चेतावनी यही है आप अपना खान -पानी दुरुस्त कर लें। अग्नाश्य भी सम्भल जाएगा। 

Some will get the shakes if they skip meals . 

क्या आप जानते हैं -अग्नाश्य के स्वास्थ्य को कुछ किण्वक 

या एंजाइम बचाये रह सकते हैं ? 

कुदरती खाना (तमाम किस्म के भोज्य पदार्थ  )इन एन्जाइज़ों के  ढ़ेर  के ढ़ेर लिए रहते हैं। ये कैंची है खाद्य को कतरने की। खाद्य टूट जाएगा अपने सरलतम रूपों में। 

लिटमस पेपर टेस्ट  है यह -वह खाना जल्दी सड़ेगा नहीं दीर्घावधि में भी ,जिसमें एन्जाइम्स का स्तर निम्तर बना होगा।

लेकिन एन्जाइम्स से भरपूर खाने की भंडारण अवधि ,सेल्फ- लाइफ कमतर होगी। परिष्कृत - प्रसंस्करित ,संशाधित खाद्यों में एंजाइम तकरीबन -तकरीबन नष्ट ही हो जाते है। 

ओवर कुक्ड और माइक्रोवेव्ड किए खाने के साथ भी यही होता है -एन्जाइम्स नदारद हो जाते हैं खाद्यों में से। उन्हें उनकी प्राकृत अवस्था में ही परम्परागत तरीके से पका बनाकर खाइये। 
बड़े एहम हैं एंजाइम हमारे भोजन के लिए। इनके अभाव में अग्नाश्य पर क्या गुज़रती होगी ये आप नहीं जानते हैं। 

संदर्भ -सामिग्री :माननीया शाइरी याले जी के साथ एक लम्बी बातचीत पर आधारित है यह आलेख। आप नामचीन काइरोप्रेक्टर हैं। डीसी का मतलब यहां  डॉक्टर आफ काइरोप्रेक्टिक है। 

Dr Sherry Yale ,DC is the owner of TLC Holistic Wellness .She lives in Livonia ,MI 48 150 phone :734 664 0339  

Tantra Yoga(Hindi ll)

Tantra Yoga(Hindi ll)

भारतधर्मी सनातन धर्म की आध्यात्मिक पीढ़ी को बनाये रखने के लिए तंत्र योग एक शक्तिशाली साधन माना गया है। बे -शक धूर्तों ,कुपात्रों ,अज्ञानियों के हाथों इस विद्या का बड़ा दुरूपयोग भी हुआ है जिन्होनें इसका इस्तेमाल सिर्फ चमत्कार दिखलाकार पैसा गाढ़ने और भले जन मानस को लूटने फंसाने युवतियों को भर्मित किये रहने के लिए ही किया है। शक्ति साधना की  इससे बड़ी तौहीन और क्या हो सकती है। गूढ़ विद्या का तमाशा लगाना अन्धकार में भटके हुए लोग ही कर सकते हैं।

पंच -मकार -सिद्धांत का अज्ञानियों ने बड़ा मखोल  बनाया है -मद्य , मांस ,मच्छी ,मुद्रा और मैथुन गलत इस्तेमाल के लिए धूर्तों के हाथ लगने पर बड़ा अनर्थ हो जाता है समाज का। जबकि इन पंच -मकारों का रहस्यमूलक आधायत्मिक गूढ़ अर्थ था :

(१ )अहम का विसर्जन ,'मैं भाव ' को मारना मद्य था

(२ )दैहिक संयम था ,काम रस नहीं था मांस

(३ )रूहानी शराब ,भक्ति रस में डूबना रहा है नामरस सबसे बड़ा है नशीला मद्य  है

(४ ) शिव से मिलन था अर्धनारीश्वर होना था।

तंत्र का मतलब 'तत्व -मीमांसा 'थी ब्रह्म तत्व को बूझना था ,(तनोति Tanoti  )की व्याख्या करना था। और 'मंत्र' रहस्य -मूलक -अध्यात्म विद्या का नाद था। गूढ़ -दुर्बोध्य स्वर था मंतोच्चार।

 त्रैयते से तंत्र बना है  

तंत्र जादू टोने- टोटके की किसी किताब का नाम नहीं है।जंतर -मंतर भी नहीं हैं यहां किसी रहस्य विद्या के ये सूत्र भी नहीं है। 

धर्म ग्रन्थ हैं ये अद्भुत। ये मानव मात्र के कल्याण के लिए हैं जहां से कोई भी उद्बोधन प्राप्त कर सकता है कोई जाति ,मज़हब निषेध नहीं है यहां।कोई रंग भेद नहीं है।  

'महानिर्वाण -तंत्र' और 'कुलार्णव' प्रमुख ग्रंथ हैं तंत्र -योग  के। 

कृष्णा यजुर्वेदीय 'योग - कुंडलिनी -उपनिषद' यहीं हैं।जबाला दरसना ,त्रिशिखा ब्राह्मण तथा वराह उपनिषद यहां कुण्डलिनी शक्ति को सक्रीय करने की कला सिखाता है। 

(ज़ारी )

(शेष तंत्र -योग दूसरी क़िस्त में.....  ) 

संदर्भ -सामिग्री : 

Reference :http://www.dlshq.org/teachings/tantrayoga.htm

                                                                

सोमवार, 30 अक्तूबर 2017

ये ही पाकिस्तान और चीन सोच के लोग हैं। जो इस हद तक अवसाद में चले आएं हैं देश को आग लगवा कर भी ये मोदी को हटवाने के लिए तैयार हैं।

इन दिनों मोदी के खिलाफ एक नियोजित षड्यंत्र चल रहा है

 जिसके रचनाकार वही लोग हैं ये षड्यंत्र -पटकथा उन्हीं की लिखी लिखवाई हुई है जिन्हें विदेशों से यहाँ लाकर भारत की राजनीतिक काया पर एक पैवन्द लगाया गया था। आज ये कह रहें हैं मोदी देश पे बम गिरवा  देगा ,जीएसटी का भूत इन पर इस तरह सवार है इन्होनें चंद ऐसे युवकों को पकड़ लिया है जो इनके एजेंट के भी एजेंट हैं ,अपने पढ़े लिखे होने की दुहाई बात- बात पे देते हुए कहतें हैं हम इंस्टीटूट आफ मैनजमेंट के पढ़े हुए हैं इसलिए हमें मालूम है -आपको नहीं मालूम ये मोदी देश  को किस तरह तबाह कर रहा है पहले डिमो-नैटाइज़ेशन के नाम पे, कभी बुलेट ट्रेन की आड़ में कभी पेट्रोल डीज़ल की आड़ लेकर। ये भूलते हैं जो इनसे पहले पढ़ गए ये उन्हीं की टीप मारके पढ़ें हैं वे भी पढ़े लिखे ही थे। आगे कहते है :

'आप वहीँ के वहीँ -   वही ढ़ाक के तीन पात, पहले भी अम्बानी और अब भी अम्बानी बस बोलें - मोदी वाणी।'

इनका गणित उस कुनबे की तरह है जिसके एक अक्लमंद पढ़े लिखे आदमी ने ये हिसाब लगा के बतलाया नदी में पानी  इतना गहरा है मैंने आप लोगों की हाइट जोड़के कुल योग निकाल  लिया है गहराई को चार से तकसीम कर दिया है कोई भी नहीं डूबेगा चलते चलो ,हमें उस पार तो हर हाल में पहुंचना ही है।  पूरा कुनबा डूब गया।

जानतें हैं इस पढ़े लिखे ने क्या किया था -ये लोग संख्या में चार थे नदी में पानी था १२ फुट इनकी कुल कुंबाई  लम्बाई इससे कहीं ज्यादा थी। इन्होने ने बस १२ को चार का भाग किया और कहा  कोई  नहीं डूबेगा। जब पूरा कुनबा डूब गया कहने लगा ये युवक नदी का पानी तो बढ़ा नहीं कुनबा कैसे डूब गया।

 आदमी ''गू ''खाये तो हाथी का खाये कमसे कम पेट तो भरे ये उनके (उन्हीं के जो आप समझ रहें हैं )एजेंट के भी एजेंट हैं जिन्हें देश का मनोबल तोड़ने के लिए लगाया गया है इसलिए कहते फिर रहें हैं मोदी ने सब बर्बाद कर दिया।

कुल मिलाकर  इन्हें जब  अपने बाप के खिलाफ कुछ नहीं मिला तो ये कहने लगें हैं मैं जानता हूँ मेरा बाप मुझे जहर देकर मार देगा उसने स्लो पॉइज़न देना शुरू भी कर दिया है।

'कोई योजना नहीं है इसलिए की भ्रष्टाचार  भी नहीं है मोदी राज में। 'इनका  आप्त -वचनामृत  ज़ारी हैं। '

देखिये इनकी विकास की परिभाषा कितना बे -लाग है। 'भ्रष्टाचार' और 'विकास 'बकौल इन कांग्रेसी एजेंटों के पर्याय वाची शब्द  हैं।

ये ही पाकिस्तान और चीन सोच के लोग हैं। जो इस हद तक अवसाद में चले आएं हैं देश को आग लगवा कर भी ये मोदी को हटवाने के लिए तैयार हैं।  

Tantra Yoga(Hindi ll)

Tantra Yoga

भारतधर्मी सनातन धर्म की आध्यात्मिक पीढ़ी को बनाये रखने के लिए तंत्र योग एक शक्तिशाली साधन माना गया है। बे -शक धूर्तों ,कुपात्रों ,अज्ञानियों के हाथों इस विद्या का बड़ा दुरूपयोग भी हुआ है जिन्होनें इसका इस्तेमाल सिर्फ चमत्कार दिखलाकार पैसा गाढ़ने और भले जन मानस को लूटने फंसाने युवतियों को भर्मित किये रहने के लिए ही किया है। शक्ति साधना की  इससे बड़ी तौहीन और क्या हो सकती है। गूढ़ विद्या का तमाशा लगाना अन्धकार में भटके हुए लोग ही कर सकते हैं।

पंच -मकार -सिद्धांत का अज्ञानियों ने बड़ा मखोल  बनाया है -मद्य , मांस ,मच्छी ,मुद्रा और मैथुन गलत इस्तेमाल के लिए धूर्तों के हाथ लगने पर बड़ा अनर्थ हो जाता है समाज का। जबकि इन पंच -मकारों का रहस्यमूलक आधायत्मिक गूढ़ अर्थ था :

(१ )अहम का विसर्जन ,'मैं भाव ' को मारना मद्य था

(२ )दैहिक संयम था ,काम रस नहीं था मांस

(३ )रूहानी शराब ,भक्ति रस में डूबना रहा है नामरस सबसे बड़ा है नशीला मद्य  है

(४ ) शिव से मिलन था अर्धनारीश्वर होना था।

तंत्र का मतलब 'तत्व -मीमांसा 'थी ब्रह्म तत्व को बूझना था ,(तनोति Tanoti  )की व्याख्या करना था। और 'मंत्र' रहस्य -मूलक -अध्यात्म विद्या का नाद था। गूढ़ -दुर्बोध्य स्वर था मंतोच्चार।

 त्रैयते से तंत्र बना है  

तंत्र जादू टोने- टोटके की किसी किताब का नाम नहीं है।जंतर -मंतर भी नहीं हैं यहां किसी रहस्य विद्या के ये सूत्र भी नहीं है। 

धर्म ग्रन्थ हैं ये अद्भुत। ये मानव मात्र के कल्याण के लिए हैं जहां से कोई भी उद्बोधन प्राप्त कर सकता है कोई जाति ,मज़हब निषेध नहीं है यहां।कोई रंग भेद नहीं है।  

'महानिर्वाण -तंत्र' और 'कुलार्णव' प्रमुख ग्रंथ हैं तंत्र -योग  के। 

कृष्णा यजुर्वेदीय 'योग - कुंडलिनी -उपनिषद' यहीं हैं।जबाला दरसना ,त्रिशिखा ब्राह्मण तथा वराह उपनिषद यहां कुण्डलिनी शक्ति को सक्रीय करने की कला सिखाता है। 

(ज़ारी )

(शेष तंत्र -योग दूसरी क़िस्त में.....  ) 

संदर्भ -सामिग्री : 

Reference :http://www.dlshq.org/teachings/tantrayoga.htm

                                                                

                                                                       

IS THERE SOMEONE YOU NEED TO FORGET ?

Many people feel that they have been wronged by someone in their recent or distant past.Often this is a parent ,or siblings ,or a life partner . 

It may be true that you were treated in a hurtful way .You may think the person who wronged you does not deserve to be forgiven .Unfortunately ,holding to this position is hurting you a great deal more than the other person .You may have been holding on to this anger or resentment for years without realizing the toll it is taking .

The fact is ,the person or persons who have wronged you may not even be aware of how you feel .They are probably going about their life without any thought about what they did to you .They are not the ones suffering.

While you may want to get back at the person you feel has harmed you ,you are actually causing many more problems for yourself .Many people do not want to let the person who has hurt them "off the hook ," believing that will allow the person to get away with it .But holding on to the anger may be causing you serious problems ,both physical and psychological ,greatly affecting the quality of your life.In this state you are unable to make changes or improve your life ; you can not move forward .

Dr Wayne Dyer used to say when he was a psychologist doing therapy , and his clients blamed their parents for the problems in their life , "send your parents to me for therapy ,I will cure them ,and then will you be alright." Obviously ,curing your parent or parents is not going to do anything to make your life better .

You need to  accept for what is occurring in your life .If you are waiting for some one else to change in order to be happy ,you will never be happy .You are the one who needs to make the changes .

There is an interesting analogy about not forgiving .It states ,"Not forgiving others is like drinking poison and hoping the other person will die ."The point is that you are drinking the poison and you are the one who is suffering as a result of this .Why punish yourself in the present because someone hurt you in the past ?This just increases your pain .It is vital to let go of what happened in the past and then learn to forgive others , if you wish to heal .

Forgiveness is not for the other person ,it is really for you .By forgiving others you free yourself .

You may be familiar with the "Course in Miracles ." It states that "All dis -eases comes from a state of unforgiveness."So if you are experiencing dis -ease ,you might want to contemplate who it is you might want to forgive .Forgiveness is nothing to do with condoning the behavior .Rather ,you are just letting it go and are getting on with your life .It might help you to realize that the person you need to forgive may also have been in a lot of pain .Forgiveness is a way of loving yourself .

Further more there may be devastating consequences by not forgiving .Dolores Canon , a hypnotist who often communicated with beings on the super conscious level ,stated that many people have cancer because they would not forgive .That is how powerful and destructive not forgiving is .Many illnesses are a result of not forgiving .We cannot change what happened in the past .We can ,however change our thoughts about the past .

If you are finding it very difficult to forgive ,hypnosis can be enormously helpful .Hypnosis deal with the subconscious part of the mind ,and by accessing the subconscious one can more easily learn to forgive and let past hurt go .

You may search for google for a near by hypnotist for help .Pl do it if you need one .Life is not to be wasted .Every person is useful ,very special and unique .

Forgiveness is life .

Reference Material :Based on a free conversation with a renowned hypno-therapist Phil Rosenbaum 

246 -688 -6469 

Is There Someone You Need to Forgive

क्षमा शील व्यक्ति ही अपने कर्म-दहन कर पाता है 

क्षमा बड़ेन को चाहिए, छोटन को उत्पात ,

का रहीम हरि को घटो, जो भृगु मारी लात।

क्षमा धीर पुरुष ही नहीं बलशाली का भी आभूषण है। क्षमाशीलता आपको स्वतंत्र करती है ,उस अतीत से जिसमें कईओं की बदसुलूकी आपके अवचेतन में आज भी जगह बनाये हुए है। आपके वर्तमान को आपकी सेहत को असरग्रस्त कर रही है। आपको आगे बढ़ने से रोक रही है।

क्षमा करके आप खुद पर एहसान करेंगे किसी और पर नहीं। वह या वे तमाम लोग जिन्होंने कभी आपकी भावनाओं को आहत किया है उन्हें आपके दर्द का पता ही नहीं है।

दर्द उनको भी है ,इसका इल्म आपको तब तक नहीं होगा जब तक आप उन तमाम लोगों को मुआफ नहीं करेंगे। कई सोल हीलर (आत्म -तत्व -हीलर ) आजकल सुबह उठकर ये प्रार्थना की तरह पाठ करते हैं :

मैं अपने तथा अपने उन तमाम पूर्वजों की तरफ से उन सबसे क्षमा माँगता हूँ जिनका हमनें कभी दिल दुखाया है। साथ ही हम उन तमाम लोगों को मुआफ करते हैं जिन्होंने जाने अनजाने या फिर अदबदाकर भी हमारे दिल को दुखाया है। आप भी ऐसा करके देखिये नित्यप्रति एक विशेष ऊर्जा आपके अंदर  प्रवाहित  होने लगेगी -ऊर्जा-ए -सुकून।

कोई भी अपराध संगी साथियों का दुर्व्यवहार ,दगा -बाज़ी आपके अपने जीवन से बड़ी नहीं है। मनुष्य का दिमाग एक साथ दो काम करता है कुछ नया सीखने के साथ -साथ उसे भूलता भी जाता है। इसीलिए एक ही काम को बार -बार दोहराना पड़ता है। शिक्षक अपना सबक क्लास में जाने से पहले लेसन हर बार ही  तैयार करता है चाहे बरसों बरस से पढ़ा रहा हो। न भूल पाना घटनाओं को एक संवेगात्मक कैंसर बन जाता है।

यदि आप किन्हीं ऐसों की जिन्हें आप दिल के बहुत करीब मानते हैं दग़ाबाज़ी को भूल नहीं पा रहे हैं आपके रोज़मर्रा के जीवन को वह असरग्रस्त कर रही है तब आप चाहे तो इसे भूलने के लिए एक हिप्नोटिस्ट, सम्मोहन करता की मदद भी ले सकते हैं। 
गलती आखिर इंसान से ही होती है। गलतियों का पुतला है इंसान हाँ जब यह इल्म हो मुझसे गलती हुई है बड़ी भूल हुई है आप शीघ्र माफ़ी मांग ले उस व्यक्ति से जो आपके अन -अपेक्षित व्यवहार से आहत हुआ है। आपके ऊपर से बोझ हट जाएगा।

जो लोग नहीं भूल पाते हैं उनसे हमारा निवेदन है मनोविज्ञान में एक ही टर्म होता है इंफीरि-योरटी  कॉम्प्लेक्स ,सुपीरि-योरटी कॉम्प्लेक्स जैसा कोई लफ्ज़ है ही नहीं। फिर भी मैं ऐसे कई व्यक्तियों को जानता हूँ जो इस बाद वाले कॉम्प्लेक्स से ग्रस्त हैं।अपने को सबसे अलहदा मान श्रेष्ठि भाव से तंग हैं।

यहां किसी के साथ कभी भी कुछ भी घट सकता है। सौ फीसद खरा २४ कैरट यहां कुछ भी नहीं है और फिर उस का कीजियेगा क्या गहने भी नहीं बन सकते उसके तो।

यदि आप अपने से प्रेम करते हैं अपनों से प्रेम करते हैं ,उनके दोषों को नज़र -अंदाज़ कीजिये। गलती हुई है उनसे तो उन्हें माफ़ करके खुद भी सुकून में आ जाइये जीवन की गति और दिशा आगे की ओर  है। भूत को नहीं वर्तमान को पकड़िए ,भविष्य से इसे जोड़िये।


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सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )https://www.youtube.com/watch?v=2z2XstaFR-E



पर नर व्याघ सुयोधन तुमसे कहो कहाँ कब हारा?


क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल सबका लिया सहारा पर नर व्याघ सुयोधन तुमसे कहो कहाँ कब हारा? क्षमाशील हो ॠपु-समक्ष तुम हुये विनीत जितना ही दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है पौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर खोता है क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल है उसका क्या जो दंतहीन विषरहित विनीत सरल है तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपति सिंधु किनारे बैठे पढते रहे छन्द अनुनय के प्यारे प्यारे उत्तर में जब एक नाद भी उठा नही सागर से उठी अधीर धधक पौरुष की आग राम के शर से सिंधु देह धर त्राहि-त्राहि करता आ गिरा शरण में चरण पूज दासता गृहण की बंधा मूढ़ बन्धन में सच पूछो तो शर में ही बसती है दीप्ति विनय की संधिवचन सम्पूज्य उसीका जिसमे शक्ति विजय की सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है
                                            -----(राष्ट्रीय कवि  रामधारी सिंह दिनकर )

(३ )https://www.youtube.com/watch?v=m66y7M-0E9M

(४ )https://www.youtube.com/watch?v=KpfTfXyfui4

(५ )https://www.youtube.com/watch?v=Ch6m800iHto

(६ )https://www.youtube.com/watch?v=CothocmSzL0

(७ )https://www.youtube.com/watch?v=5Hon6Qh1rYA

क्षमा बड़ेन को चाहिए, छोटन को उत्पात , का रहीम हरि को घटो, जो भृगु मारी लात।

क्षमा शील व्यक्ति ही अपने कर्म-दहन कर पाता है 

क्षमा बड़ेन को चाहिए, छोटन को उत्पात ,

का रहीम हरि को घटो, जो भृगु मारी लात।

क्षमा धीर पुरुष ही नहीं बलशाली का भी आभूषण है। क्षमाशीलता आपको स्वतंत्र करती है ,उस अतीत से जिसमें कईओं की बदसुलूकी आपके अवचेतन में आज भी जगह बनाये हुए है। आपके वर्तमान को आपकी सेहत को असरग्रस्त कर रही है। आपको आगे बढ़ने से रोक रही है।

क्षमा करके आप खुद पर एहसान करेंगे किसी और पर नहीं। वह या वे तमाम लोग जिन्होंने कभी आपकी भावनाओं को आहत किया है उन्हें आपके दर्द का पता ही नहीं है।

दर्द उनको भी है ,इसका इल्म आपको तब तक नहीं होगा जब तक आप उन तमाम लोगों को मुआफ नहीं करेंगे। कई सोल हीलर (आत्म -तत्व -हीलर ) आजकल सुबह उठकर ये प्रार्थना की तरह पाठ करते हैं :

मैं अपने तथा अपने उन तमाम पूर्वजों की तरफ से उन सबसे क्षमा माँगता हूँ जिनका हमनें कभी दिल दुखाया है। साथ ही हम उन तमाम लोगों को मुआफ करते हैं जिन्होंने जाने अनजाने या फिर अदबदाकर भी हमारे दिल को दुखाया है। आप भी ऐसा करके देखिये नित्यप्रति एक विशेष ऊर्जा आपके अंदर  प्रवाहित  होने लगेगी -ऊर्जा-ए -सुकून।

कोई भी अपराध संगी साथियों का दुर्व्यवहार ,दगा -बाज़ी आपके अपने जीवन से बड़ी नहीं है। मनुष्य का दिमाग एक साथ दो काम करता है कुछ नया सीखने के साथ -साथ उसे भूलता भी जाता है। इसीलिए एक ही काम को बार -बार दोहराना पड़ता है। शिक्षक अपना सबक क्लास में जाने से पहले लेसन हर बार ही  तैयार करता है चाहे बरसों बरस से पढ़ा रहा हो। न भूल पाना घटनाओं को एक संवेगात्मक कैंसर बन जाता है।

यदि आप किन्हीं ऐसों की जिन्हें आप दिल के बहुत करीब मानते हैं दग़ाबाज़ी को भूल नहीं पा रहे हैं आपके रोज़मर्रा के जीवन को वह असरग्रस्त कर रही है तब आप चाहे तो इसे भूलने के लिए एक हिप्नोटिस्ट, सम्मोहन करता की मदद भी ले सकते हैं। 
गलती आखिर इंसान से ही होती है। गलतियों का पुतला है इंसान हाँ जब यह इल्म हो मुझसे गलती हुई है बड़ी भूल हुई है आप शीघ्र माफ़ी मांग ले उस व्यक्ति से जो आपके अन -अपेक्षित व्यवहार से आहत हुआ है। आपके ऊपर से बोझ हट जाएगा। 

जो लोग नहीं भूल पाते हैं उनसे हमारा निवेदन है मनोविज्ञान में एक ही टर्म होता है इंफीरि-योरटी  कॉम्प्लेक्स ,सुपीरि-योरटी कॉम्प्लेक्स जैसा कोई लफ्ज़ है ही नहीं। फिर भी मैं ऐसे कई व्यक्तियों को जानता हूँ जो इस बाद वाले कॉम्प्लेक्स से ग्रस्त हैं।अपने को सबसे अलहदा मान श्रेष्ठि भाव से तंग हैं। 

यहां किसी के साथ कभी भी कुछ भी घट सकता है। सौ फीसद खरा २४ कैरट यहां कुछ भी नहीं है और फिर उस का कीजियेगा क्या गहने भी नहीं बन सकते उसके तो।

यदि आप अपने से प्रेम करते हैं अपनों से प्रेम करते हैं ,उनके दोषों को नज़र -अंदाज़ कीजिये। गलती हुई है उनसे तो उन्हें माफ़ करके खुद भी सुकून में आ जाइये जीवन की गति और दिशा आगे की ओर  है। भूत को नहीं वर्तमान को पकड़िए ,भविष्य से इसे जोड़िये।


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सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )https://www.youtube.com/watch?v=2z2XstaFR-E



पर नर व्याघ सुयोधन तुमसे कहो कहाँ कब हारा?


क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल सबका लिया सहारा पर नर व्याघ सुयोधन तुमसे कहो कहाँ कब हारा? क्षमाशील हो ॠपु-समक्ष तुम हुये विनीत जितना ही दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है पौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर खोता है क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल है उसका क्या जो दंतहीन विषरहित विनीत सरल है तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपति सिंधु किनारे बैठे पढते रहे छन्द अनुनय के प्यारे प्यारे उत्तर में जब एक नाद भी उठा नही सागर से उठी अधीर धधक पौरुष की आग राम के शर से सिंधु देह धर त्राहि-त्राहि करता आ गिरा शरण में चरण पूज दासता गृहण की बंधा मूढ़ बन्धन में सच पूछो तो शर में ही बसती है दीप्ति विनय की संधिवचन सम्पूज्य उसीका जिसमे शक्ति विजय की सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है
                                            -----(राष्ट्रीय कवि  रामधारी सिंह दिनकर )

(३ )https://www.youtube.com/watch?v=m66y7M-0E9M

(४ )https://www.youtube.com/watch?v=KpfTfXyfui4

(५ )https://www.youtube.com/watch?v=Ch6m800iHto

(६ )https://www.youtube.com/watch?v=CothocmSzL0

(७ )https://www.youtube.com/watch?v=5Hon6Qh1rYA

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

Tantra Yoga By Sri Swami Sivananda

Introduction

तंत्र -योग एक विहंगावलोकन 

संस्कृत साहित्य का वर्गीकरण अध्ययन की दृष्टि से छः शाश्त्र -सम्मत परम्परागत या रूढ़िवादी धाराओं एवं चार धर्म से इतर लौकिक धाराओं या सेकुलर शीर्षों ,प्रमुख धाराओं में किया जा सकता है।

छः शास्त्र सम्मत धाराएं इस प्रकार हैं :

(१) श्रुति 

(२ )स्मृति 

(३ )इतिहास 

(४ )पुराण 

(५ )आगम 

(६ )दर्शन 

सेकुलर धाराएं इस प्रकार हैं :

(१ )सुभाषित 

(२ )काव्य 

(३ )नाटक 

(४ )अलंकार 

 आगम धर्म - शास्त्र -विषयक प्रकरण ,प्रबंध या आलेख हैं, गाइड हैं ,नियम पुस्तिका हैं पूजा अर्चना के व्यावहारिक दिग्दर्शन की। इनके अंतर्गत आएंगे ;

(१ )तंत्र 

( २ )मंत्र और 

(३ )यन्त्र 

ये कह सकतें हैं हम के आलेख  हैं कैप्स्युल्स हैं मूर्तिपूजा -विधान के ,मंदिरों में अपनाये गए पूजा अर्चना के तरीके समझाते  हैं ये प्रकरण।अलावा इसके  सभी आगमों में चर्चा की गई है :

(१ )ज्ञान या नालिज की 

(२ )योग या ध्यान की 

(३ )क्रिया या मेकिंग की 

(४ )चर्या या डूइंग 

यहां आपको विस्तृत और सटीक ब्योरा मिलेगा तात्त्विकी या सत्ता मीमांसा का ,सृष्टि विज्ञान या कास्मॉलॉजी का ,मुक्ति ,भक्ति ,ध्यान समाधि ,मंत्रों में गुंथा दर्शन शास्त्र ,अध्यात्म विद्या का दिग्दर्शन कराते रेखा -चित्र ,मंत्र -तावीज़ ,माया शक्ति ,मोहिनी शक्ति ,वशीकरण (Charms and Spells ),मंदिर -निर्माण की कला ,चित्रकारी (चित्रकला ,इमेज मेकिंग ),घरेलू -प्रथाएं ,समाज में उठ बैठ के नियम सामाजिक नियम -विधान ,जन-पर्व।

(आगमों का आगे वर्गीकरण पढ़िए अगली क़िस्त में ...)

आगमों को तीन संभागों या उपवर्गों में बांटा गया है :

(१)वैष्णव 

(२ )शैव और 

(३ )शाक्त 

तीनों के अपने-अपने  मत और निर्धारित सिद्धांत हैं। ये सनातन सम्प्रदाय कहे गए हैं भारतधर्मी समाज के।

वैष्णव सम्प्रदाय (पंचरात्र )विष्णु का गुणगायन ,शैव -भगवान शंकर (शिव )का जिसे शैव - सिद्धांत भी कहा  गया

है ,तथा -

शाक्त-आगम या तंत्र  देवी शक्ति की ,विश्व की विभिन्न नाम रूपधारी  मातृ शक्ति को  परमात्मा के रूप में पूजते हैं।

आगम यद्यपि वेदों को प्रमाण नहीं मानते लेकिन इनका विरोध भी कहीं नहीं करते दीखते हैं।

आत्मा और चरित यकसां हैं आगम -निगम वेदपुराण का।

इसीलिए इन्हें 'प्रमाण 'शब्द प्रमाण' कहा माना गया है जिन्हें आगे किसी और 'प्रमाण' की ज़रूरत नहीं है।

तंत्र आगम का संबंध शाक्त -कल्ट ,शाक्त सम्प्रदाय से है। 

इसके समर्थक शक्ति को ही विश्व -माता  मानते हैं।यहां शक्ति उपासना का बहुविध विधान हैं। यहां अनुष्ठान परक ,कर्म -काण्ड परक तरीकें हैं देवी उपासना पूजा अर्चना के।

सत्ततर आगम बतलाये गए हैं।  

कुछ मायनों में ये पुराणों जैसे ही हैं। यहां शिव -पार्वती कथा संवाद रूप में है। दोनों प्रश्न करता भी हैं समाधान करता भी यानी उत्तर प्रदाता भी हैं। एक पूछता है दूसरा ज़वाब देता है। बारी -बारी। इनसे ताल्लुक रखने वाले प्रमुख ग्रंथ या कार्य रहे हैं :

(१ )महानिर्वाण निष्पादन एवं अवधारणा 

(२ )कुलार्णव 

(३ )कुलासरा (कुलसर )

(४ )प्रपञ्चसर (प्रपंचासर )

(५ )तन्त्रजा (तंत्रज )

(६ )रूद्र यमला 

(७ )ब्रह्म यमला 

(८ )तोडला तंत्र 

महानिर्वाण तंत्र आगमों से चस्पां एक प्रमुख ग्रन्थ है। इनमें तंत्र -मन्त्र ,जादुई ,रहस्यात्मक (तर्क और विज्ञान से परे ,पारतार्किक )ऑकल्ट प्रेक्टिस प्र -शिक्षण भी है शक्ति अंतरण भी। यहां ज्ञान भी है फ्रीडम भी (प्राप्त शक्ति या वस्तु के उपयोग की आज़ादी  भी है  ). 

(ज़ारी )

संदर्भ -सामिग्री :



Sanskrit literature can be classified under six orthodox heads and four secular heads. They are: (i) Sruti, (ii) Smriti, (iii) Itihasa, (iv) Purana, (v) Agama, and (vi) Darsana; and (i) Subhashita, (ii) Kavya, (iii) Nataka and, (iv) Alankara.
The Agamas are theological treatises and practical manuals of divine worship. The Agamas include Tantras, Mantras, and Yantras. These are treatises explaining the external worship of God, in idols, temples, etc. All the Agamas treat of (i) Jnana or Knowledge, (ii) Yoga or concentration, (iii) Kriya or making, and (iv) Charya or doing. They also give elaborate details about the ontology, cosmology, liberation, devotion, meditation, philosophy of Mantras, mystic diagrams, charms and spells, temple-building, image-making, domestic observances, social rules, and public festivals.
The Agamas are divided into three sections: the Vaishnava, the Saiva, and the Sakta. The three chief sects of Hinduism, viz., Vaishnavism, Saivism, and Saktism, base their doctrines and dogmas on their respective Agamas. The Vaishnava Agamas or Pancharatra Agamas glorify God as Vishnu. The Saiva Agamas glorify God as Siva and have given rise to an important school of philosophy known as Saiva Siddhanta. The Sakta Agamas or Tantras glorify God as the Mother of the world under one of the many names of Devi. The Agamas do not derive their authority from the Vedas, but they are not antagonistic to them. They are all Vedic in spirit and character. That is the reason why they are regarded as authoritative.
The Tantra Agamas belong to the Sakta cult. They glorify Sakti as the World-Mother. They dwell on the Sakti (energy) aspect of God and prescribe numerous courses of ritualistic worship of Divine Mother in various forms. There are seventy-seven Agamas. These are very much like the Puranas in some respects. The texts are usually in the form of dialogues between Siva and Parvati. In some of these, Siva answers the questions put by Parvati and in others Parvati answers, Siva questioning. Mahanirvana, Kularnava, Kulasara, Prapanchasara, Tantraraja, Rudra Yamala, Brahma Yamala, Vishnu Yamala, and Todala Tantra are the important works. The Agamas teach several occult practices, some of which confer powers, while the others bestow knowledge and freedom. Among the existing books the Mahanirvana Tantra is the most famous.

Tantra Yoga








Guru and Diksha (Initiation)

Yoga should be learnt from a Guru (spiritual preceptor). And this is true all the more in the case of Tantra Yoga. It is the Guru who will recognise the class to which the aspirant belongs and prescribe suitable Sadhana.
The Guru is none other than the Supreme Divine Mother Herself, descended into the world in order to elevate the aspirant. As one lamp is lit at the flame of another, so the divine Sakti consisting of Mantra is communicated from Guru to the disciple. The disciple fasts, observes Brahmacharya, and gets the Mantra from the Guru.
Initiation tears the veil of mystery and enables the disciple to grasp the hidden truth behind scriptures' texts. These are generally veiled in mystic language. You cannot understand them by self-study. Self-study will only lead you to greater ignorance. The Guru only will give you, by Diksha (initiation), the right perspective in which to study the scriptures and practise Yoga.

Qualifications of a Disciple

The qualifications of the disciple are purity, faith, devotion, dispassion, truthfulness, and control of the senses. He should be intelligent and a believer in Vedas. He must abstain from injury to all beings. He must be vigilant, diligent, patient, and persevering. He must be ever doing good to all. All Sadhana should be done under the personal direction of a Guru or spiritual teacher.

Tantra Sadhana

Bhuta Suddhi is an important Tantric rite. It means purification of the five elements of which the body is composed. The Sadhaka (aspirant) dissolves the sinful body and makes a new divine body. He infuses into the body the life of the Devi.
Nyasa is a very important and powerful Tantric rite. It is placing of the tips of the fingers of the right hand on various parts of the body, accompanied by Mantra.

In Kavacha the one Brahman is invoked by different names in order to protect different parts of the body. For example, Parabrahman is thought of as in the Sahasrara Padma in the head. The Supreme Lord is meditated upon in the heart. Protector of the world, Vishnu is invoked to protect the throat, so that the aspirant may utter the Mantras of his Ishta Devata.
Mudra is ritual of manual gestures. Mudra gives pleasure to the Devatas. There are 108 Mudras. In welcoming (Avahana) the Devata an appropriate gesture is made. In making offering (Arghya) Matsya Mudra is made. The right hand is placed on the back of the left and the two thumbs are extended finlike on each side of the hands. Similarly, there are Mudras for the various acts done during the worship.
Yantra takes the place of the image. It is an object of worship. Yantra is a diagram, drawn on paper. It is engraved on a metal sheet also. A Yantra is appropriated to a specific Devata only. Various Yantras are peculiar to each Devata. They are various designs according to the object of worship. Yantra is the body of the Devata. All the Yantras have a common edging called Bhupura. They have a quadrangular figure with four doors, which encloses and separates the Yantra from the external world.
The Sadhaka first meditates upon the Devata or Deity and then arouses the Devata in himself. He then communicates the Divine presence thus aroused to the Yantra. When the Devata has been invoked into the Yantra by the appropriate Mantra, the vital airs (Prana) of the Devata are infused therein by the Pranapratishtha ceremony. The Devata is thereby installed in the Yantra. The materials used or acts done in Puja are called Upachara. They are sixteen in number, viz., (1) Asana (seating of the Devata); (2) Svagata (welcoming of the Devata); (3) Padya (water for washing the feet); (4) Arghya (water for ablution); (5) Achamana (water for sipping); (6) Madhuparka (honey, ghee, milk, and curd); (7) Snana (bath); (8) Vastra (cloth); (9) Abharana (jewels); (10) Gandha (perfume); (11) Pashpa (flowers); (12) Dhupa (incense); (13) Dipa (light); (14) Naivedya (food) and Tambulam (betel); (15) Nirajana (Arati); and (16) Vandana (prostration and prayer).
Sadhakas are of three kinds, viz., Pasu (animalistic), Vira (valorous), and Divya (divine).

The Pancha Tattva

The Pancha Tattva is essential for the worship of Sakti. The Pancha Tattvas are wine (Madya), meat (Mamsa), fish (Matsya), parched cereal (Mudra) and sexual union (Maithuna). As they all commence with the letter M, they are vulgarly called Pancha-ma-kara or five M's. The Pancha Tattvas stand for drinking, eating and propagation. The Pancha Tattvas, the five elements of worship destroy great sins, Maha-pataka-nasanam.

The Pancha Tattvas have not always their literal meaning. The meaning differs according as they refer to the Tamasic (Pasu), Rajasic (Vira) or Sattvic (Divya) Sadhanas respectively.
Wine may be wine; or it may be coconut water or it may mean God-intoxication or the intoxicating knowledge of Brahman or the Absolute. Wine is a symbol to denote the Supreme, eternal Bliss of Yoga knowledge, or knowledge of Atman (Atma-jnana).
The union of Siva and Sakti in the upper brain centre known as Sahasrara or thousand-petalled lotus is Maithuna.
Mamsa (meat) is the act by which the aspirant consecrates all his actions to the Lord.
Matsya (fish) is that Sattvic knowledge by which the Sadhaka sympathises with the pleasure and pain of all beings.
Mudra is the act of abandoning all associations with evil which leads to bondage.
Wine is fire; flesh is air; fish is water; cereal is earth; sexual union is ether.
Milk, ghee, honey are all substitutes for wine. Salt, ginger, sesamum, white beans, garlic are substitutes for meat. White brinjal, red radish, masur (a kind of grain) and red sesamum are substitutes for fish. Paddy, rice, wheat and grain are Mudra. Offering of flowers with the hands formed with a particular Mudra is Maithuna.
The Sadhaka thinks that he has got a Deva body. This is Bhuta- Suddhi. Various Nyasas are performed. Mental worship is performed of the Devi who is thought of as being in red raiment seated on a red lotus. Her dark body is like rain-cloud. Her forehead is shining with the light of the crescent moon. Japa of Mantra is then done. Thereupon there is external worship.
Sexual intercourse by a man with a woman who is not lawful to him is a sin. The Vaidika Dharma is very strict on this point. It forbids not merely actual Maithuna but Ashtanga or eightfold Maithuna namely Smaranam (thinking upon it), Kirtanam (talking of it), Keli (play with women), Prekshanam (making eyes at women), Guhya-bhashanam (talking in private with women), Sankalpa (wish or resolve for sexual union), Adhyavasaya (determination towards it), Kriyanishpatti (actual accomplishment of the sexual act).
A Tantric can have copulation with his wife. He calls his wife his Sakti. Wife is a house-goddess Griha-lakshmi or Griha-devata united to her husband by the sacramental Samskara of marriage. She should not be regarded as an object of enjoyment. She is his partner in life (Ardhangini). The union of a man and his wife is a veritable sacred scriptural rite.

Conclusion

Tantra Yoga is the saving wisdom. It is the marvellous boat which takes man safely to the other shore of fearlessness, immortality, freedom, and perfection, when practised with understanding under personal guidance of well-established Tantric Guru.

शब्दार्थ  :ऑर्थोडॉक्स -रूढ़िवादी /परम्परागत /शाश्त्र सम्मत ,; सेक्युलर -संसारी /ऐहिक /लौकिक /धर्म से इतर ,; त ट्रीटाइज़-प्रकरण /प्रबंध  /आलेख ; मैन्युअल -नियमावली /गाइड/नियम पुस्तिका ; आनटालजी -सत्तामूलक /तात्त्विकी /सत्ता मीमांसा ; ट्रेवेस्टी -उपहास का विषय बनाना ,भड़ौआ करना ,भौंडी नकल उतारना ,हास्यजनक अनुकरण ; परसीवीअरिंग -दृढ़ बने रहने वाला ;इन्फ़्यूज़ -उड़ेलना ;एबलूशन -अभिषेक ,स्नान ,अपमार्जन ; 

Reference :http://www.dlshq.org/teachings/tantrayoga.htm



आधुनिक जीवन का कथानक है अरण्य काण्ड

अरण्य-काण्ड  आधुनिक जीवन का जीपीएस है।

आधुनिक जीवन का कथानक है अरण्य काण्ड।  

भाव -सार :

 अरण्य कांड  का सूत्र है संतुलन। जीवन संयम से अधिक संतुलन का नाम है। संतुलन भूत का भी है भविष्य का भी है वर्तमान का भी है। जो चल रहा है उसे पकड़ना है और जो आने वाला है उससे वर्तमान को जोड़ना है ,भूत को भूलना है। नै पौध से जुड़ना है। 
अगर आप अशांत है ,तुलसी के पौधे को पकड़ के खड़े हो जाइये ,प्रकृति से जुड़िए ,जड़ से भी चेतन जैसा व्यवहार कीजिये अभी तो हम चेतन के साथ भी जड़ जैसा व्यवहार कर रहें हैं। 

जिससे भी सुनें ,पूरा सुनें ,किसी से कोई अपेक्षा न करें ,अ -करता रहें आप निमित्त मात्र बने रहें ,करें वही जो कर रहें हैं अपने को बस करता न माने । जड़ में चेतन को देखेंगे तो चेतन में चेतन को क्यों न देखेंगे फिर। ये सारे सूत्र हैं अरण्यकाण्ड के। 

अरण्य का सामान्य अर्थ है जंगल। जीवन का एक हिस्सा वन में ज़रूर बीतना चाहिए एक संघर्ष का जीवन है वन का जीवन। मनुष्य के जीवन में अरण्य काण्ड भी   होना चाहिए ,अरण्य बोले तो संघर्ष। 

असुविधाओं में रहने की भी आदत हो। अपने जीवन की तीन स्थितियों में संतुलन बना के रखें। वर्तमान में एकाग्रता बनाये रहें अतीत को विस्मृत कर दें ,आज को आने वाले कल से जोड़े। अभाव में जीना सीखें। जंगल में आपको वन्य प्राणियों की आवाजाही अच्छी लगेगी थोड़ी देर अपने (आपके मेरे )भीतर एक संन्यास घटना चाहिए।

'भगवान् से मिलन -जिस दिन मैं भिक्षा मांगने गया मेरे जीवन से अहंकार गल गया।मेरे जीवन में राम आ गया।' 
एक राजा का सहज बोध है यह -जिसका खुलासा यह कथा करती है ,उस राजा का जो भगवान् से मिलना चाहता था। 
अरण्य काण्ड में भगवान् राम पांच बार बोलते हैं। पूरी मानस में बहुत कम बोले हैं।

एक बार  चुनि  कुसुम सुहाए , 

निजी कर भूषन राम  बनाये।

 अपने हाथों से एक बार राम ने आभूषण बनाये पुष्पों से खुद ही फूल चुनकर लाये। नित्य का कर्म और  क्रम यह था सीता जी राम जी की सेवा करतीं थीं फूल चुनकर सीता जी लाती  थीं।भगवान् राम ने स्त्री और पुरुष को यहां बराबर कर दिया है। अब हमारे जीवन में जो घटनाएं होंगी उसमें प्रमुख भूमिका तुम्हारी होगी सीते !

स्त्री और पुरुष के दायित्व स्त्री और पुरुष होने से अलग अलग नहीं रहें हैं और आज दोनों के दायित्व सांझा हो गए है परिस्थितियों  के बोझ से। दायित्व केवल भूमिका के कारण बदले गए थे।लैंगिक अंतर् होने की वजह से नहीं था ऐसा। 

भगवान् शंका करने  का विषय नहीं हैं  जिज्ञासा का है। शंकर भगवान पार्वती जी को सावधान करते हुए कहते हैं राम चरित बड़ा गूढ़ है। सावधान होकर सुनो। 
जिस दिन हम भगवान् के विरुद्ध काम करते हैं उस दिन हम जयंत बन जाते हैं ,हमें फिर कोई नहीं बचा  सकता। यही इंद्र -पुत्र जयंत सीता जी के पैर  में चौंच मार के  भागा था।सीता माँ ने एक तिनका पृथ्वी से उठाया और अभि-मन्त्रित करके छोड़ दिया वही ब्रह्मास्त्र बन गया ,जयंत के पीछे लग गया। अब उसे यह सम्पूर्ण जड़ संसार मृत्युवत दिखलाई देना लगा। नारद जी ने रास्ता बतलाया -

उस ब्रम्हास्त्र ने उसकी एक आँख फोड़ दी ताकि अब वह सबको एक दृष्टि से देख सके बिना भेदभाव के। 

कथा भाव का विषय है भीड़ का नहीं। भीड़ भगवान् को पसंद नहीं है। जब जीवन में कुछ विपरीत आये तो भी  दूसरों का भला करने से मत चूकिए भगवान् राम यही सिखाते हैं विभिन्न आश्रमों में जाकर वनवासी राम  प्रतिज्ञा करते हैं इस धरा को मैं राक्षसों से विहीन कर दूंगा। ऋषियों से अगस्त्य मुनि एवं अन्यों  से  राम पूछते हैं राक्षसों को कैसे मारते हैं बस आप हमें बताइये।  

'शून्य' से 'शिखर' का संघर्ष हैं 'राम' जिनके पास वन में कुछ नहीं है राक्षसों  के पास सब कुछ है वे समर्थ हैं। राम के पास भरोसा है ,और वनवासी राम के भरोसे हैं। प्रतिकूलताओं में से अनुकूलता निकालना सिखाते हैं राम। 

जीवन में कुछ समय अरण्य काण्ड ज़रूर पढ़िए :अतीत को भूलिए वर्तमान को पकड़िए ,पकड़े  रहिये ,भविष्य से जोड़िये।योग और मेडिटेशन वर्तमान में जीने का साधन है। भूलना है अतीत को ,भूत को और जुड़ना है भविष्य से। 

राम गीता :भगवान् चित्रकूट छोड़ के पंचवटी आ गए हैं लक्षमण उनसे प्रश्न करते हैं ,राम उत्तर देते हैं इन प्रश्नों का यही राम गीता है। मन को शून्य करें ,और चित्त को शुद्ध करें मति को एकाग्र करें। यहां भगवान् सुन ने की कला सिखाते हैं। बावन पंक्तिं हैं इस गीता में जिसमें  लक्ष्मण जीवन से सम्बंधित प्रश्न पूछते हैं :

चित्रकूट रघुनन्दन आये ,

समाचार सुनी मुनि जन आये।

 घिरे रहते थे भगवान् यहां लोगों से लक्षमण जी को निकट के अन्य लोगों को मौक़ा ही नहीं मिलता था भगवान् से बात करने का। हमारे आधुनिक जीवन में ऐसा अक्सर होता है। 

बोले रघुवर कहहुँ  गुसाईं। 

सुनहुँ तात  मति मन चित लाई  

मैं और मोर तोर ये माया,

इस संसार में मन जहां तक चला जाए वहीँ तक माया है। मन को गलाइए अहंकार को गलाइए। ये मन ही सारे क्रोध की जड़ है आपके क्रोध का कारण यह आपका अहंकार ही है। कोई बाहरी साधन या व्यक्ति नहीं। 

ज्ञान गुण  नीति और वैराग्य पर (वैराग्य के साथ) घर में चर्चा होनी चाहिए। अरण्य काण्ड जीवन को समझाने का काण्ड है रिश्ते आज बोझ बन गए हैं। अरण्य काण्ड रिश्तों की आंच को बनाये रखना सिखाता है। रिश्तों की निष्ठा खत्म होने का मतलब है हमारे अंदर निष्ठा समाप्त हो गई है। राक्षसों की कोई निष्ठा नहीं होती। सूपर्ण खा राम के यह कहने पर मैं तो शादीशुदा हूँ मेरे भाई लक्ष्मण के पास जाओ वह अविवाहित है दोनों को खाने की धमकी देती है राम के इशारे पर लक्ष्मण उसके नाक कान काट देते हैं।  

सूपर्ण खा के नाक कान काटना रावण को चुनौती थी। क्योंकि मुकाबला यहां उसी से करना था। 

रावण का वंश हमारे अंदर है सूपर्ण खा रावण को कहती है मैं आपके लिए एक सुन्दर महिला को लेने वन गई थी वहां उसके साथ दो राजकुमार थे उन्होंने मेरा ये हाल कर दिया। तुम मदिरा पीकर यहां पड़े रहते हो देखते नहीं हो कितनी बड़ी विपत्ति तुम्हारे सर पे खड़ी है।अपने भाई को उकसाती है गलत बोलकर। हम अपने ही लोगों को गलत मार्ग दिखलाते हैं। अरण्य काण्ड हमें यह बतलाता है। 

जीवन में शुभ के नीचे अशुभ चलता है अशुभ के नीचे शुभ विवेकपूर्ण होकर एक का चयन करना ही होता है मारीच प्रसंग हमें यही बतलाता है। मारीच जानता था जो रावण का मामा था मरना तो निश्चित है क्यों न भगवान राम के हाथों मरूं। 

आस्तीनों में सांप जो न पाले होते ,

तो अपनी किस्मत में भी उजाले होते। 

जब रावण से रिश्ता रखा तो खामियाज़ा तो भरना ही पड़ेगा ।

स्त्रियों की स्वर्ण और आभूषण में विशेष रूचि होती है सुंदर आकृति का स्वर्ण मृग देखा सीता जी मचल उठीं भगवान ये मुझे चाहिए। मोह और लोभ से जुडी सीता मारीच की आवाज़ से भ्रमित होतीं हैं।  लक्ष्मण  राग के प्रतीक हैं उन्हें ये मायावी आवाज़ सुनाई नहीं देती। सीता लक्ष्मण को कटु वचन बोलतीं हैं उन्हें विवश कर देतीं हैं वह सीता जी को छोड़कर चले जाएँ। 
रावण कुत्ते की तरह आता है वही रावण जिसके डर से तीनों लोक कांपते हैं। बावले कुत्ते सा हो जाता है रावण।    




गलत मार्ग पर चलने से आदमी का तेज़ और अंदर का बल चुक जाता है।जटायु संघर्ष करता है और मारा जाता है मनुष्यता की ऊंचाई पर था जटायु और रावण पशु की नीचता पर। 

रावण जब घर में आता है तो घर की शान्ति भंग हो जाती है। राम शबरी के बेर खाते हैं जिनका अर्थ है समर्पण। 

 पकड़ी  गई कड़वाहट जब ते , रिश्तों के उलझे ढेर में जब 

ढूंढ रहें हैं मिठास रामजी,फिर  शबरी के बेर में।  

बड़े शौक से सुन रहा था ज़माना ,

तुम ही सो गए दास्ताँ कहते कहते। 

स्त्री को कभी निर्जन स्थान पर मत भेजना कितनी भी बल शाली हो।

शास्त्र कितना भी पढ़ लो ये मत मान ना कभी ,पूरा ज्ञान प्राप्त हुआ।  राजा को कभी वश में नहीं मान ना। काम क्रोध और लोभ को जीवन से दूर रखना भगवान् राम गीता में बतलाते हैं। 

भगवान् शंकर पार्वती जी को कथा सुना रहे हैं उन्हें अनायास यह पंक्ति याद आती है :

उमा कहहुँ मैं अनुभव अपना ,
सच हरि  भजन जगत सब सपना। 

नारद भगवान् से क्षमा मांग रहें हैं आप ने मेरे  शाप को अंगीकार किया  उसी से आप दुःख पा रहे हैं।भगवान् कहते हैं जैसे माँ अपने बच्चों को रखती है वैसे ही मैं अपने भक्तों की संभाल  रखता हूँ। तुम मेरी संतान हो मैं तुम्हें संभाल के रखता हूँ। 
भगवान कहते हैं मैं संतों के वश में रहता हूँ। उनमें छः विकार नहीं होते।  

आपके जीवन में कभी संन्यास हो कभी संसार हो। एक बार सांस भीतर(संन्यास ) एक बार बाहर निकालना(संसार )। 

अरण्य काण्ड का समापन सतसंग से होता है भगवान् अगर थोड़ा सा भी मिला है तो खूब बाँटिये  बांटने से परमात्मा बढ़ता है अगर आपकी नाव में थोड़ा सा भी भक्ति का जल आ जाए तो उसे खूब उलीचना बांटना। सतसंग भीतर उतरकर पकड़ने का मामला है अंतर मन से सुनिए सत्संग। जय श्री राम।  


सन्दर्भ -सामिग्री :https://www.youtube.com/watch?v=jCyD8J_CF5A