शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

Delhi: In current Covid wave, docs say many kids younger than 5 among patients(Hindi )

 Passengers at Anand Vihar Bus Terminal in New Delhi, Wednesday, April 14, 2021. (PTI Photo/Manvender Vashist, File) 

ये समय लापरवाही का नहीं है जबकि हमारे नौनिहाल ,बालक -वृन्द  , छात्रागण  ,किशोर -किशोरियां  भी कोविड संक्रमण की दिनानुदिन चपेट में आते जा रहे हैं। विषाणु सार्स -कोविड -२ अपनी कांटेदार प्रोटीन -कोट बदल रहीं हैं  उत्परिवर्तित हो रही है। दो -दो बार। डबल म्युटेंट किस्म भारत में दर्ज़ हुई है। ब्रिटेन ,दक्षिण अफ्रिका और भारत म्युटेसन किस्म के मामले में एक दूसरे से बाज़ी मार रहे  हैं। 

कोई उम्र का लिहाज़ नहीं करता है यह आतताई विषाणु नवजात पैदा होते ही इसकी चपेट में आएं हैं। डेढ़ माह का  एक शिशु आईसीयू में  पहुंचा है। चार से छः हफ्ता शिशु ,०-१७ साला टोली इसकी जद में आ चुकी है। 

भले किशोर -किशोरियों में लक्षण उग्र न भी हों आगे काविड के तेज़ फैलाव का खतरा बदस्तूर कायम है। शिशुओं में बालकों में तीन दिन की अवधि तक तेज़ ज्वर बना रहे ,पेट दर के साथ उलटी दस्त शिकायत ,पेशीय दर्द बदन दर्द ,बे -हद की थकान नै लहर के कोविड रोग के ज्ञात लक्षण हैं। 

यह डरने का नहीं सम्भलने अपनी ज़िम्मेवारी समझने का वक्त है। जब आप अपना बचाव करते हैं तब आप अन्यों को भी बचा रहे हैं। खुद बचे रहे ,शिशुओं को बचाये रहें सब बच जाएंगे। 

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।

‘रहिमन’ मूलहि सींचिबो, फूलहि फलहि अघाय॥   



The ongoing Covid-19 surge is taking a toll on children’s health with several hospitals reporting a sharp rise in the number of children between the age of one and five landing up in hospitals. Unlike last year, the virus is affecting infants, with some as young as one-and-a-half months old getting admitted to hospital.

Dr Dhiren Gupta, Pediatric Intensivist at Sir Ganga Ram Hospital, said, “The virus is spreading to the pediatric age group in the current surge. The number of children coming to the hospital with Covid-19 has increased five times as compared to last year. We even have a three-month-old infant admitted to the ICU with Covid-19 and pneumonia. While we are getting swamped with young children and teenagers, the most affected age group is between one to five years in this category.”

On Wednesday, Delhi reported the highest single-day spike with 17,282 new cases of Covid-19 and 104 deaths. A total of 1,08,534 tests have been conducted with 15.92 per cent people testing positive for the infection.

The most common symptoms observed in children include high fever, vomiting, diarrhea and headache.

Dr Rahul Nagpal, Director, Pediatric and Neonatology at Fortis Hospital Vasant Kunj, said, “We are getting a lot more children now across all age groups. The youngest child who has Covid-19 is six weeks old. The number was insignificant last year but it has increased exponentially this time. The families of most of the younger ones are also positive. Even teenagers are getting infected, and, in that case, only one or two family members are affected.”

At least 50 per cent of the children surveyed during the fifth round of serological surveillance in Delhi were found to have antibodies against Covid-19, indicating that children do have equal exposure and an adequate number of antibodies levels when compared to adults.

A total of 1,307 children above five years and less than 12 years were included in the survey that had tested 28,000 people between January 15 and January 23. The prevalence was higher among females with 52.49 per cent of those tested having antibodies, while 48.41 per cent males were found to have the antibodies against the virus.

According to the doctors, the surge in cases can be attributed to the laxity in the behaviour of the general public over the last few days. While the severity in younger children is not very high, experts feel that adults in the family should continue following Covid-appropriate behaviour to ensure no one else is infected in the family.

Dr A J Chitkara, director & HOD, pediatrics at Max Super Speciality Hospital, Shalimar Bagh, said, “Since people were taking due precautions, the number was much less last year. This second surge is affecting many children, especially those younger than five years. This is also because the overall number of adults getting infected is more and somehow people have stopped following the Covid-appropriate behaviour. Fortunately, younger children do not suffer much, but it doesn’t mean they don’t suffer at all. If the child runs a high fever beyond three days, is irritable, refuses to eat, breathes heavily or gets severe abdominal pain or diarrhea, then the patient must contact a pediatrician at the earliest.”

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

यजुर्वेद में आया है यह मंत्र -शैव इसे शौक से भजते गाते हैं आरती रूप में। कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेंद्रहारं , सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि

यजुर्वेद में आया है यह मंत्र -शैव इसे शौक से भजते गाते हैं आरती रूप में। 

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेंद्रहारं ,

सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि। 

त्रिदेवों में एक ,देवो  में देव ,देवादिदेव ,शंकर ,रूद्र , भोलेनाथ,नीलकंठ ,महादेव ,पशुपतिनाथ सर्वाधिक लोकप्रिय लोकश्रुत हिन्दू देवता हैं। आकस्मिक नहीं हैं भारत में सबसे ज्यादा शिव मंदिर हैं। शिव का पूरा परिवार परम् पूज्य है। सेकुलर है यहां पूर्ण सामंजस्य है समरसता है। निर्वैर हैं यहां चूहा -सर्प -मोर - नंदी और बाघ में जबकि फ़ूड चेन में सर्प का भोजन चूहा और मोर का आहार सर्प बनता है। बाघ या शेर तो फिर शेर है नंदी को कहाँ छोड़ेगा। शिव परिवार में सब समरस हैं।प्रेमिल हैं।  

शिव मृत्यु का देवता है यमराज इन्हीं से आदेश लेते हैं। तांडव नृत्य सृष्टि का महाविस्फोटीय आगाज़ भी है अंजाम भी .

It is a dance of creation .  

संहार और रचना रचनान्तर का देवता है शिव। शिव सबसे बड़े वैष्णव है राम भक्त हैं । शिव का अर्थ ही है मांगलिक मंगल शुभ। सभी जीवों के रक्षक संरक्षक रूप आप पशुपतिनाथ है। पशु का एक अर्थ जीव होता है। पापेश्वर हैं शिव सदैव ही जीवों के लिए  कल्याणकारी हैं। शुभ करता शंकर कहलाते हैं आप। 

शुभंकर  है शिव। त्रिपुरारी हैं त्रिपुर राक्षस (आतंकी और आतंकवाद )दोनों का वध करने वाले हैं। जीव के  दैहिक ,सूक्ष्म ,कारणिक तीन शरीर हैं ग्रॉस ,सटल ,कौजल ,तीनों से मुक्त कर अंतिम मृत्यु प्रदान करते हैं शिव ,इसके बाद जन्म नहीं लेना पड़ता।मोहमाया ममता लोभ सबका नाश करते हैं शिव।  जीव के लिए आतंक रचते आतंकी हैं।  

शिव के स्वरूप लावण्य को रेखांकित करता है ये यजुर्वेदीय मन्त्र शिव विवाह के समय स्वयं महाविष्णु इसे गाते हैं। आनंदातिरेक  अनुभूति करता है शैव इसमें अवगाहन कर स्वेत कमल पुष्प अनघ शिव स्तुति से। शिव के रूप लावण्य का प्रतीक हैं पंक्तियाँ :कर्पूरगौरं

महज़ शमशान वासी नहीं हैं शिव विमुक्तेश्वर भी हैं ,परम वैरागी हैं। कपूर की तरह कांतिमान हैं शिव करुणा के मूर्त रूप हैं ,करुणा का आप मानवीकरण हैं। करुणा के सगुन रूप हैं। 

जिस सर्प से सब भय खाते हैं आप उसे कंठहार बनाते हैं लंगोट रूप (कोपीन ) भी उसी को धारण करते हैं। जीवों के हृदय के गह्वर में कमलरूप आप सदा विराजते हैं जीवों की आत्मा आप ही हैं। जिसे कलुष छू नहीं सकता जो पवित्र है सांसारिकता से ,संसार की कीच से परे है। ऐसे शिव की  जिनकी अर्धांगिनी देवी पार्वती हैं  हम वंदना करते हैं गुण -गायन  करते हैं शैलपुत्री संग। यही भाव सार है इस मंत्र का। 

Karpoor Gauram Karunavataram with lyrics | कर्पूर गौरव करुणावतारम | Shiv Mantra

https://www.youtube.com/watch?v=3nATsNWJbmA   

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

'ऐं 'बीज मंत्र की महत्ता :इस बीज मंत्र की महत्ता जानकर ही भारतीय मनीषियों ने नवजात शिशु की जिह्वा पर अष्टगंध में मधु मिलाकर 'ऐं ' लिखने की व्यवस्था दी है , जिससे बालक की वाणी और विद्या का विकास होता है। इससे ही मनुष्य जीवन सार्थक बनता है।

ऐं (सरस्वती बीज):बीज मंत्र की महत्ता 

इसका अर्थ है- जगन्माता सरस्वती मेरे दुख दूर करें। इस बीज मंत्र के जप से मां 

सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है और विद्या, कला के क्षेत्र में व्यक्ति दिन दूनी रात 

चौगुनी तरक्की करता चला जाता है।

आद्या शक्ति भगवती दुर्गा के नाना स्वरूप ,मुद्राएं और ध्यान विधियां हैं। इसमें माँ 

 सरस्वती ,महालक्ष्मी और महाकाली विशेष प्रसिद्ध  हैं ,जो क्रमश : चित् सत् और 

आनंद रूपिणी हैं।   

हालांकि यह स्वरूप और क्रिया भेद ही है। वस्तुत : वह परम सत्ता एक ही है। इनका 

नर्वाण मंत्र  : 

'ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे'सर्वार्थ सिद्धिदाता है। यहां हम उनके बीजाक्षर मंत्र 'ऐं 'की महत्ता विवेचित करते हैं। यह उनके महा सरस्वती रूप का मंत्र है ,जिसमें सृष्टि समाहित है। ऋक ,यजु और साम वेदों

 के प्रथम अक्षर को मिला देने से 'ऐं' बन जाता है ,जो अनुस्वार रहित सरस्वती का बीज मंत्र है। 

अनुस्वार सब वर्णों पर मुकुट मणि है ,जिसके योग से इसकी महिमा वर्णातीत हो जाती है। यह 'राम' 

के म का चिन्ह रूप है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है कि अक्षरों में मैं अकार हूँ। इस प्रकार 

'ऐं ' बीज मंत्र में राम और कृष्ण समाहित हैं। 

देवी भागवद में इस  बीज मंत्र की महिमा पर ब्राह्मण बालक उतथ्य की कथा आई है , जिसके 

अनुसार अनपढ़ होने के कारण उसे घर से निकाल दिया गया था। वह वन में रहकर सत्यव्रती होकर 

तप करने लगा। एक दिन एक व्याध के शर से विद्ध हुआ शूकर उसकी कुटिया में आ गया। करुणा 

से द्रवित उतथ्य चिल्ला उठा ' ऐ ऐ ' .माता सरस्वती ने इसे अपने बीज मंत्र 


'ऐं 'का अनुस्वार रहित जप मान लिया और सिद्ध हो गईं। इससे उतथ्य महान विद्वान और कवि हो गया 

. जब व्याध आया और शूकर का पता पूछा तो वह कहा , '  जो देखता है यानी नेत्र वह बोल नहीं सकता और जो बोल सकता है यानी मुख उसने देखा नहीं। 'इस प्रकार सारस्वत सिद्धि होने से उस वन्य जीव

 और सत्य दोनों की रक्षा हो गई। 

इस बीज मंत्र की महत्ता जानकर ही  भारतीय मनीषियों ने नवजात शिशु की   जिह्वा पर अष्टगंध में मधु मिलाकर  'ऐं ' लिखने की व्यवस्था दी है , जिससे बालक की वाणी और विद्या का विकास होता है।

  इससे ही मनुष्य जीवन सार्थक बनता है। 

                             ---------------रघोत्तम शुक्ल 

सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )ऊर्जा ( दैनिक जागरण १३ अप्रैल २०२१ ),

(२ )गूगल सर्च बीजमंत्र 

 

 
 

रविवार, 11 अप्रैल 2021

कमरे की दीवारें बोलती भी हैं सुनतीं हैं चहचहाती भी हैं ,हमारे संग रुदाली भी बनती हैं। दीवारों से एक माहौल की सृष्टि होती है-हमारे सुख की, अंतरंग क्षणों की साक्षी बनतीं हैं दीवारें

यादों के भंवर में डूबती -उतराती बेहतरीन रचना -भावबिम्ब सजीव -जी हाँकमरे की दीवारें बोलती भी हैं सुनतीं  हैं चहचहाती भी  हैं ,हमारे संग रुदाली भी बनती हैं। दीवारों से एक  माहौल की सृष्टि होती  है-हमारे  सुख की, अंतरंग क्षणों की साक्षी बनतीं हैं दीवारें  -तुम कहते हो दीवारें  सिर्फ दीवारें  -वह कहता ज़िंदा शख्सियत ,संवेदना का स्रोत होती हैं हंसती बोलती गाती दीवारें ,मैं तो सिर्फ सहभावी बना हूँ सहभोक्ता भी आप भी सांझा करें दीवारों को बधाई दें आशीष दें शकुंतला जी की इस रचना को। 
वीरुभाई (वीरेंद्र शर्मा ) 
veerubhai1947.blogspot.com
veerujan.blogspot.com

विशेष :आपकी यह रचना मैं ने राम राम भाई ब्लॉग पे सांझा की है पुनर्प्रकाशित की है। 

मेरा कमरा जानता है......
मैं कितनी भी लापरवाह रहूं पर
हर चीज को करीने से ही रखूंगी
कमरे का कोना कोना 
बड़े ही प्यार से सजाऊंगी
मेरा कमरा जानता है.....
कि मैंने न जाने कितनी सारी 
यादों को संजो के रखा है
न जाने कितनी बातें सांझा की है
मेरा कमरा जानता है..…
मेरे बचपन की कितनी खट्टी मीठी बातें
न जाने कितनी रातें मां के प्यार
दुलार,लोरियों के बिना काटी है
मेरा कमरा जानता है कि
मैं कितना रोई थी मां के जाने के बाद
मेरा तकिया भी मेरे साथ रोता है हर पल
हर तरफ बस मां की यादें हैं
मेरा कमरा जानता है .....
वो दादाजी और दादीजी की प्यार भरी बातें 
मेरी हर ज़िद को पूरा करना 
मां मारती तो दादी डांटती दादा दुलार करते
मेरा कमरा जानता है .......
हम भाई बहनो का आपस का जुड़ाव
वो लड़ना झगड़ना फिर एक हो जाना
एकदूसरे की गलतियों को छुपा लेना
मेरा कमरा ही जानता है..…
कितने अकेले हो गए हैं हम और हमारा कमरा
बस जुड़ी है सारी बातें , यादें ,वादे ,कसमें, झगड़े ,लोरिया,त्योहार, पागलपन सब कुछ 
मेरा कमरा ही जानता है ...…

शकुंतला


अयोध्या (फैज़ाबाद) 

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

रहिये लटपट काटि दिन ,बरु घामे माँ सोय, छाहँ न बाकी बैठिये ,जो तरु पतरो होय. जा तरु पतरो होय,एक दिन धोखा देहैं , जा दिन बहे बयार ,टूटि तब जर से जैहैं।-कविवर गिरधर की कुंडलियां : भावार्थ सहित

कविवर गिरधर की कुंडलियां : भावार्थ सहित 

                    (१ )

जानो नहीं जिस गाँव में, कहा बूझनो नाम ।

तिन सखान की क्या कथा, जिनसो नहिं कुछ काम ॥

जिनसो नहिं कुछ काम, करे जो उनकी चरचा ।

राग द्वेष पुनि क्रोध बोध में तिनका परचा ॥

कह गिरिधर कविराय होइ जिन संग मिलि खानो।

ताकी पूछो जात बरन कुल क्या है जानो ॥

भावसार :अर्थात:

गिरिधर कविराज कहते हैं कि जिस जगह से तुम्हें  कोई लेना देना नहीं हैं उसके बारे में क्यूँ पूछते हो, ऐसे लोगों की बातें  भी क्यूँ करते हो जिनसे तुम्हारा कोई संबंध नहीं | जिनसे हमें कोई लेना देना नहीं होता उनकी बातें  जो लोग करते हैं उनके बीच दुश्मनी हो जाती हैं |  सौद्देश्य ही लोगों  से मतलब रखो | 

जिस बाग़ के आम नहीं खाना उसके पेड़ क्या गिनना। 

                     (२ )

बीती ताहिं  बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ।

जो बनि आवै सहज में, ताही में चित देइ॥

ताही में चित देइ, बात जोई बनि आवै।

दुर्जन हंसे न कोइ, चित्त मैं खता न पावै॥

कह ‘गिरिधर कविराय यहै करु मन परतीती।

आगे को सुख समुझि, होइ बीती सो बीती॥

भावसार :कविराज गिरिधर कहते हैं कि जो बीत गया उसे जाने दो, बस आगे की सोच, जो हो सकता हैंउसी में अपना मन लगा अगर जिसमे मन लगता है वही करेगा तो सफल जरुर होगा | और ऐसे में कोई हँसेगा नहीं इसलिए कविवर   कहते हैं जो मन कहे वही करो बस आगे का देखो पीछे जो गया उसे बीत जाने दो |

बीत गई सो बात गई ,हो ली सो हो ली 

                           (३ )

गुनके गाहक सहस नर, बिन गुन लहै न कोय ।

जैसे कागा-कोकिला, शब्द सुनै सब कोय ।

शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबे सुहावन ।

दोऊ को इक रंग, काग सब भये अपावन ॥

कह गिरिधर कविराय, सुनौ हो ठाकुर मन के ।

बिन गुन लहै न कोय, सहस नर गाहक गुनके ॥

अर्थात

जिन में  गुण होते हैं उनकी   हज़ारों  की भीड़ में भी पूछ होती हैं और जिनमें  गुण नहीं होते उनको कोई नही पूछता | जैसे कोयल और कौए दोनों की आवाज तो सब सुनते हैं लेकिन सभी को कोकिला की आवाज ही अच्छी लगती है | दोनों समान दीखते हैं एक ही रंग के हैं लेकिन कौआ सभी को अपवित्र लगता हैं इसलिए कवि गिरिधर कहते हैं कि बिना गुण को कोई नहीं लेता,गुणों के सहस्त्र ग्राहक होते हैं |

कांव कांव करता है कौवा ,लगता है कानों को हौवा ,

चुगली करती मैना रानी ,दूर -दूर तक है बदनामी ,

इसीलिए तुम जितना  बोलो ,कम बोलो और मीठा बोलो। 

कागा काको धन हरे ,कोयल काकू देत ,

मीठे बैन सुनाय के सबको मन हर लेय। 

                     (४ )

दौलत पाय न कीजिए, सपनेहु अभिमान।

चंचल जल दिन चारिको, ठाउं न रहत निदान॥

ठाउं न रहत निदान, जियत जग में जस लीजै।

मीठे बचन सुनाय, विनय सबहि  की कीजै॥

कह ‘गिरिधर कविराय अरे यह सब घट तौलत।

पाहुन निसिदिन चारि, रहत सबहि  के दौलत॥

अर्थात

केवल दौलत पाने के लिए ही कार्यं मत करो ना उसका कोई अभिमान करो। दौलत   चंचल जल के समान है जो कहीं नहीं टिकता वैसे ही लक्ष्मी चंचला है  ,एक जगह नहीं टिकती चार दिन के लिए ही  है  | इस जीवन में जीते हुए भगवान का नाम लो, अच्छी वाणी बोलो और सभी से विनम्रता पूर्वक बोलो ,प्रेम करो | कवि  कहते हैं कि पैसा बस चार दिन का है ,बाकी  रहता है बना रहता है सभी के साथ व्यवहार ,प्रेम भाव वही   सच्ची दौलत है

                         (५ )

झूठा मीठे वचन कहि, ॠण उधार ले जाय।

लेत परम सुख उपजै, लैके दियो न जाय॥

लैके दियो न जाय, ऊँच अरु नीच बतावै।

ॠण उधार की रीति, मांगते मारन धावै॥

कह गिरिधर कविराय, जानी रह मन में रूठा।

बहुत दिना हो जाय, कहै तेरो कागज झूठा॥

अर्थात

जो व्यक्ति झूठा होता है वो हमेशा मीठे वचन बोलता है चिकनी चुपड़ी बात कर  आपसे उधार ले जाता है उसे लेने पर अत्यंत सुख महसूस होता हैं लेकिन देने का वो नाम नहीं  लेता |उधार लेकर लौटाना  भूल ही जाता है  वो हमेशा अच्छे व्यक्ति को बुरा कहता है | उधार का लेकर जीना ही उसकी नीति  है जिस पर मरते दम तक वो कायम रहता है।   यह अपने मन में रख लो कि बहुत दिन बीत जाने पर जब तुम उधार लेने जाओगे तो वो मुँह पर बोल देगा कि उधार  लिया इसका तुम्हारे पास क्या सुबूत है ?आपको ही झूठा साबित कर देगा। 

                     (६ )

लाठी में गुण बहुत हैं सदा  राखिये संग ,

गहरी नदी नारी जहां ,तहाँ बचावै  अंग।

तहाँ बचावै अंग झपटि  कुत्ता कहँ मारै ,

दुश्मन दावागीर ,होएं तिनहुँ को झारै  . 

कह गिरधर कविराय सुनो हो धूर  बाठी ,

सब हथियारन  छाड़ि ,हाथ मँह लीजै लाठी। 

भावसार :यहां लाठी का सहज सुलभ अस्त्र के रूप में बखान है। पैदल  पहले लोग एक से दूसरे स्थान को जाते थे। यात्रा को निरापद रखने के लिए लाठी का गुणगायन किया है रास्ते की बाधाओं नदी नालों को इसकी मदद से सहज से पार पाया जा सकता है। मार्ग में कोई चोर उचक्का लुटेरा पीछे लग जाए तो उससे सहज  ही निपटा जा सकता है। भाग खड़ा होवेगा वह लाठी देखके। 

सीधी सच्ची सहज बोधगम्य भाषा में कविवर लाठी की उपयोगिता रेखांकित करते हैं आज भी हरियाणा एवं कई अन्य राज्यों के प्रौढ़ और युवा लाठी लेकर चलते हैं। सुरक्षा कवच है लाठी। 

                            (७ )

कमरी थोड़े दाम की , बहुतै आवै  काम ,

खासा मलमल वाफ्ता , राखै मान। 

उनकर राखै मान ,बंद जहँ आड़े आवै ,

बकुचा  बाँधे  मोट ,राति को झारि बिछावै। 

कह गिरधर कविराय ,मिलत है थोरे दमरी

सब दिन राखै साथ ,बड़ी मर्यादा कमरी। 

 (दमड़ी-पहले प्रचलित एक सिक्का ) ,

भावसार :यहां कंबल  की लोकजीवन में उपयोगिता बतलाई गई है यह सहज सस्ता बहुउद्देश्यक साधन है जो व्यक्ति का मान भी बढ़ाता है ,आड़े वक्त साजो सामान की गठरी इसी में बाँध लो रात्रि को झाड़ पौंछकर बिछावन का काम ले लो। यहां लोकजीवन के सारल्य का चित्रण हुआ है। 

                     (८)

साईं सब संसार में ,मतलब का व्यवहार ,

जब लग पैसा गांठ में ,तब लग ताको यार। 

तब लग ताको यार ,यार संग ही संग डोले ,

पैसा रहे न पास ,यार मुख से नहिं बोले। 

कह गिरधर कविराय, जगत सब लेखा भाई ,

करत बेगरजी प्रीति ,यार बिरला कोई साईं। 

भाव सार :कहावत  मतलबी यार किसके खाये पीये खिसके। 

सब प्यार की बातें करते हैं पर करना आता प्यार नहीं ,

है मतलब की दुनिया सारी ,

यहां  कोई किसी का यार नहीं ,

किसी को सच्चा प्यार नहीं। 

कविवर गिरधर खबरदार करते  हुए पते की बात कहते हैं ,सीख देते हैं -यही दुनिया का ,यहां का चलन है ,रीति है। बनी के(अच्छे दिनों के ,खुशहाली ,मालीहालत )के  सब साथी हैं ,निस्वार्थ प्रेम बिरले ही कोई खुदा  का बन्दा करता है। 

                       (९ )

रहिये लटपट काटि दिन ,बरु घामे माँ सोय,

छाहँ न बाकी बैठिये ,जो तरु पतरो होय.

जा  तरु पतरो होय,एक दिन धोखा देहैं ,

जा दिन बहे बयार ,टूटि तब जर से जैहैं। 

कह गिरधर कविराय छाहँ मोटे की गहिये ,

पाती सब झरि जाय ,तऊ छाया में रहिये। 

भावसार :कविवर सबल की शरण जाने की सघन वृक्ष का आश्रय लेने की बात करते हैं जो आंधी तूफ़ान से बचा सकता है ,जिसकी जड़ें गहरी नहीं है ऐसा निर्बल वृक्ष तो अपनी ही हिफाज़त कर ले यह बहुत है आपको क्या सुरक्षा मुहैया करवाएगा ? घाम धूप में चलना भला कमज़ोर वृक्ष की छाया में न बैठो। 

विशेष :अलबत्ता जब गर्जन मेघों का तांडव हो ,बिजली रह रह के चमकती हो तब किसी भी पेड़ आश्रय न लें। 

                        (१० )

पानी बाढ़ै नाव में घर में बाढ़े दाम ,

दोऊ हाथ उलीचिये ,यही सयानो काम। 

 यही सयानो काम,राम को सुमिरन कीजै ,

पर -स्वारथ  के काज ,शीश आगे धर दीजै। 

कह गिरधर कविराय ,बड़ेन की याही  बानी ,

चलिए चाल सुचाल ,राखिये अपना पानी। 

भावसार :कविवर कहते हैं -परहित सरिस धर्म नहीं भाई ,औरों के काम आओ संकट में ,अच्छे वक्त में भी राम का नाम लो। 

घर धन -धान्य  से परिपूर्ण हो जाए तो इसे सहेजें ना ,मुक्त कंठ से ज़रुरत मंदों  के काम में इसे लगाएं। फलदार वृक्ष ही 

झुकता है ऐश्वर्य प्राप्त होने पर विनम्र रहो ,बिछ जाओ औरों के काम के लिए पहल करो ,यही बड़े बूढ़ों की सीख है।अच्छे 

काम कीजिये इसी में आपका मान सम्मान है।अपने लिए जीये तो क्या जीये ...... |   

https://www.youtube.com/watch?v=WMmtE70IgLY  

विशेष :गिरधर जान मन के कवि हैं मानव मन के अंतर् भावों को जानते हैं नीति वचन है उनका पूर्वा काव्य अनुभव प्रसूत है। अवधि ,पंजाबी और सहज सरल भाषा आपका वैशिष्ठ्य है।  

गिरिधर की कुंडलियाँ केन्द्रीय भाव / मूल भाव

गिरिधर कविराय जी ने अपनी कुंडलियाँ में लाठी और कम्बल के प्रति आदरभाव ,मौकापरस्ती ,सबल का सहारा ,समय के अनुसार कार्य का महत्व आदि बातों को लेकर बड़ी ही मार्मिक ढंग से बात कही है

कृपया यहां भी पधारें :https://www.hindikunj.com/2017/09/giridhar-ki-kundaliya.html#:~:text=%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82%20%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%A8%E0%A4%BE%20%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%8F%20.-,%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%B0%20%E0%A4%95%E0%A5%80%20%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81%20%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AF%20%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B5%20%2F%20%E0%A4%AE%E0%A5%82%E0%A4%B2%20%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B5,%E0%A4%A2%E0%A4%82%E0%A4%97%20%E0%A4%B8%E0%A5%87%20%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A4%20%E0%A4%95


    मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

    ख्वाहिश थी मिरि :छोटी बहर की अतिथि नज़्म :संगीता स्वरूप गीत


    ख्वाहिश थी मिरि , 



    कभी मेरे लिए 

    तेरी आँख से 

    एक कतरा क़तरा  निकले 

    भीग जाऊँ मैं 

    इस क़दर  उसमें 

    कि  समंदर भी 

    उथला  निकले । 

    छोटी नज़्म कहें या क्षणिका बेहद खूबसूरत ख्याल है। 

    क्षेपक :

    ख्वाइश थी मिरि ,

    मौत बन तू आये ,

    बादे मर्ग ,

    तेरे साथ रहूं। 

    विशेष :बादे मर्ग= मौत के बाद। 

    छोटी बहर  की अतिथि नज़्म :संगीता स्वरूप गीत  

    सहभावी -सहभागी :वीरुभाई (वीरेंद्र शर्मा )


    सोमवार, 5 अप्रैल 2021

    शब्द बना दीदी अब गारी चिढतीं ममता -सखियाँ सारी ,कलमा पड़ा सभन पे भारी

    २५ सितंबर १९९० -३० अक्टूबर १९९० की अवधि में विश्वहिंदू परिषद् ,संघ परिवार द्वारा रामरथ यात्रा का आयोजन किया गया। रथ यात्रा से पहले १९८४ में भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा में मात्रा दो सांसद थे  जो बढ़कर २०१४ में २८२ हो गए। ये राम के नाम का ही प्रताप था। सच ही कहा है किसी संत ने राम भारत की प्रात : का प्रथम स्वर हैं। 






    कोई बोले राम राम कोई खुदाए,
    कोई सेवै गोसैया कोई अल्लाहे,

    कारण करण करण करीम कृपाधार रहीम,
    कोई बोले ......


    कोई नावै तीर्थ कोई हज जाए,
    कोई करे पूजा कोई सिर निवाये,
    कोई बोले ......

    कोई पढ़े वेद कोई कतेब,
    कोई ओढ़े निल कोई सुपेद,
    कोई बोले ......

    कोई कहे तुर्क कोई कहे हिन्दू,
    कोई बाँछे भिस्त कोई सिर बिंदु,
    कोई बोले .....

    कहो नानक जिन हुक्म पछाता,
    प्रभ साहेब का तीन भेद जाता,
    कोई बोले........

    सौरभ सोनी
    सरिया, गिरिडीह
    झारखंड।।।






    The Power Of The Moola Mantra (The Oneness )
    मूल मंत्र की शक्ति (एकत्व )
    Whenever you chant the Moolamantra even without knowing the meaning of it ,that itself carries power .But when you know the meaning and chant with that feeling in your heart then the energy will flow million times more powerful .
    जब भी आप मूल मंत्र का जाप करते हैं भले आपको इसका अर्थ- बोध (पता) न हो ,तब भी यह शक्ति लिए रहता है। शक्ति दायक होता है। और यदि मतलब भी इसका पता हो और हृदय उस भाव की अनुभूति और एहसास लिए हो तब ऊर्जा का यह परवाह दस लाख गुना हो जाता है।
    The Mantra is like calling a name .Just like when you call a person he comes and makes you feel his presence ,the same manner when you chant this Mantra ,the supreme energy manifests everywhere around you .
    यह किसी को नाम से बुलाने ,नाम बोलकर आवाहन करने के समान है। जैसे किसी व्यक्ति को पुकारने पर वह आ जाए और अपनी मौजूदगी का कराए ,ऐसे ही जब आप इस मंत्र को जपते हैं परमऊर्जा आपके गिर्द प्रकट होने लगती है।
    As the universe is omnipresent ,the supreme energy can manifest anywhere and at any time .It is also very important to know that the invocation with all humility ,respect and with great necessity makes the presence stronger .
    जैसे यह सृष्टि सब जगह मौजूद है (आकाश की तरह सबको आच्छादित किए है ,सब कुछ आकाश में मौजूद रहता है लेकिन आकाश लिपायमान नहीं होता किसी भी जड़ चेतन से अलिप्त ही रहता है ),यह परम ऊर्जा किसी भी जगह और और किसी भी समय (यानी स्थान और काल में कहीं भी कभी ही )प्रकट हो सकती है। महत्वपूर्ण यह जान ना भी बहुत ज़रूरी है ,इसका आवाहन पूरी विनम्रता ,आस्था ,आदर और ज़रूरियात के साथ करने पर इसका होना ,मौजूदगी , प्राकट्य भी प्रबलतर हो जाता है।
    Mool Mantra
    Om Sat Chit Anand Parabrahama,
    Purushothama Paramatma ,
    Sri Bhagvati Sametha ,
    Sri Bhagvathe Namaha .
    मूल मंत्र
    ॐ सत चित आनंद परब्रह्मा
    पुरुषोतमा परमात्मा
    श्री भगवती समेत: (समेथा )
    श्री भगवते (भगवथे ) नम :
    हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ तत्सत ,हरी ॐ तत्सत
    Om -
    We are calling on the highest energy, of all there is .
    ॐ -सबसे शक्तिमान परमऊर्जा का आवाहन कर रहें हैं हम
    Sat -The Formless
    सत -निराकार (अनंत ,अरूप ,सनातन अस्तित्व )
    Chit -Consciousness of the universe
    चित -सृष्टि का चेतन तत्व (अनंत ज्ञान स्वरूपा चेतना ,सब कुछ का ज्ञान रखने वाली )
    Ananda -Pure love bliss and joy
    आनंद -पवित्र प्रेम आह्लाद और ख़ुशी
    Para Brahama -The supreme creator
    परब्रह्मा -परम रचेता
    Purushothama -Who has incarnated in human form to help guide mankind
    पुरुषोतमा -जो मनुष्य रूप में मनुष्यता का मार्गदर्शन ,निदेशन करने के लिए प्रकट हुआ है।
    Paramatma -Who comes to me in my heart and becomes my inner voice
    whenever I ask
    परमात्मा - जो मेरे हृदय में मेरी अंदरूनी(आंतरिक ) आवाज़ बन के कभी भी बुलाने पे आ जाता है।( मेरा हृदय ही जिसका वास है ,इसीलिए वह वासु है वासुदेव है )
    Sri Bhagvate -The divine mother ,the power aspect of creation
    श्री भगवते -दिव्यश्री माँ ,शक्ति स्वरूपा पहलू सृष्टि का (प्रकृति और पुरुष इसी से तो सृष्टि है )
    Same Tha - Together within
    समे था -एक साथ अंदर (और बाहर भी )
    Sri Bhagvate-The father of creation which is unchangeable and permanent
    श्री भगवते -सृष्टि पिता (मालिक ,मौला )
    Namaha -I thank you and acknowledge this presence in my life . I ask for your guidance at all times
    नम :(नमा :)-मैं तुम्हारा धन्यावाद (शुक्रिया ,साधुवाद )करता हूँ ,इस होने को ,आपकी मौजूदगी को मान्य पाता हूँ ,तस्दीक करता हूँ ,मानता हूँ। तुमसे पथ -प्रदर्शन मिलते रहने की हर दम मांग करता हूँ।
    Om has hundred different meanings.It is said 'In the beginning was the supreme word and the word created everything .That word is Om '.If you are meditating in silence deeply ,you can hear the sound Om within .The whole creation emerged from the sound Om .
    ॐ के अलग अलग सौ मायने -मतलब निकलते हैं। सृष्टि के आरम्भ में यही एक ध्वनि थी (जिसे अलग अलग धर्मों में बे -शक अलग अलग नामों से पुकारा गया है ). इसी एक ध्वनि से साड़ी सृष्टि ,सारा पसारा ,सारी कायनात उपजी ,पैदा हुई। यह एक शब्द ॐ है (सनातन वैदिक धर्म में ,कहीं ये ओअंकार है ,ओंकार ,प्रणव ,हुम् ,आमीन ,आमेन ,शालोम ,शिन ,मेम ,अलिफ़ ).यदि आप गहन अवस्था में डुबकी लगाए हैं ध्यान की आपको अपने अंदर यह ध्वनि ॐ सुनाई देगी। पूरी सृष्टि (ब्रह्माण्ड सारा )इसी से प्रसूत हुई है .
    Sat Chit Ananda
    सत चित आनंद (सच्चिदानंद )
    Sat -The all penetrating existence that is formless ,shapeless ,omnipresent ,attributes less , and quality less aspect of the Universe . It is the Un -manifest . It is experienced as emptiness of Universe .......
    सत -से अभिप्राय है सर्व -व्यापी अस्तित्व जो अरूप है ,जिसकी कोई आकृति -कोई मूरत नहीं है ,निराकार है,सब जगह मौजूद रहता है जो ,प्रत्येक काल में यकसां बना रहता है ,अपरिवर्तन शील (इसीलिए तो एक साथ सब जगह है ,आकार तो एक बार में एक ही जगह होगा ,छोटा या बड़ा अपना वही रूप लिए हुए ),निर्गुण है यानी तीनों गुणों सतो -रजो -तमो से परे ,यही ब्रह्म का निरंकार रूप है। निर्गुण कहा गया है इसे ही ,इसे कैसा भी कोई भी गुण देकर सीमित नहीं किया जा सकता है ,अनंत अस्तित्व है यह।
    We could say it is the body of the Universe that is static .Everything that has a form and that can be sensed ,evolved out of this Un -manifest .It is so subtle that it is beyond all perceptions .......
    हम कह सकते हैं ये ही है इस कायनात का बदन (देह ,शरीरा )जो थिर (स्थिर ,कायम रहता है सदा )है। हर आकारी चीज़ (आकार )इसी एक अव्यक्त से अभिव्यक्त हुआ है। यह इतना सूक्ष्म है जो हमारे बोध में नहीं आ पाता।
    It can only be seen when it has become gross and has taken form .We are in the Universe and the Universe is in us .We are the effect and the Universe is the cause and the cause manifests itself as the effect.
    स्थूल आकार ले लेने पर ही यह गोचर होता है दिखलाई देता है ,हम इस कायनात में हैं और कायनात हमारे अंदर है। हम कार्य(परिणाम ,प्रभाव ) हैं जिसका कारन यह सृष्टि है। और यह कारन ही प्रभाव में कार्य में हमारे होने में अभिव्यक्त हुआ है यानी कार्य -कारण दो हैं ही नहीं। तू मुझ में है,मैं तुझ में हूँ।
    Chit -The pure consciousness of the Universe that is infinite ,Omni -present
    manifesting power of the Universe
    चित -सृष्टि की वह पावन ,निर -मल चेतना (ज्ञान -बोध )जो अनंत है। सर्वव्यापी है ,कायनात की ताकत (शक्ति स्वरूपा )होके प्रकट हुई है।
    Out of this is evolved everything that we call Dynamic energy or force .It can manifest in any form or shape .It is the consciousness manifesting as motion , as gravitation , as magnetism ,etc......
    इसी चित से सारा पसारा पसरा है सारी कायनात उपजी है ,इसे ही गत्यात्मक ऊर्जा या बल ,एक्टिव प्रिंसिपल भी कहा गया है ,यह किसी भी रूपाकार में प्रगटित हो सकती है। गति इसी गत्यात्मक चेतना का मूर्त रूप है ,परिणाम है। यह चेतना ही गति ,गुरुत्व (गुरुत्वाकर्षण )और चुम्बकत्व बन के प्रकट हुई है।
    It is also manifesting as the actions of the body as thought force .It is the Supreme Spirit
    विचार शक्ति (विचारणा बल )के रूप में यह हमारे (शरीर द्वारा किए गए )कर्मों के द्वारा भी प्रकट हो रहा है।
    Ananda -This is the primordial characteristic of the Universe ,which is the greatest and most profound state of ecstasy that you can ever experience when you relate with your higher consciousness
    आनंद सृष्टि का आदिम गुण (मूल बुनियाद है )यह परमानंद की सर्वोच्च अवस्था है चरम है आनंद का। इसका अनुभव आप तभी करते हैं जब उस उच्चतर चेतना से जुड़ते हैं।
    Parabrahama -The Supreme Being in his Absolute aspect ; one who is beyond space and time .It is the essence of the Universe that is with form and without form .It is the Supreme Creator.
    अपने परम (निरपेक्ष स्वरूप )में जो परम अस्तित्व है ,वह जो काल और अंतरिक्ष की सीमा से परे है ,जो अंतरिक्ष -काल से बद्ध नहीं है (अंतरिक्ष काल का भी जो सृष्टा है ).यही निराकार (निरंकार )स्वरूप है और साकार भी यही है।
    सगुण मीठो खाँड़ सो निर्गुण कड़वो नीम ,
    जाको गुरु जो परस दे ,ताहि प्रेम सो जीम।
    Purushothama -This has different meanings .Purush means soul and Uthama means the supreme ,the Supreme spirit .It also means the supreme energy of force guiding us from the highest world.
    पुरुषोत्तम -इसके अलग अलग अर्थ है ,परस्पर जुदा जुदा ,विभिन्न ,पुरुष का एक अर्थ है आत्मा (गीता में परमात्मा और आत्मा दोनों के लिए आया है अलग -अलग सन्दर्भों में ),उत्तम का अर्थ है सुप्रीम (सबसे ऊपर ,सबके ऊपर जिसके ऊपर कोई अन्य नहीं ,कुछ नहीं ); परम -आत्मा ,परम चेतन तत्व ।इसका एक अर्थ वह परम -ऊर्जा बाल भी लिया गया है ,वह परम शक्तिशाला ऊर्जा -बल जो हमें ऊंचे ते भी ऊंचे लोक से निर्देश दे रही है ,रास्ता दिखा रही है ,मार्ग -दर्शन कर रही है ,हमारा।
    Purush also means Man ,and Purushothama is the energy that incarnates as an Avatar to help and guide Mankind and relate closely to the beloved Creation .
    पुरुष का एक अर्थ पुरुष (लैंगिक संज्ञा ,आदमी या औरत ,मनुष्य मात्र )भी है और पुरुषोत्तमा (पुरुषोत्तम )वह ऊर्जा है जो मनुष्य रूप में पृथ्वी पर मानव मात्र की मदद और पथ -प्रदर्शक बन आती है। और जिसका करीबी रिश्ता रहता है हमारी सु-प्रिया कायनात से।
    Paramatma -the supreme inner energy that immanent in every creature and in all beings ,living and non-living ......
    परमात्मा -यह है वह परम आंतरिक ऊर्जा है जो जड़ और चेतन के कुदरती और अंदरूनी तौर पर संग है।
    It's the indweller or the Antaryamin who resides formless or in any form desired .It's the force that can come to you whenever he wants to guide and help you .
    यही हमारे हृदय प्रदेश में निवास करता है इसे ही अन्तर्यामी कहा गया है जो सब कुछ को देखता जानता है ,जो निराकार रूप में भी बना रहता है और वांच्छित हर स्वरूप -आकार में भी जिसकी मौजूदगी रहती है।जब चाहे अपनी कृपा हम पर आकर सकता है।
    Sri Bhagvathi -the female aspect which is characterized as the Supreme Intelligence in action ,the Power (The Shakti ).It is referred to the Mother Earth (Divine Mother ) aspect of the creation .
    Sametha -Together or in communion with .
    Sri Bhagvathe - the Male aspect of the Creation which is unchangeable and permanent .
    Namaha -Salutations or prostration to the Universe that is Om and also has the quality of Sat Chit Ananda , that is omnipresent , unchangeable and changeable at the same time .
    The supreme spirit in a human form and formless ,the indweller that can guide and help in the feminine and masculine forms with the supreme intelligence . I seek your presence and guidance all the time .
    This Mantra evokes the living God asking protection and freedom from all sorrow and suffering .It is a prayer that adores the great creator and liberator , who out of love and compassion manifests ,to protect us , in an earthly form .
    This Moolmantra has given great peace and joy to the people all over the world ,who have chanted or even listened to it . It has the power to transport ones mind to the state of causeless love , and limitless joy .
    The calmness that the mantra can give is to be experienced , not spoken about ....its the key with which any door to spiritual treasure can be opened . A tool which can be used to achieve all desires.
    A medicine which cures all ills .The nectar that can set man free ! all auspiciousness and serenity is your simply by chanting or listening to this magnificent Moolmantra
    The Moola Mantra Om Sat-Chit-Ananda Parabrahma Purushothama Paramatma Sri Bhagavathi Sametha Sri Bhagavathe Namaha Whenever you chant this Vedic Sanskrit Man...