गुरुवार, 2 जनवरी 2020

यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च । हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः



यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च ।

 हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः


मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश ,और रक्षित किया हुआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है इसलिए धर्म का हनन कभी न करना ,इसलिए कि मरा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले।

जो पुरुष धर्म का नाश करता है ,उसी का नाश धर्म कर देता है ,और जो धर्म की रक्षा करता है ,उसकी धर्म भी रक्षा करता है। इसलिए मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले इस भय से धर्म का हनन अर्थात  त्याग कभी न करना चाहिए।

यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च ।

 हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः

‘‘जिस सभा में अधर्म से धर्म, असत्य से सत्य, सब सभासदों के देखते हुए मारा जाता है, उस सभा में सब मृतक के समान हैं, जानों उनमें कोई भी नहीं जीता ।’’
महाभारत का  भीष्म पर्व -भरी सभा  में जिसमें नामचीन भीष्म पितामह ,धृतराष्ट्र ,आदिक------ पाँचों पांडव -----मौजूद थे धूर्त और ज़िद्दी मूढ़ -मति दुर्योधन और कर्ण के मातहत दुश्शासन द्रौपदी का चीरहरण करता है यह तो भला हो अपने कन्हैयाँ का वस्त्र अवतार बन के आ गए द्रौपदी की आर्त : पुकार सुनके -और दुश्शासन थक हार के गिर पड़ा 


यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च । हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः । 

महाभारत का वह प्रसंग जिसमें दौपदी का चीरहरण धृतराष्ट्र और भीष्मपितामह आदिक की मौजूदगी में दुःशासन करने की असफल कोशिश करता असफल इसलिए कृष्ण आर्त : द्रौपदी की पुकार सुन उनकी   हिफाज़त अदृश्य बने रहकर करते है। 
गीता में कृष्ण अर्जुन से मुखातिब होते हुए कहते हैं -अर्जुन तू क्षत्री है क्षत्री का धर्म राष्ट्र और कुल की हिफाज़त करना है तू चाहकर भी इसका त्याग नहीं कर सकेगा तेरा स्वभाव तेरी प्रकृति ही तुझे विवश कर देगी इसलिए तू बंधू बांधवों का मोह छोड़ और युद्ध कर। 
ज़ाहिर है धर्म व्यक्ति का अंतर्जात ,अंत :गुण , जन्मजात गुण है। स्वभाव है धारण किया जाता है। 

धारयति इति धर्म :
तेरी कमीज मेरी से उजली क्यों है ?कैसे है ?है ही नहीं ?मेरी कमीज की बात ही और है। 
कुछ इसी अंदाज़ में आज हम मेरा धर्म श्रेष्ठ सबसे ऊपर अव्वल शेष सभी धर्मों से श्रेष्ठ है।दोयम दर्ज़ा हैं शेष धर्म - जो अल्लाह के आगे सिज़दा नहीं करता वह  काफ़िर है। सबकी अपनी मनमानी व्याख्याएं हैं जिनका धर्म की किसी भी मूल किताब (कतेब )से कोई लेना देना नहीं है कहीं भी कुरआन में यह नहीं कहा गया है। वहां भी सभी धर्मों की जो आपसे सहमत नहीं है इज़्ज़त करने की बात कही गई है। 
गुरु ग्रन्थ साहब में भी यही कहा गया है -
एक ओंकार सतनाम ,करता -पुरख, निर्भय निर्वैर 
अकाल मूरत अजूनि सैभंग गुर परसाद 
अर्थात ईश्वर एक है उसमें और उसकी सृष्टि में कोई फर्क नहीं है। ऐसा नहीं है कि सृष्टि का निर्माण करके वह कहीं और बैठ गया है वह इसी में प्रवेश कर गया है। वह निर्भय और निर्वैर है अर्थात न उसे किसी का भय है न किसी से वह वैर भाव वैमनस्य ही रखता है बदला लेने की सोचता है। दूसरा जब कोई है ही नहीं फिर वह किस से भय खायेगा किससे बदला लेगा। उसकी छवि समय सापेक्ष नहीं हैं समय के साथ उसमें बदलाव नहीं आता है.वह हमेशा से है अ -यौनिक है गर्भ में किसी माँ के उलटा नहीं लटकता है मूर्त भी है अमूर्त भी। 
सनातन धर्म भी यही कहता है :
सगुण मीठो खांड़ सो ,निर्गुण कड़वो नीम ,
जाको गुरु जो परस दे ,ताहि प्रेम सो  जीम। 

 इस्लाम में भी यही बात है। अल्लाह एक है। 
मोहम्मद साहब के अब्बाजान  मूर्तियां बना के बेचते थे।देवी देवताओं की मूर्ति। 

बालक मोहम्मद उनका मज़ाक बनाते हुए कहता तुम्हारी ये मूर्तियां जब खुद की हिफाज़त नहीं करती ,कर सकतीं हैं तो औरों को कैसे बचाएंगी। इस्लाम में  हर दिन एक नए देव की पूजा होती थी। ३६५ से ज्यादा देवी देव-गण पूजे जाते थे साल भर । मोहम्मद ने बिगुल बजाया -अल्लाह एक है और कोई  
  दूसरा है ही नहीं। 
There is only one God and no second 
सभी धर्मों की  मूल सीख एक ही है भेदभाव का कारण हमारा खुद को श्रेष्ठ मानने का भाव है. खुद को श्रेष्ठ मानना। अपने मुंह मियाँ मिठ्ठू बनना है। 
'भगवा आतंक' ; 'इस्लामी आतंक'; वगैहरा - वगैहरा सब प्रलाप हैं हमारे बनाये हुए हैं धंधे हैं धंधे - बाज़ी है राजनीतिक धंधे -बाज़ों की।
शायद इसीलिए उमर-ख़ैयाम से अभि-प्रेरित हो हरिवंश राय बच्चन जी लिख गए -
वैर बढ़ाते मंदिर मस्जिद मेल कराती मधु -शाला 
कम ही लोग इस तथ्य से वाकिफ हैं कि बच्चन जी शराब को हाथ भी नहीं लगाते थे। उन्हीं ने लिखा -
कायस्थ कुल में जन्म लिया ,मेरे पुरखों ने इतना ढाला ,
मेरे लोहू के अंदर है पचहत्तर प्रतिशत हाला। 
और यह भी उन्हीं ने लिखा था - 

जहां कहीं मिल बैठे हम तुम ,
वहीँ रही हो ,मधुशाला 
लाल सुरा की धार लपट सी ,कह न इसे देना ज्वाला ,
फेनिल मदिरा है मत इसको कह देना  उर का छाला, 
दर्द नशा है इस मदिरा का ,विगत स्मृतियाँ साकी हैं ,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आये मेरी मधुशाला 
भाई साहब !न कोई साकी (मधुबाला ,बार टेंडर )थी न कोई प्याला। यह तो बिछोड़ा था आत्मा का परमात्मा से ,माशूका का आशिक से। 
संदर्भ :खतरे में रहने दो ,ख़तरा न हटाओ -जब सारे धर्म ही खुद पर ख़तरा महसूस करने लगें ,तो समाधान भी इन खतरों से ही निकलेगा (हिन्दुस्तान हिंदी दैनिक ,नै दिल्ली गुरूवार ०२ जनवरी २०२० ,स्तम्भ : नश्तर ,लेखा राजेंद्र धोड़पकर )पर एक प्रतिक्रिया 
प्रस्तोता :वीरेंद्र शर्मा ,F/0 कमांडर निशांत शर्मा ,२४५/२ ,विक्रम विहार ,शंकर विहार कॉम्प्लेक्स ,दिल्ली -छावनी -११० ०१०         https://www.youtube.com/watch?v=dxtgsq5oVy4

बुधवार, 18 दिसंबर 2019

नेहरू कांग्रेसियों के द्वारा दो बार हिंदू समाज के संतों की हत्याएं करवाईं गईं ।इंदिराम्मा ने तो देश के संविधान को ही पलीता लगाके आधी रात को देश में आपातकाल लागू कर दिया। रायसीना हिल से दुम अगले दिन हिलवाई गई। कोशिश तो इनकी बाबा रामदेव के सफाये की भी थी पर वे ईश्वर की कृपा से बच गए

४४० सांसदों वाले ऊपरले और निचले सदनों ने यानी अपर और लोवर हाउस ने जिस नागरिकता संशोधन बिल को पारित किया है उसे प्रियंका वाड्रा देश को तोड़ने वाला कदम बतला रहीं हैं। देश को तोड़ने का काम इनकी अम्मा जी और सुबुद्ध भाईसाहब सरे आम करवा रहें हैं पेट्रोल से (गाड़ियां जलवाकर ),सड़कों पर पथ्थर बाज़ी से हद दर्ज़े की हुल्लड़बाजी से जामिया में दस नंबरियों को घुसवाने का षड्यंत्र इन्हीं लोगों ने रचा है इसकी पटकथा इन्होनें पहले ही लिख ली थी। रायसीना हिल पर दवाब इन्हीं की अगुवाई में डाला गया है। इनकी अम्मा ने आते ही जयेन्द्र सरस्वती को गिरफ्तार करवाया था। इनकी दादी के पिता श्री द्वारा ये बांट के देश को खाने का काम शुरू हुआ था। जिन्ना जो कभी हिन्दू मुस्लिम एकता के पक्षधर थे इन्हीं की शह पर बाद में देश के सांप्रदायिक आधार पर बांट के आधा आधा खाने पे अड़ गए।अल्लामा इकबाल ने पाक जाने के बाद अपना रूख और भी कड़ा करते हुए लिखा सारा जहां हमारा। उसी का विकृत रूप इस्लामिक बुनियाद परस्ती दहशद गर्दी बनी है। 

   पहले अंग्रेज़ों से मिलकर सिखों को अलग करवाया फिर  ,जैनियों को वृहत्तर दायरे से सनातन धर्म के बाहर निकलवाया यह तो गनीमत रही इन्हें ये इल्म नहीं हुआ के जैनियों में भी स्वेताम्बर और दिगंबर दो अलहदा सम्प्रदाय होते हैं वरना इनके बंटवारे का काम  भी इसी खानदान के हाथों संपन्न होता।कर्नाटक में शैव सम्प्रदाय से  से लिंगायतों को अलग करने  का बेशर्म निर्णय लिया इन लोगों ने। नेहरू कांग्रेसियों के द्वारा दो बार हिंदू समाज के संतों की हत्याएं करवाईं गईं ।इंदिराम्मा ने तो देश के संविधान को ही पलीता लगाके आधी रात को देश में आपातकाल लागू कर दिया। रायसीना हिल से दुम  अगले दिन हिलवाई गई।  कोशिश  तो इनकी बाबा रामदेव के सफाये की भी थी पर वे ईश्वर की  कृपा से बच गए।
गोधरा करवाने का जेहादियों के साथ किनका तालमेल था ?यह जग जाहिर है। हिन्दू परिवारों को तोड़ने के लिए ऐसे क़ानून बनाये के बहन भाइयों के सहज मेल को नष्ट कर उन्हें संपत्ति अधिकार में उलझा दिया। इन्हीं के प्रताप से परिवारों में लेस्बियन प्रवृत्ति को उभारा गया। साध्वी प्रज्ञा जैसे निरपराध संतों पर ज़ुल्म किया गया। हिन्दुओं के प्रति इनके मन में बेशुमार ,बेहद की  (अनंत) नफ़रत है। कभी प्रधानमन्त्री रहे सरदार मनमोहन सिंह से कहलवाया गया के देश के संशाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का है। देश की हिन्दू जनता इनसे इतनी तंग है के उनकी सामूहिक आह शाप बनकर नेहरू कांग्रेसियों पर पड़ेगी। वक्त दूर नहीं है।जब ये ४४ से चार पर आके मानेंगे। 

वक्त दूर नहीं है  

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

महाभारत में कहा गया है : यन्न भारते !तन्न भारते !अर्थात जो महाभारत में नहीं है वह अन्यत्र भी नहीं है।ज़ाहिर है अभी जेनेटिक्स भी उन ऊंचाइयों को स्पर्श नहीं कर सकी हैं जो यहां वर्णित हैं

महाभारत में कहा गया है : यन्न भारते !तन्न भारते !अर्थात जो महाभारत में नहीं है वह अन्यत्र भी नहीं है।ज़ाहिर है अभी जेनेटिक्स भी उन ऊंचाइयों को स्पर्श नहीं कर सकी हैं जो यहां वर्णित हैं।  


पुराणों में जो कहा गया है वह शुद्ध भौतिक विज्ञानों का निचोड़ भी हो सकता है ,सारतत्व भी। ज़रूरी नहीं है वह महज़ मिथ हो और चंद लेफ्टिए मिलकर उसका मज़ाक बनाते  उपहास करते फिरें ।
मसलन अगस्त्य मुनि को 'घटसम्भव' कहा गया है। 'कुंभज' और 'घटयौनि' भी 'कलशज :' भी ; एक ही अभिप्राय है इन  पारिभाषिक नामों का जिसका जन्म घड़े से कलश से हुआ है वही अगस्त्य है सप्तऋषि मंडल का शान से चमकने वाला कैनोपास (Canopus )ही अगस्त्य है जो लुब्धक (sirius)के बाद दूसरा सबसे चमकीला ब्राइट स्टार है।

 गांधारी के बारे में कहा जाता है जब उसे पता चला कुंती एक बच्चे को उससे पहले जन्म देने वाली है (युधिष्ठिर महाराज ज्येष्ठ पांडव उस समय कुंती के गर्भ में ही थे )उसने ईर्ष्या वश अपने गर्भ में पल रहे भ्रूण के मुष्टि प्रहार से सौ टुकड़े कर दिए यही सौ कौरव बनकर आये। एक ही फर्टिलाइज़्द ह्यूमेन एग के मुष्टि प्रहार से विभाजित टुकड़ों से पनपे पूर्ण कालिक गर्भ काल के बाद।अलबत्ता एक दुशाला भी थी ये सभी पेटर्नल ट्विन्स थे न के आइडेंटल। कौरवों में वरिष्ठ दुर्योधन की एक मात्र बहन का नाम दुशाला था।

आज चर्चा एक और माइल स्टोन की है दुनिया का पहला शिशु कुदरती तौर पर एक नहीं दो दो महिलाओं के गर्भ में पनपने के बाद प्रसवित हुआ है। इंवाइवो फर्टिलाजेशन के ज़रिये।
इन्क्यूबेटर की भूमिका में मात्र अठारह घंटा यह कॉर्पोरल माँ डोना फ्रांसिस  इस्मित के गर्भाशय में रहा। इसके बाद का गर्भकाल जेस्टेशन पीरियड अपनी दूसरी धाय माँ जैस्मीन की कोख में  भुगताया।

यह कमाल का हुनर ब्रितानी वूमेंस फर्टिलिटी क्लिनिक स्विस प्रोद्योगिक कम्पनी अनेकवा ने कर दिखाया है। यहां इनविट्रो फर्टिलाजेशन (परखनली गर्भाधान का सहारा नहीं लिया गया है ). बस एक कैपसूल  में डोना के फीमेलएग (ह्यूमेन एग )का मिलन किसी मर्द के स्पर्म से करवाया गया (स्पर्म बैंक से स्पर्म जुटाया गया )तथा कैप्स्यूल को दोना के गर्भाशय में अठारह घंटा पनपाया गया इंक्यूबेट किया गया। अब क्योंकि डोना पूरे टर्म भ्रूण को रखने को उद्यत नहीं थीं जबकि जेस्मिन इस प्रग्नेंसी को अंजाम तक ले जाना चाहतीं थीं पुन : एम्ब्रियो को अठारह घंटा बाद जेस्मिन के गर्भाशय में रोप दिया गया।इस हुनर के कमाल को आने -वाइवो प्रसीजर (AneVivo Procedure )कहा गया है। हम लंदन की इस क्लिनिक को बधाई देते हुई नवजात शिशु की तंदरुस्ती की दुआ करते है  नाटिंघमशैर की लांस कॉर्पोरल तथा यहीं की मोतरमा जो पेशे से भी नर्स हैं बधाई देते हुए अपना वक्तव्य संपन्न करते हैं। जैश्रीकृष्णा !जयश्रीराम !जै हिंद की सेना प्रणाम !शब्बाख़ैर ! 

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

कहीं बलात्कार एक ला -इलाज़ रोग न बन जाए ?

बड़ी मुश्किल है खोया मेरा दिल है..... कोई इसे ढूंढ के लाओ न .......आखिर ऐसी फ़िल्में किस के मनोरंजन के लिए बन रही हैं जिसमें कथित नायक बे -हद के उत्पीड़न की हद तक जाकर हीरोइन को आतंकित करता है। ....... इन्साफ का तराजू .....कैसा इन्साफ ?कहाँ मिलता है इंसाफ  औरत को ? इस देश में ....कहाँ ?

.औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया ,

जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा दुत्कार दिया .

....कोख  के अंदर भी औरत दफन.कोख के  बाहर भी। घर में भी मेहफ़ूज़ नहीं। कहीं हलाला कहीं रखैल .......   ऊ लाला  ....  ऊलालाला  के  बाद अब और कुछ बचा है दिखाने खोने को ?कला है यह ?

"वह सुबह कभी तो आएगी" -की गुंजाइश ही कहाँ बचती है।

हमारा नागर बोध ,हमारी सिवि-लिटी  किस स्तर को छू रही है। " औरत का अस्मिता इंडेक्स "भारत में नापा जाए -देखा जाए- राष्ट्र कुल के देशों में हम कहाँ हैं ?
रावण जैसे महाबली ने भी सीता के साथ बलात्कार नहीं किया था। आज पिद्दी न पिद्दी के सोरबे एक ज़िंदा औरत के साथ बलात्कार करके क़ानून के गलियारों की आड़ में बरसों रोटियां तोड़ते हैं। पुलिस जो शहर की  हिफाज़त करती है नागर -सेना है उसका खौफ कहाँ हैं।उसकी वर्दी का ?अपनी प्रासंगिता तलाश रही है बे -चारी खाकी वर्दी ?काला कोट बलात्कारियों को बचाने से भी नहीं चूकेगा। ऐसे उकीलों से राम बचाये।

और हम खुद क्या कम हैं ? अपने अंदर पसरी फैली  चौ -तरफा  व्याप्त अतृप्त भोगी मानसिकता को क्या नकार सकने की ईमानदारी बरतेंगे हम लोग ?
'वी हेव ए क्रिमिनल आई 'दिस हेज़ गोट टू बी 'मेटा -मॉर- फोज़-अ -ड 'क्या हुआ हमारे नैतिक आचरण का ?कहीं दोहरी मानसिकता  का तो हम शिकार नहीं हैं हम लोग ?।मी टू ?
बलात्कार यदि एक मानसिक रोग है   .... तो इसे डायग्नोस्टिक स्टेटिस्टिकल मेनुअल ( D.S.M.IV)और इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन आफ मेन्टल डिसऑर्डर्स में जगह मिलनी चाहिए। 

IBHAS (Institute Of Behavioural Health and  Allied Sciences ) ,VIMHANS (Vidya Sagar Institute Of Mental Health and Neurosciences ),NIMHANS (National Institute Of Mental Health and Neuro  Sciences )क्या अपने सांझा प्रयासों से इस रोग की प्रागुक्ति, शिनाख्त वक्त रहते कर सकते हैं ?

 समाज  का एक तबका 'इससे' साफ़ साफ़ ग्रस्त है। इसकी परिव्याप्ति जम्मू कश्मीर लद्दाख से कन्या -कुमारी तक है।कहीं बलात्कार एक ला -इलाज़ रोग न बन जाए ?

ज़ुल्म की मुझपर इन्तिहाँ कर दे ,
मुझ सा बे जुबां ,फिर कोई मिले, न मिले।  

मैं हवाई -जहाज उड़ा सकतीं हूँ। मर्दों का अहम मर्दन करने वाली रणचंडी भी बन सकतीं हूँ  बलात्कार एक ऐसा आतंकवाद है जिसका शिकार सिर्फ और सिर्फ औरत होती है। वह बदला लेगी ज़रूर लेगी खबरदार !

कोई शिव नहीं लेटेगा मेरे पैरों के आगे -मुझे रोकने के लिए -है ही नहीं कोई माई का लाल , काली बन मैं  महिषासुर का वध करने को आतुर हूँ। अब देर नहीं है। एक बार आमरण अनशन करके देख लूँ @Gandhi 150 

https://www.youtube.com/watch?v=jLEOSnLi4Zw
 


शनिवार, 30 नवंबर 2019

ज़हर की पुड़िया और भारतीय लोकतंत्र

ज़हर की पुड़िया और भारतीय लोकतंत्र
"We Will Win Maharashtra Floor Test," Says Sonia Gandhi

सुना है  इन दिनों केंद्रीय सुल्तानों ने भारत की फ़िज़ा में ज़हर घोल दिया है। भारतीय लोकतंत्र विषाक्त हो गया है इस ज़हर को बे -असर करने के लिए एक मल्लिका ने शिवसेना से समझौता किया है। सुना यह भी गया है फडणवीस जी ने लोकतंत्र को बंधक बना लिया था।
यह तो वही बात हो गई जिसे लोकतंत्र के इम्तिहान में सबसे ज्यादा नंबर मिले वह फस्ट नहीं आया है। इस परीक्षा में  हार जाने वाले तीन फिसड्डी मिलकर कह रहे हैं फ़स्ट हम आएं हैं क्योंकि हमारे कुल तीनों के मिलाकर नंबर ज्यादा हैं।
इस मलिका को विशेष कुछ पता नहीं है अपने आपको 'आज़ाद  'कहने वाला एक 'गुलाम ' जो अपने को नबी भी बतलाता है जो कुछ लिखकर दे देता है यह वही बोल देती है। रही सही कसर एक 'पटेल' पूरी कर देते हैं जो अहमद भी हैं और पटेल भी।
वह  सेकुलर ताकतों का गठ जोड़ कहा जाता है। जहां हारे हुए तीन जुआरी  सेकुलर हो जाते हैं शकुनी  की तरह पासे फेंक कर।  जीते हुए साम्प्रदायिक कहलाते हैं इनकी जुबां में।
आज यह सवाल पहले से ज्यादा मौज़ू हो गया है : भारत में कौन कहाँ कब 'सेकुलर' हो जाए इसका कोई निश्चय नहीं। किसी जेल की चौहद्दी से एक ईंट सरक जाए तो वहां से तीन सेकुलर निकल आते हैं। ज़मानत पे छूटे लोग कल को नीतीश से चुनाव पूर्व गठबंधन करके खुद को सेकुलर घोषित कर सकते हैं। ये ट्रेन में भी सेकुलर कम्पार्ट की बात कहते रहें हैं। मुंह में बीड़ा रखकर यह साहब उकीलों की तरह ज़बान को बिगाड़ कर बोलते हैं चरवाहा विश्वविद्ययालय से यह ज़नाब एम.ए एल.एल.बी वगैरह वगेहरा  हैं।
काम की बात पे लौटते हैं वो 'मलका 'उद्धव साहब के शपथ ग्रहण समारोह में न खुद पहुंची न अपने लौंडे को पहुँचने दिया कल को सरकार गिर जाए तो यह कह सकती है हम तो इसलिए दिल्ली छोड़ के गए ही नहीं थे।हमें पहले से पता था। लेकिन मरता क्या न करता लोकतंत्र को विषाक्त होता हम कैसे देखते ?



बहरसूरत इस मल्लिका का योगदान भारतीय लोकतंत्र को जीवित रखने में अभूत -पूर्व रहा है। उस  मराठा शौर्य को इस विषदंतों ने अपने निश्चय से गिरा दिया है जिसने महारानी लक्ष्मी बाई के साथ मिलकर भारत की चौतरफा हिफाज़त करते अपने जान गंवाई थी जिसके लिए पूरा अखंड भारत मायने रखता था एकल महाराष्ट्र नहीं। सलामत रहे यह रक्तबीज जिसने खुद ही  नेहरुवियन खूंटा उखाड़ फेंका है जो अपने पति के हत्यारों की आँखें निकालने की कौन कहे उन्हें माँ कर देती है। यह इस देश की शौर्य परम्परा वीरांगनाओं की तौहीन है। असली ज़हर की पुड़िया कौन है ?लोग एक  दूसरे से पूछ रहे हैं। 

गुरुवार, 28 नवंबर 2019

Au revoir

au re-voir! is a french exclamation meaning good bye for now (till we meet again ) tweeted Ms Fadnavis upon his husband resignation as C.M.Maharashtra on Tuesday .

पलट के आऊँगी शाखों पे खुश्बूएं लेकर ,

ख़िज़ाँ की ज़द में हूँ मौसिम ज़रा बदलने दे।

यही उदगार व्यक्त किये थे अमृता देवेंद्र  फडणवीस ने देवेंद्र के इस्तीफे पर।

Mumbai: 
Former Maharashtra Chief Minister Devendra Fadnavis's wife Amruta Fadnavis on Tuesday tweeted a poetic verse hours after her husband resigned from his post. "Will return and bring back fragrance on branches, it's autumn season, wait for the change in weather," she tweeted in Hindi.
"Thanks Mah (Maharashtra) for memorable five years as your Vahini (sister-in-law)!The love showered by you will always make me nostalgic! I tried to perform my role to best of my abilities-with desire only to serve and make a positive difference," she added.
शख्सियत :अमृता देवेंद्र फडणवीस 
आपका जन्म महाराष्ट्र के नागपुर में नौ अप्रैल उन्नीस सौ उन्हासी को हुआ।आपकी माता चारुलता राना डे प्रसूति -विज्ञान की माहिर तथा आपके पिताश्री नेत्र -विज्ञान के माहिर हैं। आपका विस्तारित (संयुक्त )परिवार महिलाओं की अभिरुचि  के अनुरूप शिक्षा और स्वतंत्र विचार देने का कायल (हामी )रहा है। आपके खानदान में औरत को एक ख़ास दर्ज़ा मिलता आया है। आपकी स्कूली शिक्षा संत जोज़फ़ स्कूल नागपुर में हुई। ग्रेजुएशन भी आपने जी.एस. कॉलिज ऑफ़ कॉमर्स एन्ड इकोनॉमिक्स ,नागपुर से ही  किया  .
अनन्तर आपने एम.बी.ए (फाइनेंस )किया। सिम्बायोसिस स्कूल ,पुणे से आपने टैक्सेशन लॉ का कोर्स पूरा  किया।  पढ़ाई लिखाई के साथ -साथ आपकी खेलकूद में भी न सिर्फ शिरकत रही है अंडर सिक्सटीन लान टेनिस का आपने राज्य स्तर पर प्रतिनिधित्व किया है। आप शास्त्रीय एवं लोकप्रिय गायन में भी दखल रखती हैं।
बैंकर के रूप में आपको एक मुकाम हासिल है। 
Amruta Fadnavis.jpg
Vice-President, Corporate Head(West India), Axis Bank
   

बुधवार, 27 नवंबर 2019

Climate Change a Myth and Or Realty ?



 Climate Change a Myth and Or Realty ?  

बिला शक जलवायु परिवर्तन हमारी हवा ,पानी और मिट्टी में मानवीयक्रियाकलापों (करतूतों और कुदरत के साथ किये गए हमारे सौतिया व्यवहार )द्वारा पैदा बदलाव की गवाही दृष्टा भाव से देखे जाने के साक्षी एकाधिक संस्थान सरकारी गैरसरकारी संगठन बन रहे हैं। इनमें शरीक हैं :
(१ )इंटरगावरनमेंटल पैनल आन क्लाइमेट चेंज बोले तो जलावायु में आये बदलाव से सम्बद्ध  अंतर् -सरकारी (शासकीय) पैनल
(२ )जैव वैविध्य और पारि -तंत्रीय सेवाओं से जुड़ा - इंटरगावरनमेंटल साइंस पॉलिसी प्लेटफॉर्म
(३ )जलवायु केंद्रीय जन-नीति  शोध संस्थान इत्यादि
सभी ने समवेत स्वर एकराय से साफ -साफ़ माना है और बूझा भी है ,हमारा प्रकृति प्रदत्त पर्यावरण तंत्र  कुदरती (प्राकृत हवा पानी मिट्टी ) और तमाम पारितंत्र (इकोलॉजिकल सिस्टम्स )एक- एक करके लगातार दरकते -टूटते रहें हैं। इनके खुद को बनाये रखने ,साधे रहने की संतुलित बने रहने की कुदरती कूवत चुक गई है।
इसी के चलते अनेक प्राणी -प्रजातियां अब विलुप्त प्राय : हैं कितनी ही अन्य प्रजातियां रेड डाटा बुक में जगह बना चुकीं हैं इनके इक्का दुक्का चिन्ह ही अब दिखलाई दे रहे हैं। अकेले टाइगर का हम क्या करेंगें। पृथ्वी का कुदरती उर्वरा मिट्टी  का बिछौना छीज रहा है (टॉप साइल इरोजन या मिट्टी  की ऊपरी उपजाऊ परतों का अपरदन  ),जंगलों का सफाया सरे -आम ज़ारी है। नतीजा: हमारे समुन्दर तेज़ाबी होकर कराहने लगे हैं। समुद्री तूफानों की बेहद की  विनाशलीला अब हैरानी पैदा नहीं करती। अब तो ऑस्ट्रेलया का  जंगल भी सुलगने लगा है। केलिफोर्निया राज्य की तो यह नियति ही बन चुका है। भूमंडलीय तापन अब जो दिन दिखला दे वह थोड़ा।

क्या यह सब मिथक है मिथकीय अवधारणा मात्र है फैसला आप कीजिए। 

क्या किया जाए इस विनाश लीला को थामने के लिए ?  

ग्लोबी तापमानों की बढ़ोतरी को लगाम लगाने के लिए यह निहायत ज़रूरी है के २०३० तक कमसे कम १.५  सेल्सियस और ज्यादा से २ सेल्सियस यानी २०१० के विश्वव्यापी तापन स्तर पर थाम विश्व्यापी बढ़ते  तापमानों को थाम  लिया जाए।  दूसरे शब्दों में वर्तमान ४५ फीसद मानव-जनित उत्सरजनों को घटाकर पच्चीस फीसद पर लाना सुनिश्चित किया जाए। 

 कालान्तर (२०५० /२०७० तक) में  उत्सरजनों को ज़ीरो लेवल तक लाना भी अब लाज़मी समझा जा रहा है।
 हो ठीक इसका उलट  रहा है यह तो वही हो गया मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की। 
आखिर इस सबकी वजहें क्या है ?

विकसित देश अपना कथित जीवन स्तर नीचे लाने के लिए अपना बढ़ता हुआ फुट प्रिंट घटाने को ज़रा भी तैयार नहीं हैं। न ही तकनीकी अंतरण को यानी  उत्सर्जन घटाने वाली प्रौद्योगिकी मुफ्त में विकासमान तथा विकाशशील देशों को मुहैया करवाने को राज़ी हैं। कार्बन बजट की बातें भी बे -असर ही साबित हुई हैं जबकि चीन और भारत जैसे आबादी संकुल राष्ट्रों अफ्रिका महाद्वीप के देशों के लिए बढ़ती आबादी को जीवन जीवन कहने  लायक ज़रूरतें मुहैया करवाना यथा पानी बिजली सड़क जैसी सुविधाएं मुहैया  अब भी   कहीं आंशिक और कहीं पूरी तौर पर  हासिल नहीं हैं।पर्याप्त पोषण की कौन कहे ?
विकसित ,गैर -विकसित सभी मुल्कों द्वारा नीति गत बदलाव के तहत ग्रीन ऊर्जा , वैकल्पिक ऊर्जा ,सौर ,पवन ,भू ,ऊर्जाओं ,जैव -गैस का अंशदान कुल ऊर्जा  बजट में बढ़ाते जाना अब बेहद ज़रूरी हो गया  है।लेकिन क्या यह सब हो पायेगा ?
पीने लायक पानी पर्याप्त पोषण सब के लिए अन्न कहाँ से आएग ?गरीब अमीर के बीच की खाई कम नहीं हो रही है। 
मुफ्त बिजली खाद पानी नहीं सब के लिए बिजली पानी किसान को जैविक खाद स्थानीय उपायों से ही  मुहैया करवाया जाए। 
भविष्य वाणी है अगर कथित विकास मानव-जनित  उत्सर्जन यूं ही ज़ारी रहे तब एशिया के तकरीबन तीस करोड़ सत्तर लाख लोगों को जल - समाधि लेने से नहीं रोका जा सकेगा। तटीय क्षेत्रों को जल समाधि लेने का ख़तरा किताबी नहीं है इसकी जब तब आंशिक झलक दिखलाई देने लगी है। 
२०१५ में प्रदूषण पच्चीस लाख लोगों को खा चुका है। उत्तर भारत के चेहरे पे मुखोटा लग रहा है। मास्क मास्क और मास्क खामोशी के साथ अपनी बिक्री बढ़ा रहा है। 
गरीब दुनिया सोशल सेक्युरिटी ज्यादा  औलाद पैदा करने में तलाश रही है।अमीर देशों का मध्य वर्ग गरीबी की ओर आने लगा है गरीब देशों का दरिद्र नारायण सुदामा अपने ज़िंदा रहने की शर्तें नहीं पूरी कर पा रहा है जीवन की परिभाषा के हाशिये पे आ गया है। आसपास  त्राण को  कोई कृष्णा  नहीं है। खुदा ही हाफ़िज़ है। 
हमारे नगर वगैर रूह के निरात्मा जीवित हैं। कोई मरे हमें क्या हम तो सलामत हैं हमारी बला से। गरीब कहे हैं :आलतू - फ़ालतू आई बला को टाल तू।पर्यावरण पारितंत्रों की मौत प्राणी मात्र की मौत है। हमारी साँसें हवा पानी मिट्टी सभी तो सांझा है परस्पर पार्थक्य   कहाँ हैं ?हम सब एक  ही कायनात कुदरत के अलग -अलग दीखते प्रतीत होते  हिस्से हैं एक दूसरे से सम्बद्ध एक दूसरे के पोषक संवर्धक।इसे बूझना ज़रूरी है।