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बुधवार, 19 जून 2013

क्या आत्मा महज़ एक विचार है .आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है ?

क्या आत्मा महज़ एक विचार है .आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है ?शरीर के साथ सब कुछ चुक जाता है ?पुनर -जन्म की अवधारणा भ्रामक है ?

आज एक ब्लॉग पोस्ट पढ़ी उसका लब्बोलुआब यही था कि आत्मा एक विचार मात्र है और शरीर के क्षीण होने पर अंतिम संस्कार के वक्त हवा ,पानी ,अग्नि ,आकाश और पृथ्वी तत्व वायुमंडल में ही खो जाते हैं जिनसे पुनर्जन्म बोले तो नै काया  का निर्माण हो  ही नहीं  सकता .



मन में इस ब्लॉग पोस्ट को पढ़ने  पर यह सवाल कौंधा ,फिर आत्मा ,परमात्मा ,पापात्मा ,दुरात्मा ,हुतात्मा ,प्रेतात्मा ,महात्मा ,महान आत्मा ,दुष्टात्मा शब्द कहाँ से आये और इनका अर्थ क्या है ?

'मेरी तो उसे देख रूह फना हो गई' ऐसे जुमले वाक्य और   शब्द प्रयोग भी भाषिक जगत से बे -दखल करने पड़ेंगे .रूह रूहान शब्द भी भाषा कोष से बाहर करना पड़ेगा .परमात्मा से आत्मा का रूह रूहान बोले तो बातचीत निलंबित रखनी पड़ेगी .

फिर यह जुमला  क्यों चल निकला फलाने ने (अमुक ने )कल रात शरीर छोड़ दिया ?परमात्मा उसकी आत्मा को शान्ति दे .दो मिनिट का मौन रखके हम किसे श्रद्धांजलि देते हैं फिर .अकाल मृत्यु (आकस्मिक दुर्घटना मृत्यु )होने पर आत्मा की शांति के लिए विशेष स्थानों पर क्यों जाते हैं .महामृत्युंजय मन्त्र का जाप क्यों करते हैं .

तेरह दिन तक दीया (दीपक )क्यों जलाया जाता है उस स्थान पर जहां किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है (आत्मा शरीर छोडती है ).फिर साल भर बाद सनातन धर्मी गंगा ,यमुना या किसी भी नदी के तट पे जाके दीपक क्यों सिलाते हैं ?यही न की परलोक में भी वह आत्म तत्व आलोकित रहे जो स्वयं ज्योतिबिंदु स्वरूप है .दीपक की लौ सा पवित्र है .

क्या यह सब कल्पना मान लिया जाए .शरीर के साथ क्या सब कुछ खत्म हो जाता है .या फिर मुसाफिर (आत्मा )का सफर ज़ारी रहता है .एक से दूसरे  चोले  में ?८ ४ जन्मों तक और फिर सब कुछ की पुनरावृत्ति होती है .आवा जाहि ज़ारी रहती है आत्मा की एक से दूसरे  शरीर में .

क्यों कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए कहा -हे अर्जुन आत्मा अजर अमर  अविनाशी है .पञ्च भूतों से परे निराकार परम ज्योति तत्व है .शश्त्र जिसे काट नहीं सकते ,अग्नि जिसे जला नहीं सकती .तू अपने बंधू बांधवों का मोह छोड़ नष्टो  मोहा बन कर्म कर .फल की चिंता मत कर .निष्काम कर्म ही गीता का सार है .जो हुआ अच्छा हुआ ,जो हो रहा है वह भी अच्छा हो रहा है जो होगा वह भी अच्छा होगा .फल की चिंता मत कर .

क्यों शरीर को आत्मा का वस्त्र कहा जाता है .क्यों कहा जाता है मनुष्य आत्मा अधिकतम ८ ४ और न्यूनतम एक मर्तबा जन्म लेती है .वस्त्र बदलती है .बंधू बांधव सखा बदलती है .जाति  धर्म देश बदलती है .दैहिक सम्बन्ध बदलती है .

क्यों कहा जाता है आत्मा अ-लैंगिक होती है शरीर स्त्री और पुरुष होता है आत्मा नहीं .रूह सबकी पञ्च तत्वों से परे अपने बुनियादी स्वरूप  में यकसां हैं .न स्त्री है न पुरुष .

शरीर को रथ, आत्मा को रथी ,बुद्धि को सारथी क्यों कहा गया फिर ?

रथी जब रथ (शरीर )छोड़ जाता है ,शेष को अर्थी क्यों कहते हैं .श्राद्ध पक्ष और पिंड दान का क्या मतलब है फिर ?पिंड कहा जाता है रहने की जगह को . आत्मा का अस्थाई गाँव उसका शरीर(पिंड ) ही है ?स्थाई है परमधाम जहां दिव्यप्रकाश है शान्ति है .


और आत्मा का स्थाई निवास ब्रह्मलोक (परलोक ),पार गगन ,परे से भी परे परम धाम है .

आत्मा का पारलौकिक पिता परम -आत्मा (निराकार शिव ,ज्योतिर्लिन्गम )है .लौकिक पिता शरीर का पिता है .दैहिक सम्बन्ध में शरीर आता है .इस देह में लौकिक मात पिता के जीवन खंड (जींस )होते हैं .अ-लौकिक शरीर बोले तो आत्मा का पिता  पार -लौकिक परमात्मा है .रूह के जींस नहीं होते कर्म की छाप लिए रहती है रूह .आपका क्या कहना है अपनी राय दें .

यह भी बतला दें -मनोविज्ञान की पहली परिभाषा -मनोविज्ञान आत्माओं का विज्ञान है दी गई है .विरोधाभास देखिये आज वही मनोविज्ञानी आत्मा का नाम लेने पर नाक भौं सिकोड़ते हुए उसके अस्तित्व को नकारते हुए कहतें हैं आत्मा यदि है तो लाओ उसे लैब में .

पूछा जा सकता है आत्मा क्या गिनी पिग है या लेबोरेट्री एनिमल  है  ?

सन्दर्भ- सामिग्री :

http://vichar-anubhuti.blogspot.com/2013/06/blog-post_8.html

जन्म ,मृत्यु और मोक्ष !







            जन्म और मृत्यु ,यही है दो अटल सत्य।जन्म होगा तो मृत्यु  निश्चित है। जन्म और मृत्यु के बीच के समय को जीवन की संज्ञा  दी गई है। इस प्रकार जन्म ,जीवन और मृत्यु ,यही है कहानी हर जीव की।परन्तु जन्म के पहले की अवस्था ,स्थिति काया है , मृत्यु के बाद की स्थिति क्या है ? कहाँ  जाते हैं ? यह किसी को पता नहीं है।जन्म के पहले क्या ?  मृत्यु के बाद क्या ? यही है शाश्वत प्रश्न।
              शास्त्रों  में 'आत्मा' 'की  बात कही गई  है। कहते हैं आत्मा नश्वर शरीर  को छोड़कर अलग हो जाती है और परमात्मा में विलीन हो जाती  है जिसे 'मोक्ष' कहते हैं। अतृप्त आत्मा फिर जन्म लेती है अर्थात कोई नया शरीर धारण करती है और यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जबतक उसे 'मोक्ष' नहीं मिल जाता है।आत्मा का नया शरीर धारण करने को 'पुनर्जन्म ' कहा जाता है।अब प्रश्न उठता   है ,
 "आत्मा क्या है? शरीर क्या है ?"
शरीर में आत्मा है तो वह जीवित है। शरीर आत्माहीन है तो वह मृत है,शव है। इसका अर्थ है, आत्मा और शरीर का युग्म ही जीव है।शरीर पञ्च तत्व से बना है।शरीर के नष्ट होने पर वे तत्व पांच अलग अलग तत्वों में मिल  जाते हैं, अर्थात पूरा शरीर का रूप परिवर्तन हो जाता  है। यहाँ विज्ञान का सिद्धान्त लागू होता है कि ,"किसी पदार्थ को नष्ट नहीं किया जा सकता है केवल उसका रूप परिवर्तन किया जा सकता है। The matter cannot be destroyed but it can be transformed into another form." इसीलिए मरने के बाद शव को जलाना या कब्र में रखना, रूप परिवर्तन की प्रक्रिया है। इसके बाद के जो क्रिया कर्म ,रस्म रिवाज़ हैं उस से न आत्मा का,  न शरीर का  कोई सम्बन्ध है और न उनको कोई लाभ या हानी होती है। ये क्रियाएं शरीर और आत्मा के लिए अर्थहीन हैं और अंधविश्वास से प्रेरित हैं।
               आत्मा और शरीर का युग्म ही जीव है इसीलिए आत्मा और शरीर का घनिष्ट सम्बन्ध है। शरीर स्थूल है ,दृश्य है।आत्मा सूक्ष्म ,तीक्ष्ण ,तीब्र और अदृश्य है।शरीर पाँच तत्वों से बना है। वे तत्व हैं अग्नि ,वायु ,जल ,मृत्तिका और आकाश।ये सब मिलकर शरीर बनाते हैं और इनकी प्राप्ति माँ से होती है।माँ के गर्भ में जब शरीर बनकर तैयार हो जाता है उसमें कम्पन उत्पन्न होता है जिसे आत्मा का शरीर में प्रवेश का नाम दिया गया है अर्थात आत्मा ने एक नया शरीर धारण कर लिया है। 
                लेकिन इसे यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो यह कम्पन पैदा कैसे होता है?
               पाँच तत्वों में अग्नि उष्मा(Heat Energy)  का स्वरुप है।हीट एनर्जी परिवर्तित होकर (Electrical Energy )इलेक्ट्रिकल एनर्जी बन जाता है। यह शरीर के हर सेल (Bio Cell) को विद्युत् सेल बना देता है। यह स्वनिर्मित विद्युत् है। सब सेलों का  समुह शरीर का पॉवर हाउस बन जाता है।पुरे शरीर में विद्युत् प्रवाहित होने लगता है।हमारे शरीर में जो रिफ्लेक्स एक्शन होता है वह इसी विद्युत् प्रवाह के कारण  होता है।हमारे ब्रेन तेजी से काम करता है वह भी विद्युतप्रवाह के कारण कर पाता  है।पैर में चींटी काटता  है तो हमें दर्द महसूस होता है ,यह रिफ्लेक्स एक्शन के कारण होता है और रिफ्लेक्स एक्शन विद्युत प्रवाह के कारण होता है।जिस सेल में विद्युत् प्रवाह नहीं होता है उसमें चैतन्यता नहीं रहती (स्नायु हीन होता है ).इसीलिए उस सेल में होने वाले दर्द हमें पता नहीं लगता। यही विद्युत् जबतक शरीर में रहता है ,शरीर चैतन्य की हालत में रहता है।
              अग्नि उष्मा के रूप में वायु की गति को नियंत्रित करती है।यही वायु और विद्युत् मिलकर अपनी अपनी प्रवाह से ह्रदय ,फेफड़े तथा  अन्य महत्वपूर्ण अंगो  में कम्पन उत्पन्न करता है और यही कम्पन जीवन की निशनी है।जल और मृत्तिका शरीर को स्थूल रूप देने के साथ साथ विद्युत् और वायुके गति निर्धारण में निर्णायक भुमिका निभाते हैं। दो सेल के बीच  में कुछ स्थान खाली रहता है ,यह सेल के चलन में सहायक है।उसी प्रकार शरीर के अन्दर दो अंगो के बीच में खाली स्थान रहता है।सेल और अंगो के बीच में खालीस्थान को आकाश (शून्य ) कहते हैं।अगर खाली  स्थान नहीं होगा तो वांछित कम्पन उत्पन नहीं होगा। मन की शुन्यता भी आकाश है।इस प्रकार पञ्च तत्त्व शरीर में कम्पन उत्पन्न करने में (प्राण प्रतिष्ठा ) महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।शरीर में अग्नि का कमजोर होने पर या अत्यधिक बढ़ जाने पर वायु की गति में भी तदनुसार परिवर्तन होता है। विद्युत् संचार में भी परिवर्तन होता है।इसीलिए शरीर का तापक्रम पर नियंत्रण रखना बहुत जरुरी है।वृद्धावस्था में या बिमारी की अवस्था में शरीर में उष्मा की कमी हो जाता है। विद्युत् संचार कम हो जाता हैऔर धीरे धीरे ऐसी अवस्था में आ जाता है जब सेल आवश्यक विद्युत् उत्पन्न नहीं कर पाता  है। ऊष्मा की कमी के कारण हवा की गति रुक जाती है।यही मृत्यु की अवस्था है। शरीर में बचा  विद्युत् (Residual) निकलकर अंतरिक्ष के तरंगों में मिलजाता है। शरीर के पाँच तत्त्व अलग अलग होकर पञ्च तत्त्व में विलीन हो जाता है। इस अवस्था में किसी आत्मा की कल्पना करना या उसकी मोक्ष की कल्पना करना ,वास्तव में कल्पना ही लगता है।
           रही बात पुनर्जन्म की तो शरीर जिन अणु परमाणु से  बना था ,दूसरा शरीर वही अणु ,वही परमाणु से नहीं बनता ,इसीलिए शरीर का पुनर्जन्म संभव नहीं है। नया शरीर में पञ्च तत्व के नए अणु ,परमाणु होंगे। अत: उनमे नया कम्पन होगा।विद्युत् पॉवर हाउस भी नया होगा। यहाँ कम्पन का पुनर्जन्म या विद्युत् का पुनर्जन्म कहना सही नहीं लगता। कम्पन आत्मा नहीं ,विद्युत्  भी आत्मा नहीं। अत: 'आत्मा' एक वैचारिक तत्त्व है और वैचारिक  तत्त्व न नष्ट होता है, न उसका पुनर्जन्म 
होता है।

नोट : विद्वान पाठकों से निवेदन है कि  वे विषय पर केवल अपनी सोच/विचार व्यक्त करे।किसी के कमेंट्स के ऊपर कमेंट्स कर वाद विवाद ना करें। इस लेख का उद्देश्य है विभिन्न विचार धारायों से खुद को और पाठकों को  परिचय कराना।  


कालीपद "प्रसाद "


©सर्वाधिकार सुरक्षित
.


क्या आत्मा महज़ एक विचार है .आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है ?

क्या आत्मा महज़ एक विचार है .आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है ?शरीर के साथ सब कुछ चुक जाता है ?पुनर -जन्म की अवधारणा भ्रामक है ?

आज एक ब्लॉग पोस्ट पढ़ी उसका लब्बोलुआब यही था कि आत्मा एक विचार मात्र है और शरीर के क्षीण होने पर अंतिम संस्कार के वक्त हवा ,पानी ,अग्नि ,आकाश और पृथ्वी तत्व वायुमंडल में ही खो जाते हैं जिनसे पुनर्जन्म बोले तो नै काया  का निर्माण हो  ही नहीं  सकता .



मन में इस ब्लॉग पोस्ट को पढ़ने  पर यह सवाल कौंधा ,फिर आत्मा ,परमात्मा ,पापात्मा ,दुरात्मा ,हुतात्मा ,प्रेतात्मा ,महात्मा ,महान आत्मा ,दुष्टात्मा शब्द कहाँ से आये और इनका अर्थ क्या है ?

'मेरी तो उसे देख रूह फना हो गई' ऐसे जुमले वाक्य और   शब्द प्रयोग भी भाषिक जगत से बे -दखल करने पड़ेंगे .रूह रूहान शब्द भी भाषा कोष से बाहर करना पड़ेगा .परमात्मा से आत्मा का रूह रूहान बोले तो बातचीत निलंबित रखनी पड़ेगी .

फिर यह जुमला  क्यों चल निकला फलाने ने (अमुक ने )कल रात शरीर छोड़ दिया ?परमात्मा उसकी आत्मा को शान्ति दे .दो मिनिट का मौन रखके हम किसे श्रद्धांजलि देते हैं फिर .अकाल मृत्यु (आकस्मिक दुर्घटना मृत्यु )होने पर आत्मा की शांति के लिए विशेष स्थानों पर क्यों जाते हैं .महामृत्युंजय मन्त्र का जाप क्यों करते हैं .

तेरह दिन तक दीया (दीपक )क्यों जलाया जाता है उस स्थान पर जहां किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है (आत्मा शरीर छोडती है ).फिर साल भर बाद सनातन धर्मी गंगा ,यमुना या किसी भी नदी के तट पे जाके दीपक क्यों सिलाते हैं ?यही न की परलोक में भी वह आत्म तत्व आलोकित रहे जो स्वयं ज्योतिबिंदु स्वरूप है .दीपक की लौ सा पवित्र है .

क्या यह सब कल्पना मान लिया जाए .शरीर के साथ क्या सब कुछ खत्म हो जाता है .या फिर मुसाफिर (आत्मा )का सफर ज़ारी रहता है .एक से दूसरे  चोले  में ?८ ४ जन्मों तक और फिर सब कुछ की पुनरावृत्ति होती है .आवा जाहि ज़ारी रहती है आत्मा की एक से दूसरे  शरीर में .

क्यों कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए कहा -हे अर्जुन आत्मा अजर अमर  अविनाशी है .पञ्च भूतों से परे निराकार परम ज्योति तत्व है .शश्त्र जिसे काट नहीं सकते ,अग्नि जिसे जला नहीं सकती .तू अपने बंधू बांधवों का मोह छोड़ नष्टो  मोहा बन कर्म कर .फल की चिंता मत कर .निष्काम कर्म ही गीता का सार है .जो हुआ अच्छा हुआ ,जो हो रहा है वह भी अच्छा हो रहा है जो होगा वह भी अच्छा होगा .फल की चिंता मत कर .

क्यों शरीर को आत्मा का वस्त्र कहा जाता है .क्यों कहा जाता है मनुष्य आत्मा अधिकतम ८ ४ और न्यूनतम एक मर्तबा जन्म लेती है .वस्त्र बदलती है .बंधू बांधव सखा बदलती है .जाति  धर्म देश बदलती है .दैहिक सम्बन्ध बदलती है .

क्यों कहा जाता है आत्मा अ-लैंगिक होती है शरीर स्त्री और पुरुष होता है आत्मा नहीं .रूह सबकी पञ्च तत्वों से परे अपने बुनियादी स्वरूप  में यकसां हैं .न स्त्री है न पुरुष .

शरीर को रथ, आत्मा को रथी ,बुद्धि को सारथी क्यों कहा गया फिर ?

रथी जब रथ (शरीर )छोड़ जाता है ,शेष को अर्थी क्यों कहते हैं .श्राद्ध पक्ष और पिंड दान का क्या मतलब है फिर ?पिंड कहा जाता है रहने की जगह को . आत्मा का अस्थाई गाँव उसका शरीर(पिंड ) ही है ?स्थाई है परमधाम जहां दिव्यप्रकाश है शान्ति है .


और आत्मा का स्थाई निवास ब्रह्मलोक (परलोक ),पार गगन ,परे से भी परे परम धाम है .

आत्मा का पारलौकिक पिता परम -आत्मा (निराकार शिव ,ज्योतिर्लिन्गम )है .लौकिक पिता शरीर का पिता है .दैहिक सम्बन्ध में शरीर आता है .इस देह में लौकिक मात पिता के जीवन खंड (जींस )होते हैं .अ-लौकिक शरीर बोले तो आत्मा का पिता  पार -लौकिक परमात्मा है .रूह के जींस नहीं होते कर्म की छाप लिए रहती है रूह .आपका क्या कहना है अपनी राय दें .

यह भी बतला दें -मनोविज्ञान की पहली परिभाषा -मनोविज्ञान आत्माओं का विज्ञान है दी गई है .विरोधाभास देखिये आज वही मनोविज्ञानी आत्मा का नाम लेने पर नाक भौं सिकोड़ते हुए उसके अस्तित्व को नकारते हुए कहतें हैं आत्मा यदि है तो लाओ उसे लैब में .

पूछा जा सकता है आत्मा क्या गिनी पिग है या लेबोरेट्री एनिमल  है  ?

सन्दर्भ- सामिग्री :

http://vichar-anubhuti.blogspot.com/2013/06/blog-post_8.html


जन्म ,मृत्यु और मोक्ष !







            जन्म और मृत्यु ,यही है दो अटल सत्य।जन्म होगा तो मृत्यु  निश्चित है। जन्म और मृत्यु के बीच के समय को जीवन की संज्ञा  दी गई है। इस प्रकार जन्म ,जीवन और मृत्यु ,यही है कहानी हर जीव की।परन्तु जन्म के पहले की अवस्था ,स्थिति काया है , मृत्यु के बाद की स्थिति क्या है ? कहाँ  जाते हैं ? यह किसी को पता नहीं है।जन्म के पहले क्या ?  मृत्यु के बाद क्या ? यही है शाश्वत प्रश्न।
              शास्त्रों  में 'आत्मा' 'की  बात कही गई  है। कहते हैं आत्मा नश्वर शरीर  को छोड़कर अलग हो जाती है और परमात्मा में विलीन हो जाती  है जिसे 'मोक्ष' कहते हैं। अतृप्त आत्मा फिर जन्म लेती है अर्थात कोई नया शरीर धारण करती है और यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जबतक उसे 'मोक्ष' नहीं मिल जाता है।आत्मा का नया शरीर धारण करने को 'पुनर्जन्म ' कहा जाता है।अब प्रश्न उठता   है ,
 "आत्मा क्या है? शरीर क्या है ?"
शरीर में आत्मा है तो वह जीवित है। शरीर आत्माहीन है तो वह मृत है,शव है। इसका अर्थ है, आत्मा और शरीर का युग्म ही जीव है।शरीर पञ्च तत्व से बना है।शरीर के नष्ट होने पर वे तत्व पांच अलग अलग तत्वों में मिल  जाते हैं, अर्थात पूरा शरीर का रूप परिवर्तन हो जाता  है। यहाँ विज्ञान का सिद्धान्त लागू होता है कि ,"किसी पदार्थ को नष्ट नहीं किया जा सकता है केवल उसका रूप परिवर्तन किया जा सकता है। The matter cannot be destroyed but it can be transformed into another form." इसीलिए मरने के बाद शव को जलाना या कब्र में रखना, रूप परिवर्तन की प्रक्रिया है। इसके बाद के जो क्रिया कर्म ,रस्म रिवाज़ हैं उस से न आत्मा का,  न शरीर का  कोई सम्बन्ध है और न उनको कोई लाभ या हानी होती है। ये क्रियाएं शरीर और आत्मा के लिए अर्थहीन हैं और अंधविश्वास से प्रेरित हैं।
               आत्मा और शरीर का युग्म ही जीव है इसीलिए आत्मा और शरीर का घनिष्ट सम्बन्ध है। शरीर स्थूल है ,दृश्य है।आत्मा सूक्ष्म ,तीक्ष्ण ,तीब्र और अदृश्य है।शरीर पाँच तत्वों से बना है। वे तत्व हैं अग्नि ,वायु ,जल ,मृत्तिका और आकाश।ये सब मिलकर शरीर बनाते हैं और इनकी प्राप्ति माँ से होती है।माँ के गर्भ में जब शरीर बनकर तैयार हो जाता है उसमें कम्पन उत्पन्न होता है जिसे आत्मा का शरीर में प्रवेश का नाम दिया गया है अर्थात आत्मा ने एक नया शरीर धारण कर लिया है। 
                लेकिन इसे यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो यह कम्पन पैदा कैसे होता है?
               पाँच तत्वों में अग्नि उष्मा(Heat Energy)  का स्वरुप है।हीट एनर्जी परिवर्तित होकर (Electrical Energy )इलेक्ट्रिकल एनर्जी बन जाता है। यह शरीर के हर सेल (Bio Cell) को विद्युत् सेल बना देता है। यह स्वनिर्मित विद्युत् है। सब सेलों का  समुह शरीर का पॉवर हाउस बन जाता है।पुरे शरीर में विद्युत् प्रवाहित होने लगता है।हमारे शरीर में जो रिफ्लेक्स एक्शन होता है वह इसी विद्युत् प्रवाह के कारण  होता है।हमारे ब्रेन तेजी से काम करता है वह भी विद्युतप्रवाह के कारण कर पाता  है।पैर में चींटी काटता  है तो हमें दर्द महसूस होता है ,यह रिफ्लेक्स एक्शन के कारण होता है और रिफ्लेक्स एक्शन विद्युत प्रवाह के कारण होता है।जिस सेल में विद्युत् प्रवाह नहीं होता है उसमें चैतन्यता नहीं रहती (स्नायु हीन होता है ).इसीलिए उस सेल में होने वाले दर्द हमें पता नहीं लगता। यही विद्युत् जबतक शरीर में रहता है ,शरीर चैतन्य की हालत में रहता है।
              अग्नि उष्मा के रूप में वायु की गति को नियंत्रित करती है।यही वायु और विद्युत् मिलकर अपनी अपनी प्रवाह से ह्रदय ,फेफड़े तथा  अन्य महत्वपूर्ण अंगो  में कम्पन उत्पन्न करता है और यही कम्पन जीवन की निशनी है।जल और मृत्तिका शरीर को स्थूल रूप देने के साथ साथ विद्युत् और वायुके गति निर्धारण में निर्णायक भुमिका निभाते हैं। दो सेल के बीच  में कुछ स्थान खाली रहता है ,यह सेल के चलन में सहायक है।उसी प्रकार शरीर के अन्दर दो अंगो के बीच में खाली स्थान रहता है।सेल और अंगो के बीच में खालीस्थान को आकाश (शून्य ) कहते हैं।अगर खाली  स्थान नहीं होगा तो वांछित कम्पन उत्पन नहीं होगा। मन की शुन्यता भी आकाश है।इस प्रकार पञ्च तत्त्व शरीर में कम्पन उत्पन्न करने में (प्राण प्रतिष्ठा ) महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।शरीर में अग्नि का कमजोर होने पर या अत्यधिक बढ़ जाने पर वायु की गति में भी तदनुसार परिवर्तन होता है। विद्युत् संचार में भी परिवर्तन होता है।इसीलिए शरीर का तापक्रम पर नियंत्रण रखना बहुत जरुरी है।वृद्धावस्था में या बिमारी की अवस्था में शरीर में उष्मा की कमी हो जाता है। विद्युत् संचार कम हो जाता हैऔर धीरे धीरे ऐसी अवस्था में आ जाता है जब सेल आवश्यक विद्युत् उत्पन्न नहीं कर पाता  है। ऊष्मा की कमी के कारण हवा की गति रुक जाती है।यही मृत्यु की अवस्था है। शरीर में बचा  विद्युत् (Residual) निकलकर अंतरिक्ष के तरंगों में मिलजाता है। शरीर के पाँच तत्त्व अलग अलग होकर पञ्च तत्त्व में विलीन हो जाता है। इस अवस्था में किसी आत्मा की कल्पना करना या उसकी मोक्ष की कल्पना करना ,वास्तव में कल्पना ही लगता है।
           रही बात पुनर्जन्म की तो शरीर जिन अणु परमाणु से  बना था ,दूसरा शरीर वही अणु ,वही परमाणु से नहीं बनता ,इसीलिए शरीर का पुनर्जन्म संभव नहीं है। नया शरीर में पञ्च तत्व के नए अणु ,परमाणु होंगे। अत: उनमे नया कम्पन होगा।विद्युत् पॉवर हाउस भी नया होगा। यहाँ कम्पन का पुनर्जन्म या विद्युत् का पुनर्जन्म कहना सही नहीं लगता। कम्पन आत्मा नहीं ,विद्युत्  भी आत्मा नहीं। अत: 'आत्मा' एक वैचारिक तत्त्व है और वैचारिक  तत्त्व न नष्ट होता है, न उसका पुनर्जन्म 
होता है।


नोट : विद्वान पाठकों से निवेदन है कि  वे विषय पर केवल अपनी सोच/विचार व्यक्त करे।किसी के कमेंट्स के ऊपर कमेंट्स कर वाद विवाद ना करें। इस लेख का उद्देश्य है विभिन्न विचार धारायों से खुद को और पाठकों को  परिचय कराना।  


कालीपद "प्रसाद "


©सर्वाधिकार सुरक्षित
.



आत्मा की खुराक है ख़ुशी

आत्मा की खुराक है ख़ुशी 

ख़ुशी वह शह है जो हमारे नकारात्मक स्वभाव संस्कार को बदल हमारे अनुभूत अभावों को समाप्त कर देती है .होंठों की मुस्कान जीवन की हर्षित मुखता है ख़ुशी .मुस्कान चेहरे का आभूषण है अलंकरण है जिस चेहरे पे मुस्कान नहीं वह चेहरा फीका रह जाता है .

किसी शायर ने कहा है -

ज़िन्दगी जब भी रुलाने लगे ,

आप इतना मुस्कुराओ ,ज़िन्दगी शर्माने लगे .

फटोग्रेफर फोटो उतारने  से पूर्व आपको कहता है -स्माइल प्लीज़ .ज़रा सोचिये जब ज़रा सी मुस्कान से फोटो अच्छा आ सकता है तो सदा ही मुस्कुराते  रहने से क्या ज़िन्दगी खुशहाल न होगी ?

आखिर चलते चलते जीवन में ऐसा क्या आ जाता है, हमारी ख़ुशी गायब हो जाती है .हम  इतने कमज़ोर हैं किसी ने हमसे ठीक से व्यवहार नहीं  किया बस हमारी ख़ुशी कम हो जाती है .मन हलचल में आजाता है .उसने मुझसे ऐसा क्यों कहा वैसा क्यों कहा .बस पकड़ के बैठ जाते हैं हम उसके व्यवहार को शब्दों को .

ज़रा सोचिये प्यार से बात करते समय हम क्या करते  हैं .कब किससे  कित्ती बार प्यार से बात करना है यह भी हम निश्चय कर लेते हैं .अरे मैं ने तो तीन चार बार उससे प्यार से बात की उसने कोई रेस्पांस  ही नहीं दिया .चूल्हे में जाए वह .ज़रा सोचिये बस इत्ता ही लक्ष्य था आपका ?वह प्यार से बात करे तो मैं भी करूँ  .क्या प्यार करना एक व्यापार है ?ये तो एक्सचेंज हुआ भाईसाहब . यह प्यार का व्यापार चल रहा है इसलिए इससे जीवन में ख़ुशी हो ही नहीं सकती .

ज़रा सोचिये हम किसे महत्व दे रहें हैं सामने वाले के व्यवहार को या अपनी प्यार करने की विशेषता को .अपनी आदत ,स्वभाव संस्कार को ?उसने मुझे देखकर मुंह उधर कर लिया .मैं भी ऐसा ही करूँ ?

जब हम ऐसा करते हैं हम सामने वाले के नकारात्मक स्वभाव संस्कार की नकल कर रहें हैं .नकल करनी ही है तो मैं अच्छी बात की करूँ ,गलत बात की नकल क्यों करूँ ?

मैं अपनी ओरिजिनल विशेषता से ही व्यवहार  करूँ .क्यों छोड़ू अपनी विशेषता को .दिक्कत यह है हमने इन चीज़ों को नेचुरल समझना शुरू कर दिया है .हम अपने मूल स्वभाव ,स्वमान ,अपने आत्म स्वरूप को भूल गए हैं .कई तो आत्मा के स्वरूप ,आत्मा के अस्तित्व को ही नकारने लगें हैं .कहतें हैं आत्मा तो एक काल्पनिक विचार मात्र है वास्तविक तत्व नहीं  है.अपने को देह मानने लगें हैं हम लोग .देह दर्शन ,देह प्रतियोगिता में ही मशगूल हैं दिन रात .इसलिए आत्मा के निजी गुणों की भी ह्त्या हो गई है जबकि अपने बुनियादी स्वरूप में आत्मा (चैतन्य शक्ति ,चैतन्य ऊर्जा )आनंद स्वरूप है ,प्रेम स्वरूप है ख़ुशी आत्मा  की खुराक है .जैसे देह की खुराक भोजन है .देह दर्शन ,देह के सम्बन्ध स्वरूप को ही हम सब कुछ मानने लगें हैं .जबकि देह से परे ,पञ्च तत्वों से परे जो निराकार सूक्ष्म  सनातन तत्व है वही इस शरीर का करता धरता है स्वामी है .दिव्य आत्मा है .यह शरीर तो आत्मा का अस्थाई घर है .उसका मूल वतन तो ब्रह्म तत्व ,ब्रह्म लोक है .उसका स्थाई निवास परमधाम है सूरज चाँद सितारा से परे ,परे से भी परे जो शान्ति धाम है मुक्ति धाम है वही आत्मा का घर है .यह शरीर तो जड़ है .आज है कल नहीं है निरंतर परिवर्तन होता रहता है छीजता रहता है .आत्मा पर भी कर्म का सूक्ष्म प्रभाव पड़ता रहता है .जो कर्म बार बार दोहराया जाता है धीरे धीरे वही आत्मा का स्वभाव संस्कार बन जाता है .मसलन आप किसी से चिढ़ते हैं चिढ़ना  धीरे धीरे आपका स्वभाव बन जाता है .

जबकि इंद्र धनुष के सात रंगों की तरह आत्मा भी एक सप्त वर्णी सितारा है शाइनिंग स्टार है .दिव्यज्योति है .इसीलिए संध्या को दीपक जलाते समय हम अपने ही आत्म स्वरूप उस दीपक की लौ को प्रणाम करते हैं .दूकानदार के हाथ प्रणाम की मुद्रा में आजाते हैं सांझ को बत्ती जलाते वक्त .मस्तक के   बीच तिलक लगाते हैं .महिलाएं बिंदी लगातीं हैं .क्योंकि शरीर में यहीं निवास करती है आत्मा इसीलिए जब आत्मा शरीर छोडती है सनातन धर्मी समाज कपाल क्रिया करता है लठ्ठ मारता है ताकि आत्मा राम मुक्त हो जाए .शरीर से पूरी तरह बे -दखल हो जाए .शरीर तो अब किसी काम का रह नहीं गया है ,हमारी आत्मा भी कमज़ोर हो चली है जीते जी .

ज्ञान ,पवित्रता ,शान्ति ,प्रेम ,आनंद ,शक्ति ,प्रसन्नता यह मेरा (मुझ आत्मा का ही )निजी गुण धर्म था .कहाँ छीज गया यह गुण ?

जब तक जीवन में तनिक आध्यात्मिकता नहीं  होगी  ख़ुशी आ नहीं सकती .चाहे पार्क में सुबह सवेरे जाके हम कितना भी ठाहाका मारते रहें तालियाँ पीटते  रहें .शरीर को भले कुछ लाभ हो इस कसरत से आत्मा को कोई लाभ नहीं पहुंचेगा .

मुझे अपने व्यवहार में आत्मा के निजी गुणों को ही महत्व देना है किसी और के व्यवहार को नहीं .यह संकल्प कर लें .दोहरालें मैं उस परम पिता का वंश हूँ (अंश नहीं ),संतान हूँ जो विश्व की समस्त आत्माओं का सच्चा सच्चा पिता है .निरहंकारी पिता है सुखदाता दुःख हरता .उसी का वंश हूँ उसी के गुण धर्म धारूं किसी ऐरे गैरे  नथ्थू खैरे (एवरी टॉम एंड हेरी )के नहीं .

उसने ऐसा कहा तो क्यों कहा .ऐसे मुझे देखा तो क्यों देखा .डंक मारना बिच्छु की आदत है .वह अपने स्वभाव में है .मैं अपने स्वभाव में रहूँ .अपनी स्थिति क्यों खराब करूँ ?

सामने वाला व्यक्ति भूल कर रहा है ,तो मैं भी करूँ ?जीवन को जीने का आपका एक अंदाज़ होना चाहिए .

कोई परिस्थिति आ गई .रुक कर बस इतना सोचिये परिस्थिति ने मेरी स्थिति बिगाड़ी या मेरी सोच ने .आपकी नै गाड़ी  में किसी ने टक्कर मार दी , आप तैश में आगये .भाई साहब उसका डेंट निकल जाएगा .आपकी सोच बिगड़ेगी तो उसका आपके शरीर पर भी प्रभाव पडेगा .एक नुकसान  के पीछे एक और बड़ा नुकसान  कर लेना कहाँ की अक्लमंदी है .

बात साफ़ है हम अपनी निजी शक्ति को भूल चुकें हैं भूल चुकें हैं हम किसकी संतान हैं .देह के पिता पर गुमान कर रहें हैं सामने वाले को कह रहें हैं -तुझे मालूम है मेरा बाप कौन है ?लौकिक बाप  की शक्ति पर उछल रहें हैं पारलौकिक को भूल .जबकि लौकिक बाप तो हमारी देह का ही पिता है आत्मा का नहीं .आत्मा का पिता भी आत्मा ही होगा यह हमें अब याद नहीं है यही हमारे दुखों का कारण है .वह पिता है परमपरमात्मा जिसे हमने सर्वव्यापी कह उसकी बड़ी अवमानना की है .फिर तो भगत ही भगवान हो गया .फिर क्या भगवान ही  भगवान की पूजा कर रहा है . फिर क्यों कहा जाता है आत्मा और परमात्मा अलग रहे बहुकाल .

परिश्थितियाँ तो आती रहतीं हैं .साइड सीन्स हैं इन्हें बड़ा नहीं मानना है .परिश्थितियाँ शक्ति शाली नहीं हैं हम शक्तिशाली हैं .मैं अपनी स्थिति सुधार लूं तो परिश्थिति आपसे आप छोटी हो जाती है .जैसे विमान से देखने पर पृथ्वी छोटी दिखने लगती है .अपने उसी स्वमान में टिकके मैं परिश्थिति को देखूं .

सामने वाला व्यक्ति मुझे धोखा तो दे सकता है दर्द नहीं .दर्द हम खुद पैदा कर लेते हैं .हम उसे पकड़  के बैठे रहते हैं उस दर्द को .जबकि ख़ुशी और दर्द अपोजिट हैं रात  दिन की तरह .अगर ख़ुशी चाहिए तो दर्द को छोड़ो पकडे हुए क्यों बैठे हो .

रात गई सो बात गई ..हो ली सो हो ली .

लेकिन हम घटना को उससे पैदा स्थिति को पकड़े पकड़े अपनी स्थिति को भी खराब कर लेते हैं .

हम आत्माएं बे -दागी हीरा हैं .दागी बन जाते हैं परिश्थिति को पकड़ के जबकि असली हीरा धूप  में गर्म नहीं होता हम ज़रा सी सी परिश्थिति से गर्म हो जातें हैं .
अगर जीवन  में ख़ुशी चाहिए तो अपने आपको शक्तिशाली समझो .मेरी खुद की सोच मेरी ख़ुशी की हकदार है .

हमारा स्वभाव और जीवन के अ -भाव ये दो ही बातें हैं जो हमें तंग करती हैं .जब इन दोनों में कनेक्शन हो जाता है ,जीवन दुखमय हो जाता है .इसलिए ख़ुशी हासिल करने के लिए मुझे अपनी सोच को बदलना होगा .किसी की कही बातों को नहीं खुद को बड़ा समझना है .

ये संसार प्रकृति और पुरुष के मेल से बनता है .मन में उठने वाले विचारों से प्रवृत्ति का निर्माण होता है .याद रहे जो हमने सोचा ,दूसरे  को दिया वही लौटके हमारे पास आयेगा .

मन को अगर अच्छे संस्कार नहीं देंगें ,यह गलत ही सोचता रहेगा .फिर हम कह उठते हैं मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है .मैं ने किसी का क्या बिगाड़ा है ?

इसलिए मन की शक्ति के सृजनात्मक प्रयोग करें .अपने मन को दिशा दें .आदेश दें .आत्मा की मनन शक्ति है आपका मन इसे मनमानी न करने दें .आप इसके मालिक बनें .आत्मा की निर्णय शक्ति है बुद्धि .बुद्धि का पात्र शुद्ध रखें .निर्णय करने की इस शक्ति में निखार आयेगा .हमारे दिन की शुरुआत अच्छी हो इसपर पूरा पूरा ध्यान दें .ख़ुशी में रहने और ख़ुशी बांटने की प्रतिज्ञा करें .सुबह उठके शिव बाबा को गुड मोर्निंग कहें ,हेपी मोर्निंग ,गोल्डन मोर्निंग कहें .सोते वक्त भीयाद में सोयें .  नारायणी नशा रहे .ॐ शान्ति .

मंगलवार, 18 जून 2013

राज योग द्वारा आंतरिक शक्तियों का विकास

राज योग द्वारा आंतरिक शक्तियों का विकास 

मन की ऊर्जा (चैतन्य शक्ति )आत्मा का परमात्मा से मिलन करवाती है बशर्ते मन हमारा मुरीद हो हम मन के मुरीद न हों .एक सेकिंड में हम अपने आप को अशरीरी समझ आत्म स्वरूप में स्थित हो ,अपने ज्योति बिंदु स्वरूप शांत स्वरूप के स्मृति में टिककर परम ज्योति परमात्मा को याद करें और परमात्मा से हमारा मिलन हो जाए .दो तारों को जोड़ने के लिए ऊपर का रबड़ (इन्सुलेटर )हटाना पड़ता है तभी करेंट बहता है तार में .आत्मा का परमात्मा से योग भी तभी लगेगा जब हम ऊपर  का रबड़ हटा अ -शरीरी बनेंगे बुद्धि से . हमारे तार जो सर्वश्रेष्ठ सर्वोपरि है सर्वमान्य है सर्वज्ञ है ,ऊंचे  ते भी ऊंचे भगवान के साथ जुड़ जाते हैं इसीलिए आत्मा परमात्मा के इस प्रेममिलन को राजयोग कहा गया है .बस हमारा संकल्प एक स्विच बन जाए इधर स्विच आन किया उधर संपर्क जुड़ा .बे -तार का प्रसारण है राज योग .

राजयोग के अभ्यास से हमारा व्यवहार संस्कार बदलता है :

आचरण शुद्ध होता है राजयोग के अभ्यास से .वृतांत है स्वामी रामतीर्थ के आश्रम में एक सन्यासी आये ,आते ही बोले महाराज मैं नदी को पानी की सतह  पे चलके पार कर सकता हूँ .स्वामीजी बोले कितने साल लग गए इस अभ्यास में ,इस प्राप्ति में? साधू बोला दस साल .भले आदमी जो काम नाव में बैठके नदी पार करने का दो पैसे में हो सकता था उसमें तुमने जीवन के दस साल व्यर्थ कर दिए .तुम्हारे अन्दर अहंकार और आगया करिश्मा दिखाने का .आत्मा तुम्हारी उतनी ही कमज़ोर हो गई .जानते हो भाई भाई के परस्पर द्वेष से ही महा -भारत हुआ था . योग के अभाव में शक्ति नहीं थी आत्मा में .

योग हमें सहन करने की शक्ति देता है 

आज आदमी सोचता है हम क्यों सहन करें सामने वाला करे .आत्म ह्त्या  का एक कारण सहन शक्ति का ही अभाव है .क्रोध में विवेक नष्ट हो जाता है .गुस्से के तात्कालिक लाभ ही मिलते हैं .क्रोध से आप किसी से काम तो करवा सकते हैं लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बुरे होते हैं .

माँ बाप सोचते हैं बच्चे पढ़ेंगे नहीं तो गुस्सा तो करना ही पड़ेगा .आप उन्हें प्यार से समझाइये .गुस्से में हम बच्चों को कुछ भी कह देते हैं .नालायक ,पाजी ,कुछ नहीं सीखेगा तू .बड़े होने पर ऐसे बच्चे विद्रोही बन सकते हैं .

निंदा हमारी जो करे मित्र हमारा होय :

हमारी किसी ने निंदा की और हम उसे स्वीकार करते हैं तो दुःख होता है .हम न चाहे तो कोई हमें दुःख नहीं पहुंचा सकता .मेरा कमंडल है मेरे पास ही रहा .मैं ने कुछ लिया ही नहीं तो दुःख कहाँ से आयेगा ?हमने लिया ही नहीं जो बुरा भला किसी ने कहा .कोई प्रतिक्रिया ही नहीं की तो सामने वाला शांत हो जाएगा .   

जब कोई गुस्सा करे मुंह में पानी रख लो निगलो नहीं :

एक पति महोदय रोज़ पत्नी को घुड़कते थे .शाम को दफ्तर से लौटे तो उन्होंने ऐसा ही किया .पत्नी ने झट मुंह में पानी रख लिया .दूसरे  दिन भी पति के गुस्सा  होने पर पत्नी ने ऐसा ही किया .पति को लगा अब यह बदल गई है .पति भी खुद पे ध्यान देने लगे और वह भी शांत हो गए .

बतला दें आपको वह पानी कोई सिद्ध पानी नहीं था .साधारण पानी ही था जो महात्मा जी ने बोतल में भरके दिया था .यह सचमुच हमारे कंट्रोल में है हम कैसा व्यवहार करें .कई बार बिना सोचे समझे ही हम रिएक्ट करते हैं .असाधारण व्यक्तियों ने कभी भी साधारण व्यवहार नहीं किया है .साधारण आदमी की तरह ईंट का ज़वाब पत्थर से नहीं दिया है .ईसा मसीह को तो सूली पर ही चढ़ा दिया गया था ,तब भी उन्होंने रिएक्ट नहीं किया .यही कहा ईश्वर इन्हें माफ़ करदेना .ये नहीं जानते ये क्या कर रहें हैं .
महात्मा गांधी एक मर्तबा ट्रेन में यात्रा कर रहे थे .साथ वाला व्यक्ति पान खा रहा था .दो बार गांधी के पैर पर उस व्यक्ति की थूक पड़ी दोनों बार महात्मा ने उसे चुपचाप पौंछ  दिया .उस व्यक्ति को कुछ भी नहीं कहा .व्यक्ति शर्मिन्दा हो महात्मा के पैरों पर गिर गया .

एक  साधू था .उसे एक व्यक्ति नियम निष्ठ होकर रोज गाली देता था .एक रोज साधू नेउस व्यक्ति को फल भिजवाये .वह व्यक्ति बहुत चकराया कहने लगा मैं तो आपको गाली देता था फिर भी आपने मुझे फल भिजवाये हैं .क्यों ?साधू बोले -तुम रोज़ मेरे ऊपर अमृत वर्षं करते हो तुम्हारी शक्ति बनी रहे इसीलिए मैं ने ये फल भिजवाये .तुमने मुझे सहने की शक्ति दी .राजयोग भी यही काम करता है .

समाने की शक्ति :

सागर तमाम नदियों के कचरे को समाता है और खुद कभी किनारा नहीं छोड़ता .हानि, लाभ ,सुख ,दुःख में जो समान भाव बनाए रहता है वह सागर के समान बन जाता है .

योग से हम वही ग्रहण करते हैं जो हमारे लिए लाभदायक हो :

एक कारीगर के पास एक जैसी तीन मूर्तियाँ थीं फिर भी एक की कीमत एक हजार दूसरी की दो तथा तीसरी की दस हज़ार थी .

पहली मूर्ती की विशेषता यह थी जब उसके एक कान में तार डाला जाता था ,वह उसके मुंह से बाहर आ जाता था .

दूसरी  के कान में तार  डालने पर वह दूसरे   कान से बाहर आजाता था तथा तीसरी के पेट में ही रह जाता था .

तीन प्रकार के व्यक्ति होतें हैं इसी प्रकार एक जो सुनी हुई को फट आगे कह देते हैं प्रसारित करदेते हैं .दूसरे एक कान से सुनते है दूसरे  से निकाल देते थे .तीसरे पचा लेते हैं .बात बुद्धि तक ले ही नहीं जाते हैं .

योग हमें  परखने, निर्णय करने की शक्ति देता है :

औचित्य ,अनौचित्य पर हम विवेक से काम लेते हैं .असली और नकली हीरे की पहचान कर लेते हैं .असली हीरे धूप में रखने पे गर्म नहीं होते .बुद्धि का पात्र निर्मल बनाता है योग जितनी बुद्धि श्रेष्ठ होती है निर्णय करने की शक्ति भी उतनी ही अव्वल हो जाती है .

सामना करने की शक्ति देता है योग :

तूफ़ान तो आयेंगें जीवन भर .इस जीवन में जो कुछ भी हो रहा है हमारे कल्याण के लिए ही हो रहा है .परिणाम का कोई तो कारण होता है .आज जो भी हमारे साथ घटित हो रहा है वह हमारे ही पूर्व जन्मों  का फल है परिणाम है .अकारण कुछ भी नहीं होता है .हमारी छाया की तरह हमारे कर्म हमारे साथ चलते हैं .

सहयोग की  शक्ति :

योग हमें सिखाता है हम एक ही परमपिता की संतान हैं इसीलिए भाई भाई हैं .असंभव को भी संभव कर देता है सहयोग .

एक भोज का आयोजन देवाताओं और असुरों के लिए किया गया .शर्त यह थी खाते समय किसी की भी कोहनी नहीं मुड़नी चाहिए .असुर भूखे रह गए .देवताओं ने भर पेट खाया .जानते हैं कैसे ?एक देवता ने अपने सामने वाले दूसरेदेवता  को अपने  हाथ से खिलाया .भर पूर खाया खिलाया .

एक जंगल में आग लगी थी .आग बुझाने के संकल्प में एक छोटी सी चिड़िया भी लगी हुई थी .अपनी नन्नी चौंच में पानी भर के लाती आग पे छिड़कती .एक कौवा यह कृत्य देख रहा था कहने लगा तुम्हारे इस पुरुषार्थ से क्या होगा ?क्या आग बुझ जायेगी .चिड़िया बोली भले न बुझे लेकिन मेरा नाम इतिहास में आग बुझाने वालों में लिखा जाएगा लगाने वालों में नहीं .

विस्तार को संकीर्ण करने की शक्ति :

कछुए की तरह हो जाएं  हम .ज़रुरत हो आसपास को जगत को देखे ज़रुरत हो अशरीरी बन जाए .योग से हम अपने मन को न्यारा कर  सकते हैं .मैं जब जो चाहूँ देखू जब न चाहूँ न देखूं .

समेटने की शक्ति :

न कुछ तेरा न कुछ मेरा चिड़िया रैन बसेरा .सब कुछ छोड़ने को तैयार रहो .नाम ,धन, शोहरत .कभी भी काल आ सकता है .


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रविवार, 16 जून 2013

क्या डायबिटिक रेटिनोपैथी का निदान है ?

क्या डायबिटिक रेटिनोपैथी का निदान है ?

डायबिटिक रेटिनोपैथी का रोगनिदान एक अच्छा नेत्र रोगविशेषज्ञ (ओफ्थल्मोलोजिस्ट )आँखों के गहन जांच द्वारा कर सकता है .जांच में दृष्टि तीक्ष्णता का टेस्ट ,आँखों के प्रेशर (ओक्युलर प्रेशर )की मापऔर नेत्र विशेषज्ञ द्वारा रेटिना का गहन निरीक्षण  भी किया जाना शामिल होता  है 

.कई बार नेत्र विशेषज्ञ आपसे एक विशेष प्रकार के जांच के लिए निवेदन कर सकता है ,जिसे फंडस फ्लोरोसिन एञ्जियोग्रेफ़ि (ऍफ़ऍफ़ए )कहते हैं .इसमें विशेष प्रकार की फ्लोरोसेंट डाई रक्त नलिकाओं में इंजेक्ट की जाती है ,जिससे रेटिना को बेहतर ढंग से देखा जा सकता है .डाई रेटिना की रक्त नलिकाओं में जैसे जैसे घूमता है ,इसकी तस्वीर ले ली जाती है .इन तस्वीरों के माध्यम से इसकी सम्पूर्ण जानकारी मिल जाती है कि कहाँ पर असामान्य नलिकाओं से रक्तस्राव हो रहा है .इससे डायबिटिक रेटिनोपैथी की अवस्था की  पहचान एवं उसके इलाज़ में मदद मिलती है .

एञ्जियोग्रेफ़ि के अतिरिक्त ,डायबिटिक मेक्युलोपैथी की जांच एवं उसकी गंभीरता का पता लगाने के लिए ओप्टिकल कोहरेन्स टमोग्रेफ़ी (ओसीटी )की ज़रुरत पड़  सकती है .   

क्या डायबिटिक रेटिनोपैथी की जांच है ?

मधुमेह से पीड़ित मरीज़ के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि वह नेत्र विशेषज्ञ के साथ ही स्रावीविज्ञान के माहिर (इंडोक्राइनोलाजिस्ट )के संपर्क में रहे और नियमित जांच कराए .

यदि डायबिटिक रेटिनोपैथी शुरूआती अवस्था में पकड़ में आ जाता है तो इसके दीर्घकालिक फायदे हैं .डायबिटिक रेटिनोपैथी से अधिकाँश मामलों में दृष्टि ह्रास की रोकथाम की जा सकती है बशर्ते इसका इलाज़ जल्द शुरू कर दिया जाए .लेकिन एक बार नुक्सान हो गया तो इसके दुष्प्रभाव को दूर नहीं किया जा सकता .इसलिए बेहद ज़रूरी है कि प्रत्येक मधुमेह रोगी  को नियमित तौर पर आँखों की जांच करानी चाहिए ,ताकि डायबिटिक रेटिनोपैथी की मौजूदगी और फैलाव का समय रहते पता लगाया जा सके .

डायबिटिक रेटिनोपैथी का उपचार क्या है ?

उपचार के तीन प्रचलित तरीके हैं :

लेज़र ट्रीटमेंट :लेज़र उपचार में नेत्र विशेषज्ञ लेज़र का प्रयोग कर रेटिना के क्षेत्र  में विकसित अवांछित रक्त नलिकाओं को नष्ट कर देते हैं जो रेटिना को पोषण और एवं ऑक्सीजन सप्लाई में बाधा उत्पन्न करती हैं .यह रेटिना क्षेत्र में नै रक्त नलिकाओं की वृद्धि को भी रोकता है .इसका प्रयोग कई सत्रों में किया जाता है .

विट्रेकटमी :यह एक शल्य चिकित्सा विधि है .इस विधि में शल्य क्रिया की मदद से खून एवं क्षतिग्रस्त ऊतकों को आँख के मध्य भाग से हटा दिया जाता है .इस विधि का चुनाव तब किया जाता है जब आँखों में रक्त स्राव का विस्तार अधिक हो .

इंट्राआक्युलर इंजेक्शन :आँखों में लगाए जाने वाले एंटी वीईजीऍफ़ या स्टेराइड जैसे इंजेक्शन डायबिटिक रेटिनोपैथी के कुछ मरीजों पर बेहद कारगर तरीके से काम करते हैं .यह रक्त नलिकाओं की असामान्य वृद्धि (पीडीआर )एवं उनसे होने वाले रक्त स्राव को कम कर देता है .इसका प्रयोग सर्जरी से पहले रक्त स्राव को कम करने के लिए भी कर सकते हैं .

उपचार के तरीकों का चुनाव बीमारी की अवस्था ,मरीज़ की उम्र एवं नेत्र विशेषज्ञ की सलाह पर निर्भर करता है .लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि आँखों को नुक्सान पहुंचना शुरू हो इससे पहले इलाज़ शुरू कर दिया जाए .

उपचार से दृष्टि वापस पाई जा सकती है ?

वह मरीज़ जो इस बीमारी के कारण पूर्व में अपनी दृष्टि गँवा चुका है ,सामान्यतय उपचार से उसकी दृष्टि वापस नहीं लाई  जा सकती .यद्यपि आँखों में रक्त स्राव ,रेटिनल डिटेचमेंट या मोतियाबिंद  के कारण गई दृष्टि को वापस लाया जा सकता है .

लेज़र उपचार के बारे में कुछ तथ्य :

(१  )यह केवल एक ओपीडी में भी संभव है ,इसके लिए भर्ती होने की ज़रुरत नहीं पड़ती है .

(२ )इसमें चीरा लगाने की ज़रुरत नहीं पड़ती है .

(३ )यह रक्त स्राव को रोक देता है या रेटिना के अवांछनीय रक्त नलिकाओं को नष्ट कर देता है .

(४ )सामान्यतय यह कष्ट दायक नहीं होता ,हालाकि जब नै रक्त नलिकाओं को हटाते हैं तो थोड़ा असहज महसूस होता है .ज़रुरत के पड़ने पर लेज़र उपचार को दोहराते हैं .

( ५ ) यह दृष्टि ह्रास को रोक सकता है ,लेकिन जा चुकी दृष्टि को वापस नहीं ला सकता .

डायबिटिक रेटिनोपैथी से बचा जा सकता है ?

इसके प्रमाण हैं कि मधुमेह से पीड़ित लोग  ब्लड शुगर (रक्त शर्करा )पर बेहतर नियंत्रण से डायबिटिक रेटिनोपैथी को टाल सकते हैं और उससे होने वाली समस्याओं को कम कर सकते हैं .

महत्वपूर्ण सुझाव :

मधुमेह हो गया हो तो .साल में एक बार नेत्र रोग विशेषज्ञ के पास आँखों की जांच के लिए ज़रूर जाएं .

रेटिना विशेषज्ञ की सलाह व बातों को नियमित तौर पर मानें व अनुसरण करें .

ब्लड शुगर स्तर पर नजर बनाए रहें .

रक्त चाप को सामान्य बनाए रहें .

धूम्रपान न करें .

कोलेस्ट्राल स्तर पर नियंत्रण रखें .

नियमित कसरत करें और संतुलित आहार लें .

(समाप्त )

शनिवार, 15 जून 2013

डायबिटिक रेटिनोपैथी

डायबिटिक रेटिनोपैथी 

मधुमेह(डायबिटीज़ ) क्या है ?

मधुमेह एक सामान्य बीमारी  है ,जो शरीर में ग्लूकोज़ (शर्करा )के प्रयोग एवं संचय करने वाले अंगों को प्रभावित करती है .मधुमेह बचपन में भी हो सकता है ,लेकिन आम तौर पर यह बड़ी उम्र में होता है .इससे पीड़ित मरीज़ को ज्यादा प्यास लगती है ,जल्दी जल्दी पेशाब आता है और वजन कम होने के साथ दृष्टि (नजर ,बीनाई ,विजन )भी प्रभावित हो सकती है .

मधुमेह एवं आँखें 

मधुमेह आँखों को कई प्रकार से नुक्सान पहुंचा सकता है .इससे दृष्टि में अस्थिरता ,कम आयु में मोतियाबिंद ,आप्टिक नर्व के प्रभावित होने से दृष्टि का कम होना ,आँखों से सम्बंधित नसों एवं मांसपेशियों में पक्षाघात के चलते भैंगापन या डिपलोपिया हो सकता है .

लेकिन मधुमेह के कारण आँखों में होने वाली बीमारियों में डायबिटिक रेटिनोपैथी सबसे प्रमुख है .

डायबिटिक रेटिनोपैथी क्या है ?
डायबिटिक रेटिनोपैथी एक बीमारी  है ,जो मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति की रेटिना (दृष्टि पटल ,आँख का पर्दा जहां तस्वीर बनती है )को प्रभावित करती है .यह रेटिना को रक्त पहुंचाने वाली महीन नलिकाओं के क्षतिग्रस्त होने के कारण होता है ,अगर इसका समय पर इलाज़ न कराया जाए तो पीड़ित अंधे पन  का शिकार हो सकता है .

डायबिटिक रेटिनोपैथी दुनिया में अंधेपन का सबसे बड़ा कारण  है ,जिसके मामले हर साल बढ़ते जा रहें हैं .


रेटिना क्या है ?

रेटिना आँखों के अंदरूनी भाग  में स्थित एक नाजुक प्रकाश सम्बन्धी परत है ,जो किसी वस्तु से परावर्तित होकर आने वाले प्रकाश की मदद से वस्तु की छवि निर्माण के लिए जिम्मेवार होती है .रेटिना को होने वाला नुकसान रेटिनोपैथी का कारण बनता है .

मधुमेह रेटिना को कैसे प्रभावित करता है ?

मधुमेह के मामले में ,रक्त में शर्करा की बढ़ी हुई मात्रा रक्त नलिकाओं को क्षतिग्रस्त कर सकती है .फलस्वरूप नलिकाओं से रक्त स्राव हो सकता है ,जिससे रेटिना में सूजन पैदा हो जाती है .रक्त नलिकाओं में खराबी के कारण रेटिना को स्वस्थ रखने के लिए ज़रूरी पोषक तत्व व ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो जाती है .

शुरूआती चरण में उपर्युक्त कारणों  से दृष्टि के धुंधले पन के लक्षण दिखते  हैं .जैसे जैसे बीमारी बढ़ती  है ,रेटिना क्षेत्र में नै  अ - वांछनीय रक्त नलिकाएं पनपने लगतीं हैं जो ऑक्सीजन आपूर्ति में बाधा पैदा करतीं हैं .

यह नै रक्त नलिकाएं मधुमेह के कारण कभी भी फट सकती हैं ,फलस्वरूप 
रेटिना के आसपास होने वाले रक्त स्राव से आँखों में अंध बिंदु (ब्लाइंड स्पॉट )बन सकता है या अचानक दृष्टि ह्रास हो सकता है .नजर (बीनाई )कमजोर हो सकती है .


डायबिटिक रेटिनोपैथी किसे हो सकता है ?

केवल मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति को ही डायबिटिक रेटिनोपैथी हो सकता है .डायबिटीज़ होने की अवधि के बढ़ने के साथ ही डायबिटिक रेटिनोपैथी होने का ख़तरा बढ़ता जाता है .

यह देखा गया है कि करीब अस्सी फीसद लोग जो १ ५ से अधिक वर्षों से मधुमेह के शिकार हैं उनके रेटिना क्षेत्र की कुछ रक्त नलिकाएं क्षति ग्रस्त हो जाती हैं .लेकिन डायबिटिक रेटिनोपैथी होने के लिए जो सबसे प्रमुख कारण हैं उनमें गंभीर और अनियंत्रित मधुमेह ,रक्त में शर्करा के स्तर में उतरा चढ़ाव ,उच्च रक्त स्राव ,उच्च रक्त कोलेस्ट्राल ,मधुमेह के कारण किडनी की बीमारी और गर्भावस्था है .

किशोरावस्था में मधुमेह से पीड़ित को डायबिटिक रेटिनोपैथी कम उम्र में हो सकता है .

डायबिटिक रेटिनोपैथी कैसे बढ़ता है ?

डायबिटिक रेटिनोपैथी के दो मुख्य चरण होते हैं .शुरूआती चरण को नान प्रोलिफेरेटिव डायबिटिक रेटिनोपैथी (एनपीडीआर )कहते हैं .इस चरण में रेटिना क्षेत्र की नलिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं .सामान्यत बीमारी  का यह शुरूआती चरण होता है ,जिसमें लक्षणों का पता नहीं चलता है .कुछ मामलों में क्षतिग्रस्त रक्त नलिकाओं के फटने से रेटिना के मध्य भाग में रक्त फ़ैल जाता है .इस स्थिति को डायबिटिक मैक्युलोपैथी कहते हैं ,इससे दृष्टि प्रभावित होती है और धुंधला दिखने लगता है .

इसके उन्नत और विकसित चरण को प्रोलीफेरेटिव डायबिटिक रेटिनोपैथी (पीडीआर )कहते हैं .यह डायबिटिक रेटिनोपैथी  की सबसे सबसे गंभीर चरण है .इस चरण में रेटिना क्षेत्र में नै कमज़ोर अवांछनीय रक्त नलिकाएं तेज़ी से पनपने लगती हैं जो रेटिना के ऑक्सीजन आपूर्ति  में बाधा पैदा कर उसे क्षतिग्रस्त करती  हैं।इस कारण रेटिनल डिटेचमेंट या ग्लूकोमा भी हो सकता है .करीब २ ० फीसद मधुमेह पीड़ितों में पीडीआर की वजह से गंभीर दृष्टि ह्रास हो सकता है जो अंधेपन का कारण बनाता है .

डायबिटिक रेटिनोपैथी के लक्षण क्या हैं ?

डायबिटिक रेटिनोपैथी के लक्षण  हो सकते हैं :

  (१ )घटती दृष्टि 

 (२ ) दृष्टि का धुंधला पड़ना 

 (३ )फ्लोटर 

शुरूआती चरण या कई बार गंभीर स्तर के डायबिटिक रेटिनोपैथी का कोई लक्षण नहीं दिखाई देता है .

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(ज़ारी )