सोमवार, 25 सितंबर 2017

बीएचयू में षडयंत्रकारी तत्वों का जमघट

बीएचयू में षडयंत्रकारी तत्वों का जमघट

प्रधानमन्त्री अभी हवाईजहाज में बैठे ही थे ,मार्क्सवाद के बौद्धिक गुलामों में जिनके सरदार येचारी सीताराम बने हुए हैं ,सपाई के छटे हुए षड्यंत्रकारी तत्व ,पाकिस्तान विचार के स्थानीय जेहादी तत्व जिनमें अपने को सबसे पहले मुसलमान मानने शान से बतलाने वाले लोग ,ममताई लफंडर आईएसआई के स्लीपर सेल के लोग,हाय ये तो कुछ भी नहीं हुआ कह के  हाथ मलके चुप नहीं बैठे उन्होंने अपनी लीला दिखला दी।

 मुद्दा था एक केम्पस छात्रा  के  साथ कथित बदसुलूकी दूसरी का अपने को खुद ही घायल कर लेना और तीसरी का सर मुंडा लेना। प्रधानमन्त्री कि यद्यपि यह कांस्टीटूएंसी है लेकिन प्रधानमन्त्री का काम गली -गली घूमके इन षड्यंत्रों को सूघ लेना नहीं होता है वह आये और अपना सकारात्मक काम अंजाम देकर चले गए।

योगी आदित्य नाथ खुद क्योंकि षड्यंत्रकारी नहीं रहे हैं मुलायमतत्वों की तरह ,वह अंदर खाने पल रही इस साजिश की टोह नहीं ले सके। यूनिवर्सिटी के वाइसचांसलर ने घटना पर खेद व्यक्त करते हुए कहा है जो हुआ वह खेद जनक है लेकिन मुझे घटना को ठीक से समझने तो दो।वह भी हतप्रभ हैं। 

अजीब बात है हालांकि शरदयादव के लोग  वहां इम्प्लांट नहीं किये गए थे लेकिन ये ज़नाब घटना की निंदा करने वालों में सबसे आगे रहे।

अब ये भारतधर्मी समाज का काम है वह आमजान को बतलाये बीएचयू को जेएनयू में बदलने की साजिश करने वाले कौन -कौन से कन्हैया तत्व हैं जो मौके का फायदा उठा रहे हैं। बीएचयू एक बड़ा कैंपस है यहां हैदराबादी ओवेसी -पाकिस्तान सोच के लोग भी पढ़ने की आड़ में घुस आये हैं ,सीधे -सीधे पाकिस्तान सोच के लोग भी ,ममता की नज़र पूजा - मूर्ती विसर्जन से पहले ऐसे दंगे करवाने की बनी हुई है ताकि अपनी सोच को वह ठीक ठहरा सकें। इन्होने हाईकोर्ट के आदेश को नहीं माना सुप्रीम कोर्ट इसलिए नहीं गईं कि और फ़ज़ीहत होगी लिहाज़ा अपनी सोच को जायज सिद्ध करने करवाने के लिए वह हिन्दुस्तान में जगह -जगह दंगे प्रायोजित करवाने की ताक  में हैं उनके लोग भी बीएचयू पहुंचे पहुंचाए गए हैं।  यकीन मानिये बहुत जल्दी इन की बखिया उधड़ेगी लेकिन भारतधर्मी समाज को इस वेला देश- विरोधी  पाकिस्तान और आईएसआई समर्थक सोच के लोगों पर बराबर निगाह जमाये रखनी है। जैश्रीकृष्णा।  

कौन सी बातें महाधमनी वाल्व अवरोध या संकरेपन की बीमारी एओटिकवाल्व स्टेनोसिस के होने की जोखिम को ,संभावना को पैदा करती हैं,बढ़ा देती है :

कौन सी बातें महाधमनी वाल्व अवरोध या संकरेपन की बीमारी एओटिकवाल्व स्टेनोसिस   के होने की जोखिम को ,संभावना को पैदा करती हैं,बढ़ा देती है  :

(१) बढ़ती उम्र खासकर सत्तर -अस्सी के पेटे  में आये लोगों के लिए जोखिम बढ़ जाता है। 

(२ )जन्मजात हृदय से ताल्लुक  रखने वाली चिकित्सीय स्थितियां (विकृतियां जैसे वाल्वों की संरचना सामान्य से अलग होना ट्राइकस्पिड वाल्व एओटिक का दो पल्ले या लीफलेट्स लिए बायकस्पिड रह जाना  )

(३)ऐसे संक्रमणों का पूर्ववृतान्त (हिस्ट्री )जो हृदय को असरग्रस्त करने का माद्दा या क्षमता रखते हों। 

(४)हृदय तथा रक्तवाहिकाओं से संबंधित (कार्डिओ -वसक्यलर)जोखिम को बढ़ाने वाली कंडीशनों जीवनशैली रोग यथा मधुमेह ,खून में घुली हुई चर्बी की  ज्यादा मात्रा (हाई -कॉलस्ट्रॉल )तथा हाई -ब्लड प्रेशर का मौजूद होना  

(५ )दीर्घावधि चले आये पुराने (लाइलाज )किडनी रोग का रहना ,रहे आना 

(६ )छाती विकिरण चिकित्सा का पूर्व -वृत्तांत 

सन्दर्भ -सामिग्री :http://www.mayoclinic.org/diseases-conditions/aortic-stenosis/symptoms-causes/dxc-20344145


भौतिक -विज्ञानों के झरोखे से

भौतिक -विज्ञानों के झरोखे से :क्या है उष्णकटिबंधी चक्रवातीय तूफानों की एक भयावह किस्म- "हरिकैन" (Hurricane )?कैसे होता है इनका नामकरण संस्कार ?

आम फेहम साधरण -जन की भाषा में कहें तो हरिकेन एक भयावह अंधड़ -तूफ़ान ही है  जिसे भूगोल -विज्ञान के माहिर उष्णकटिबंधी चक्रवात ही कहते हैं। हरिकेन अक्सर उष्णकटिबंधी और उप -उष्णकटि -बंधी जलराशि के ऊपर ही समुन्द्र के ऊपर उठते- बनते- पैदा होते हैं। इनकी फ़िज़िक्स के बारे में बात फिर कभी करेंगे।पूरा भौतिकी शास्त्र है इनका।

माहिरों के अनुसार जब किसी तूफ़ान की घूर्णन -गति  (Storm's Maximum Sustained Wind )प्रतिघंटा चौहत्तर मील को न सिर्फ छूले बल्कि लगातार उस अवधि में कायम भी रहे तब उसे हरिकेन का दर्ज़ा मिल जाता है। चीते से  ज्यादा तेज़ है ये बवंडर सी बलखाती नर्तनशील चाल जो इमारतों और वृक्षों को जड़ से उखाड़ फेंकने की ताकत रखती है।

सागरों के उष्ण जल के ऊपर बनते - पैदा होते ये तूफ़ान। उष्ण कटिबंधी इलाके इनके प्राकृत आवास कहे जा सकते हैं। कभी कभार तटीय इलाके का भू -क्षेत्र भी इनकी चपेट में आता है। बस देखते ही देखते जैसे समुन्दर विशाल जलराशि की एक दीवार बन भूक्षेत्र की ओर  दौड़ पड़ता है। इसे स्टॉर्म सर्ज (Storm Surge )कहा जाता है। वर्तमान में प्युटो- रीको (उत्तरी अमरीका के नियंत्रण में एक द्वीप )ये तबाही झेल रहा है। बस जैसे एक जल प्रलय होने को है तटबंध टूटने को हैं , ऐसी प्रतीति कराती है यह कुदरत की विनाश  लीला।

जैसे रिख्टर -पैमाने पे भूकंप की शक्ति का आकलन प्रसूत ऊर्जा के आधार और उससे होने वाली तबाही ,उस स्थान की भू -स्थल आकृति जिसका ज़ायज़ा दिलवाती चलती है , आकलन करती है  इस तबाही का , वैसे ही यहां इन भयावह समुदी तूफानों की शक्ति और विनाश लीला का आकलन (Saffir Simpson Wind Scale )सफ़ीर सिम्प्सन पवन पैमाने पर किया जाता है। जैसे जलजले से निसृत ऊर्जा से होने वाली तबाही का आकलन (१-१० )अंकों तक रिख्टर पैमाने तथा १ से लेकर १२ तक मरकेली पैमाने पर किया जाता है वैसे ही यहां इन भयावह चक्रवातों के मामले में १ से लेकर पांच अंक   रखे गए हैं जिसे अंकीय रेटिंग कह सकते हैं।इनका शक्तिमान कह सकते हैं।

कम -दाब वाला एक  मौसमी घूर्णनतंत्र होता  है उष्ण कटिबंधी चक्रवात। इसके तहत संघठित गर्जनमेघ (organised thunderstorms )आते हैं। लेकिन अलग -अलग पवनराशियों को अलग अलग रखने वाला कोई क्षेत्र या सीमा (Fronts )यहां नहीं होती है।

सन्दर्भ के लिए देखें सेतु :(https://oceanservice.noaa.gov/facts/hurricane.html)

राष्ट्रीय समुद्री (सागरीय )एवं वायुमंडलीय प्रशासन तथा संबद्ध राष्ट्रीय हरिकेन केंद्र के अनुसार इन विनाशकारी तूफानों का प्रसव एक जून से लेकर ३० नवंबर तक आधिकारिक तौर पर आकलित ,अनुमित ,किया गया है दीगर है कि इस अवधि के  बाहर -भीतर भी ये तूफ़ान उठ सकते हैं। कुदरत के खेल का केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।निश्चय  कुछ नहीं।

हरिकेन का नामकरण और पुरोहिताई  :विश्व मौसम संगठन करता यह काम। इस पर नेशनल हरिकेन सेंटर का कोई नियंत्रण नहीं रहता है। पूर्व में प्रशांत और अब अंधमहासागरीय क्षेत्र में भी पैदा होने वाले भयावह तूफानों के लिए कुछ नर और मादा ,स्त्रियों और मर्दों के नाम छः साल के एक आवधिक चक्र के बाद बारी -बारी  से रखे जाते हैं।

किसी कहतें हैं चक्रवात ?

यह एक लार्ज स्केल बड़े पैमाने का आंधी -तूफ़ान तंत्र(स्टाम ) होता है जहां पवनें एक केंद्र के गिर्द उत्तरी गोलार्द्ध में वामावर्त दिशा में यानी घड़ी  की सुइयों के विपरीत दिशा में   घूर्णन करती हैं तथा दक्षिणी गोल में दक्षिणावर्त। 
आम भाषा में इसे ही चक्रवात या बवंडर (गोल -गोल वृताकार घूमती तेज़ हवा वाली आंधी हवा का बिगूला कह दिया जाता है। यह बहुत खराब मौसम का संकेत करता है जिसमें बेहद की  वर्षा या तेज़ आंधी का भी इशारा रहता है।  

बहुत तेज़ बर्फीला तूफ़ान "Blizzard "कहा जाता है। टाइफून (Typhoon )उष्ण - कटिबंधी प्रचंड विध्वंसकारी  अंधड़ तूफ़ान (Violent Tropical Storm )को कहा जाता है ये आमतौर पर बेहद की शक्ति और ऊर्जा लिए अपनी विनाश लीला का क्षेत्र पश्चिमी प्रशांत तथा भारतीय समुन्द्रों (Indian Oceans)को बनाते हैं। 

हरिकेन एक ऐसा उग्र -अंधड़ तूफ़ान है जो अपने साथ मूसलाधार बारिश तथा अतिवेगवान पवनों से मार करता है। इसमें पवनों की चाल ११९ किलोमीटर प्रतिघंटे के पार चली जाती है। Beaufort Scale पर इसका ताकत और परिमान १२ या इससे और भी अधिक आंका जाता था। 

वर्तमान में जिस हरिकेन ने प्युर्तो-रीको (उत्तरी अमरीकी द्वीप )को अपना निशाना बनाया है उसे "सफ़ीर सिम्प्सन स्केल" पर विनाशलीला के तहत ३. ० आंका गया है। 

टारनेडो :यह भी एक प्रकार का घूर्णनशील उग्र बवंडर होता है। इसकी आकृति फनेल आकृति के बादल जैसी, हाथी की सूंड सी रहती है जिसमे भयंकर घूर्णन करती हवाएं चक्कर काटती हुई आगे बढ़ती है। गनीमत है इनका मार्ग स्थल के ओर बढ़ते हुए संकरा ही रहता है एक सीमित क्षेत्र ही इस column of swirling wind से पैदा  तबाही  का  साक्षी बनता है। एक प्रचंड तूफानी तंत्र इसकी कोख में रहता है जिसके साये में जिसके तले (नीचे )यह आगे बढ़ता रहता है। 

यह हवा या पानी का ऐसा बवंडर (भंवर )होता है ,वातावर्त या जलावर्न होता है जो चपेट में आई चीज़ों को अपने केंद्र की और खींच -घसीट के ले आता है। और मज़े से उसे लिए आगे बढ़ जाता है। चंद मिनिटों की अवधि में केहर ढ़ा देता है. इसका वाटेक्स (Vortex )घूर्णन वायु या जल राशि रहती है यही वायु या जल की  घूर्णन शील भंवर - राशि तबाही मचाती है। तरह मिनिट से पहले इनकी चेतावनी प्रसारित नहीं की जा सकती। तबाही मचाके ये चलते बनते हैं चंद सेकिंड  से लेकर कई घंटा तक हो सकती है इनकी आक्रामक मुद्रा  इनकी यथा समय भविष्य वाणी का समय केवल तरह  मिनिट रहता है। इससे पहले कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। 
देखें सेतु :
https://www.youtube.com/watch?v=wlwyA-5iafg

टाइडल वेव या सुनामी (बंदरगाह पर पहुँचने विनाशकारी बेहद लम्बी दीर्घ लम्बाई वेव -लेंथ समुद्री तरंग ,यहां Tsu-सु का अर्थ बंदरगाह आउट Nami का अर्थ तरंग है ):यह ऐसी लम्बी समुद्री तरंग  है जो समुद्री तल में जल के नीचे Sub-duction Earth Quake से पैदा होती है जब एक प्लेट दूसरी पर चढ़के सरकती है तब पैदा होती है यह तरंग जो जल के नीचे तो शान्त भाव आगे बढ़ती है लेकिन तट की और पहुँचते -पहुँचते इसकी लम्बाई बेहद बढ़ जाती है और इसके ध्वंसात्मक प्रभाव भुगतने पड़ते हैं। 

इस सभी प्राकृत आपदाओं की फ़िज़िक्स की  चर्चा हम आगामी विज्ञानों के झरोखे के तहत "क्या और कैसे ?"में आगामी आलेखों में करेंगें। 

https://www.youtube.com/watch?v=W0LskBe_QfA

सन्दर्भ के लिए  
ये सेतु  भी देखें : (१ )(https://www.google.com/search?q=how+names+are+given+to+hurricanes&rlz=1CAACAP_enUS646US647&oq=how+names+are+given+to+hurricanes)

(२ )https://oceanservice.noaa.gov/facts/storm-names.html

रविवार, 24 सितंबर 2017

कहो दिल खोलके जो भी कहो अपनों से कहना है

अभी से थक के बैठे हो अभी तो दूर जाना है ,

वही किस्से  पुराने हैं उन्हें क्या आज़माना है।

वो अपनी राह जाते हैं तुम्हें अपनी पे रहना है ,

तुम्हें क्या उनसे लेना है तुम्हे क्या उनको देना है।

न कुछ उनसे है अब कहना न कुछ उनसे  सुनना है।

कहो  दिल खोलके जो भी कहो अपनों से कहना है। 

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

जेहादी तत्वों के पोषक देश भंजकों अपनी मूल धारा में लौटो

 रोहंग्या जेहादी तत्वों के समर्थन में उतरे मान्य रक्तरंगियों (लेफ्टीयों ,वामियों ),सोनिया के बौद्धिक गुलाम सम्मान के योग्य पिठ्ठुओं एक बात समझ लो। यदि यह देश आज़ाद हुआ तो उस नेहरू वंश की वजह से नहीं जिसके लाडले नेहरू ने उन अंग्रेज़ों की परम्परा को ही आगे बढ़ाया था जो भारत -द्वेष पर ही आधारित थी। नेहरु का मन विलायती ,काया मुसलमान  और.... खैर छोड़िये .. बात सांस्कृतिक धारा की हो रही थी उसी पर लौटते हैं।

भारत को आज़ादी उस सांस्कृतिक धारा ने ही दिलवाई थी जो परम्परा से शक्ति की उपासक थी । यह आकस्मिक नहीं है कि राष्ट्रगान और वन्देमातरम का प्रसव उस बंगाल की  धरती पर ही हुआ जो परम्परा से शक्ति की, माँ दुर्गा की उपासक थी। उसी परम्परा को तिलांजलि दे खुद को दीदी कहलवाने वाली नेत्री ममता आज मूर्ती विसर्जन को एक दिन आगे खिसकाने की बात करती है क्योंकि मुसलमानों का २७ फीसद वोट फ्लोटिंग वोट है यह उस सांस्कृतिक धारा के साथ भी जा सकता है जो गांधी की आत्मा में वास करती थी जो मरते वक्त भी "हे राम "से संयुक्त रहे। 

सुयोग्य लेफ्टीयों तुम्हारे बीच सबसे ज्यादा बेरिस्टर रहे हैं कमोबेश तुम्हारा नाता बंगाल से गहरा रहा है जहां से आये प्रणव दा राष्ट्रपति के रूप में अपने आखिरी दिन विदा वेला में भारत के प्रधानमन्त्री मोदी से ये कहलवा लेते हैं "भले माननीय राष्ट्रपति मेरी कई बातों से सहमत न थे लकिन उन्होंने अपने पिता समान नेह से मुझे कभी वंचित नहीं रखा।" यही है भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक धारा जो एक तरफ राजा राम के गुण गाती है , मानस- मंदिर में (वाराणसी ) पूजा करती है ,शिव के तांडव और सदा शिव रूप (मंगलकारी )को भी नहीं भूलती।

जेहादी तत्वों के पोषक देश भंजकों अपनी मूल धारा में लौटो -भले मार्क्सवाद की बौद्धिक गुलामी करो लेकिन जेहादी रोहंग्या के साथ मत फिरो गली- कूचों में ,जेहादी तत्वों को यहां से दफह होना ही होगा ,तुम काहे बुरे बनते हो ?

ये देश तुम्हारा सम्मान करेगा।इसकी रगों में बहने वाले खून को पहचानो।  भारत धर्मी समाज  तुम्हें भी गले लगाएगा।
जैश्रीकृष्णा जयश्रीराम जयहिंद के सेना प्रणाम। 

क्या और कैसे ? क्या है महाधमनी वाल्व का संकरा पड़ना।यानी Aortic Valve Stenosis ?

क्या और कैसे ?

क्या है महाधमनी वाल्व का संकरा पड़ना।यानी Aortic Valve Stenosis ?

 क्यों हो जाता है यह हृद रोशनदान नैरो ?

उम्र बढ़ने के साथ -साथ साठ के दशक के पार  के अक्सर हमारे हृदय के चार रोशनदानों में से यह महारोशनदान (Aortic Valve ) संकरा होके खून के संचरण में रुकावट पैदा करने लगता है क्योंकि यह पूरी तरह अब खुल नहीं पाता है फलत:ब्लड सर्कुलेशन के कारण वाल्व के बंद होने से पैदा लुब-डुब साउंड में  भी बदलाव आता है जिसकी वजह बनता है हृदय के आसपास प्रवाह में पैदा होने वाला विक्षोभ। यह साउंड अब एक सरसराहट जैसी (Whooshing,Svishing जैसी  लगने  लगती है जैसे तेज़ी से बहती हवा सनसनाहट पैदा करे आवेग से बहता पानी सरसराहट पैदा करे। इस स्थिति को ही एआटिक वाल्व स्टेनोसिस (Aortic Valve Stenosis)कहा गया है। तथा इस असामान्य ध्वनि को जो इस स्थिति में वाल्व के बंद होने से पैदा हो रही है हार्ट -मर्मर कहा जाता है।

इसकी शिनाख्त हृद रोग का माहिर छाती की  पड़ताल स्टेथोस्कोप से करके आसानी से कर लेता  है। बस हो गया रोगनिदान।

अब क्योंकि रक्तप्रवाह में विक्षोभ पैदा होने लगता है इसलिए हृदय से बा -रास्ता मुख्यधमनी (Aorta )आगे शेष शरीर को रक्त पहुंचाने के लिए हृदय को अब अपेक्षाकृत ज्यादा काम करना पड़ता है। इस स्थिति में हृदय की कुल रक्त उलीचने पम्प करने (सिस्टोलिक स्ट्रोक )की क्षमता भी घटने लगती है। इसका दुष्प्रभाव हमारी हृद्पेशी (कार्डिएक मसल )को भुगतना पड़ सकता है। पेशी की मोटाई भी बढ़ सकती है वाल्व के आसपास कैल्शियम भी जमा हो सकता है। इसे ही केलिफिकेशन आफ एओटा कहा जा सकता है। यह भी रोग की एक वजह बन सकता है।

शिनाख्त न होने पर हृद पेशी को होने वाला नुक्सान बढ़ सकता है इलाज़ के अभाव में अनेक लक्षण जो अब तक मूक थे मुखरित होने लगते हैं। जबकि रोगनिदान समय से होने पर वाल्व की मरम्मत के अलावा दवाओं से भी इस स्थिति में आराम आ सकता है।अन्य पेचीला लक्षणों से जैसे री-जर्जी -टेशन (आगे बढ़ते हुए रक्त का महाधमनी में वापस लौटने लगना ) से बचाव हो जाता है।

सन्दर्भ -सामिग्री :http://www.mayoclinic.org/diseases-conditions/aortic-stenosis/home/ovc-20343384


चिकित्सा झरोखा :"क्या और कैसे ?"

चिकित्सा झरोखा :"क्या और कैसे ?"

क्या है महाधमनी वाल्व का संकरा पड़ना।यानी Aortic Valve Stenosis ?

 क्यों हो जाता है यह हृद रोशनदान नैरो ?

उम्र बढ़ने के साथ -साथ साठ के दशक के पार  के अक्सर हमारे हृदय के चार रोशनदानों में से यह महारोशनदान (Aortic Valve ) संकरा होके खून के संचरण में रुकावट पैदा करने लगता है क्योंकि यह पूरी तरह अब खुल नहीं पाता है फलत:ब्लड सर्कुलेशन के कारण वाल्व के बंद होने से पैदा लुब-डुब साउंड में  भी बदलाव आता है जिसकी वजह बनता है हृदय के आसपास प्रवाह में पैदा होने वाला विक्षोभ। यह साउंड अब एक सरसराहट जैसी (Whooshing,Svishing जैसी  लगने  लगती है जैसे तेज़ी से बहती हवा सनसनाहट पैदा करे आवेग से बहता पानी सरसराहट पैदा करे। इस स्थिति को ही एआटिक वाल्व स्टेनोसिस (Aortic Valve Stenosis)कहा गया है। तथा इस असामान्य ध्वनि को जो इस स्थिति में वाल्व के बंद होने से पैदा हो रही है हार्ट -मर्मर कहा जाता है।

इसकी शिनाख्त हृद रोग का माहिर छाती की  पड़ताल स्टेथोस्कोप से करके आसानी से कर लेता  है। बस हो गया रोगनिदान।

अब क्योंकि रक्तप्रवाह में विक्षोभ पैदा होने लगता है इसलिए हृदय से बा -रास्ता मुख्यधमनी (Aorta )आगे शेष शरीर को रक्त पहुंचाने के लिए हृदय को अब अपेक्षाकृत ज्यादा काम करना पड़ता है। इस स्थिति में हृदय की कुल रक्त उलीचने पम्प करने (सिस्टोलिक स्ट्रोक )की क्षमता भी घटने लगती है। इसका दुष्प्रभाव हमारी हृद्पेशी (कार्डिएक मसल )को भुगतना पड़ सकता है। पेशी की मोटाई भी बढ़ सकती है वाल्व के आसपास कैल्शियम भी जमा हो सकता है। इसे ही केलिफिकेशन आफ एओटा कहा जा सकता है। यह भी रोग की एक वजह बन सकता है।

शिनाख्त न होने पर हृद पेशी को होने वाला नुक्सान बढ़ सकता है इलाज़ के अभाव में अनेक लक्षण जो अब तक मूक थे मुखरित होने लगते हैं। जबकि रोगनिदान समय से होने पर वाल्व की मरम्मत के अलावा दवाओं से भी इस स्थिति में आराम आ सकता है।अन्य पेचीला लक्षणों से जैसे री-जर्जी -टेशन (आगे बढ़ते हुए रक्त का महाधमनी में वापस लौटने लगना ) से बचाव हो जाता है।

सन्दर्भ -सामिग्री :http://www.mayoclinic.org/diseases-conditions/aortic-stenosis/home/ovc-20343384

Aortic Valve Stenosis :Symptoms and Causes

एआटिक वाल्व स्टेनोसिस :कारण और लक्षण

Aortic Valve Stenosis :Symptoms and Causes

ज़रूरी नहीं है हर मामले में इस रोग के लक्षण जिसमें महाधमनी रोशनदान उम्र के एक ख़ास पड़ाव पर पहुँचते पहुँचते (६० -७० साला होते -होते )संकरा पड़ने लगता है प्रकट ही हों। सालों साल ये लक्षण शांत (नदारद )रह सकते हैं ,मुखर तब होते हैं जब वाल्व इतना संकरा हो जाता है कि हृदय को रक्त पम्प करने में जरूरत  से ज्यादा काम करना पड़ने लगता है और तो भो वह पूरी क्षमता के साथ रक्त पम्प करके महाधमनी के रास्ते शरीर के अन्य भागों को पूरी आपूर्ति नहीं कर करा  पाता है।

ज़ाहिर है लक्षणों का प्राकट्य इस बात पर निर्भर करता है रोग किस चरण में है क्या रोग आरंभ का चरण चल रहा है या रोग लगातार चुपके चुपके बढ़ता रहा है और आप इस से अनजान रहे हैं।

चलिए कुछ प्रमुख लक्षणों की गिनती कर लेते हैं :

(१ )वाल्व के बंद होने से  पैदा आवाज़ का असामान्य हो जाना ,लुब डुब के स्थान पर मरमर्स (सरसराहट ,सनसनी पैदा करने वाली आवाज़ स्टेथोस्कोप से छाती की सामान्य जांच के दौरान हृद माहिर को सुनाई देना।

(२ )चलने फिरने मेहनत का काम करने पर छाती से दर्द की लहर का उठकर  आगे बढ़ना और आराम करने पर थम जाना यानी एंजाइना का पैन होना जिसका मतलब है हृदय को आंशिक तौर पर रक्त की आपूर्ति बाधित हो रही है।

(३ )काम के दौरान उनींदापन नीमहोशी

(४ )सैर करने काम करने के दौरान सांस का फूलना।

(५ )काम के व्यस्त घंटों में बेहद के थकान महसूस करना

(६ )दिल की धड़कनों की रफ़्तार का यकायक बढ़ जाना ,बीच -बीच में धड़कन का मिस होना (  Fluttering Heart Beat )

(७ )खुराक में कमी आना खासकर उन बच्चों के मामलों में ऐसा होते देखा गया है जो महाधमनी वाल्व के संकरेपन की चपेट में पैदा होने के बाद ही किसी वजह से  आ गए  हैं,जिसकी अनेक वजहें होतीं हैं।

(८ )बढ़वार के अनुरूप (रोग से असरग्रस्त होने की वजह से ) बच्चों के वजन का न बढ़ पाना

इलाज़ मुहैया न होने पर कालान्तर में हृद पेशी के कमज़ोर पड़ते चले जाने से  इस रोग में हार्ट फेलियोर भी हो सकता है।रक्त आपूर्ति बुरी तरह असरग्रस्त होजाती है इस स्थिति में।

लक्षणों पर सरसरी निगाह डालने के बाद आइये अब इसके कारणों को खंगाला जाए :

हृदय (हृद्तंत्र )में चार खिड़कियाँ ुया वाल्व होतें हैं। इनका काम यह सुनिश्चित करना है ,रक्त संचरण सही दिशा और मार्ग से निर्बाध होता रहे। ये चार हैं क्रमश :

(१ )मिट्रल वाल्व (लेटिन भाषा में जिसका अर्थ होता है बिशप के हेट के आकार का )

(२ )ट्राइकस्पिड वाल्व (तीन पल्ले या लीफलेट्स लिए रहता है ये हृदय के दाएं अलिंद (प्रकोष्ठ )के मुंह से संयुक्त हुआ दाएं निलय (Right Ventricle )में आता है। संरचना  में यह भी मिट्रल वाल्व से मिलता जुलता दिखता है। बस इसके पल्लू (या पल्ले Flaps या लीफलेट्स आकार में त्रिभुजाकार  और संख्या में तीन होते  हैं। )इसे राइट एटरियोवेंट्रिकुलर वाल्व भी कहा जाता है।

(३ )तीसरा पल्मोनरी वाल्व हृदय के दाएं निलय से चस्पां रहता है एक ही तरफ पल्मोनरी आर्टरी में खुलता है तथा इसीसे होकर रक्त हृद पेशी को छोड़ धमनियों की  ओर बढ़ता है और चौथा होता है

(४ )ए-ओ -टिक वाल्व जो (महाधमनी और बाएं निलय के बीच रहता है )इसका काम रक्त को बाएं निलय में  वापस आने से रोकना रहता है। इसका आकार सेमिलुनर यानी अर्द्ध चंद्राकार रहता है। संख्या में ये दो रहते हैं तथा इनमें से एक महाधमनी के मुंह तथा दूसरा पल्मोनरी आर्टरी के मुंह के पास  स्थित होता है।

इनमें से प्रत्येक वाल्व में पल्ले (लीफलेट्स रहते हैं )तथा हरेक वाल्व एक हार्टबीट के दौरान एक मर्तबा खुलता तथा बंद होता है।

कई मर्तबा वाल्व खुल नहीं पाते हैं जिससे रक्त संचरण में अवरोध पैदा होता है। ऐसा होने पर हृदय के रक्त उठाने -ऊलीचने पम्प करके बाकी शरीर तक पहुंचाने की क्षमता भी कम होती है।

ए -ओ  -टिक  वाल्व स्टेनोसिस में ऐसा अवरोध ऐ -ओ -टिक वाल्व (महाधमनी  रोशनदान )के साथ होता है। हम बतला चुके हैं ये वाल्व हृदय के बाएं प्रकोष्ठ और मुख्यधमनी के बीच रहता है जिसका मुख्यकाम बाकी शरीर को रक्त मुहैया करवाना होता है। इसीलिए इसे महाधमनी वाल्व अवरोध या महाधमनी वाल्व का संकरा हो जाना कहा जाता है। इस स्थिति में यह आधा अधूरा ही खुल बंद होपाता है।

ए -ओ -टिक वाल्व के संकरा पड़जाने पर बाएं निलय को ज्यादा श्रम करना पड़ता है, ताकि पहले महाधमनी तक और वहां से शेष शरीर को रक्तापूर्ति पर्याप्त मात्रा में हो सके। बाएं निलय पर दवाब बढ़ने इसके काम में वृद्धि होने से इसकी मोटाई बढ़ सकती है आकार भी। ऐसे में दिल और निलय दोनों कमज़ोर पड़ जाते हैं यही कमज़ोरी हार्टफेलियोर की वजह बन सकती  है।

एक से ज्यादा वजहें हो सकतीं हैं ए -ओ -टिक वाल्व स्टेनोसिस की :

(१ )जन्मजात (Congenital Heart Defect )वजहों में इस वाल्व की बनावट में तीन के स्थान पर दो पल्ले (Bicuspid Valve )या फिर कभी कभार एक पल्ला(Unicuspid) तो कभी चार (Quadri-cuspid)भी हो सकते हैं। भले बचपना ऐसा होने पर भी बे -असर बना रहे लेकिन युवावस्था आने पर संकरेपन (Stenosis )की  शुरुआत भी हो सकती है।

(२ )वाल्व केल्सिफिकेशन भी इस नैरोइंग की वजह बन सकता है। इस स्थिति में रक्त प्रवाह में मौजूद केल्सियम वाल्वों के गिर्द जमा हो जाता है।
ए -आटिक वाल्व स्टेनोसिस रोग की स्थिति में  ए -ओ -टिक वाल्व के पल्ले भी इस केल्सियम जमावड़े की चपेट में आने लगते हैं। (अलबत्ता केल्सियम पुष्टिकृत पेय या फिर केल्सियम की गोलियों के सेवन से इस स्थिति का कोई लेना देना नहीं होता है। ).
भले आमतौर पर ये केल्सियम जमाव कुछ न भी करे लेकिन जन्मजात बनावट संबंधी  दोष बाइकस्पिड वाल्व की स्थिति में ये जमाव पल्लों को कठोर बना सकता है। ये कठोरता ही वाल्व के संकरेपन (स्टेनोसिस यानी अवरोध )की वजह बन जाती है। अलबत्ता ओल्डर एज  में सत्तर के पार अस्सी के पेटे में जो बुजुर्ग  चले आते हैं उनमें ये केल्सियम जमाव और स्टेनोसिस लक्षणों के रूप में मुखरित होने लगते हैं।

(३)र्यूमैटिक फीवर में ए -ओ -टिक वाल्व की स्कारिंग हो सकती है ,दगैल ऊतक (स्कार टिस्यू )पनप सकते हैं इसके गिर्द। ऐसे में वाल्व की सतह के खुरदरा पड़ने पर केल्सियम जमाव को उकसावा मिलता है नतीजा होता है स्टेनोसिस। रहूमेटिक फीवर एक से ज्यादा वाल्वों को भी बहुबिध   क्षति पहुंचा सकता है। इस टूट फुट के बाद वाल्व न ठीक से खुलते हैं न बंद हो पाते हैं।

सन्दर्भ -सामिग्री :http://www.mayoclinic.org/diseases-conditions/aortic-stenosis/symptoms-causes/dxc-20344145

बुधवार, 20 सितंबर 2017

क्या सोच के बनाई रे तूने ये दुनिया ?

क्या सोच के बनाई रे तूने ये दुनिया ?

अक्सर यह मौज़ू सार्वकालिक बने रहने वाला सवाल पूछा जाता है :ईश्वर ने ये सृष्टि बनाई ही क्यों ?

 छान्दोग्य  -उपनिषद का ऋषि प्रश्न करता से कहता है :अपने सृजन से पहले ,अपने अस्तित्व से पहले ये विश्व (गोचर जगत )केवल सनातन अस्तित्व ही था -सत् ही था। यह विश्व अपने निर्माण से पहले  केवल सत् (ब्रह्मण ,Brahman )ही था। वन विदाउट ए सेकिंड। ठीक एक सेकिंड पहले केवल ब्रह्मण ही था (ब्रह्मा जी नहीं ). कोई कच्चा माल मटीरियल काज नहीं था उसके पास कायनात के रचाव के लिए। घड़े के निर्माण के लिए जैसे मृत्तिका (मटीरियल काज )और घड़ा बनाने का चाक (Potters Wheel ),उपकरण या  इंस्ट्रयूमेन्ट  नहीं था। अलबत्ता वह ब्रह्मण स्वयं इंटेलिजेंट या एफिशिएंट काज ज़रूर था। 

ब्रह्मण के पास एक वासना (इच्छा ,डिज़ायर ज़रूर थी )-मैं एक से अनेक हो जावूं। 

"May I Become Many "-Taittiriya Upnishad ,2-6 

इसका मतलब यह हुआ जिसे हम सृष्टि का प्रसव कहते हैं वह एक ही ब्रह्मण की बहुविध प्रतीति है। 

Creation is just an appearance .

यही तो माया है भ्रान्ति है। नित -परिवर्तनशील सृष्टि यदि वास्तविक होती रीअल होती तो उसका कोई कारण ज़रूर होता। 

रस्सी में सांप दिखलाई देना एक प्रतीति है सांप है नहीं और न ही रस्सी  सर्प में तब्दील हुई है।सर्प का दिखलाई देना एक प्रोजेक्शन है मानसी सृष्टि है ,हमारे मन का वहम है। 

अब क्योंकि कायनात वास्तविक नहीं है वर्चुअल है ,इसलिए कारण इसका कोई असल कारण हो नहीं सकता जिसकी तलाश की जाए। 

आपने एक विज्ञापन देखा होगा एक व्यक्ति सालों बाद अपने शहर में आता है टेक्सी में बैठा अपने ही शहर का ज़ायज़ा लेता है -चिल्लाता है ठहरो !ठहरो भाई !यहाँ एक बैंक था। इसी तरह दूसरी जगह पहुँचने पर कहता है यहां एटीम था ,वहां एअरपोर्ट था वह कहाँ गया। जो अभी है अभी नहीं है वही प्रतीति है माया है। 

इसे (माया को )परमात्मा की एक शक्ति कहा गया है नौकरानी भी। परमात्मा का बाहरी आवरण (वस्त्र )ही माया है। हमारा वस्त्र हमारा यह शरीर है। ब्रह्मण कॉमन है दोनों में।ठीक वैसे ही जैसे सृष्टि निर्माण से पहले विज्ञानी एक ही आदिम अणु (प्राइमीवल एटम )की बात करते हैं जो एक साथ सब जगह मौजूद था। तब न अंतरिक्ष था न काल, था तो बस एक अतिउत्तप्त ,अति -घनत्वीय स्थिति बिना आकार का ,शून्य कलेवर अस्तित्व था। ऐसे ही उपनिषद का ऋषि एक सत् (ब्रह्मण )की बात करता है। 

आप पूछ सकते हैं वह वासना (डिज़ायर )आई कहाँ से क्यों आई कि मैं एक से अनेक हो जावूं ?

आप रात भर की नींद के बाद सुबह सोकर कैसे उठ जाते हैं ?

क्या अलार्म क्लॉक की वजह से यदि आप कहें हाँ तो कई और क्यों सोते रहजाते हैं अलार्म की अनदेखी होते देखी  होगी आपने भी । पशुपक्षी क्यों उठ जाते हैं ?उनके पास तो कोई घड़ी  नहीं होती। उपनिषद का ऋषि इस बात का ज़वाब देता है अभी आपकी एषणाएं ,अन फिनिश्ड अजेंडा बाकी है।सुबह उठते ही आप मंसूबे अपने उस आज का ,उस रोज़ का कैज़ुअल बनाने लगते है  

फुर्सत मिली तो जाना सब काम हैं अधूरे ,

क्या करें जहां में दो हाथ आदमी के। 

अच्छे कभी बुरे हैं हालात आदमी के ,

पीछे पड़े हुए हैं दिन रात आदमी के। 

हमारा पुनर्जन्म भी इस अधूरे अजेंडे को पूरा करने के लिए ही होता है। जिसको जो अच्छा लगे करे। भला या बुरा खुली  छूट है।बहरसूरत  काज एन्ड इफेक्ट से कोई मुक्त नहीं है। करतम सो भोक्तम। जब तक आप ये न जान लेंगें ,आप ही ब्रह्मण हैं सत् हैं ईश्वर हैं यह जन्म मरण का सिलसिला बदस्तूर जारी रहेगा। 

ये कायनात ,इस सृष्टि का बारहा  प्रसव होना विलय (Dissolution )होना हम सबकी सम्मिलित वासनाओं की ही अभिव्यक्ति है। 

बिग बैंग सिद्धांत भी यही कहता है: बिग बैंग्स कम एन्ड गो ,दिस प्रेजेंट बैंग इज़ वन  आफ ए सीरीज़ आफ मैनी मोर ,इन्फेक्ट इनफाइनाइट बिग बैंग्स। सबकुछ चांदतारा ,नीहारिकाएं ,बनते बिगड़ते रहते हैं आवधिक तौर पर। उनका होना एक प्रतीति है। 

नींद के दौरान जैसे मैं अव्यक्त हो जाता हूँ ,मुझे अपने स्थूल शरीर का कोई बोध नहीं रहता ,लेकिन मेरा अंतर -सूक्ष्म -शरीर ,अवचेतन बाकायदा काम करता है।वासनाएं अभी भी शेष हैं लेकिन वह कारण शरीर में विलीन हो जाती हैं इस दरमियान। 

इफेक्ट का अपने काज में विलीन हो जाना ही सृष्टि का विलय (Dissolution )कहलाता है। काज का इफेक्ट के रूप में प्रकट होना किरयेशन है ,सृष्टि का पैदा होना है। काज सत् है ब्रह्मण है। 

स्वर्ण और स्वर्ण आभूषण स्वर्ण ही है लेकिन स्वर्ण से आभूषणों का बनना सृष्टि है स्वर्ण का अम्लों के एक ख़ास मिश्र में विलीन हो जाना घुल जाना विलय है।आभूषण स्वर्ण ही हैं अलग अलग रूपाकार एक प्रतीति है।  

पुनरपि जन्मम ,पुनरपि मरणम ,

पुनरपि जननी ,जठरे शरणम। 

एक प्रतिक्रिया ब्लॉग इंडियन साइंस ब्लागर्स एशोशिएशन की उल्लेखित पोस्ट पर :
http://blog.scientificworld.in/2016/07/how-god-create-world-hindi.html

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

कौन से घटक (कारक )बनते हैं अल्जाइमर्स रोग की वजह।

क्यों हो जाता है बुढ़ापे में स्मृति ह्रास रोग अल्ज़ाइमर्स ?कौन कौन से कारक इसकी वजह बनते हैं ?

समझा जाता है कोई एक वजह नहीं है इस रोग की  कालान्तर में हमारे दिमाग को न सिर्फ हमारी खानदानी (आनुवंशिक बुनावट ,जेनेटिक मेकअप )अपना असर ग्रस्त कर सकती  है हमारा माहौल भी पर्यावरणी घटक भी ,जीवन शैली भी।

पांच फीसद से भी कम मामलों में हमारी आनुवंशिक  रचना (जीवन इकाइयों )में होने वाले कुछ ख़ास परिवर्तन भी इसकी वजह बन सकते हैं। इस रोग की चपेट में आये मस्तिष्क में आपको कमतर कोशिकाएं (न्यूरॉन्स दिमाग की एकल कोशिका न्यूरोन कही जाती है  )मिलेंगी  ,जिनका पता शरीर छोड़ने के बाद ही दिमाग की आनुवंशिक जांच पड़ताल करने पर ही मिलेगा। अलबत्ता आपके जीते जी भी जीवित कोशिकाओं में भी कमतर सम्प्रेषण सेतु ,कनेक्शंस नेटवर्क  रह जाते हैं।

कालानतर में इन्हीं तमाम वजहों से दिमागी कोशिकाओं के छीजने टूटने से दिमाग भी सिकुड़ के छोटा रहजाता है पहले की बनिस्पत। दिमागी ऊतकों की बादे मार्ग ,यानी मरीज़ की मृत्यु के बाद माइक्रोस्कोपों से की गई सूक्ष्म जांच बतलाती है ,प्लाक्स और टेंगिल्स। यानी दो किस्म की एब्नॉर्मलिटीज़ (दिमागी कोशिकाओं में आये असामान्य बदलाव ) प्रकाश में आती हैं।

Plaques:प्लाक्स वास्तव में एक दिमागी प्रोटीन बीटा एम्लोईड्स के गुच्छ होते हैं जो बहुबिध दिमागी कोशिकाओं को नष्ट करते हैं। न्यूरॉन से न्यूरॉन के संवाद (न्यूरॉन -न्यूरॉन कम्युनिकेशन )को ये प्लाक्स बाधित करते हैं। कोशिका के बाहरी खोल को घेरे में ले लेते हैं ये प्रोटीन प्लाक। सम्भवतया यह घेरा बंदी ही न्यूरॉन्स की मौत की वजह बनती है।

Tangles:दिमागी कोशिकाएं एक आंतरिक वाहन प्रणाली ,इंटरनल सपोर्ट सिस्टम के आसरे रहती हैं । यही प्रणाली कोशिकाओं को पोषण मुहैया करवाती है तब तक जब तक के वह जीवित बनी रहती हैं।यह प्रणाली कारगर बनी रहे इसके लिए ज़रूरी होता है ,एक और प्रोटीन Tau (टो या टाउ )का संरचनात्मक और प्रकार्यात्मक तौर पर भी सामान्य बने रहना।

लेकिन दिमागी  कोशिकाओं के इस अपविकासी रोग में इस प्रोटीन के धागे परस्पर उलझ जाते हैं यही उलझाव टेंगिल्स की सृष्टि करता है। नतीज़न कोशिकाओं को पोषण की आपूर्ति रुक जाती है। पुष्टिकर तत्व मुहैया करवाने वाली वाहन  प्रणाली टूट जाती है। दिमागी कोशिकाओं के क्षय से भी ये टेंगिल्स बनते हैं प्रणाली ढहने लगती है।

कौन से घटक (कारक )बनते हैं अल्जाइमर्स रोग की वजह।(देखें सन्दर्भ सामिग्री ):

सन्दर्भ -सामिग्री: http://www.mayoclinic.org/diseases-conditions/alzheimers-disease/symptoms-causes/dxc-20167103






सोमवार, 18 सितंबर 2017

बुढ़ापे का रोग अल्ज़ाइमर्स कुछ मिथ और यथार्थ

बुढ़ापे का रोग अल्ज़ाइमर्स कुछ मिथ और यथार्थ

(१)महज मिथ है यह कहना मानना समझना ,बुढ़ापे का स्मृति ह्रास एक आनुवंशिक (खानदानी )बीमारी है जिसका सम्बन्ध हमारी आनुवंशिक रचना (जींस )से है। हमारे पर्यावरण के कुछ कारक (घटक )भी इसके लिए उत्तरदाई हो सकते हैं जिनकी शिनाख्त होने पर इलाज़ जल्दी शुरू हो सकता है।

(२) महज मिथ है यह मान लेना कि रोग का पता नहीं चलता है (रोग निदान मुमकिन नहीं है ).

यथार्थ यह है ९० फीसद तक इसका सही निदान (डायग्नोसिस )अब सम्भव है। रोगनिदान के नए नए उपाय आज उपलब्ध हैं इसलिए अब आरम्भिक चरण में ही रोग निदान कर लिया जाता है।

(३)तीसरा मिथ खामख्याली यह चली आई है कि दवाएं इसके इलाज़ में बे -असर रहतीं हैं।

यथार्थ यह है :दवाएं काम करतीं है नै नै दवाओं के कॉम्बो (कॉम्बिनेशन थिरेपी )रोग के बढ़ने की रफ़्तार को काम कर सकते हैं ,भले रोग पूर्व की अवस्था में न पहुंचा जा सके।

कुछ दवाएं जो आप लेते आएं हैं आपके रोग रोधी सुरक्षा कवच (इम्यून सिस्टम )के हाथ मजबूत करती रहती हैं।

(४ )मिथ यह भी चला आया है इसके होने इस रोग की चपेट में आने को मुल्तवी नहीं रखा जा सकता।

यथार्थ यह है आपकी खुराक ,कसरत ,तंदरुस्त जीवन शैली और बचावी चिकित्सा दवाएं इस रोग को मुल्तवी रखे रख सकतीं हैं।

मूलतया इसे पश्चिमी दुनिया खासकर अमरीका का रोग माना गया है भारत में इसे हम सठियाना कहकर टाल देते है।निरंतर कुछ न कुछ सीखते रहना  लिखते पढ़ते रहना दिमाग को कुंद होने से बचाये रहता है। रोग से भी बचाव का एक उपाय है स्वाध्याय।

अभी अभी आपने क्या किया था यह आप बुढ़ापे में भूलते रहते हैं यही शार्ट टर्म मेमोरी लास इस रोग का एक लक्षण हैं। सूंघने की शक्ति (घ्राण शक्ति )भी काम हो सकती है जो रोग का आरंभिक और प्राथमिक लक्षण माना जा सकता है।

आज काग्निटिव रिहेबिलिटेशन तकनीकें ,रणनीतियां उपलब्ध हैं जो कारगर बचावी उपाय सिद्ध हो सकतीं हैं। यूं उम्र के साथ सब कुछ छीजता है दिमाग का आकार भी। इस रोग में भी दिमाग सिकुड़ने लगता है कौन अजूबा है ये।

संदर्भ -सामिग्री :

https://mail.google.com/mail/u/0/#inbox/15e91aa6f71ce2d8

शनिवार, 16 सितंबर 2017

कन्या राशि में सूर्य का प्रवेश जिस अवधि में होता है उसे ही श्राद्ध पक्ष कहा समझा माना गया है

कनागत में बुलेट ट्रेन का उदघाटन करने पर मोदी पर छिद्रान्वेषण करने वाले मार्कवाद के बौद्धिक गुलाम तो धर्म को मानते ही नहीं इनके मुखिया तो इसे अफीम कह आएं हैं न ही इन भकुओं में से किसी को यह मालूम होगा कि कन्या राशि में सूर्य का प्रवेश जिस अवधि में होता है उसे ही श्राद्ध पक्ष कहा समझा माना गया है। हैलोवीन इसी का थोड़ा अलग सा संस्करण है। ये देश तोड़क जो हर बात में देश का विरोध करते हैं ,स्वयं साक्षात जीवित प्रेत हैं। एक श्राद्ध इनके लिए भी होते रहना चाहिए।

इस मुद्दे पर हमने भारत धर्मी समाज के चंद नाम चीन लोगों से बात की है मुद्दा रोहंग्या मुसलमानों से भी जुड़ा। इन मुसलमानों को जिन्हें   लश्करे तैयबा के  एजेंटों ने भारत में आतंक फैलाने की नीयत से घुसाने की कोशिश की है  इनकी हिमायत में भी कई  सेकुलर सड़कों पर आ  गए हैं। भारतधर्मी समाज के मुखिया प्रमुख विचारक डॉ नन्द लाल मेहता वागीश जी ने इस का एक हल यह सुझाया है -ये तमाम लोग जिनमें से कई कुनबों के पास बे -हिसाब जमीनें हैं अपनी जमीन इन रोहंग्या मुसलमानों के नाम कर देवें साथ ही भारत सरकार को ये लिखकर देवें -इन रोहंग्या कथित शरणार्थी लोगों का वोट नहीं बनाया जाएगा।

मसलन अखिलेश ,लालू ,सोनिया के पास ही बे -हिसाब संपत्ति है। ये पहल करें इस दिशा में यदि सचमुच मानवीय पहलू  इनकी नज़र में है (जिससे इनका कोई लेना देना रहता नहीं है ),इनका एक ही एजेंडा है मोदी बैटिंग ,मोदी हैटिंग एन्ड हिटिंग। इन देश भाजकों को यह नहीं पता -

फ़ानूस बन के जिसकी हिफाज़त हवा करे ,

वो शमा(शम्मा ) क्या बुझेगी  जिसे रोशन खुदा करे।

जिसे वाह -  गुरु की कृपा प्राप्त है ,कृष्णा का आशीष जिसके साथ है मोहम्मद साहब की दुआएं जिसे प्राप्त हैं उसका ये चंद फुकरे क्या बिगाड़ लेंगे जो आज कनागत की बात करते हैं ,असहिंष्णु जिसे घोषित कर चुके हैं उस भारत से सहिष्णुता की आज ये बात करते मानवीय पक्ष की बात करते हैं।

मैं सरयू तीरे इन भकुओं का  तरपन करता हूँ। 

वैदिक धर्म (हिदुत्व )के एक बड़े प्रतीक चिन्ह के रूप में एकाक्षरी (मनोसिलेबिल )समझे गए ॐ का क्या महत्व है?

वैदिक धर्म (हिदुत्व )के एक बड़े प्रतीक चिन्ह के रूप में एकाक्षरी (मनोसिलेबिल )समझे गए ॐ  का क्या महत्व है?

अमूमन किसी भी मांगलिक अनुष्ठान से पूर्व एक गंभीर और निष्ठ उदगार स्वत :प्रस्फुटित होता है हमारे मुख से एक अक्षरी ॐ। ये किसी भी अनुष्ठान के आरम्भ और संपन्न होने का सूचक होता है। चाहे फिर वह वेदपाठ हो या नित नियम  की वाणी (प्रार्थना ).गहन ध्यान -साधना ,मेडिटेशन का केंद्रबिंदु रहा है ॐ।

परमात्मा के नाम के करीब -करीब निकटतम बतलाया है ॐ को आदिगुरु शंकराचार्य ने। जब हम ॐ कहते हैं तो इसका मतलब परमात्मा से हेलो कहना है ,सम्बोधन है यह उस सर्वोच्च सत्ता की  प्रतिष्ठार्थ।

ॐ की बारहा पुनरावृत्ति (जप )वैराग्य की ओर ले जा सकती है इसलिए इसके जाप को  सन्यासियों के निमित्त समझा गया है। किसी भी प्रकार की वासना (इच्छा )सांसारिक सुख भोग की एषणा का नाश करता है इसका जप ऐसा समझा गया है। कहा यह भी गया यह गृहस्थियों को नित्य प्रति के आवश्यक सांसारिक कर्मों से भी विलग कर सकता है। सन्यासियों का ही आभूषण हो सकता है ॐ जो संसार से ,सब कर्मों से विरक्त हो ईश -भक्ति ,ज्ञानार्जन को ही समर्पित हो चुका है।

अलबत्ता इसका सम्बन्ध अन्य सभी मन्त्रों से रहा है ,ॐ अक्षर हर मन्त्र से पहले आता है ताकि गणपति (गणेश) मन्त्र जाप में कोई विघ्न न आने देवें। माण्डूक्य उपनिषद के अनुसार ॐ का निरंतर मनन अपने निज स्वरूप (ब्रह्मण ,रीअल सेल्फ )के सहज बोध की ओर ले जा सकता है। "ओंकार" का ज्ञान -बोध खुद को जान लेना है।

The name and the one that stands for the name are identical (are one and no second ).When we call a name there is an image of an object in our mind .

यह संसार नाम और रूप ही है। दोनों को विलगाया नहीं जा सकता। नाम का लोप होते ही संसार का लोप हो जाएगा। इसीलिए ओंकार की पुनरावृत्ति उसे साकार कर देती है जिसको यह सम्बोधित है।

ओंकार में तीन मात्राएँ "अ "; "उ " और  "म "शामिल हैं। ओ (O) दो मात्राओं का जोड़ है डिफ्थॉंग हैं अ और उ का। यानी अ -अकार और म -मकार।

"अ" को जागृत अवस्था का प्रपंच कहा गया है (प्रपंच या माया  इसलिए यह वे - किंग- स्टेट भी स्वप्न ही है फर्क इतना है इसकी अवधि औसतन ६० -७० वर्ष है बस जबकि नींद में आने वाले स्वप्न अल्पकालिक डेढ़ दो मिनिट से ज्यादा अवधि के नहीं होते .

उकार (उ )का सम्बन्ध उपनिषद ने स्वप्नावस्था से जोड़ा है। स्वप्न दृष्टा और स्वप्न देखने के अनुभव से जोड़ा है। जागृत अवस्था और स्वप्नावस्था परस्पर एक दूसरे का निषेध करते हैं। स्वप्नावस्था में आप को  न तो  स्थूल शरीर का बोध है न ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रीय का। स्वप्न देखने वाला मन ,स्वप्न के आब्जेक्ट्स सब स्वप्न की ही सृष्टि है जहां परबत ,समुन्दर से लेकर हर बड़े छोटे आकार की चीज़ें आप के यानी स्वप्न-दृष्टा के  द्वारा देखी जा रहीं  हैं ,स्वप्न के समय आपका अवचेतन मन सक्रीय है ,सूक्ष्म शरीर कार्यरत है स्थूल को कुछ पता नहीं है वह तो निढाल पड़ा है।

मकार (म )सुसुप्ति या गहन निद्रा (डीप स्लीप स्टेट )की स्थिति है जहां केवल आपका कारण शरीर(Causal Body ) शेष रह गया है ,वासनाएं हैं। सुबह उठकर आप कहते हैं -रात को मस्त नींद आई। ये कौन किस से कह रहा है वह कौन था जो गहन निंद्रा में था। फिर वह कौन है जो अब जागृत अवस्था में है ,जो स्वप्न देख रहा था वह कौन है। और मैं (मेरा स्व ,रीअल सेल्फ ) क्या है।

उपनिषद का ऋषि कहता है जो इन तीनों अवस्थाओं को रोशन कर रहा है वह 'तू '(यानी मेरा निज स्वरूप है रीअल आई है ).

अ ,उ ,म त्रय के और भी अर्थ निकाले गए हैं -तीन वेद(ऋग ,यजुर,साम )  -तीन लोक (मृत्य -स्वर्ग और इन दोनों के बीच का अंतरिक्ष ),तीन देवता (अग्नि- वायु- सूर्यदेव ),ब्रह्मा -विष्णु -महेश ,सतो -रजो -तमो गुण (त्रिगुणात्मक माया ). स्थूल -सूक्ष्म -कारण शरीर की तिकड़ी आदि। ज़ाहिर है तमाम सृष्टि का पसारा (विस्तार )इन तीन मात्राओं -अ,उ ,म में समाविष्ट है।

हम कह सकते हैं -Om refers to the personal form of  God ,the one with attributes i.e सगुण ब्रह्म।

मंगल ध्वनि ॐ  दो उच्चारणों के बीच का मौन -Impersonal form of God यानी निर्गुण ब्रह्म कहा जा सकता है। यह मौन निराकार है ,आयाम -हीन ,आयाम -शून्य ,Dimensionless है।

जबकि अ ,उ और म एक ड्यूरेशन (अवधि )लिए हैं ,मौन निर -अवधिक  है। इस प्रकार सिद्ध हुआ ओंकार ही प्रभु हैं प्रभु का नाम हैं।

महाकवि पीपा कहते हैं :

सगुण मीठो खांड़ सो ,निर्गुण कड़वो नीम ,

जाको गुरु जो परस दे ,ताहि प्रेम सो जीम।





शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

माथे की बिंदी आबरू का शाल है हिंदी

हिंदी दिवस पर विशेष 

माथे की बिंदी आबरू का शाल है हिंदी ,

है देश मिरा  भारत ,टकसाल है हिंदी। 

है आरती का थाल मिरी  सम्पदा हिंदी ,

संपर्क की सांकल सभी है खोलती हिंदी। 

गुरुग्रंथ ,दशम ग्रन्थ भली रही हो कुरआन ,

एंजिल हो धम्मपद भले फिर चाहें पुराण ,

है शान में सबकी मिरी  लिखती रही जुबान ,

हैं सबके सब स्वजन मिरे ,सबकी मेरी हिंदी।

कर जोड़ के प्रणाम करे ,आपको हिंदी।  

है शान में सबकी मिरी , लिखती रही जुबान ,

शोभा में सबकी शान में, लिखती मिरी हिंदी। 

मैं तमाम हिंदी सेवकों को उनकी दिव्यता को प्रणाम करता हूँ। 

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

गायत्री मंत्र एक विहंगावलोकन

गायत्री मंत्र एक विहंगावलोकन

उपनयनसंस्कार के वक्त (वेदों का  अध्ययन शुरू करवाते वक्त )गुरु अथवा पिता गुरुकुल परम्परा के मुताबिक़ यह मंत्र छात्र के कान में कहता उच्चारता था ताकि वह विधिवत वेदों का अध्ययन आरम्भ कर सके। तमाम वेद वांग्मय का सार कहा गया है गायत्री  मंत्र को।

ऋग्वेद में सात छंद (मीटर )आते हैं इन्हीं में से एक है गायत्रीछन्द। इस छंद के तीन पाद (चरण या पैर ,फुट )हैं। प्रत्येक पाद में आठ अक्षर आते हैं। इस प्रकार गायत्री  छंद २४ अक्षरीय है।

सूर्य  की स्तुति में इसका पाठ किया जाता है इसीलिए इसे सावित्री -मंत्र भी कहा गया है। सवितृ  माने सावित्री यानी भगवान्  सूर्यदेव का गुणगायन है स्तुति है प्रार्थना है सूर्य देव से- वह हमें  सही मार्ग पर चलाये हमारी मेधा को प्रज्ञा ,बुद्धिमत्ता प्रदान करे।

अन्यान्य मंत्र भी गायत्री छंद-बद्ध किये गए हैं। अमूमन हरेक  देवता की  स्तुति में इस छंद में रचनाएं हैं।इनमें गायत्री मंत्र सब से ज्यादा लोकप्रिय है।

मंत्र पाठ हम  सभी जानते हैं इस प्रकार है :

ॐ भूर्भुवस्सुवः ,तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात

यहां ॐ परमात्मा को सम्बोधित है उसी का नाम है इसमें तीन अक्षर है अ ,उ ,म जो तीन उदगार (अभिव्यक्तियाँ )व्याहृतियाँ हैं। तीन Utterances हैंतीन  कथन हैं।

भूः भुवः सुवः   कथन हैं। उदगार हैं ये तीन जो ब्रह्माजी ने सृष्टि - रचना के क्षणों में अभिव्यक्त किये हैं उच्चारे हैं। इन्हें आध्यात्मिक ,रहस्यमय - ध्वनि -प्रतीक  भी समझा  गया  है।अनेकार्थ हैं इन ध्वनियों के जिनमें से एक है :

भूः मृत्यलोक ,भुवः पृथ्वी और सूर्य के बीच  के अंतरिक्ष तथा सुवः स्वर्ग के लिए आया है। इनसे व्युत्पन्न अर्थ भूः सत या सनातन अस्तित्व के लिए भुवः चित या ज्ञान के लिए और सुव: आनंद या ब्लिस के लिए आया है।यानी सच्चिदानंद। सत्यम ज्ञानम् अनंतं ।
अन्य अर्थों में सृष्टि की उत्पत्ति -पालना -और विलय (विनाश )लिए  हैं। जागृत ,स्वप्न एवं सुसुप्ति की तीनअवस्था का प्रपंच  स्थूल -सूक्ष्म -कारण तीन शरीर आदि भी अभिव्यक्त हुए हैं। गायत्री मन्त्र से पहले ये तीन उदगार ही अभिव्यक्त किए  जाते हैं।
ॐ वह परमात्मा भूः है ,भुवः है स्वः है। यानी वह एक ही सृष्टिकर्ता -पालनहार -और संहारकर्ता है सृष्टि का। वही सच्चिदानंद है वाहगुरु है अल्लाह है यहोवा है। वही सनातन अस्तित्व अनंत ज्ञान और कभी भी कम न होने वाला सदैव कायम आनंद है।गुरपरसादि  है।

वही तिरलोकी(त्रिलोक ) है जागृति स्वप्न एवं सुसुप्ति (डीप स्लीप स्टेट )का प्रपंच है। स्थूल -सूक्ष्म -कारण शरीर -त्रय है।

ये तीन उदगार ही गायत्री  के तीन पाद हैं पहला पाद है -तत्सवितुर्वरेण्यम दूसरा भर्गो देवस्य धीमहि और तीसरा यो न: प्रचोदयात।

ऐसा समझा जाता है की ॐ के  तीन अक्षर अकार (अ ),उकार (उ )और मकार (म ),तीन अभिव्यक्तियों ,भूः भुवः स्वः के उद्गम स्रोत हैं। इन तीन अक्षरों से ही गायत्रीछंद  के  तीन पाद बने हैं। प्रत्येक पाद से एक वेद निसृत है पहले से ऋग्वेद दूसरे से यजुर्वेद  तथा तीसरे से सामवेद  . इसीलिए गायत्री को वेदमाता भी कहा गया है वेद -जननी है गायत्री।     

प्रात : सूर्योदय से पहले और संध्या गौ -धूलि सूर्यके अस्ताचल गमन से पहले का वंदन है यह मन्त्र हम सभी के लिए।

मध्य दिवस काल (मिड - डे )में भी लोग सूर्य उपासना करते है। इसका बारम्बार उच्चारण संध्यावंदन का एक महत्वपूर्ण अंग है।

दो वाक्यों की निर्मिति भी माना जा सकता है इस मन्त्र को -पहला :हम ध्यान लगाते हैं प्रार्थी और प्रशंशक हैं उस सूर्य देव की स्वयं प्रकशित ख्यात भव्यता कांतिमान और बुद्धिमत्ता के  जो हमारे लिए सदैव ही वरेण्य है। मनभावन मनमोहक है।

सूर्यको प्रत्यक्ष देवता कहा गया है क्योंकि हम इसके प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं इसका आलोक वस्तुओं से लौटकर हमारी आँख को देखने की क्षमता प्रदान करता है। वैदिक संस्कृति सूर्यदेव की सहज उपासक रही आई है। उल्लास और प्रकाश और ताप को बिखेरने वाला देव माना गया है सूर्य देव को पृथ्वी पर जीवन और किसीभी प्रकार की वनस्पति का स्रोत भी सूर्यदेव ही माने समझे गए हैं। अज्ञान को दूर करता है इसका आलोक अज्ञान के अँधेरे  से हमें ज्ञान की उजास की ओर लाता है यह स्वयं प्रकाशित   देव।

दूसरा  वाक्य सीधा सरल प्रत्यक्ष बोध में आता है :'यह ही प्रचोदयात ' यो नः प्रचोदयात -यह हमें सही मार्ग पर ले चले हृदय गुहा के अन्धकार अज्ञान को भगा हमें सत्य की और ले जाकर हमारे अपने ब्रह्म स्वरूप का बोध कराये। हमारी मेधा को प्रज्ञा में बदले।

हमारा मन बाहरी प्रभावों उद्दीपनों की चपेट में आता है और अंतकरण से भी  विचार सरणी आती हैं।हमारे मन बुद्धि सोचने की शक्ति चित्त को  बाहरी प्रभावों से निकाल सही मार्ग की ओर ले चलें सूर्यदेव।

इस सृष्टि ब्रह्माण्ड पूरी  कायनात के संदर्भ में सूर्य देव को सृष्टा पालन करता कायम रखने वाले देव का दर्ज़ा प्राप्त है -प्रकाश और सौर ऊर्जा के  अभाव सचमुच में जीवन चुक जाए।

पृथ्वी  पर सारी वनस्पति और सारा दृश्य प्रपंच सूर्यदेव का ही प्राकट्य है। व्यक्त अभिव्यक्ति है। निर्गुण ब्रह्म का सगुण  रूप है सूर्यदेव। 

ताप ऊर्जा और प्रकार-अंतर  से बरसात लाने वाला भी सूर्य देव ही है। जब किसी देवता के प्रसादन  के लिए हवन करते हैं हव्य सामिग्री अग्नि के हवाले की जाती है।यही सूक्ष्म रूप अंतरित हो सूर्य की  किरणों पर सवार  हो सूर्य में  संग्रहित हो जाती है। कर्मफल दाता के बतौर सूर्य देव हमारे सद्कर्मों के फलस्वरूप वर्षा जल प्रदान करता है। जल ही जीवन है जल चक्र को सूर्य ही चलाये रहता है। भगवद्गीता में कहा गया है यज्ञ ही बरसा लाते हैं।इसीलिए सूर्य को गॉड का दर्ज़ा प्राप्त है। सूर्य को ब्रह्म होने का दृष्टा  बन सब कुछ साक्षी भाव से देखने का दर्ज़ा भी प्राप्त है मेरे तमाम विचारों का नियामक है सूर्य देव मेरी हृद गुफा में उसी के ज्ञान का प्रकाश मेरे ब्रह्मण (Brahman ब्रह्मन ) स्वरूप को उजागर करे। वही ज्ञान स्वरूप बुद्धिमता का देव सूर्य मेरे विचारों की  बुद्धि का कम्पास बने यही भाव है गायत्री का।
व्यवस्था सृष्टि का स्वरूप है बाहरी विक्षोभ सतही ही है। इसी अव्यवस्था के अंदर लय -ताल समरसता व्याप्त है। यही लयताल मेरा निजस्वरूप भी है। इस प्रकार  मार्ग और लक्ष्य दोनों एक साथ है गायत्री मन्त्र। हम उस सूर्यदेव का ध्यान लगाते हैं जो हमारा लक्ष्य है जो हमारे मन बुद्धि विचार सरणी को सन्मार्ग पर ले जाए। सद्कर्म कराये हमसे। ताकि मैं अपनी निजता को  आँज  लक्ष्य के निकटतर आ सकूं।वह मुझसे भिन्न कहाँ हैं मैं इस द्वैत को पहचान सकूं , मान सकूं यही अद्वैत वेदांत है। मेरे निज स्वरूप और ब्राह्मण में अद्वैत है द्वैत एक प्रतीति मात्र है मैं इसे समझ सकूं यही इस मन्त्र के निहितार्थ हैं।

ॐ शान्ति।

सगुण मीठो खांड़  सो,निर्गुण कड़वो नीम  ,

जा को गुरु जो परस दे ,ताहि प्रेम सो जीम।

जयश्रीकृष्ण।

विशेष ;प्रपंच शब्द मेरी इस अभिव्यक्ति में कई मर्तबा आया है। स्पस्ट कर दूँ माया के लिए प्रयुक्त किया जाता है यह शब्द।जो अनुपस्थित हो लेकिन अपने होने का बोध कराये वह माया है। जो सत्य प्रतीत हो , असत्य भी और दोनों  ही  नहीं हो वह माया है। जैसे स्वप्न एक प्रतीति है अल्पकाल की ,एक प्रपंच है जो जागने पर गायब हो जाता है वैसे ही जागृति भी एक प्रपंच है दीर्घकाल का (सत्तर अस्सी साल होती है आदमी की उम्र उसके बाद यह काया कहाँ चली जाती है यही तो माया है ,जो ट्रान्जेक्शनल रियलिटी ज़रूर है सत्य नहीं है लेकिन असत्य भी नहीं है क्योंकि मेरा  उसके साथ लेन  देन  है ट्रांसजेक्शन है।  उसी तरह सुसुप्ति (डीप स्लीप स्टेट )एक प्रपंच है कई मर्तबा बड़ी मस्त नींद आती है सुबह उठके हम कहते हैं रात बहुत अच्छी नींद आई। कौन किस्से यह कह रहा है कहने वाला कौन है ?सोया कौन था ?उठा कौन है ?यही प्रपंच है। सत्य वह है जो इन तीनों अवस्थाओं जागृति -स्वप्न -सुसुप्ति को आलोकित करता है साक्षी बनता है इन तीनों स्टेटस का ,वही मेरा असल स्वरूप है रीअल सेल्फ है ब्रह्मण है।मैं वही हूँ।  

बुधवार, 13 सितंबर 2017

घर -दुआरे,मांगलिक अवसरों पर मंदिरों के बाहर रंगोली क्यों सजाई (बनाई )जाती है ?

घर -दुआरे,मांगलिक अवसरों पर मंदिरों  के बाहर  रंगोली क्यों सजाई (बनाई )जाती है ?

रंगोली घर-दुआरे बनाना श्री लक्ष्मी जी का आवाहन करना है। धनसंपदा वैभव की खजांची हैं विष्णुपत्नी श्रीलक्ष्मीजी। रंगोली पूजा का प्रतीक है। गृहलक्ष्मी का मतलब है आपका घर लक्ष्मी का प्रकट रूप है प्राकट्य है मनिफेस्टेशन है गॉडेस आफ प्रॉस्पेरिटी का।

रंगोली सजाने के लिए अमूमन चावल का आटा (राइस फ्लोर )ही काम में लिया जाता है जो चींटियों का अन्य सूक्ष्म जीवों का अंततय : आहार बनता है ,कीट जगत से आपको जोड़ती है रंगोली। इस पूरी कायनात में परस्पर सब एक दूसरे से सम्पर्कित हैं कनेक्टिड हैं।

ख़ास मांगलिक मौकों पर विशेष देवताओं के पूजन के निमित्त रंगोली सजाई जाती है। दीक्षांत समारोह महा -विद्यालयों का विश्व -विद्यालयों का रंगोली का साक्षी बनता है -बिस्मिल्ला -खां  की शहनाई के स्वर और रंगोली की सजावट मौहोल को चार चाँद लगा देती है। शोभायात्रा इसी मांगलिक ध्वनि के साथ शुरू होती है।

दीगर है की रंगोली आपकी कलात्मकता की भी एक स -शक्त अभिव्यक्ति है। रंगोली जोश -औ - खरोश और पूजा दोनों का प्रतीक है। दीपावली ,पोंगल आदि पर्वों पर रंगोली की शान औ सजावट देखते ही बनती है।

स्वास्तिक डिज़ाइन के अपने निहितार्थ हैं रंगोली में -एक तरफ यह ओंकार का प्रतीक है दूसरी और कालचक्र का। स्वास्तिक चक्र की एक भुजा ऊपर जाती है तो एक नीचे ,एक दक्षिणांगी रहती है तो एक वामांगी। ऊर्ध्वगामी भुजा सतयुग और अधोगामी द्वापर(भौतिक  द्वन्द्व डायलेक्टिकल मटीरियलिज़्म ) को दर्शाती है वामांगी -कलयुग का प्रतीक है और दक्षिणांगी त्रेता का।

रंगोली में ज्यामितीय आकार यंत्रों को दर्शाते हैं जो इतर - देवों के पूजन हेतु हैं।


पूजा अर्चना के दौरान घर -मंदिर आदि में शंख क्यों बजाया जाता है ?

पूजा अर्चना के दौरान घर -मंदिर आदि में शंख क्यों बजाया जाता है ?

शंख बजाने से कथा शुरूहोने की और फिर संपन्न होने पर आरती होने की इत्तला हो जाती है। संचार का एक ज़रिया भी रहा है शंख ध्वनि। महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले सब अपने अपने शंख बजाकर युद्धारम्भ की खबर देते हैं। अलबत्ता शंख ध्वनि से तकरीबन आधा - किलोमीटर दायरे में रोगकारकों का विषाणुओं का नाश होता है। शंख ध्वनि मांगलिक समझी गई है। जब कोई बुजुर्ग अपनी उम्र पूरी करके इस दुनिया से उठता है तब भी शंख बजाया जाता है। चंवर भी झला जाता है अर्थी के गिर्द।

शंखध्वनि चित्तशामक का काम करती है शांत  करती है चित्त को फलतय : मन भक्ति उन्मुख हो जाता है। 

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

नदियों में गंगा का शीर्ष स्थान क्यों ?

नदियों में गंगा का शीर्ष स्थान क्यों ?

जबकि विश्वकी सभी नदियाँ जीवन और संस्कृतियों का पोषण करती आईं हैं गंगा का अपना वैशिठ्य रहा आया है। कहा जाता है -एक बार ब्रह्माजी नारायण (महा-विष्णु )के चरण धौ रहे थे ,पाद प्रक्षालन कर रहे थे ,यही विष्णु -चरणोदक स्वर्ग की नदी बन बहने लगा। उसी समय पृथ्वी पर राजा भागीरथ अपने पुरखों की भस्म के परि -शोधन  ,उनकी ऐशिज  को सेंकटिफ़ाइ हेतु  तप कर रहे थे,फलस्वरूप गंगा जी भू -मुखी हो वेगवती धारा के साथ पृथ्वी की और बढ़ने लगीं ,इस आवेग से पृथ्वी दो फाड़ हो सकती थी ,लिहाज़ा वेव -ब्रेकर्स के तौर पर शिव ने इसे अपनी जटाओं की ओर  मोड़ा ,प्रवेग को शांत करके पृथ्वी की और पुन :मोड़ दिया।

लिहाज़ा रजोगुण प्रधान ब्रह्माजी ,सतोगुणप्रधान विष्णु और तमोगुण के स्वामी शिव का स्पर्श गंगे को मिला है। इसके जल को गंगा जल कहा गया है जिसमें घुलित ऑक्सीजन की मात्रा गौ -मुख से निकासी होते ही अधिकतम रहती है इसीलिए गंगा जल यहां स्रोत से लिया गया कभी सड़ता नहीं है। भले आज हमारी करतूतों के चलते कहानी और है लेकिन श्रद्धा और आस्था चुकी नहीं है भले नदियाँ तो क्या दुनिया भर  के समुन्दर भी स्वत :शोधन आज नहीं कर पा रहें हैं आइल स्पिल्स के चलते। तमाम और कारक हैं जिनकी चर्चा करना हमारा मंतव्य यहां नहीं है।

"आदि -शंकराचार्य" अपने  "गंगा -स्त्रोत्रं" में कहते हैं -जो एक मर्तबा भी गंगा में डुबकी लगा लेता है उसे फिर दोबारा माँ के गर्भ में जठराग्नि में लौटकर उलटे लटकना नहीं पड़ता -पुनरपि जन्मम पुनरपि मरणम ,पुनरपि जननी जठरेशयनम -से वह मुक्त हो जाता है।

"आर्य" यहीं इंडो  -गेंजेटिक प्लेन्स में रहे पनपें  हैं विकसें हैं। काशी -प्रयाग -हरिद्वार -ऋषिकेश से लेकर रुद्रप्रयाग ,कर्णप्रयाग आदि उत्तराखंड के अनेक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र यहीं पनपें हैं जहां संस्कृति का लगातार पल्लवन हुआ है।

गंगा ज्ञान का प्रतीक है जो गुरु के मस्तिष्क से निसृत होकर शिष्य परम्परा की और आया है। ज्ञान की सतत प्रवहमान धारा है गंगा महज नदी नहीं है।

अनेक ऋषियों का तप फल गंगा जल लिए हुए है। "शब्द" से गंगा -जल का अभिषेक हुआ है। यह आकस्मिक नहीं है उत्तर भारत के तमाम लोग एक मर्तबा रामेश्वरम के समुन्दर में डुबकी लगाना चाहते हैं तो दक्षिण के हर की पौड़ी - हरिद्वार का रुख करते हैं। हर कोई गंगासागर में भी स्नान करना चाहता है जो उत्तरभारत को बंगाल की खाड़ी  और दक्षिण के समुन्दर से जोड़ता है। इसप्रकार गंगा हमारी सर्व -समावेशी सांस्कृतक धारा का सशक्त न्यूक्लियस बनी हुई है।यूं ही नहीं गया गया है -गंगा मेरी माँ का नाम बाप का नाम हिमालय

https://www.youtube.com/watch?v=Donn6OgYV-g

  

पुजारी ईश की आरती उतारने के बाद आरती का थाल भक्तों तक लाता है,इसका क्या मतलब होता है ?

पुजारी ईश की आरती उतारने के बाद आरती का थाल भक्तों तक लाता है,इसका क्या मतलब होता है ?

अक्सर पूजा के प्रकार के अनुसार दीपशिखा एक से लेकर पांच लौ वाली भी होती है। जो पांच कोशों का प्रतीक है (Five sheaths of life force).दरसल जो शिखा (फ्लेम ,दीप  की लौ -ज्योति )ईश को आलोकित कर चुकी है उसका संपर्क ईश से हो चुका है। अब वह साधारण ज्योति नहीं रही है जैसे ईश्वर पर अर्पण करने के बाद प्रसाद में अर्पित खाद्य सामिग्री अब प्रसाद ही कहलाती है केला अब मात्र केला नहीं रहा ,प्रसाद (परसादा )बन गया। वैसे ही यह ज्योत अब आशीष प्राप्त ज्योत है ,भक्त इसके ऊपर अपने हाथों की हथेली पलांश को रखता है फिर इसका स्पर्श अपनी आँखों से कराता है।ऐसा करके वह अनुग्रह प्राप्त करता है ईश की।  पुजारी यहां गुरु समान ज्ञान उजास कर मय -ईश- अर्पित- ज्योत के रागद्वेष ,ईरखा (ईर्षा )आदि नकारात्मक वृतियों का नास कर रहा है। यही निहितार्थ हैं भक्तों तक आरती लाने का। 

हाँ एक बात और अर्थ ,पुष्पम पत्रं के रूप में हम जो भी कुछ ईश को अर्पित करते हैं। वह उसे स्वीकारता है। ये नहीं है कि ईश्वर को कुछ पदार्थ चाहिए वह तो आपकी मुक्ति तनमन धन समर्पण ,का प्रतीक है रुपया पैसा डॉलर जो भी आप समर्पित करते हैं इस सम -अर्पण  भाव से आप अपने अहम (अहंता भाव से )मुक्त होते हैं। ईश्वर तो स्वयं दाता है अलबत्ता संस्था को चलाये रखने उसके रख रखाव के लिए अर्थ (पदार्थ )भी चाहिए। फिर आपके पास अपना है क्या सब कुछ तो उसी का दिया हुआ है। इसीलिए कहा गया -तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा। 

सोमवार, 11 सितंबर 2017

"पूजा" के बाद"आरती "करने के निहितार्थ क्या हैं ?क्यों की जाती है किसी भी पूजा के सम्पन्न होने पर आराध्यदेव की आरती?

"पूजा" के बाद"आरती "करने के निहितार्थ क्या हैं ?क्यों की जाती है किसी भी पूजा के सम्पन्न होने पर आराध्यदेव की आरती?

ईष्ट की प्रतिमा के गिर्द प्रज्वलित दीप -थाल को घुमाने का एक कारण यह रहा आया है आज भी दक्षिण  भारत के अधिकाँश मंदिरों के गर्भगृह में बिजली का बल्ब नहीं जलाया जाता है। मात्र दीपक का धीमा प्रकाश ईश को रोशन करता है। उसके आभूषणों की दमक और कांति हम तक पहुँचती है। पुजारी आरती उतारता है ईश को समूचा साफ़ साफ़ आलोकित करने के लिए ताकि उसका दर्शन ठीक से हो सके सर्वांश  में।

गर्भ गृह हमारे हृदय की गुफा की तरह हैं जहां एक साथ ईश और हमारे अज्ञान का अन्धकार है। आरती में कपूर जलाये जाने का एक विशेष अर्थ यह रहता है -कपूर पूरा जल जाता है। दहन सौ फीसद होता है। शेष कुछ नहीं बचता कार्बन (कालिख ),के रूप में। हमारा अज्ञान नष्ट हो अपने ब्रह्म स्वरूप को निरंजन (बिना कालिख)होने को हम जान सकें। आखिरकार एक ही चेतन परिव्याप्त है सृष्टि में। करता और करतार एक ही हैं। किर्येटर एन्ड किरयेशन आर वन एन्ड देअर इज़ नो सेकिंड। देअर इस आनली गॉड।

पूजा आरती आदि भले द्वैत का बोध कराये। इसकी  परिणति अद्वैत में ही होती है। बस भांडा साफ़ रहे हमारा मन स्वच्छ रहे। पूजा अर्चना शुद्धिकरण का एक ज़रिया भर है। मंज़िल अद्वैत ही है जहां पूजित और पुजारी दो नहीं हैं। दो की जस्ट अपियरेन्स है।