शनिवार, 9 दिसंबर 2017

Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - Day 4 (Part lll )

जैसा पानी वैसी वाणी जैसा अन्न वैसा मन -अन्न और जल से ही हमारी प्रकृति का निर्माण होता है। जब कभी जल पीयो ,गंगा को याद कर लेना ,अन्न ग्रहण करो तो नारायण का स्मरण कर लेना। 

राम कहते हैं -लक्ष्मण हम एक ऐसे नगर में जा रहे हैं जहां ऐसे लोग रहते हैं जो देह में नहीं रहते।हवन कुंड की लकड़ी खत्म हो जाए तो अपना पैर  हवन कुंड में डाल देते हैं।  ये देह तो एक आवरण है उपाधि है जैसे आप वस्त्र लपेट लेते हैं वैसे ही है। 

आपकी आत्मा में वैसे ही आपका मन लिपटा हुआ है ,बुद्धि लिपटी हुई है।हमारे तीन शरीर हैं :

ये देह भी एक आवरण  है। आत्मा के  ऊपर यह बुद्धि भी एक आवरण है।मन भी।  अपने अनेक प्रयोजनों की पूर्ती में जो संलग्न है उसका नाम ग्यानी है। उसमें समय का ,ऊर्जा का,उत्साह का , आशावादिता का प्रबंधन है।विजय का संकल्प है। समयबद्ध नियोजन है उसके पास। 

जो बहुत स्वाभाविक हो गया था वह था जनक। जब सीता धनुष उठाकर एक तरफ रख रहीं थीं मांढ़ना बनाने के लिए अल्पना ,रंगोली बनाने के लिए रख रहीं थीं जब यह दृश्य जनक ने देखा ,सीता की माँ ने देखा तो वह सुख से भर गए। मेरी पुत्री पराम्बा है  ये धनुष तो किसी से हिलता भी नहीं है।यह सीता नहीं पराम्बा है इसके लिए तो वर के रूप में  एक राम ही चाहिए। और जनक ने तभी यह संकल्प ले लिया -जो इस शिव धनु को भंग करेगा वही मेरी पुत्री का वरण  करेगा उसे जयमाल पहनायेगा।   

जब खाया भंग का गोला ,

गोपी बन गए बम -भोला।  

शिव रास में हिस्सा तभी ले पाते हैं तभी रास देख पाते हैं जब अपने अंदर स्त्री भाव पैदा कर लेते हैं। पुरुष बनकर वह रास नहीं देख सकते। इस देह को पात्र बनाओ। पुजारी जो देवी का श्रृंगार करता है पहले अपने अंदर स्त्रीभाव पैदा करता है ऐसे ही माँ के कपोल नहीं छू  सकता ,बिंदिया नहीं लगा सकता आलता  नहीं लगा सकता पैरों में ,करधनी नहीं पहना सकता कटिबंध में। वह पत्थर का श्रृंगार नहीं कर रहा है माँ का कर रहा है। स्त्रैण भाव उसे पैदा करना पड़ता है पुरुष (पुजारी )बन के वह माँ का श्रृंगार नहीं कर सकता। पहले उसे अपनी देह को पात्र  बनाना पड़ता है।  
इस देह को भी तर्जनी को भी पात्र बनाना पड़ता है। 

 तर्जनी से अपार ऊर्जा  का स्खलन होता है इसे कभी मत उठाओ।  तर्जनी से  सिर्फ पितरों की पूजा की जाती है उन्हें ही तिलक लगाया जाता है।  
शत्रु को अगर जीत लिया है तो उसे तिलक बीच की ऊँगली से लगाया जाएगा। माँ बेटे को ,पत्नी पति को तिलक , बहन भाई को अनामिका से ही तिलक लगाएगी। नीचे से ऊपर की ओर  उसे ले जाएगी। जो ऊर्ध्वगमन का प्रतीक है। 

तो जनक पात्र बन गए। उन्हें पता चल गया जब मेरे घर में सीता आ गई तो मैं पात्र बन गया। ब्रह्म आएगा अब मेरे घर  ,मेरे पास ,नारायण आएगा मेरे पास। जब यह देखा मेरी बेटी धनुष उठाकर चल रही है तभी उन्होंने संकल्प  ले लिया शिव के समक्ष जल लेकर अंजुरी में प्रतिज्ञा की जो इस धनुष को उठा लेगा उसी के गले में मेरी पुत्री जयमाल डालेगी। 

तो जब संसार भर के शासकों राजाओं को बुलाया स्वयंवर के लिए -तो जनक स्वयं नहीं गए -सचिव को मात्यों को भेज रहें हैं उन सबकी  अगवानी के लिए। 

जब राम आएगा तो मैं जाऊंगा। राम आएगा ,क्योंकि मेरे यहां सीता है।जो समय के पार देख लेता है वही तो जनक है। विदेह है जो शरीरातीत ,भावातीत ,समयातीत है वही तो जनक है।  

अस्वाद ,अक्रोध ,अवैर  ,अनिन्दा ,इष्टानुगत ,इष्टानुगति । ये पांच चीज़ें ज़रूरी हैं किसी भी व्रत के लिए।ये चीज़ें नहीं हुईं तो व्रत खंडित हो जाएगा।  

सोमवार का व्रत शिव  के ध्यान में ,एकादशी का -नारायण ,बुद्धवार ,मंगलवार गणपति के ध्यान में ,और हनुमानजी का व्रत कर रहे हो तो हनुमान के ध्यान में। 
जिसे व्रत करने नहीं आते जिसने इन्द्रियों को नहीं साधा है वह व्रत नहीं ले सकता। 

एक बार भीषण अकाल पड़ा जनकपुर में -

राजा जनक ने प्रतिज्ञा की मैं शिवाभिषेक करूंगा  -"शिवाभिषेक करने से परिजन्य आयेंगे-बारिश होगी" ,गुरु ने कहा पहले  ये व्रत ले -राजा ने जल हाथ में लेकर  शपथ खाई जिस विधि से गुरु जलाभिषेक कराएंगे वैसे ही मैं करूंगा। 

व्रत क्या था ?रुद्राभिषेक की विधि क्या थी ?कितनी दुस्साध्य थी जनक ने नहीं पूछा बस कह दिया मैं करूंगा -

जब गुरु ने बताया :

राज कूप में कच्चा घड़ा डाला जाए -रुइ हाथ में लेकर कोई नारी एक  कच्चा धागा रुई में से निकाले उससे घड़े का मुंह बांधा जाए उसे कुँए  में डाला जाए जल निकाला जाए उस कच्चे घड़े से।  उस जल से ही  रुद्राभिषेक होगा।
जनक ने कहा यह मुझसे नहीं होगा कौन करेगा यह ?गुरु ने कहा तेरी पत्नी करेगी वह पतिव्रता है। पत्नी ने कहा मैं कर तो सकतीं हूँ लेकिन हो सकता है कच्चा घड़ा पानी में जाकर बिखर जाए। फूट जाए मुझमें इतना आत्मविश्वास नहीं है। लेकिन हाँ एक स्त्री है जो ऐसा कर सकती है। उसने राम को पैदा किया है। कौशल्या माता ऐसा कर सकतीं हैं। 

जनक की पत्नी ने कहा मैंने तो सीता को अपनी कोख से पैदा नहीं किया वह तो हमें धरती से मिली है लेकिन हाँ मुझे इतना विश्वास है के माता कौशल्या ने राम को अपनी कोख से पैदा किया है वह ऐसा कर सकतीं हैं।वह परमात्मा  से संवाद कर सकतीं हैं। 

दसरथ को चिठ्ठी लिखी गई। गुप्त रूप से भेजी गई।सहायता मांगी गई रुद्राभिषेक संपन्न करवाने के लिए ताकि जनकपुरी से अकाल के बादल छट  जाएँ। 

 राजा दशरथ   पत्र देखकर मुस्कुराये।कैकई पूछती हैं इस प्रकार क्यों मुस्कुरा रहे हो स्वामी आज आप ?राजा मन ही मन में सोच  रहे थे -अब पता चलेगा कैकई को कौशल्या कितनी गुनी हैं। बोले राजा कौशल्या के लिए पत्र है तुम्हारे लिए नहीं हैं बोली कैकई मुझे भी दिखाओ ऐसा क्या है इस खत में और फिर चिठ्ठी पढ़के बोलीं  मैं करूंगी यह काम तभी वहां सुमित्रा भी अकस्मात आ पहुंचीं कहने लगी सब काम तुम ही करोगी। हमें भी तो सेवा का मौक़ा मिले -यह काम तो मैं करूंगी। मैं जाऊंगी जनक की नगरी ,मैं रुई से कच्चा धागा निकाल के घड़े के मुख से बांधूंगी  ...अभी उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी एक दासी भी इस दरमियान वहां पहुँच गई थी वह बोली ये काम रानियों के करने का नहीं है कुँए से पानी  निकालने का काम दास दासियों का होता है। मैं कर लूंगी यह काम। 

कौशल्या के वस्त्र मांगे दासी ने उसी पालकी में उसे जनकपुर भेजा गया पूरे अमले के साथ। और भी पालकियां यथावत साथ गईं। दासी ने ये काम कर दिया। लेकिन जब वह यह काम कर ने लगी थी जानते हो वह मन ही मन क्या कह रहीं थीं कौशल्या नम :  कौशल्या नम:  -मैं ये काम कौशल्या के निमित्त कर रहीं हूँ वह ही इसकी करता हैं मैं तो निमित्त मात्र हूँ।वह मन ही मन कौशल्या जी की स्तुति कर रहीं थीं कहीं मेरे में करता पैन का अभिमान न आ जाए। 

जनकपुर का अकाल दूर हुआ सुखद वर्षा हुई। जनक की पत्नी पालकी की ओर  उस दासी के चरण स्पर्श के लिए आगे बढ़ीं तभी दासी पालकी से बाहर आ गईं -अभी तक जनकपुर वासी यही सोच रहे थे ये करतब कौशल्या जी ने किया है। जब सब को असलियत पता चली -राजा जनक ने मन ही मन सोच लिया -विवाह का न्योता ,स्वयंवर की चिठ्ठी अयोध्या नहीं भेजेंगे वहां का तो कोई किंकर ,दास ही आकर धनुष तोड़ देगा और सीता जी को वही  ब्याह के ले जायेगा। ऐसे प्रवीण थे तमाम अयोध्या वासी। 

एक बात और स्वयंवर के लिए राजा जनक ने केवल राजाओं को बुलाया था ,राजकुमारों को नहीं। दूसरी बात दशरथ तो आएंगे नहीं धनुष उठाने क्योंकि उनकी मान्यता नहीं है। लेकिन अगर मेरे पास सीता है तो विवश होकर राम को आना ही पड़ेगा। 

समाचार मिथिलापति पाए ,
विश्वामित्र महामुनि आये।  

उच्च पदस्थ सचिवालय ,सकल मंत्रिमंडल ,कवि , अमात्य ,मंगलाचरण और स्वस्तिवाचन में निपुण लोगों को ,चारण भाटों को साथ लेकर जनक जी नंगे पैर ही चल पड़े गुरु विश्वामित्र की आवभगत स्वागत को। तमाम राजा सोचने लगे ऐसा कौन आया है जिसकी अगवानी को स्वयं राजा जनक जा रहे हैं और वह भी नंगे ही पैर। 

गुप्तचरों ने कहा विश्वामित्र आएं हैं। राजा के गुरु ,धर्मसत्ता ,ज्ञान सत्ता आई है ,मुझसे मिलने उनकी उदारता तो देखो जनक मन ही मन सोचते हैं  मैं तो उन्हें निमंत्रण देना ही भूल गया। विदूषक भी ले चले राजा साथ में कवि ,पंड़ित ग्यानी सभी को लेकर -गुरु के चरणों में सर रख  दिया। गुरु एक पवित्रता का नाम है अलोभ सत्ता का ,अकाम सत्ता का नाम है जो निर्विषय है वही गुरु है। संसार में कोई ऐसा आकर्षण नहीं जो उसे अटका सके। गुरु में अगर आपकी  श्रृद्धा है तो गुरु बिना निमंत्रण के भी चला आएगा। 

जैसे ही चरणों में सर रखा -प्रणाम करके जनक उठे -राम पर नज़र पड़ी।

उनके मुख मंडल पर जनक अटक गए। 

मूरत  मधुर मनोहर देखी 

रोटी रूखी तो न खाओ ,थोड़ा घी तो लेते जाओ -विठ्ठला -विठ्ठला  कहते हुए भागे थे नामदेव स्वान  के पीछे कहते हुए क्या स्वान  की शक्ल बनाई हुई है विठ्ठला -रोटी रूखी ही खाओगे -थोड़ा घी तो लेते जाओ। ऐसा ही होता है भावातिरेक ,भावानुराग में । 

राम को देखकर ब्रह्म ग्यानी निर्गुण के उपासक जनक विमोहित थे मंत्रमुग्ध थे। गुरु से दृष्टि हटी राम पर अटकी तो अटकी  ही रही।टकटकी लगाए देखते रहे राम को जनक। विदेह जनक देह में अटक गए सगुण ब्रह्म राम को देखते ही रह गए। 

स्वामी एकनाथ गंगोत्री से कठिनाई से लाया हुआ जल लेकर रामेश्वरम जा रहे थे सूखे कंठ से कराहते गर्दभ को देखा और सारा जल उसे ही पिला दिया।भगवान् ने ही उनकी परीक्षा ली थी ,क्या मैं सचमुच ही इसे सब जगह दिखता हूँ यह मुझ पर जल चढ़ाएगा या प्यास से छटपटाते गर्दभ को पानी पिलायेगा। भगवान् रामेश्वरम की  सीढ़ियों में मरता हुआ गधा बनकर लेट गए। मेरा रामेश्वरम मुझे इस गधे में दिखाई देता है और यह कहते हुए पूरी गंगाजली उसके मुंह में उड़ेल दी एकनाथ ने। भगवान् स्वयं प्रकट हो गए -विठ्ठला विठ्ठला कहने वाले नामदेव के सामने भी। 
शिवलिंग में शालिग्राम में कहाँ शक्ल है ?लेकिन पुजारी जानता है शिव का भाल कहा हैं। 
धीरे से पूरी शक्ल ही दिखने लगेगी आपको -ओष्ठ भी आ गए ,नासिका  भी ,कपोल भी। और फिर महाकालेश्वर की आरती में  बमभोला   ही पूरा प्रकट हो गया। पात्र (पुजारी )बनकर तो देखो जनक सा। 
गुरु चरणों का फल परमात्मा की प्राप्ति है -यही सन्देश है जनक और विश्वामित्र प्रकरण का यहां पर।
(ज़ारी )  
संदर्भ -सामिग्री :

(१ )

Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 29th Dec 2015 || Day 4(Part lV )

मूरत मधुर मनोहर देखी 

भयो  विदेह  विदेह विशेषी। 

वो (राजा जनक ) देहातीत , शब्दातीत ,भावातीत हो गए। गुरु चरणों का फल भगवान् की प्राप्ति है। जनक का ध्यान नहीं हटा राम की मूर्ती से।राम की प्रतिज्ञा है :

सम्मुख होय जीव मोहे जबहि ,

जन्म  कोटि अग नासहि  तबहि।  

 इनहिं विलोकत अति अनुरागा ,

बरबस ब्रह्म सुखहि मन त्यागा।

 श्वास श्वास  सिमरो गोविन्द ,

मन अंतर की उतरे  चिंद।

अब मैं राम का ही सिमरन करूंगा।राम को ही भजूँगा।  

और गुरु विश्वामित्र  जी बहुत प्रसन्न हुए अब इसे (जनक को ) समझ में आ गया -राम सब में है। सगुन और निर्गुण दोनों के इसे दर्शन हो गए।अब इसे समझ आ गया -निराकार ,निर्विकल्प ,निर्गुण ,निर- तर्क और सविकल्प साकार यह एक ही है जो सबमें  है। 

गुरु के कान में जनक कह रहे हैं राम को देखते हुए- आपने मुझे पहले जो साधन बतलाया था निर्गुण ब्रह्म उपासना का अब वह मैं नहीं करूंगा।वह साधन तो बहुत कठोर है।  अब मैं इनकी ही उपासना करूंगा। 

लेकिन ये क्या ?

राम के दर्शन का फल तो आनंद है लेकिन जनक का मुख म्लान क्यों हो गया -तब जनक ने गुरु के कान में बतलाया मैंने इतनी कठोर और यह प्रतिज्ञा क्यों कर डाली के जो शिव के धनुष को उठाएगा उसी के गले में सीता जयमाल डालेगी।  

मैंने क्यों प्रतिज्ञा कर ली अब मुझे इंतज़ार करना पड़ेगा वरना महल में जाकर सीता से कहता राम को जयमाला डाल दो जनक मन ही मन सोचते चले जा रहे हैं। 

युवती भवन झरोखन लागीं -अयोध्या के भवनों के झरोखों से युवतियां राम के रूप लावण्य को निहार रहीं हैं। 

राम का बड़ा सम्मान है नगर में बड़ी चर्चा है राम की । पूरे नगर में चर्चा है देखो तो राम कैसे हैं। जानकी जी भी अपने को रोक नहीं पाईं वहीँ आ गईं वन में  प्रणाम करने। 

राम के सकल व्यक्तित्व की ,राम के चरित्र की पूरे नगर में चर्चा है। सीता रोक नहीं पाईं अपने आप को। मंदिर जाने के बहाने से उन्होंने अपनी माँ से कहा माँ मैं मंदिर हो आऊँ। और मन ही मन कहने लगीं राम से -हे प्रभु आप भी मंदिर आ जाइये न। वहां दर्शन हो सकेंगे आप के। 
अब ये भनक राम के कान में पड़ी के सीता ऐसा चाहती हैं तो वो गुरुदेव से कहने लगे हे गुरुदेव आपकी आज्ञा हो तो मैं लक्ष्मण को यह नगर दिखा लाऊँ। 

गुरुदेव ने कहा बिलकुल जाओ और आराम से आना सांझ तक आना। राम ने लक्ष्मण से कहा हमने इतने बड़े बड़े काम किये चलो आज शिव के दर्शन भी कर आएं। 

बिल्व ,मधुपर्क ,पंचामृत ,विशेष अर्घ्य लिए   हैं ,जानकी लिए हैं। पकवान हैं दिव्य वस्त्र आभूषण हैं ,माँ को चढाने के लिए । चंदन ,रोली तमाम पूजा सामिग्री एक बड़े स्वर्ण थाल में लिए जानकी चल दीं  हैं बाग़ (वन )की ओर सहेलियों के संग भगवान् को मन ही मन याद करते हुए। उनके कंगन इतने बड़े  थाल को संभालते हुए हिल रहे हैं।उनके पैरों की पायल  के नन्हे -नन्हे  घुंघरू  की ध्वनि आ रही है। 

दूर से आता हुआ कंगनों का स्वर उनकी धुन ,बड़ा कुण्डल पहने हुए हैं माँ। बहु बेटियों का श्रृंगार बड़ों को आदर देने के लिए पूजा के लिए है। 
"ये धुन सुन ये स्वर कहाँ से आ रहा है ?लक्ष्मण सुन ये स्वर -लखन के कंधे पर हाथ रखते हुए भगवान् कहते हैं -लक्ष्मण कहते हैं हाँ मैं इन स्वरों को इस धुन को भलीभांति पहचानता हूँ मैं इस धुन को पहचानता हूँ। जब लक्ष्मी जी सेवा करती है विष्णु की तो उनके आभूषण जो ध्वनि करते हैं लक्ष्मण उस ध्वनि को बरसों से पहचानते हैं। 
अपनी  अर्द्धांगनी को देख कर राम ठगे से रह गए। मेरी सीता कितनी सुन्दर हैं राम को लक्ष्मी जी से बिछड़े हुए मुद्दत जो हो गई है।राम सीता को निहार रहे हैं।  

अगर मैं बार -बार सीता को देख रहा हूँ तो हे लक्ष्मण इसका अर्थ ये है मैंने सपने में भी पर -नारी नहीं देखी है ये सीता मेरी ही है। 
ऐसा राम लक्ष्मण को छोटे भाई की मर्यादा रखते हुए कह रहे हैं अरे ओ लक्ष्मण ये सीता मेरी ही है मैं इसीलिए इसे बार -बार देख रहा हूँ ,मैं   इक्षवाकु वंश का हूँ।मैंने सपने में भी पर नार नहीं देखी  है।  राम ऐसा बार बार इसलिए भी कह रहे हैं उन्हें मालूम है शिव धनु किसी से उठेगा नहीं राजा जनक झुंझला कर ऐसी वैसी बात कहेंगे -मेरे भाई को गुस्सा आएगा। आवेश में आकर कहीं वह ही धनुष न तोड़ दे। 

विनय प्रेमवश भई भवानी ,
खसी माल मूरत मुस्कानी। 

मूर्ती से निकलके पारवती प्रकट हो गईं -आशीष देने लगीं जानकी जी को -

  जय जय जय श्री राज किशोरी ,

जय महेश मुख चंद्र चकोरी। 

सुन सिय सत्य अशीष हमारी  ,

पूजहि मन कामना तुम्हारी। 

भारत का एक शगुन विज्ञान है -नील कंठ के दर्शन हो गए ,श्यामा आ गई ,कुमारी कन्या भरा हुआ घड़ा लेकर चल रही है इसे शुभ समझा जाता है स्त्री के बाएं अंगों और पुरुष के दाएं अंग फड़कने को शुभ समझा जाता है। बिल्ली के मार्ग में आने को अशुभ समझा जाता है। बंदर की उछल कूद के मायने भिन्न हैं।  
बाएं अंग बाईं आँख फड़कने लगी माँ की। उंगलियों से छूआ आँख को और चूम लिया उँगलियों को हाथ को -मेरी मनोकामना पूरी होगी भगवान्। 

जो सबसे ऊंचा था  मुनियों का ,आचार्यों का,उसके नीचे  राजाओं का ,और उससे भी नीचे उनके सचिवों का आसन उससे भी ऊंचा गुरु का आसन है राम -लक्ष्मण को भी वहीँ गुरु के साथ बिठाया जाता है।राम लखन तो राजकुमार थे और इस सभा में वह निमंत्रित नहीं थे केवल सभी राज्यों देशों के राजाओं को ही बुलाया गया था स्वयंवर की इस सभा में भव्य आयोजन में लेकिन वह तो गुरु के साथ थे इसीलिए किसी को कोई आपत्ति भी नहीं थी।  

भूप सहस  दस एकहि बारा ,
लगे उठावन टरै न टारा। 

विषयी कामी राजा धनुष को हिला भी न सके। सहसत्र बाहु उठा फिर रावण उठा पर वह शिव धनु हिला न सके।अपमानित होकर कितने ही उस परिसर से लजाकर चले गए। 
तब राजा ने कहा ये पूरी धरती  वीर विहीन हो गई। अब कोई पराक्रमी बलशाली राजा धरा पर नहीं रहा। मुझे ये पता होता तो मैं ऐसी प्रतिज्ञा न करता। 

राजा के ऐसे वचन सुनकर लक्ष्मण जी  अपने स्थान से मंच से एकदम  कूद गए  -आवेश में आकर कहने लगे जहां मेरा भाई राम बैठा हो वहां ऐसे अ -मर्यादित शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है ,ऐसे वचन नहीं बोले जाते हैं -राजा अपना वचन वापस लो।
ये धनुष क्या मैं इस ब्रह्माण्ड को ही  कच्चे घड़े की तरह फोड़ दूँ। ऐसे धनुष प्रत्यंचा चढ़ा चढ़ा के न जाने हमने अपने गुरु के साथ कितने तोड़ दिए। 
और फिर तभी ऐसा कहकर लक्ष्मण मुस्कुराने भी लगे जनक को प्रणाम करके चुपके से राम के चरणों में आकर  बैठ गए।राम ने उनकी तरफ देख कर उन्हें इशारों इशारों में ही तरेड़ा था ,लक्ष्मण समझ गए थे।  

अब विश्वामित्र को लगा यह शुभ समय है -

विश्वामित्र  समय शुभ जानी ,

बोले अति स्नेहमय वाणी।  

उठौ राम   भंजो भव चापा ,

मैटो  चाप जनक परितापा। 

राम मन ही मन गुरु को, देवसत्ता को पितृ सत्ता को प्रणाम करते हैं -पूरी परम्परा का स्मरण किया राम ने। 
कथा का यहां संकेत है जब भी जीवन में कोई बड़ा काम करो -अपनी परम्परा पूर्वजों को प्रणाम करो उनके मन ही मन आशीष लो - 

गुरुहि प्रणाम मन ही मन कीना ,
अति लाघव उठाय धनु लीना।

ऐसा लगा राम प्रणाम कर रहे हैं शिव धनु को ।सब कुछ पलक झपकते ही  हो गया। 

लेत चढ़ावत खेंचत गारै ,

काउ न लखा ,देखें सब ठाढ़ै। 

देखा राम मध्य धनु तोड़ा  -सबने देखा राम के धनुष ने बीच में से दो टुकड़े कर दिए हैं लेकिन कब कैसे यह किसी ने भी नहीं देखा। भगवान् का किया हुआ दिखाई नहीं देता वह बस हो जाता है। 

उसकी धनुष भंग की बड़ी ध्वनि हुई। जैसे ही धनुष तोड़ा जनक जी ने जानकी जी को संकेत किए और जानकी जी चल पड़ीं। 

शंख झाँझर मृदंग सब बाजे।  

सखियों ने सीता जी को कहा धीरे -धीरे चलो ,सीता जी तेज़ चल रही हैं। उत्सव के आनंद में उनकी स्वाभाविक गति खो सी गई है उत्सव के भाव आनंद अनुराग में इष्ट की करुणा में में व्यक्ति कई बार अपनी सहजता खो देता है। वह खो सा जाता है कहीं। 

सीताजी लखन से कहने लगीं मन ही मन -ये आँख बंद करके खड़े हैं सिर झुकायेंगे नहीं ,आँखें बंद किये   रहते हैं ,इनकी तो प्रकृति ही ऐसी है ,शेष- शैया पर भी सोते ही तो रहते हैं। तुम मेरे बालक हो मेरा आज काम कर दो। लक्ष्मण ने मन ही मन कहा माँ तुम निश्चिन्त रहो मेरे पास सौ तरीके हैं राम को झुकवाने के। 

लक्ष्मण जी राम के चरणों में झुक गए प्रणाम करने के लिए -राम आषीश देने के लिए लक्ष्मण को उठाने  के लिए झुके -लक्ष्मण -बोले भैया प्रणाम। 
राम ने पूछा ये कौन से समय का प्रणाम था। बोले लक्ष्मण राम जी को तो जब जी चाहे ,कभी भी प्रणाम कर लो।आपका स्मरण करने का क्या कोई समय होता है मेरा मन किया मैंने कर लिया। 

और तुरंत जानकी जी ने जयमाल राम के गले में डाल दी। 

गावहिं मंगल गान सहेली ......

परशुराम भी आये कुछ नौंक झौंक भी हुई और वह समझ गए ये राम हैं। बारात फिर अयोध्या  चली आई -मांडवी भरत की, उर्मिला लक्ष्मण की और श्रुतिकीर्ति शत्रुघ्न की वामांगी बनी.
दसरथ कुछ पल के लिए अप्रसन्न हो गए -राजा जनक ने दशरथ से कह दिया अब सीमाएं आ गईं  हैं दोनों नगरों की -ये सीता अब अयोध्या की दासी है अब ये अयोध्या की सेवा करेगी। 

दशरथ ने कहा ये अब हमारी सीमा में है आप इसे अपने घर में कुछ भी कहो यहां अयोध्या में तो यह पटरानी है दासी नहीं है यह हमारे घर की रानी है। आइंदा ऐसे शब्दों का इस्तेमाल आप न करें। 

कथा का यहाँ सन्देश है -

किसी की बेटी को लेकर आओ उसे घर की बहु बनाना पटरानी बनाना उसे इस ढंग से प्रीती देना उसे अपना घर याद  न आये। यही कथा का सन्देश है। 

जब ते राम ब्याहे  घर आये 

नित नव मंगल मोद  बधाये। 
        
सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )
3:28:43


You are watching Day 4 of Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji Maharaj from Indore (Madhya Pradesh) Date: 26th 

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - Day 4 (Part ll)

गुरु विश्वामित्र ने राम से कहा आपके पूर्वज बड़ी कठनाई से गंगा को लाये हैं चलिए इसका पूजन करते हैं :


चले राम लक्ष्मण मुनि  संगा  ,

........   ...... पावहिं गंगा। 

गंग  सकल मुद मंगल मूला। 

सब सुख करणी हरहिं सब शूला। 

हम भारतीयों के सभी संस्कार जल से ही संपन्न होते हैं। जल में जीवन है जीव की उत्पत्ति जल से है।अंत्येष्टि के बाद अस्थि विसर्जन गंगा में और फिर जलांजलि दी जाती है। 

बारह बरस पहले मैं जब यहां कुम्भ पर आया था ,पूरी धरती पर  पेय जल   डेढ़  से पौने दो प्रतिशत ही रह गया था  बाकी जल संदूषित हो गया ,अब आज इस धरती पर आधा प्रतिशत ही पीने  योग्य जल रह गया है।अगले कुम्भ तक कितना रह जाएगा ?सहज अनुमेय है। 

और इसीलिए आज हमारी सहनशीलता गई प्रतिरोधात्मक शक्ति गई।मनुष्य का धैर्य गया। दूसरों को सहन करने की शक्ति गई। इतनी कीमत की चीज़ है गंगा आपके पूर्वज लाये थे इसे बड़ी मेहनत से -गुरु ने राम से कहा।  

हरीतिमा गई अन्न का अण्णत्व अन्नत्व प्राणत्व गया पाचकता गई।अन्न से रस गया। स्वाद गया सुगंध गई।  गुरु ने राम से कहा आपके पूर्वज लाये थे ये जल।उन्होंने ही हमें हरे भरे बाग़ बगीचे सौंपे थे।  

और आज हमने क्या कर दिया ?

वसुंधरा का हरा बिछौना ही नौंच डाला। 

भारत में दो वस्तुएं अमर  हैं एक का नाम है गंगा।जिसका पावित्र्य कभी नहीं मिट सकता। और दूसरी चीज़ है गाय।  मनुष्य को बचाने के लिए भारत की देसी गाय की आज आवश्यकता है वही हमारी संवेदनाएं बचाएगी। उसमें जो धातु हैं वही मानव मन को समेट  कर रखेंगे। भारत की गौ को बचाओ तो मानवता बचेगी।एक एक सांड हमारा एक करोड़ रूपये में बिकता है। गाय को समाप्त करने का मतलब मनुष्यता को समाप्त करना है । 

भारत की गौ को बचाओ तो मानवता बचेगी। गंगा देवत्व को समेट  कर रखती है।गंगा ऐन्द्रिक संयम के लिए एकमात्र औषधि है।

किंचिद गीता भगवद गीता , 

गंगा जल अब कनिका पीता। 

बारह गुण केवल गंगा में हैं।  पवित्र गुण हैं,तत्व हैं बारह ।  गंगा में दो अतिरिक्त तत्व हैं एक लोक कल्याण के लिए दूसरा परलोक के लिए है। एक तत्व तो उसके बहते रहने से बना रहता है। एक और तत्व है जिसमें भगवदीय  गुण  हैं। क्योंकि गंगा भगवान् के चरणों से निकलीं हैं। शिव के माथे को छुआ है ब्रह्मा के हाथों को छूआ है। एक गुण  गंगा का मात्र स्मरण से प्रकट हो जाता है वह तत्व उसका सर्वत्र है। 

गंगा बड़ी गोदावरी ,तीरथ  बड़े प्रयाग।गौ मुख से ही तो निकली है गंगा इसीलिए गोदावरी भी कही गई।   

जब भी कभी जल पीयो गंगा का स्मरण करना। और जब भी अन्न लो तो नारायण का स्मरण करना।भाव की प्राप्ति होगी। बल मिलेगा।  

गंगा स्नान करने के बाद राम मुस्कुराये। 

हरषि चले मुनि वृन्द सहाया ......  

 वेगि  (वेद ) विदेह नगर नियराया।

विदेह नगर जा रहे हैं जहां का शासक कालातीत है। किसी काल का उस पर कोई प्रभाव नहीं वह समय में से तत्वों को निकालना जानता था। वह स्पेस टाइम से परे था। 

ग्यानी कौन है जो अपनी प्राथमिकताओं के नियोजन में संलग्न हैं वह व्यस्त है वही ग्यानी है।  कभी अस्त व्यस्त नहीं मिलेगा ग्यानी आपको ,जो समय के ,उत्साह के ,विवेक के प्रबंधन में  प्रवीण है वही ग्यानी है। 

विदेह की नगरी में एक बार 'होता' आदि को यह बोध ही नहीं रहा समिधा हवन कुंड में है ही नहीं और  वह स्वाह- स्वाह करते रहे। जनक ने देखा और मन ही मन संकल्प किया मेरे अंदर जितनी भी वनस्पति का लकड़ी का अंश है वह समिधा बन के आ जाए मैं जो सारी  सृष्टि में ब्रह्माण्ड  में व्याप्त हूँ अपने इस आवरण में से समिधा की  लकड़ी निकाल लूँ मेरा वह अंश जो वनस्पतियों में है बाहर समिधा  बन के आ जाए।और जनक ने अपना पैर हवन कुंड में डाल दिया। चर्बी जली हवन  संपन्न हुआ। 

लक्ष्मण ऐसी है वह विदेह नगरी जहां हम जा रहे हैं। 

(ज़ारी ) 

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 29th Dec 2015 || Day 4(Part l )

नियतिवादी नियंतावादी -ये दो धाराएं निरंतर प्रवहमान रहीं हैं :

होइए वही जो राम रचि   राखा ,

को करि तरक बढ़ावै साखा। 

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा ,

जो जस करहि सो तस फल चाखा। 

ये दो समानांतर दृष्टियाँ  हैं :

कर्म की और विचार करने की स्वतंत्रता आपको मिली है। आप अपना ही उत्पाद है अपना ही फल हैं अपनी ही फसल हैं -यह याद रखना आज की कथा की ये दो विशेष बातें हैं।जो कुछ भी हैं आप में ही  सृजक है।

नै सोच बनाइये बंधू बांधवों परिजनों के लिए। मैं नया क्यों नहीं सोच सकता। नया क्यों नहीं कर सकता वह अपने ढंग से।शपथ लेकर तो देखो। भले मेरी देह जाए मैं करूंगा -नया शरीर मिलेगा ,परन्तु मैं करूंगा।इस संकल्प के साथ आप वर्तमान में जो चल रहा है आपकी चर्या में उसे बदल सकते हैं।  

आपको श्रम करना देखना है :

मकड़ी को देखिये अनथक श्रम करते।  अनुराग के साथ नाचते हुए ठुमकते हुए करती है कर्म मकड़ी। अपना ही थूक निकाल कर एक जगह से दूसरी जगह जोड़ती है। वेब साइट मकड़ी से ही आई है। अपना ही संकल्प एक जगह से उठाया दूसरी जगह जोड़ दिया। कुछ नया हितकर उत्साह के साथ करते रहो जिसका बहुत लोग लाभ ले सकें। 

विश्वामित्र और वशिष्ठ ये दो ऋषि गुरु छाए रहे राम के गिर्द। जब तक तू मुझे हरा नहीं सकता यहां से निकल नहीं सकता। गुरु इसी चिंता में जीता था किस दिन मेरा शिष्य मुझे हराएगा। यही हमारी गुरुकुल परम्परा थी। किस दिन मेरा शिष्य मुझे जीते उस दिन का गुरु को इंतज़ार रहता था।शिष्य जिस दिन गुरु को जीत लेता था उस दिन गुरु को चैन मिलता था उस दिन वह कहता था -निकल जा। गुरुओं की चिंता रही है शिष्य मुझे परास्त कब करेगा मैं कब हारूंगा इससे।भारत का गुरु इसी सपने को लेकर जीता है। 


भारत की माँ इसी सपने को लेकर जीती है। मेरी पुत्री रूप लावण्य में सदाचार में शील और वैभव में मुझे जीत ले। उसे  मुझसे भी अच्छा घर मिले मुझसे अच्छा वर मिले।

मेरी पुत्री मेरे से बड़े घर में जाए और वहां की सम्पदा वहां के ऐश्वर्य से मुझे जीते।न केवल धन से शील संयम सदाचार औदार्य से भी। जो माँ की टोकाटाकी है वह टोकाटाकी नहीं है आपके उच्चतम चरित्र निर्माण के लिए उसकी व्याकुलता है। जीतो माँ को संस्कार में , विचार में, लज्जा में। 

जब तक पुत्र पराजित नहीं कर देता पिता चैन से नहीं बैठता। जो 'पूह ' नाम का नर्क है जो उससे त्राण दे दे उसका नाम पुत्र है और ये जानते हो कौन सा नर्क है -अभाव रुपी नर्क। कब बड़ा होगा कब ज्येष्ठ बनेगा, पुरुषार्थी होगा ,पराक्रमी होगा। ये कब गुणी होगा।जब पुत्र ही अपने उच्चतम चरित्र से पिता से आगे निकल जाता है , उसका मतलब यह हुआ पिता को  जीत  लिया उसने।तो नर्क से उसे तब मुक्ति मिल जाती है। 

ऋषियों का  मन (हृदय )जीत लिया राम ने : 

प्रात : काल उठके रघुनाथा ,

मातु पिता गुरु नावहिं माथा   .  

यही राम की गुडमॉर्निंग थी। कुछ आशीष मिल जाएँ। जिस दिन माता पिता को पता चल गया यह समर्पित है उस दिन वह आज्ञा देंगे। रोज़ प्रात : राम वन से पुष्प ,धतूर ,बिल्व तुलसी अनेक प्रकार के फल आदि लेकर गुरु के चरणों का अभिषेक करते हैं। भोर में कोई नया विचार नै आज्ञा मिल जायेगी गुरु से।नया आशीष ,प्रेम मिल जाए। सुबह उठकर आज्ञा की भीख मांगते हैं राम ।  ताड़का का वध हो गया अब कुछ नै आज्ञा दो। 

ताड़का तमोगुण की प्रतीक है 

जो ऋषियों के लिए सदैव ही खतरा बना रहता है। यहां कथा में गुणों का खेल दिखाया है। तमो गुण को एक्शन से (रजो गुण से ),राम की कर्मठता अ -प्रमत्तता  से ही जीता जा सकता है। राम ताड़का का त्राण करते हैं वध नहीं करते। करुणा और आद्रता से भरे राम उसे भी ब्रह्म लोक भेज देते हैं। शंकर संहार करते हैं। विष्णु सुधार का समय देते हैं अपराधी को ,यही वध है लेकिन राम त्राण देते हैं। मारीच को सौ योजन दूर फेंक कर अपने बाणों से रावण को यह संकेत देते हैं -मैं आ गया हूँ। 

राम वन प्रवास में गुरु विश्वामित्र से कभी अधीर होकर यह नहीं कहते -मुझे अयोध्या छोड़ने कब जा रहे हैं आप। आप के आश्रम अब भय मुक्त हो तो गए अहिल्या का उद्धार हो तो गया अब क्या शेष रह गया। राम को कोई ओतसुक्य नहीं है अयोध्या लौटने का। 

गुरुदेव कहते हैं सारे वनप्रांतरों नदियों को पार करके दूर जाना है। सामने गंगा है और आज की आज्ञा यह है गंगा के ध्यान ,पूजा उसके मर्म को समझना है। राम आज मैं तुझे जल की महिमा समझाऊंगा। आज मुझे ये बताना है यह जल क्या है नीर क्या है। हम नीर से ही बने हैं। हम जल से ही तो बने हैं माता पिता के रज और वीर्य में आद्रता ही तो है। 

कोई नारायण से पूछे वह कहाँ पैदा हुआ है। नीर से नारायण बना है । क्षीरसागर। नीर से ही नीरजा है । नीर जब पर्बतों पर रहता है तब वह पारबती कहलाता है । जब वह शैल शिखरों पर रहता है तब क्या चाहिए उसे- शैलजा। जब वह धरती पर आता है भुवनेश बनके तब भूमिजा कहलाता है । इसलिए गुरु ने राम को पूर्वजों की गाथा सुनाई। 

इस धरती पर एक चीज़ है जो व्यर्थ मत करना -एक भी जल कण व्यर्थ मत करना। अन्न जल का कण और संत का संग(क्षण ) कभी व्यर्थ मत करना -यही कथा का सन्देश है यहां। 

इसलिए आपको कभी किसी ब्रह्म ग्यानी के समक्ष जाने का मौक़ा मिले -रुको बोलना मत। क्योंकि पूछना ही नहीं आता आपको। आपको पता ही नहीं है ,पूछना क्या है ?आपको यह तो पता ही नहीं हैं आपके प्रश्न क्या हैं दुविधा क्या है। आपकी शंकाएं क्या हैं विचार करो तौलो। दो चार पांच महीने पकाओ। 

गुरु जगा हुआ प्राणी है जागृत सत्ता है जिस दिन बुझे हुए दीपक का जले हुए दीपक से संपर्क होगा -प्रकाश होगा। 
एक भुना हुआ चना और एक कच्चा चना आपकी हथेली पे रख दें तो -कच्चा चना यदि रात भर पानी में भीगा  रहेगा तो उसका अंकुरण हो जाएगा। 
अन्न जल का कण और संत का क्षण व्यर्थ मत करो शास्त्र यह कहता है। 

गुरु ने राम से कहा आपके पूर्वज बड़ी कठिनाई से गंगा लेकर  आये हैं ,आइये गंगा का पूजन करते हैं :

 गंग  सकल मुद मंगल मूला ,

सब सुख करनी, हरनी  भव  शूला। 

     
सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )https://www.youtube.com/watch?v=kxb17bPyUpM

(२ )

LIVE - Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 28th Dec 2015 || Day 3


(३)


LIVE - Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 29th Dec 2015 || Day 4

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - Day 3(Part lV)

स्वभाव से जीतिए सबको प्रभाव से नहीं-

चरित्र से ही आप किसी को जीत सकते हैं अपनी सत्यनिष्ठा से ही आप सबको अपना बना सकते हैं।स्वभाव दिखाइए विनम्र बनिए। राम ने कोई प्रभाव नहीं दिखाया अपने  स्वभाव से ही ताड़का का तारण किया और वो सबके सब अनुयायी बन गए। वह समूचा सिद्ध -आश्रम निष्कंटक हो गया क्योंकि अपराधियों को अभय दान दे दिया गया   वे सब अनुयायी बन गए। 

राम पहली बार जंगल को निकले -वृक्षों पर लटकती हुई लताएं  तमाल के वृक्ष जम्बू तमाल पाकर रसाल ,तितलियाँ भ्रमर  फूलों पर मंडराते हुए।राम आह्लादित हैं वन में। 
आज पूरी दिल्ली सारे हमारे महानगर परेशान हैं  आज गौरैया कहीं नहीं हैं ,गिद्ध नहीं हैं ,जुगनू नहीं हैं तितलियाँ नहीं हैं भ्रमर नहीं हैं झींगुर नहीं हैं किसकी वजह से -मोबाइल टावर से निकलने वाली तरंगों  की वजह से -जिसने  गौरैयाओं   को मार दिया। अन्न  की पोषकता गई पुष्पों की गंध गई।अन्न की पाचकता गई सुरति गई सुगंध गई।  

राम पीछे -पीछे दौड़ रहें हैं मृगछौनाओं के। राम संतों सन्यासियों के दर्शन कर बहुत आनंदित हैं यहां वन प्रांतरों में सरोवर हैं उनमें में राजहंस हैं । और सहसा राम चकित से रह गए एक आश्रम को देखकर। अभी तक तो राम बहुत आह्लादित थे। लेकिन एक आश्रम ये इतना  सूना है यहां सरोवर तो  है  उसमें नीर नहीं है । आश्रम में एक भी  पंछी परिंदा वृक्ष नहीं है और एक शिला है जो सिसक रही है। रो रही है। राम परेशान है शिला कैसे रो सकती है सिसक सकती है ,पत्थर को आंसू कैसे आ सकते हैं ? 

आश्रम एक ,देख मग माहिं  

खग मृग जीव  जंतु तहँ  नाहिं ,

पूछा मुनि शिला एक देखि ,

सकल कथा मुनि कही विशेषी। 

यही तो शाप दिया था गौतम ने। और इसीलिए यहां वनस्पति नहीं हैं सुगन्धि नहीं हैं जीव जंतु नहीं हैं। 

कृन्दन चीत्कार करती रहना जो तूने वृक्ष लगाए हैं फलदार सब ठूंठ बन जाएंगे। जिन पंछियों को रोज़ चुगना देती है कभी नहीं आएंगे अब लौटके । तू शिला बनके यहां अकेली सिसकती रहना धूप में तप्ती रहना। तू देखने में तो चट्टान जैसे दिखेगी लेकिन तेरी सारी  संवेदनाएं मानुषी जैसी ही रहेंगी मानवीय ही रहेंगी।  तू धूप में तप्ती रहना वर्षा में भीगती रहना।ओस और धूप तेरी त्वचा को झुलस देंगे।  अपनों को ऐसा शाप देना इतना दुःख देना।इतना दुःख देता है कोई अपनों को। यही तो किया था गौतम ने। 

अहिल्या ने बहुत कहा मैं निरपराध हूँ निर्दोषी हूँ। वह हठी है -योगी। गौतम ने कुछ सुना ही नहीं वो कहने लगे -तुझे परपुरुष का स्पर्श ही नहीं पता चला यह कैसे हो सकता है ?अनिंद्य है अहिल्ल्या। 

अहिल्ल्या निर्गन्धा थी जिसने अपनी लालसाओं को कामनाओं को अपने वश में कर लिया था ।एक अलग ही ओज था उनमें। इसीलिए इंद्र भी उन पर मोहित था।

मनुष्य की तीन प्रकार की एषणाएँ हैं :

(१ )वित्तेषणा 
(२ )पुत्रेष्णा 
(३ )लोकेषणा 

अहिल्या ने तीनों को जीत लिया था। अनिंद्य सनातन सतोगुणी सौंदर्य था उनमें। जिसने अपनी एषणाओं को जीत लिया है उसके द्वार पर देवता दौड़े चले आते हैं। सिद्धियां उसका द्वार खटखटाने लगतीं हैं। अहिल्या ने काम जीत लिया था। पर -पुरुष का कभी ध्यान नहीं करतीं थीं अहिल्या। वो चाहिए भी नहीं। 
काम का अर्थ कुछ इन्द्रियों की गुदगुदी नहीं है। संसार की सब सुखद वांछाओं का नाम काम है। तो किसी ने इन्हें नियंत्रित कर लिया ,बड़ा सुन्दर लगता है वह आदमी। उसमें बड़ा आकर्षण आ जाता है बड़ा मोहक लगता है वह आदमी।

एक अलग प्रकार का विमोहन रहता है उसमें सब खींचे चले आते हैं। इंद्र ने एक बार उन्हें देखा तो सभी शची ,अप्सराएं उनके सामने लज्जित होने लगीं।

इंद्र का षड्यंत्र छलकपट मायाजाल 

 चाकर से कहा चंद्र से तू मेरा साथ दे। अर्द्ध रात्रि में कुकुट्ट बनकर मुर्गा बनकर बांग दे। भोर के स्वर पैदा करना मुर्गा बनकर। ऋषि की आँख खुल जायेगी। 

और ऐसा ही हुआ। और बड़े लज्जित हुए ऋषि। जानते हो कब लज्जित होता है ऋषि जब पूजा न कर पाए ,माला न फेर पाए।  नित्य नैमित्तिक पाठ न कर पाए। गौ ग्रास न निकाल पाए। जो सात्विक नियम हैं जब उनका निर्वहन नहीं होता अपराध बोध सालता है वह गिल्ट कुछ और किस्म की गिल्ट है। 

अरे !आज मेरी आँख क्यों नहीं खुली ,मैंने ऐसा रात  को क्या खा लिया ,किसका संग साथ कर लिया जो ब्रह्म मुहूर्त में  मेरी निद्रा न खुली।मैंने कौन सी ऐसी बात सोची है रात भर जो मेरी आँख नहीं खुली। हड़बड़ा कर उठे गौतम और एक वस्त्र लेकर  गंगा की ओर  भागे। 

और वैसे ही  गौतम की  कुटिया में इंद्र आये - वैसा ही उनका रूप आकृति ,वैसी ही भाषा   .छद्म गौतम बन गए इंद्र।

उन्होंने आवरण भंग किया। ,अपना कोई आवरण भंग करेगा तो कैसे करेगा। 'काम' योग का नाम है। भोजन लेना योग है। भोजन में भी जल में भी संयम शान्ति रखना है ,जल  चबाया जाए, औषधि बन जाएगा। हड़बड़ी में ध्यान कहीं और है बुद्धू बक्सा सामने है भोजन कर रहे हैं। ये भोग हो गया। निद्रा योग का नाम है सांस लेना भी योग का नाम है। 

गौतम मुख  पर से आवरण कैसे भंग करेंगे -जिस तरह से छद्म गौतम ने आवरण भंग किया वह सहम गईं उठके बैठ गईं और जिस वक्त इंद्र ने उनका हाथ छूआ उनके सारे शरीर में अग्न दौड़ ने  लगी। 

उधर गंगा किनारे गौतम को लगा कोई छल  हुआ है चन्द्रमा धीरे से प्रकट हो रहा है मुर्गे में से और इंद्र हाथ छू रहा है अहिल्या का  -

सहसा स्वामी पति गौतम द्वार पर -वह नैनों में गौतम के देख कर पहचान गईं अपने स्वामी को।  

इंद्र के हाथ में कम्पन है।अब तेरा इन्द्रत्व गया। कोई नहीं बचा सकता ऋषि कोप से। 

 इंद्र तू कोढ़ी हो जाएगा तेरे सारे अंग गल- गल कर गिरेंगे-गौतम शाप देते हैं।  

क्रोध से मारक कोई और हिंसा नहीं है। स्त्री पर जो स्वामित्व है यह  पशु भाव है आपका -यह मेरे अधीन हैं वैसे ही नाँचेगी जैसे मैं चाहूँ। जब आप वर्चस्व के अधिकार में हैं और इसे कोई छीन रहा है भीतर का  पशु जग जाता है तब । गौतम ने इतना  भयानक शाप दे डाला। वे शाप देते जा रहें हैं अहिल्या चीखती जा रही हैं । वह कहती है मैं सब सह लूंगीं मेरा त्राण का उपाय भी तो करो ये कौन बताएगा स्वामी मैं  पवित्र हूँ। कौन प्रमाणित करेगा मैं निर्दोष हूँ। आप तो मानते नहीं। 

पति तो पवित्रता का प्रमाण माँगता है। कौन प्रमाणित करेगा के मैं पवित्र हूँ मेरा उद्धार कौन करेगा।तब सहसा उनके भीतर की करुणा जगी और वह यह कह गए - 

जब इस गली से राम निकलेंगे तो उनका ध्यान तेरी तरफ जाएगा। ईश्वर ही प्रमाणित कर सकता है हमारी निरपराधता को। बरसों से भीगती वह शिला -जब राम उधर से गुज़रे उनका ध्यान गया उस पर -चट्टान सिसक रही है। 

गुरु ने कहा  यह गौतम नारी है आपके चरण की रज चाहतीं है। गुरु की आज्ञा है राम सकुचाते हैं यह ब्राह्मणी है मैं चरण रज कैसे डालूँ। 

मेरी आज्ञा है उठा अपना पैर कहा  गुरुदेव ने -और जैसे ही भगवान के चरणों की धूल गिरी वह शिला कल्याणी हो गई। वह पाषाणी कल्याणी हो गई। 

गौतम नारी शाप वश उपल देह  धर -धीर ,

चरण कमल रज चाहती कृपा करो रघुवीर। 

अति प्रेम अधीरा -

राम ने कहा तो पूज्या है पवित्रा है ,पतिव्रता है। मैं प्रमाणित करता हूँ और जा -तू निर्वाण को उपलब्ध होगी। उसने कहा न मुझे तेरा धाम भी नहीं चाहिए मुझे मेरा पति जैसा भी है उसका साथ चाहिए -वे तिल - तिल मर रहें होंगे उन्होंने कभी इससे पहले क्रोध नहीं किया था। क्रोध के बाद खुद का पता नहीं रहता व्यक्ति बिखर जाता है। क्रोध के बाद फिर से पूरा अपने को समेट भी नहीं पाता। क्रोध विजातीय है वह भीतर रहना भी नहीं चाहता। कोई चोबीस घंटों रह कर दिखाए क्रोध में। 

प्रेम में व्यक्ति 24 x 7 रह सकता है क्रोध में नहीं भले वर्ल्ड रिकार्ड बना के दिखाए कोई । स्त्री के सकल व्रत का फल अन्य को मिलता है उसके परिवार को भाई को पुत्र को ,पति को मिलता है। यह भारत की नारी ही  है। जो भगवान् से भी अपनों का सुख मांगती है स्वयं का मोक्ष नहीं।   

 और फिर अति आद्र होकर अहिल्या ने कहा था -स्वामी मुझे मेरी मुक्ति का तो मार्ग बता दो। 

दिन भर कोई आपसे न बोले तो पत्थर जैसे हो जाओगे। बुत बन जाओगे।प्रेम अपनों से चाहिए दूसरों से नहीं। संवेदनाएं  अपनों  से ही  चाहिए। दर्द भी हमारे अपनों से हैं। हमारी कोई प्रसन्नता है तो अपनों से है। दुःख दर्द में अपने ही याद आते हैं।     

 सन्दर्भ -सामिग्री :


(१)LIVE - Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 28th Dec 2015 || Day 3
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मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - Day 3(Part lll )

वशिष्ठ जी दशरथ जी से कहने लगे न, न ये मुझसे न होगा। जिनको वेद भी न जान सके ,नेति नेति कहकर रह गए मैं उनका नाम नहीं रख सकता। दशरथ जी कहने लगे ये तो आपकी  महानता है आप ऐसा कह रहें हैं ,आप तो साक्षात वेद मूर्तिं हैं ,आपके लिए असम्भव क्या है।वशिष्ठ जी की आँखों में आंसू छलछला आये हैं। वह देखते हैं सन्यासियों की पंक्ति में स्वयं शिव खड़े हैं ब्राह्मणों की  पंक्ति में ब्रह्मा जी खड़े हैं सेवकों की पंक्ति में स्वयं इंद्र खड़े हैं देव पुत्रियां ,अप्सराएं ,सुबालाएँ जिस को जहां जगह मिली है वह वहीँ खड़ा हुआ है सब जानता चाहते हैं सबको औत्सुक्य है यह जान लेने का भगवान् का क्या नाम रखा जाता है।

वैसे वेद ने भगवान् का पहला नाम कवि बतलाया है -जो कल्पना करता है मैं एक से अनेक हो जाऊँ ,वह सर्जक है ,सृजनकर्ता है ,कवि है।   

वशिष्ठ ने धीरे से भगवान् के चरण छूते हुए कहा-गंगा यहीं से निकलीं हैं और बहुत साहस करके भगवान् की नाभि का स्पर्श करते हुए बोले -ब्रह्मा जी इसी नाभि कमल से प्रसूत हुए हैं। फिर और ज्यादा साहस समेट कर भगवान् का  वक्ष स्पर्श करते हुए बोले यहां दुर्वासा की लात के स्वस्ति चिन्ह अभी तक अंकित हैं भगवान् कितने दयालू हैं। 

इनके नाम अनेक अनूपा ,

सो सुख धाम नाम अस रामा। 

मैं इनका नाम कैसे रखूँ -सभी नाम और रूप इन्हीं के तो हैं इनमें बस एक ही बात है इनमें निरंतर वैभिन्न्य हैं मैं कोई एक नाम इनका कैसे रखूँ -गुरु वशिष्ठ मन ही मन सोच रहे हैं। 

राम शासक भी हैं प्र-शासक  भी हैं उपासक भी हैं।मैं इनका कोई एक नाम कैसे रखूँ -ये तो सनातन ब्रह्म हैं। राम का शासन प्रेम से होता है। इस धरती पर प्रेम से ही आप शासन कर सकते हैं।  

जीव की पहली एषणा सुख पाने की है।सारा संग्रह ,सारा   भंडारण  हमारा किसलिए है ?पदार्थ का संग्रह क्यों है इतना ?सुख पाने के लिए ही तो है।सुख पदार्थ सापेक्ष नहीं है। 

 सुख और   प्रसन्नता ज्ञान सापेक्ष है ,चिंतन सापेक्ष है. स्थाई प्रसन्नता वैराग्य से आएगी। तो कोई जीव यह जानना चाहें के सुख कहाँ है तो सुख राम नाम में है।  

सुख राम नाम में है। 

सीता जी आत्म  हत्या  करने पर उतर  आईं ,राम के वियोग में वह इतनी  त्रस्त  हो गईं अब राम नहीं आएंगे ,मैं भी सती  की तरह भस्म हो जाऊंगी।देह त्याग दूंगी।  तब अचानक एक नाम उनके कान में पड़ा। पुनरुक्ति करने लगीं वह ,आनंद में डूब गईं। 

रामचंद्र गुण बरनहिं  लागा ,

सुनते ही सीता कर  दुःख भागा। 

हनुमान ने कहा ये तो अग्नि कुंड  तैयार कर रहीं हैं लकड़ी बीन समेट कर।  आत्मदाह के लिए तैयार हैं।  तब उन्होंने राम के गुणों का बखान किया जिन्हें सुनकर सीता जी संताप मुक्त हो गईं । 

ईश्वर अंश जीव अविनाशी ,

चेतन अमल सहज सुख राशि। 

अपने स्वरूप को देख अखिलानंद है परमानंद है ये । आनंद ही आनंद है किस दुःख की बात करता है। बुद्ध और उनके अनुयायी संसार में दुःख ही दुःख देखते हैं। आदि शंकराचार्य कहते हैं किस दुःख की बात करता है निज स्वरूप को देख -सच्चिदानंद है वहां -आनंद ही आनंद है।जब कभी दुःख आये तो राम को याद करना। आवरण को नहीं निज स्वरूप को देख। देह को संसार को मत देख ये तो निंदनीय है ही और इसमें है भी क्या मल मूत्र के अलावा। 

राम के नाम को जपने का जो फलादेश है वही ॐ को जपने का है। राम में रकार है ,अकार है और मकार है। रा कहते ही मुंह खुलेगा और म कहते ही बंद  हो जाएगा। ऐसा ही ॐ के उच्चरण में होगा।  
राम तारक मन्त्र है जिसकी जिभ्या के  अग्र  भाग पर यह मन्त्र (यह नाम ) नाँचता रहता है वह दोबारा जन्म नहीं लेता। -जीव जगत और जगन्नाथ का यही भेद है यही अंतिम ज्ञान है पार्वती और ये मुंड माल जो मैं धारण किये रहता हूँ यह किसी और की  नहीं तुम्हारी  ही है। सृष्टि का अंतिम ज्ञान जान लोगी तो दोबारा देह को भस्म नहीं करना पड़ेगा और वह महामंत्र ,गुरु मंत्र राम है।यही कहा था शिव ने पार्वती से बार बार उनके सृष्टि का भेद क्या है पूछने पर।  

राम सनातन सत्य है मंत्र है। आश्चर्य में भी ,कौतुहल में भी ,किसी दुष्ट पुरुष की अधमता को देखकर भी किसी अत्यंत निकृष्ट प्राणी को देख कर भी उसके अति निकृष्ट कृत्य को देखकर भी और हमारे  मुख से निकलता क्या है -यही राम राम राम ही तो निकलता है विभिन्न भावों के साथ । प्रसव की पीड़ा के समय भी यही नाम प्रसूता के मुख से निकलता है और अर्थी के साथ शवयात्रा में भी यही नाम जाता है -राम नाम सत्य है सत्य बोलो गत्य (गति )है। मजदूर जब माथे का पसीना पौछते हुए सुस्ताने बैठता है तो उसके मुख से भी यही शब्द निकलता है- हे! राम।

तो राम एक मंत्र है।महामंत्र है।  

राम और भरत में रूप साम्य इतना है के बचपन में ये दोनों आपस में बदल जाते थे। केवल आँखों से भेद पता चलता है। भरत की आँखों में दासत्व का नित्य ही एक सेवक का भाव है। किम करोति  अपेक्षति -मुझे क्या करना है मेरे लिए क्या आज्ञा है जैसे पूछ रहे हों। आज्ञा की उत्सुकता है जिनकी आँखों में वह भरत हैं।सेवकत्व है जिनमें वह भरत हैं। 

परिये प्रथम भरत के चरना ,

जासो नियम व्रत  जाए न बरना।

 भरत कभी भी नियम नहीं तोड़ते। तुलसीदास कहते हैं यदि मुझसे पूछा जाए पहले पूजा उपासना किसकी करोगे तो मैं कहूंगा -भरत. जो मन क्रम वचन से एक हैं वह भरत हैं धर्म का सार हैं। जिनमें सन्यासत्व और निरंतर वैराग्य है वह भरत हैं। 

भरत तो धर्म का सार ही हैं -मनसा वाचा कर्मणा एक ही हैं।  

और जिनके नेत्रों में गाम्भीर्य है औदार्य है स्वीकृति है वह राम हैं।सबको अपना बनाने के लिए जो भाव है जिनके नेत्रों में -वह राम हैं।नेत्रों में देखने से ही दोनों का भेद पता चलता था इनके बचपन में।  

जो अपनी उपलब्धियों में दूसरों को यश दे दूसरों को कारण माने ,यश दे वह शत्रुघ्न  है।जो सबको प्रेम देता है करुणा देता है।मान सम्मान आदर देता है शत्रुघ्न  है।जिस की वाणी वेद वाणी है जो वेदों के मर्म को जानता है वह शत्रुघ्न है।   

जाके सिमरन से रिपु नाशा 

नाम शत्रुघन वेद प्रकाशा। -------

जो अपने शत्रु का पहचानकर पहले उसका हरण करता है।उसका निवारण कर दे वह  निर्वैर है।शत्रुघ्न है। हमारा आलस्य ,हमारी जड़ता वही हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। जो इस जड़ता का प्रमाद का  नाश कर दे वही शत्रुघ्न है।  

जो साक्षात वेदमूर्ती है ,ज्ञान मूर्ती है शांत है ,सौम्य है ,विनम्र है ये निरंतर आज्ञा का पालन करेगा। ये बालक शत्रुघ्न है यही नाम रखा था वशिष्ठ जी ने क्रम भंग करते हुए सबसे छोटे बालक का । 

सुमित्रा से कहा था राम और भरत के नामकरण के बाद -सबसे छोटे बालक को लाओ -सुमित्राजी ने गौरांग लक्ष्मण  जी को आगे कर दिया वशिष्ठ बोले ये नहीं इसे बाद में पहले सबसे छोटे को लाओ।सबसे छोटे के नामकरण के बाद - 

जब गौरांग बालक को सुमित्रा ने आगे किया वशिष्ठ जी उसे अपने अंक में भर कर उसका माथा चूमते रहे उसे अंक से लगा लिया। उसकी हथेलियों पर चुम्बनों की बौछार कर दी। बोले ये बालक सब लक्षणों का धाम है।जितने भी शीर्ष श्रेष्ठ गुण हैं सब इस बालक में हैं।  राम सबके बिना रह सकते हैं इसके बिना नहीं ये बालक तो राम की शैया है।हाँ एक बार को राम सीता के बिना रह सकते हैं मातापिता के बिना भी रह सकते हैं लेकिन  लक्ष्मण के बिना नहीं रह सकते। 

और ऐसा कई बार हुआ है जब लक्ष्मी जी विष्णु जी को छोड़कर चली गईं हैं लेकिन लक्ष्मण जी कभी राम को  छोड़कर नहीं गए। एक बार विष्णु जी ने लक्ष्मी जी से जब पूछा तुम मुझे छोड़कर क्यों चली गईं। बोली लक्ष्मीजी आप तो सोते रहते हैं मैं उद्यमी के पास ही रहती हूँ। तब से भगवान् फिर उतना कभी नहीं सोये। एक बार सोये थे तो उस निद्रा में से मधु -कैटब निकल आये। 

 लक्षणधाम रामप्रिय ,सकल जगत आधार ,

गुरु  वशिष्ठ  ने राखा लक्ष्मण नाम। 

भजन किसे कहते हैं -भज सेवायाम। 

भजन क्या है ?गीत गाने का नाम भजन है क्या ?उसकी कायनात की सेवा वृक्षों ,पक्षियों जीव जलाशयों की सेवा भजन है । इसलिए राम इसे प्रेम करते हैं  और ये अपने को शिशु मानता है। अबोध शिशु ,नवजात शिशु मानता है अपने को। इसलिए गुरु ने इसका नाम लक्ष्मण रखा।

गुरु  वशिष्ठ ते राखा लक्ष्मण नाम  उदार। 

और अब आइये गुरु के गृह चलते हैं -

गुरु गृह गए पढ़न  रघुराई ,

 अल्प  काल विद्या सब पाई। 

गुरु के आश्रम में अमात्य ,साहूकारों कृषकों के बालकों के बीच में ही राम भी बैठकर पढ़ते हैं । उसी  बिछौने पर पल्लवों का बिछौना जिस पर सब बालक बैठते हैं । शिष्य के पास एक ही चीज़ होनी चाहिए -श्रद्धा। 

श्रद्धावान लभते ज्ञानम्। 

गुरु के पास जो कुछ भी है उसका वह अधिकारी बन जाता है  श्रद्धा से । । गुरु ने एकांत में आसन पर बिठाया और ब्रह्म ज्ञान की दीक्षा दी राम को। 

गुरु ने कहा मैं एक ज्ञान केवल राम को दूंगा और वहां से शेष सभी को हटा दिया -लक्ष्मण को ,भरत ,शत्रुघ्न को। 

विश्वामित्र का उद्धरण आता है एक बार विश्वामित्र नंगी तलवार लेकर वशिष्ठ जी की हत्या करने उनके आश्रम में गए :

अरुंधति वशिष्ठ जी से कहतीं हैं ऐसा आह्लाद ऐसा माधुर्य मैंने आश्रम में पहले कभी नहीं देखा। आज लगता है झड़े हुए पीले पाँतों को भी उठाकर चूम लूँ। मुझे अपने आश्रम के आँगन की धूल अपने माथे से लगाने को क्यों मन करता है ?मुझे हर चीज़ अति मोहिनी ,अति उदात्त ,भगवदीय लग रही है। आनंद मुझसे संभाले नहीं सम्भल रहा है हमारा घर तीरथ हो गया हिमालय हो गया। ऐसा मुझे क्यों लग रहा है ?हमारे पेड़ ये देव आत्मा  दिख रहे हैं परमात्मा दिख रहे हैं।

जानती हो ऐसा क्यों हैं ?ये विश्वामित्र की तपस्या का फल है। उनका तप इतना बड़ा हो गया है। अरुंधति कहतीं हैं मुझे ले चलो उन ऋषियों के पास मैं उनकी चरण रज लेना चाहती हूँ।

अरे ये तो एकांत में भी मेरे गुण  गा  रहे हैं और मैं इनकी हत्या करने आया था। उनके हाथ से खड्ग गिर गई। 

अध्यात्म अश्त्र को छीन लेता है। इस धरती को आध्यात्मिक बनाइये युद्ध उन्माद अपने आप कम हो जाएंगे। 
जिसे चिंता रहती है अवसाद रहता है वह अपने घर में एक पुस्तक योग-वशिष्ठ ले आये। यागावशिष्ठ ले आये। नित्य उसे पढ़े जिसमें भगवान् और वशिष्ठ ऋषि के संवाद हैं। ब्रह्म के और उस गुरु के क्या संवाद हुए इसे पढ़कर आपके घर के सारे अभाव दुःख दैन्य दूर हो जाएंगे। अद्भुत  ग्रन्थ है वह।

गुरु गृह गए पढ़न रघुराई 

अल्प काल विद्या सब पाई  . अल्प काल का अर्थ है श्रद्धा से भरा हुआ अंत :करण  है विद्या अपने आप आ जायेगी।

रावण ने मारीच ,सुबाहु ,ताड़का आदि को भेजा था जहां अस्त्र शस्त्र का भण्डार है। सिद्ध आश्रम है। युद्धशाला है जहां अस्त्र शस्त्रों का निर्माण होता है सारा अध्ययन  है जहां उसे नष्ट करने वहां व्यवधान पैदा करने ताकि ऋषियों का ध्यान भंग हो भय पैदा हो उनके अंदर। भय होगा तो ध्यान नहीं लगेगा।ध्यान नहीं लगेगा तो अनुसंधान नहीं होगा। राम को सारे अस्त्र ऋषियों ने दिए है अस्त्र विद्या ऋषियों ने सिखाई है। और यह सब बहुत सायलेंट होना चाहिए किसी को पता नहीं लगना चाहिए।ऐसी हिदायतें देकर रावण ने दूत दूतियों को भेजा था सिद्ध आश्रम।  

प्रतिभा भय ग्रस्त व्यक्ति की  घटने लगती है भय एकाग्रता को छीनता  है।प्रतिभा को कुंद करता है। 

विश्वामित्र जिस  ढ़ंग  से  बढ़े चले आ रहे हैं। आज कुछ मांगने आ रहे हैं । याचक की भूमिका में हैं । अयोध्या की तरफ़  बढ़े चले आ रहे हैं। विश्वामित्र सतो गुण है ताड़का तमो गुण है और तमो गुण ऋषियों को परेशान करता है।

राम चाहिए मुझे दशरथ से कहने लगे विश्वामित्र।मुझे एक राजपुत्र चाहिए जिसे देख कर वह ठीक हो जाएँ। मुझे चाहिए राम और लखन। जब राजपुत्र जाएगा तो ये सन्देश जाएगा राजपुरुष तैयार हो गए हैं और राम सिर्फ राज पुरुष नहीं हैं। सिर्फ राजा नहीं हैं अवतार हैं। राक्षसों का विनाश करने आये हैं। 

एक ही बाण प्राण हर लीन्हां ,

दीन  जान निज पद दीन्हां।

भगवान् के एक ही  बाण ने ताड़का के प्राण हर लिए उसका त्राण कर दिया। तारण कर दिया ये जानकर ये तो दूती है एम्बेसेडर है भगवान् ने उस पर करुणा कर दी। 
मारीच को दूर भेजा था एक ही बाण से सन्देश दे देना रावण  को मैं आ गया हूँ। मारा नहीं है मारीच को करुणामय करुनानिधान राम ने सौ योजन दूर फेंका है बस -अपने बाणों से। 
श्याम गौण सुन्दर दोउ भाई ,

विश्वामित्र महानिधि पाई। 

भगवान् की करुणा से ही सारे शस्त्र गिर गए। स्थविर : अरे ठहर जा मैं तो ठहरा हुआ हूँ तू भी तो ठहर जा। ये एक ही शब्द तो गया था कान में अंगुलिमाल के बुद्ध का और उसके हथियार वहीँ गिर गए। हिंसा सारी  समाप्त हो गई।
चरित्र से स्वभाव से आप सारे संसार को जीत सकते हैं प्रभाव से आप ऐसा नहीं कर सकते। 

स्वभाव दिखाओ सब लोगों को अपना ,स्वभाव से जीतो सबको राम ने कोई अपना प्रभाव नहीं दिखाया -स्वभाव से ही सबको जीता। स्वभाव से ही ताड़का का तारण और वह सारा सिद्ध -आश्रम निष्कंटक हो गया। क्योंकि अपराधियों को अभय दान दे दिया वे अनुचर बन गए। (ज़ारी ...)   

  सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )

LIVE - Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 28th Dec 2015 || Day 3

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(२ )


3:25:43

LIVE - Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 28th Dec 2015 || Day 3


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