मंगलवार, 24 मई 2011

"पढ़े लिखे समाज में ."

यूनिवर्सिटी कैम्पस के इस क्वार्टर में किसी ने कई दिनों से आवाजाही नहीं देखी थी .किसी को फ़िक्र भी नहीं थी .अचानक कई दिनों बाद आसपास के क्वार्टरों तक बू आनी शुरू हो गई थी .इसकी भी अनदेखी की गई थी .कुछ दिनों बाद इधर से लोगों ने आना जाना भी बंद कर दिया .भला हो उन छात्रों का जो बे -चैन हो उठे थे .एक दूसरे से बतियाते हुए इधर ही आरहे थे .सर को इधर यार काफी अरसे से नहीं देखा .कुछ तो बात है ज़रूर .और इसी कशमकश में वे इसी क्वार्टर के नज़दीक आते आते ठिठक गये थे .हालाकि दुर्गन्ध की वजह से आगे बढना करीब करीब नामुमकिन सा ही हो गया था .फिर बढ़ते रहे थे और जैसे अनहोनी की आशंका साफ़ थी दरवाज़ा तोड़ दिया था ।
लाश सर की ही थी जो डिस -इन्टीग्रेट हो चुकी थी ।फफक फफक के रो पड़े थे सबके सब .
कहतें हैं सर ने घर में एक खाई सी ही बना ली थी .आखिरी दिनों में खड़े होकर जन गण मन कहने लगे थे .खाने पीने की तो हफ्तों से शायद सुध ही नहीं थी ।
इन युवा छात्रों के आते ही आसपास सन्नाटा ज़रूर पसर गया था लेकिन फुसफुसाहटें मुखरित थीं ।
देखो -कितना मान गुमान था इस आदमी को अपने पर और हो भी क्यों न आखिर अगला डेनियल जोन्स का शिष्य रहा था .अंग्रेजी उच्चारणों का माहिर था . हिंदी संस्कृत फ्रेंच में भी महारत हासिल थी .श्रृंगार से हटकर पर्यावरणी दोहे भी इस आदमी ने लिखे थे ।
ये तेजाबी बारिशें बिजली घर की राख ,
एक दिन होगा भू -पटल वार्णा -वर्त की लाख .
नाम था के .सी .राठी यानी कैलाश चंद राठी लेकिन लिखते थे -कैलाश राठी विशाल .ये आदमी काया से ही नहीं दिमाग से भी विशाल था ।
एक छोटी सी बीमारी ने जिसे कहतें हैं -बाई -पोलर इलनेस इसका हाल बे -हाल कर दिया था .पत्नी और एक बेटा गाँव में रहते थे .शक का लक्षण हावी रहता राठी साहब पर .कहते बंधू मेरा सारा काम चोरी हो चुका है ,छपके पुरुस्कृत भी हो चुका है .और मैं बे -खबर हूँ .तुम इतना अच्छा सा लिख लेते हो .विज्ञान के आदमी होते हुए कितनी दिलचस्पी और जानकारी रखते हो साहित्य की .एक हमारे ये बूदम हैं ।
तुम स्साले एक आलेख हमारी तारीफ़ में नहीं लिख सकते .राजेन्द्र माथुरजी के देहावसान पर नव भारत टाइम्स में प्रकाशित तुम्हारा पत्र व्यक्ति चरित की एक अलग आंच लिए हुए था ।
मैंने मज़ाक में तब कहा था -जब तुम शरीर पूरा करोगे ज़रूर लिखूंगा ।
मुझे क्या पता था वह शरीर विखंडित हो जाएगा .यूं चला जाएगा यह धुरंधर अनाम .गुमनाम ।लेकिन शायद'" पढ़े लिखे समाज" में ऐसा होना अनहोनी नहीं है .
हम तो शहर में ही नहीं थे अवकाश भुगताने गए हुए थे लौटे तो इस हादसे से बाखबर हुए थे ।
दो कदम भी उनके पीछे पीछे न चल सके .शिष्य भाव से जब तब उनसे क्या नहीं सीखा था .वह दौर जब हम आरोग्य समाचार लिखते थे "दैनिक हिन्दुस्तान "के लिए तमाम राष्ट्रीय ,आंचलिक अखबारों में हमारी विज्ञान रपटें प्रकाशित होतीं थी .विज्ञान पत्रिकाओं में शीर्ष स्थान बनाए हुए थे हम .कंधे थे हमारे पास तब राठी साहब के .आज कुछ भी नहीं है एक मलाल है काश हमें तब पता होता -राठी साहब मेनियाक फेज़ में थे बाईपोलर डिस -ऑर्डर की .

5 टिप्‍पणियां:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

आज और कल में यही तो अन्तर है,

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

कोई भी मानसिक बीमारी जब उग्र-रुप धारंण कर लेती है...तब अंजाम ऐसा ही या इसीसे मिलता जुलता सामने आता है!...कहानी द्वारा बहुत अच्छी जानकारी आपने उपलब्ध कराई है..धन्यवाद!

Vivek Jain ने कहा…

उफ......
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

ved parkash ने कहा…

दुख होता है राठी जैसे पढे लिखे इंसान के ऐसे चले जाने पर,,,,,,,,,,,,,,,,,अच्छा लिखा आपने

veerubhai ने कहा…

डॉ अरुणा -जी ,वेदजी ,संदीपजी ,जैनसाहब,आप सभी का शुक्रिया तहे दिलसे हौसला अफजाई के लिए .