सोमवार, 23 मई 2011

ये पुत्र वधुएँ .

ये ध्यान और आपकी तवज्जो चाहने वालीं ,अटेंशन सीकिंग पुत्र वधुएँ आखिर हैं किसकी सगी ?नाम इनका कुछ भी ही हो सकता है काम सबका एक ही है ,घर में झंडे गाड़ना ।
समाज के निचले पायेदान से उठकर स्त्रीत्व धरोहर चुकता भुक्ता कर एक झटके से ऊपरले पायेदान पर आ पहुंचतीं हैं,पुत्र वधुओं की ये ज़मातें ,नस्ल या स्पीशीज .यूं ये डिग्री शुदा होतीं हैं लेकिन पढ़ा लिखा गुना भी हो यह ज़रूरी नहीं है .इसलिए गुनी जन कह्गये हैं पढ़े से गुना (गुणी)ज्यादा अच्छा होता है .पत्नी पद पाते ही ये अपना दर्ज़ा पति से एक दर्जा ऊपर करके उस पर ग़ालिब हो जातीं हैं ।
पति -खानदान तो फिर है किस खेत की मूलीहै इनके लिए .दीगर है ,इनके जीवन से यदि पति नाम की संज्ञा को हटा दिया जाए तो शेषांक शून्य ही आयेगा .
पुत्र प्राप्ति पर ये सफेदे के पेड़ से ऊपर निकल जातीं हैं .जैसे पुत्र प्राप्ति भारत रत्न जैसा कोई अलंकरण हो .पारिवारिक धरोहर की सारी आब ,आबरू और उर्वरा शक्ति को ,रचना शीलता को ये गन्ने की पोई सा निचोड़ के फैंक देती हैं ।
जिस सीढ़ी पे चढ़के ये शिखर पर पहुंचतीं हैं उसके सारे पायेदान ये एक एक करकेतोड़ देतीं हैं .यही इनका संत्रास ,हीन भावना और अ-सुरक्षा बोध है .जो बरस -दर -बरस बदस्तूर कायम रहता है ।
इनके रहते स्वगत कथन शैली में घर का कोई भी बुजुर्ग बुदबुदाता दिखलाई दे सकता है -"तुम यह सोचती हो हमारा पौत्र हमारी फुसफुसाहट से जाग जाता है ,यह क्यों नहीं सोचतीं तुम्हारी गोद में बच्चा सो क्यों नहीं पाता,क्यों उसे गहरी नींद नहीं आती .हम तुम्हें बतातें हैं बच्चा लोरी पसंद करता है कर्कशा वाणी नहीं और लोरी के लिए एक परम्परा चाहिए जो तुम्हारे पास नहीं है ।"
अब न मैं रीझता हूँ न खीझता हूँ ,
तटस्थ रहता हूँ ,
जानती हो क्यों !
मेरे पास एक ब्लॉग है -
तुम निहथ्थी हो -
यूं कहने को तुम्हारे पास एक पति है जिसकी आंच तुम कभी की बुझा चुकी हो ,
अब वह तुम्हारी कांख में दबा हुआ मरा हुआएक चूजा है ,
अकसर तुम्हारी जांघ की दराज़ में पड़ा हुआ श्रान्ति दूर करता ।
हमारा मानना है जब कुपात्र को अधिकार मिल जाता है तब ऐसा ही होता है ,पुत्र वधुएँ ये भूल जातीं हैं ,उनका पति उनके ससुर का ही विस्तार भाव है ,जो निश्चिंतता दादा की छाँव में होती है उससे ये अनभिज्ञ हैं .कृतिघ्न जो ठहरीं .किराए के मकान में रहतीं हैं और मालिकाना भाव पाले रहती हैं .२५ वाट की रौशनी में गुज़र करने वाली ये नागारियाँ जबसे २०० वाट के उजाले में आईं हैं इनका दिमाग भन्नाया हुआ है आँखें चौंधियाई हुईं हैं .मायोपिया ग्रस्त हैं ।
इस किस्म की तमाम पुत्र वधुएँ व्यक्ति नहीं विचार हैं ,मानसिकता हैं ,पुत्र वधुओं की एक परिवार रोधी नस्ल हैं ।
(ज़ारी ...)

3 टिप्‍पणियां:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

क्या बात कही है आपने, कमाल कर दिया है,

ved parkash ने कहा…

SHARMA JI PANGEEEE THEK NHINNNNN..........RAHNE DOOOOOOOOOOO

ved parkash ने कहा…

PUTRE VADHU HE AAB SAHARA HAI
BETA KHUD BEECHARAA HAI....