गुरुवार, 26 मई 2011

ऐसे थे जगदीश मामा .

कहने को वो हमारे मुंह बोले मामा थे .नानी की तरफ से कहीं रिश्ते में आते थे लेकिन सबको बहुत प्यारे थे वह मुंहबोले मामा .उनका एक फटो -ग्रेफ उस दौर का हमारे घर के एक आले में सजा रहता जब वह फौज में थे .हाथ में बन्दूक लिए बैठे थे वे घुटनों के बल .एक दम से मुस्तैद ।
अम्मा बतातीं थीं इनके बाप ने अपनी बहु से ही रिश्ता जोड़ लिया था .मामा चाहते तो वह गोली घर में भी चला सकते थे लेकिन उन्होंने अपना पुत्र धर्म निभाया और चुप- चाप फौज में भर्ती हो गए .
उनकी टांग में गोली लगी थी सीमा पे लड़ते हुए और वह फौज की नौकरी छोड़ कर बुलंद शहर हमारे घर चले आये थे .हमारी नानी के घर .हाँ हमारा लालन पालन भी यहीं हुआ था .लेकिन उस दौर की हमें कोई स्मृति नहीं .अम्मा बतातीं थीं ,जगदीश मामाजी हमारी दवाएं बेचने लगे थे .बस में चढ़ कर उलटी उलटी आवाज़ लगाते आँखों का मंजन और दांतों का सुरमा लेलो और अच्छी खासी बिक्री कर लाते थे .दादा का नाम बिकता था जिनके नाम से फार्मेसी थी .पेटेंट चीज़ों की अपनी साख होती है ।
उस दौर में हम स्कूल में ही पढ़ते थे मामा जब भी आते ढेर सारे चीनी मिटटी के खिलौने लेकर आते ,झांसी ,ग्वालियर ,इटारसी तक मेरठ स्टील स्प्रिंग्स की धाक थी .माल सप्लाई करके लौटते तो पहले बुलंद शहर आते .फिर कहीं मेरठ जाते ।
लम्बे कद के थे जगदीश मामा ,गोद में उठाते और हमें कहते -भाई साहब !यह आत्मीय संबोधन हमारे हिमोग्लोबिन में उन्होंने बचपन में ही घोल दिया था ।
दूसरे को सहने का ,संबंधों को निबाहने का एक जो ज़ज्बा उनमें था ,वह हमने फिर कभी नहीं देखा .उनके रिश्तों का दायरा बड़ा विशाल और विकसित था .छोटों की गलती को ज़ाहिर नहीं होने देते थे छोटों पर उनके प्यार से एक बार तब डर लगने लगा था जब दो दिन पहले हममेरठ में मामा की बुआ के घर में थे आते वक्त वहां से एक पैन उठालाये थे ।
मामा पता नहीं कैसे दो दिन बाद ही बुलंद शहर चले आये थे .हमें गोदमे भाई साहब कहते हुए उन्होंने उठालिया था .पैन हमारी जेब में ही था .उस दौर का कीमती पैन रहा होगा ,.मामा ने पूछाये पैन भाईसाहब आपका है , यह पैन तुम्हारा है .हमने झूठ बोल दिया डरते हुए ,गर्दन हाँ में हिलादी .बोला कहाँ गयाथा उनके प्यार के आगे ।
माँ ने उनकी दूसरी शादी करा दी थी .बरसों बाद एक लडका हुआ था ,फिर दूसरा भी .डिलीवरी कराने अम्मा ही गईं थीं हम जब तब उनके साथ चले जाते .मामा ढेर सारी गर्म जलेबी लाते ,जलेबा भी होता ,शुद्ध देशी घी की जलेबियाँ जब थाल में डालते तो थाल भर जाता .हम खूब खाते ।
मामा के लाये हुए खिलौने ,जलेबी हमें सब कुछ आज भी याद है .जोड़े में से एक चीनी मिटटी का बना शेर टूट गया था हमने बरसों बरस उसे संभाल के रखा था ।सागर पढने गए तो वह शेर भी हमारे साथ था .जब टूटा बड़ा दुःख हुआ .
मामा हमेशा ज़िन्दगी में किसी बड़ी बात को लेकर जिए उनके रिश्तों का दायरा बहुत खुला खुला बहुत अपना सा होता ।
मामा जहां भी सच्चा प्यार मिला वहीं का होके रह गए . माँ उनसे हमारे सगे मामा से भी ज्यादा प्यार करतीं .व्यक्ति को प्यार के अलफ़ाज़ चाहिए .कोई बात सुनने वाला चाहिए .शायद इसीलिए मामा लौट लौट के बुलंदशहर चले आते थे .हरेक टूर के बाद यहाँ आना उनके लिए गंगा स्नान सा था .आते प्रेम की गंगा बहाके चले जाते .अम्मा तीज त्यौहार उनके माथे पे टीका करतीं .उनके विशाल माथे पर बहन का टीका ज्यादा ही शोभता .एक बंडी(जेब वाली बनियान )पहनते थे मामा .सफर के दौरान उसी में रकम रखते थे .जाते तो हमें भी रुपया दो मिलता बड़ी कीमत थी उस दौर में दो रूपये की .१९६० -७० के दशक में ।
शिद्दत से हमें धीरे धीरे महसूस हुआ रिश्ते सिर्फ खून के नहीं होते ,उनमें प्यार न हो तो बेकार .रिश्ते प्यार के होतें हैं .केवल खून के नहीं होते .खून के रिश्तों में तो हमने खून होते देखा है .शोषण का वीभत्स रूप भी .मामा के साथ क्या यहीं नहीं हुआ था .लेकिन मामा उस दंश से दंशित कभी नहीं दिखे .एक स्मित उनके चेहरे पे एक आभा खेलती इतराती बनी रहती .मामा के घर में एक खरगोश और कुत्ता साथ साथ रहतेमामा के प्यार ने उनमे भी यारी करा दी थी . .पहली बार हमने तब जाना अल्शेशियन कुत्ता प्याज़ा भी खालेता है कच्चा गोभी भी .मामा के घर चोरी हुई तो उसने चोर को नहीं छोड़ा बदले में चोर ने उसे छुरा घोंप दिया था और उसकी जान चली गई ।
तब हमें इल्म नहीं था डायबिटीज़ क्या होती है सब बीमारियों की माँ क्या, नानी होती है .पता तब चला जब हम व्याख्याता बन गए .पता यह भी चला मामा को मधुमेह था .उस दौर में इतनी स्वास्थ्य चेतना लोगों में वैसे भी कहाँ थी .बाद में पता चला उनके बाप को भी डायबिटीज़ थी .बाप की यही सौगात उनकी जान ले गई .दाय्बेतिक फुट और गैंग्रीन ,टांग काटनी पड़ी थी लेकिन इसके बाद भी मामा को बचाया नहीं जा सका था .नै दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में मामा ने दम तोड़ दिया .सेप्तेसीमिया,ज़हरवाद हो गया था सर्जरी के बाद .हमारे पास तो बस खबर पहुंची थी वह भी लेट लतीफ़ .रोना भी मौके पे नसीब नहीं हुआ ।
(ज़ारी ...)

6 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

मार्मिक प्रसंग।

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही आत्मीय संस्मरण....
रिश्ते दिल से ही बनते हैं....
इतने जिंदादिल--खुद्दार इन्सान को यूँ बीमारी से जूझना पड़ा...मार्मिक

Kajal Kumar ने कहा…

बहुत अच्छा लगा यह आत्मीय चित्र.

ved parkash ने कहा…

रिश्ते सिर्फ खून के नहीं होते ,उनमें प्यार न हो तो बेकार .रिश्ते प्यार के होतें हैं .केवल खून के नहीं होते .खून के रिश्तों में तो हमने खून होते देखा है .शोषण का वीभत्स रूप भी . vah saab nah .....kalam tode k rakh dee..............
KUCH RISTE AADME BHULNA HI NHIN CHAHTA....MEETAAAS HOTA HAI UN MEIN

ved parkash ने कहा…

रिश्ते सिर्फ खून के नहीं होते ,उनमें प्यार न हो तो बेकार .रिश्ते प्यार के होतें हैं .केवल खून के नहीं होते .खून के रिश्तों में तो हमने खून होते देखा है .शोषण का वीभत्स रूप भी . vah saab Vah .....kalam tode k rakh dee..............
KUCH RISTE AADME BHULNA HI NHIN CHAHTA....MEETAAAS HOTA HAI UN MEIN

सतीश सक्सेना ने कहा…

मार्मिक मगर संस्मरण अच्छा लगा ...! शुभकामनायें !!