शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

हम बड़े होकर समाज विरोधी तत्व बनेगे या समाज सहाय ?

     हम बड़े होकर समाज विरोधी तत्व बनेगे या समाज  सहाय ?मनोविकृति से ग्रस्त हो जायेंगे 

या अपनी जन्मना नैतिकता ,अर्जित 

सामाजिक नीति  शास्त्र का पालन करेंगे .अपने या औरों के प्रति 

हिंसक हो जाएंगे या अपनी नैतिकता अर्जित सामाजिक नीति नियमों का पालन करते हुए 

अपने विश्वासों पर दृढ रहेंगे .क्या महज़ ब्रेन 

सर्किटरी ,और जीवन खंडों का जमा जोड़ तय करेगा यह सब .या 

हमारी परवरिश .बचपन में हमारे साथ हुई हर किस्म की  बदसुलूकी ,किस्म किस्म का  एब्यूज 

इसका नियमन विनियमन करेगा 

.बचपन का अनुशासन और नसीब हुई हर किस्म की हिफाज़त क्या हमें 

बचाए रहेगी ? 

इन तमाम सवालों के ज़वाब देतें हैं नाम चीन अमरीकी न्यूरोसाइंटिस्ट (स्नायुविज्ञान के माहिर 

)जेम्स फालओं (James Fallon).हम 

जैसे कितने ही लोग हिंसक उग्र और बलात्कारी बन सकते हैं 

.किसी पेशेवर अपराधी की  तरह .आखिर हम भी वही  दिमागी परिपथ (दिमागी न्यूरोन तंत्र 

),ब्रेन सर्किट जन्मना लिए आएं हैं  ,जो हमें 

आवेगशील बिना सोचे  विचारे अपराध करने को बाधित कर 

सकती है मनोविकृति से ग्रस्त बना सकती है किसी मनो रोगी की तरह .  कौन सी चीज़ है तत्व 

हैं जो  फर्क पैदा करतें हैं हमारे सामाजिक  

रूप से  स्वीकार्य या समाज विरोधी अपराध तत्व होने बनने 

में? 

ज़वाब भी फालओं खुद ही देते हैं .हमारे जीवन अनुभव खासकर  बालपन   के और हमारी जीवन 

इकाइयों का परस्पर  Interaction एक 

दूसरे  पर प्रभाव अन्योन्य क्रिया   निर्णायक साबित होती है 

.नैतिकता आप जन्म से लिए रहतें हैं ,समाज नीति शास्त्र आपका अर्जित गुण है .आनुवंशिकी 

बन्दूक में बारूद भरती  है ,परवरिश घोड़ा  

दबा देती है .ट्रिगर बन जाती है हमारे समाज व्यवहार का ..

फाललों ने बीस वर्षों तक psycopaths (ऐसा आवेगशील  व्यक्ति  जो मनोविकृति से ग्रस्त हो  

जाता  अपने या दूसरों के प्रति 

 दहशत गर्द हो उठता है .)के मष्तिष्क का  विश्लेषण अध्ययन 

किया है .पता चला इनमें तदानुभूति नहीं होती दूसरे  के दुःख को ये महसूस ही नहीं कर  सकते .

 यही 

इन्हें एक आम aggressive और 

 impulsive व्यक्ति से अलग रखता है .

"Primarily ,they can't feel for people on a fundamental level ,"explains the 

professor of psychiatry and human behavior 

at the University of California .His theory 

about what makes our brain go into a  tizzy hinges on three factors :

(1)abnormal genetics

(2)distorted brain function and 

(3)early childhood abuse .

अ -सामान्य आनुवंशिकी ,विकृति से  भरा दिमाग और बचपन के बुरे अनुभव  तीनों मिलकर 

हमारे दिमाग को चिंता में डाल देतें हैं 

उद्विग्न और परेशान अशांत कर देतें हैं  उत्तेजना से भर देते हैं .

(ज़ारी )

6 टिप्‍पणियां:

madhu singh ने कहा…

Rochak aur bhavishy ki sambhavnaon ki talas se judi sundar prastuti .नैतिकता आप जन्म से लिए रहतें हैं ,समाज नीति शास्त्र आपका अर्जित गुण है .आनुवंशिकी
बन्दूक में बारूद भरती है ,परवरिश घोड़ा
दबा देती है .ट्रिगर बन जाती है हमारे समाज व्यवहार का ..

Aziz Jaunpuri ने कहा…

Well explained sketch of nature and nurture shaping ours attitude of what we are going to do with our society,undoubtedly it is an explanation of FUTURE OF FUTURE SOCIETIES.

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

हर बिंदु विचारणीय सभी के लिए......

रविकर ने कहा…

बढ़िया प्रश्न |
आभार बीरू भाई ||

संदीप पवाँर (Jatdevta) ने कहा…

आज के लेख ने काफ़ी हद तक सोचने को विवश कर दिया है।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सोचनीय विषय..