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शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

कुछ एच आई वी -एड्स पाजिटिव लोगों को "एंटी -रेट्रो -वायरल ड्रग्स "की ज़रुरत नहीं पडती ....

एक अभिनव अध्धय्यन से पता चला है कुछ एच आई वी -एड्स पाजिटिव लोगों में एक ख़ास मोलीक्युल "एल्फा -देफेंसिनस १-३ "का स्तर बढ़ने लगता है .ऐसे में इन्हें एंटी -रेट्रो -वायरल दवाओं की ज़रुरत नहीं पडती .लेकिन ये लोग बेहतर कंट्रोल बनाए रहतें हैं ,जिसका आधार यही मोलिक्युल बनता है .यह मर्ज़ के बढ़ने की रफ़्तार को एक दम से कम करदेता है ।
इस अध्धय्यन में स्पेन के साइंसदान शरीक रहें हैं ."प्रेन्सा लातीना रिपोर्ट "में इस अध्धय्यन का उल्लेख है .इस के मुताबिक़ तकरीबन ५ फीसद लोग ऐसे हैं जिन्हें इस मोलिक्युल के पनपते रहते एंटी -रेट्रो -वायरल दवाओं की दरकार नहीं रह जाती है .यही मोलिक्युल रोग के लक्षणों का विनियमन करता रहता है ,दीजीज़ को रेग्यु लेट करता रहता है ,प्रोग्रेसन को थामे रहता है .यह करामाती अनु कैसे यह काम अंजाम देदेता है इसे समझने बूझने की अभी बहुत ज़रुरत है .माहिरों का यही कहना है ।
सन्दर्भ सामिग्री :सम डोंट नी "ऐ आर वीज़ /एंटी -रेट्रो -वायरल ड्रग्स "तू बेतिल एड्स (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २७ ,२०१० )

काम के बोझ से दबी अमरीकी औरत इन दिनों ....

काम के अतिरिक्त दवाब से ताल मेल बिठाने की सनक में अमरीकी औरत गैर चिकित्सा कारणों से एंजा -इती बस्टर (एंटी -एंजा -इती ड्रग्स ),चित्त शामक ,ऊर्जा से भरे होने का एहसास कराने वाली उत्तेजक दवाओं का सहारा अपने दैनिक तकाजों को निपटाने के लिए ले रहीं हैं ।
नेशनल इन्स्तीत्युत ओंन ड्रग एब्यूज (एन आई डीऐ )द्वारा संपन्न एक सर्वेक्षण के अनुसार फिलवक्त तकरीबन ६ फीसद अमरीकी महिलायें (यानी कुल मिलाके तकरीबन ७५ लाख अमरीकी महिलायें )ऐसा सुपर्वोमेंन होने दिखने की विवशता में कर रहीं हैं ।
ये तमाम महिलायें नुस्खे पर लिखी दवाओं का ही स्तेमाल कर रहीं हैं .लेकिन धीरे धीरे इन्हें और ज्यादा दवा उतना ही उत्तेजन प्राप्त करने के लिए लेनी पड़ती है .शरीर आदी होने लगता है इन दवाओं का .यहाँ ख़तरा यह है इन दवाओं का सहारा दुसरे नुस्खों के साथ भी ये महिलायें ले रहीं हैं .मसलन आम कोल्ड और कफ की दवाएं (इनमे कई नर्वस सिस्टम सप्रेसर ड्रग भी शामिल हैं ).ऐसे में इनके परस्पर रियेक्सन से दिल की लौ (लय ) बिगड़नेइरेग्युलर हार्ट बीत से लेकर कार्डिएक अरेस्ट का जोखिम भी हो सकता है .रक्त चाप में अप्रत्याशित वृद्धि (हाई -पर्तेंशन )हो सकती है ।
एन आई डी ऐ के अनुसार जहां मर्द तमाम तरह की दवाओं का दुरूपयोग कर रहें हैं वहीँ महिलायें इन प्रिक्रिप्शन दवाओं का मनमाना स्तेमाल (ड्रग एब्यूज )करके जोखिम मोल ले रहीं हैं ।
एम् एस एन बी सी .कोम पर इस अध्धय्यन सर्वे का पूरा ब्योरा उपलब्द्ध है .लोसेंज़िलीज़ की मनोविज्ञानी तालिया वित्कोव्सकी के अनुसार महिलाए दवाओं में रिफ्युज़ ढूंढ रहीं हैं .यह एक एस्केपिस्ट रूट है .अपने स्वास्थ्य के साथअदबदा कर किया गया खिलवाड़ है ।
सन्दर्भ सामिग्री :सुपर्वोमेन्न सिंड्रोम फ्युएल्स पिल -पोप कल्चर (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २७ ,२०१० )

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

जानिये ,क्यों रो रहा है आपका लाडला ?

अक्सर माँ -बाप या केयर टेकर आया या फिर धाय माँ के लिए यह जानना मुश्किल हो जाता है ,आपका लाडला क्यों रो रहा है .रुदन ही शिशु की एक मात्र भाषा होती है .भूख लगने पर भी शिशु जोर जोर से रोता है कोई तकलीफ होने पर भी बौलकरता है ।

क्या है बौल -एनेलाइज़र(रुदन -विश्लेषक )?कैसे काम करता है यह बौल -एनेलाइज़र ?कैसे पता लगाता है शिशु संवेगों का ?

यह एक सांखिकीय कंप्यूटर प्रोग्रेम हैं जिसे जापानी साइंस दानों ने तैयार किया है .इसमें एक इंजिनीयरिंग तकनीक "प्रोडक्ट दिज़ईनिंगका"का स्तेमाल किया गया है जिसकाविकास १९७० दशक में मित्सुओ नगशिमा ने डिपार्टमेंट ऑफ़ कंप्यूटर साइंस तथा सिस्टम इंजिनीयरिंग के तत्वावधान में किया था .यह मुरोरण इन्स्तित्युत ऑफ़ टेक्नोलोजी ,होक्कैदो में स्तिथ है .इसे कांसी इंजिनीयरिंग कहा गया था ।

दरअसल आवाज़ का एक पेट्रनहोता है जिसकी शिनाख्त के लिए रुदन की फ्री -क्वेंसीज़ का सांखिकीय विश्लेषण किया जाता है .यानी रुदन का अंदाज़ जुदा होता है .रुदन बच्चे के मनोभावों एवं संवेगों का विशिष्ठ आइना है ,हस्ताक्षर है उसके भाव जगत का .ऑडियो स्पेक्ट्रम (आवृत्ति गत श्रव्य फ्रीक्वेंसीज़ का विभाजन और पहचान ) के अनुरूप एक पावर फंक्शन होता है .यही रुदन के वर्गीकरण का आधार तैयार करता है .(साउंड पेट्रन रिकग्नीशन अप्रोच युसिज़ अ स्टेतिस्तिकल एनेलिसिस ऑफ़ दी फ्रीक्वेंसीज़ ऑफ़ क्राईज़ एंड दी पावर फंक्शन ऑफ़ दी ऑडियो स्पेक्ट्रम तू क्लासिफाई डिफरेंट टाइप्स ऑफ़ क्राईज़ /क्राइंग ।)
अब अलग अलग ऑडियो स्पेक्ट्रा का मिलान बच्चे के संवेगों से उनके माँ -बाप की मदद से किया जाता है .जो शिशु किसी कष्स्त साध्य जन्म जात रोग से ग्रस्त थे साइंसदानों ने उनकेरुदन की रिकोर्दिंग्स अलग से की थी ताकि एक आम और तकलीफ देह रुदन में भेद किया जा सके ।
इस प्रकार दर्द से रोते बच्चे के रुदन और आम बच्चे के रुदन में एक अंतर १०० फीसद कामयाबी के साथ किया जा सका .इस प्रकार ऑडियो स्पेक्ट्रा आधारित एक आधार बच्चे के रुदन और संवेगों का तैयार कर लिया गया है .उम्मीद की जा सकती है एक दिन यही एक इलेक्ट्रोनिक डिवाइस का आधार बनेगा .तब आप जान सकेंगें आपका लाडला आखिर क्यों रो रहा है .क्या उसे कोई तकलीफ है या फिर वह भूख से रो रहा है .?

अब अलग अलग ऑडियो स्पेक्ट्रा का मिलान शिशु संवेगों से किया गया .ज़ाहिर है इसमें माँ -बाप का सहयोग भी लिया गया ।

परीक्षणों के दौरान साइंसदानों ने उन बच्चों के रुदन की अलग से रिकोर्डिंग तैयार की जो किसी कष्ट साध्य जन्म जात रोग से ग्रस्त थे .ताकि इस विशिष्ठ रुदन तथा अन्यकिस्म की क्राइंग में साफ़ अंतर किया जा सके ।

इस प्रकार से पेनफुल और सामान्य क्राइंग में १०० फीसद कामयाबी के साथ अंतर किया जा सका ।

इस प्रकार शिशु रुदन

शराब खोरी के खिलाफ विज्ञापन शराब खोरी को हवा देतें हैं ...

जिन लोगों को लक्षित करके शराब -रोधी विज्ञापन तैयार किये जातें हैं ,उनमे एल्कोहल एब्यूज घटने के स्थान पर और ज्यादा हो जाता है .यानी मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की वाली उक्ति चरितार्थ होने लगती है यही लब्बोलुआब है एक अभिनव अध्धय्यन का ।यानी एल्कोहल एब्यूज से पार पाना आसान नहीं है .
अपने तरह के इस अलग अध्धय्यन में रिसर्चरों ने पता लगाया है ,एक जन्म जात तालमेल बिठाने की प्रवृत्ति के तहत जो लोग इन विज्ञापनों को देखतें पढतें हैं वह अपने गले यह बात उतरने ही नहीं देते ,शराब उनका भी कुछ बिगाड़ सकती है .उनका यही विशवास जोर मारता है मेरा कुछ नहीं होगा जो भी नुकसान होगा किसी और को होगा .इंडियाना यूनिवर्सिटी कल्ले स्कूल ऑफ़ बिजनेस द्वारा संपन्न इस अध्धय्यन के नतीजे "मार्केटिंग रिसर्च "जर्नल मेंशीघ्र प्रकाशित होंगे ।
अध्धय्यन के को -ऑथर दुहाचेक के अनुसार एक डिफेन्स मिकेनिज्म के तहत पियक्कड़ एक ऐसा माइंड सेट तैयार कर लेतें हैं जो नुक्सानात को कम करके आंकने लगता है .यानी विज्ञापन में बतलाये गए नुक्सानात को कमतर करके देखने समझने लागतें हैं .एच आई वी एड्स के बारे में भी तो लोगों का यही रवैया रहता है "मेरा कुछ नहीं हो सकता "
सन्दर्भ सामिग्री :एंटी -बूज अद्वेर्ट्स (एद्वर्ताइज़्मेन्त्स )में रेज़ एल्कोहल यूज़ (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २६ ,२०१० ).

ले उड़तीं हैं होठों की रंगत पुरानी लिप्स्तिकें......

ओल्ड एंड आउट ऑफ़ डेट मेक अप ना सिर्फ संक्रमण की वजह बनता है ,पुरानी पद चुकी लिप्स्तिकें गुलाबी होठों की रंगत हमेशा हमेशा के लिए ले उड़ सकतीं हैं .ओल्ड लिप्स्तिक्स दिस्कलर लिप्स फॉर एवर ।
जिन लिप्स्तिक्स का रंग खुद ही बदरंग हो चुका है ,दिस्कलार्ड हो चुकीं हैं जो लिप्स्तिकें और मस्कारा ,आई पेन्सिल्स जो पुरानी पड़ चुकीं हैं खतरनाक जीवाणु को पनाह देने लगतीं हैं .यही जीवाणु होठों की आभा चट कर जातें हैं ।
देबेन्हाम्स ने अपने अध्धय्यन में बतलाया है ज्यादर तर महिलायें (दो तिहाई जो कोस्मेतिक्स का स्तेमाल करतीं हैं )मेक अप का सामान तभी नया करतीं हैं जब पुराना पूरी तरह चुक जाता है .आखिर सौन्दर्य प्रसाधनों की भी तो एक सेल्फ लाइफ होती है ,गुणवत्ता मियाद होती है ।
सन्दर्भ सामिग्री :ओल्ड लिप्स्तिक्स दिस्कलर लिप्स फॉर एवर (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,२६ फरवरी ,२०१० )

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

देत रैप के बाद अब सेक्स्युअल शिकारियों की नजर "लीगल ड्रग्स "पर

डेट रैप के बाद अब सेक्स्युअल शिकारियों की नजर "लीगल ड्रग्स "पर आ टिकी है .दुनिया भर की सरकारों को एक ऐसा निगरानी और कारगर तंत्र खडा करने की ज़रुरत बतलाई है "इंटर -नेशनल नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड "ने .वियेना आधारित इस बोर्ड के मुताबिक़ यौन शिकारी अब उन वैधानिक दवाओं का दूर उपयोग करने को आतुर हैं जो इंटर -नेशनल ड्रग कन्वेंसंज़ के दायरे से बाहर हैं ।
बहुत आसान है "सेक्स्युअल प्रीडे -तरस के लिए अपने खूबसूरत शिकार की ड्रिंक्स ,इतर खाद्य पदार्थों में इन दवाओं को चुपके से मिला देना .ताकि बाद में वह अपने शिकार का मनमाना सेक्स्युअल एब्यूज कर सकें .इन सेदेतिव्स दवाओं के स्तेमाल के बाद युवतियां सेक्स्युअल असाल्ट्स का विरोध करने लायक नहीं रह जातीं हैं .अलबत्ता उन्हें धीरे धीरे सब याद आ जाता है .यह कहना है एक वाच दोगका .एक ऐसा व्यक्ति जो कंज्यूमर के हितों की हिफाज़त करता है इसके अलावा और कर भी क्या सकता है .अलबत्ता अब जो करना है वह सरकारें ही कर सकतीं हैं .उपभोक्ता को भी खबरदारी बरतनी होगी .पब्लिक स्पेस में होने वाली अनेक पार्टीज़ ,सभा सोसायटीज़ में परोसे जाने वाले खाद्य और पेय पदार्थों की भी निगरानी रखने की इस दौर में महती ज़रुरत है जबकि सेक्स्युअल प्री -देटार्ज़ खुला खेल फरुखाबादी खेल रहें हैं ऐसी खबरदारी और भी ज़रूरी है ।
फ्लुनी -त्रज़ेपम का दुरूपयोग इस दौर में खबरदारी के चलते ही कम हुआ है .जो ब्रांड नेम "रोह्य्प्नोल "के नाम से बाज़ार में सहज सुलभ रही है .अंतर -राष्ट्रीय बिरादरी के सहयोग से ही इस सेदेतिव का दुरूपयोग काबू में आया है । एक रिपोर्ट के अनुसार अब यौन -भखुए गामा -हाई -ड्रोक्स्य-ब्युत्रिक एसिड (जी एच बी /कीतामाइन ) तथा गामा ब्युतैरो लेक्तोंन (जी बी एल ) हथिया लेना चाहतें हैं .इंटर नेशनल नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड के अनुसार और प्रयासों की ज़रुरत है ताकि सभी तरह के ड्रग एब्यूज को रोका जा सके .एक पूरा क्रिमिनल माफिया सक्रीय है जो इन दवाओं के बहु विध निर्माण और दुरूपयोग की जुगत में है .तू दाल दाल मैं पांत पांत .....

परख नली गर्भाधान के कारण कितने बच्चे मरे हुए पैदा होतें हैं ?

आई वी ऍफ़ ट्रीटमेंट रेज़िज़ रिस्क ऑफ़ स्टिल बर्थ ४ टाइम्स (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २५ ,२०१० )
डेनमार्क में संपन्न एक हालिया अध्धय्यन से पता चला है जो महिलायें गर्भ धारण के लिए "परखनली गर्भाधान ,इनवीट्रो फर्टिलाई जेशन" का सहारा लेतीं हैं उनके लिए स्टिल बर्थ का जोखिम उन महिलाओं के बरक्स जो कुदरती तौर पर या फिर गर्भाधान के लिए अन्य तकनीकों का सहारा लेतीं हैं ,चार गुना ज्यादा हो जाता है ।
आरहस यूनिवर्सिटी डेनमार्क के फर्टिलिटी एक्सपर्ट किर्स्तें विस्बोर्ग के नेत्रित्व में साइंसदानों की एक टीम ने २०१६६ शिश्युओं (बेबीज़ ) का जन्म सम्बन्धी डाटा संजोया है .यह तमाम शिशु सिंगिल बर्थ्स में ही पैदा हो गए थे .और यह पहली प्रेगनेंसी की सौगातें थे .१९८९ -२००६ के बीच में जन्मे थे ये नौनिहाल ।
उन महिलाओं में जिन्होंने गर्भ धारण के लिए "आई वी ऍफ़ /आई सी एस आई तकनीक अपनाई थी स्तिल्बर्थ (जब बच्चा मरा हुआ ही पैदा होता है )का जोखिम १६.२ फीसद पाया गया .लेकिन उन महिलाओं के लिए जिन्होनें नॉन -आई वी ऍफ़ ट्रीटमेंट के बाद गर्भ धारण किया था स्तिबर्थ का ख़तरा घटकर २.३ प्रति एक हज़ार प्रसव ही रह गया था ।
फर्टाइल और सब- फर्टाइल महिलाओं के मामले में यही जोखिम ३.७ और ५.४ पाया गया (प्रति -हज़ार प्रसव के पीछे ).

अमीर देशों के अस्पताल के ये हाल हैं ...

हॉस्पिटल इन्फेक्शन किल्ड ४८,००० ए ईयर (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २४ ,२०१० )।
एक रिपोर्ट के मुताबिक़ अकेले न्युमोनिया और रक्त सक्रमण (ब्लड बोर्न इन्फेक्संज़ ) ने २००६में ४८,०००अमरीका वासी लोगों की जान ले ली थी .इन्हें यह रोग अस्पताल में चिकित्सा लेने के दरमियान लगा .हॉस्पिटल बोर्न इन्फेक्संज़ दुनिया भर के अस्पतालों के लियें एक कटु सत्य है .अमरीकी सरकार को अस्पताल से लगने वाले रोगों से निपटने के लिए इस बरस कुल ८.१ अरब डॉलर खर्च करने पड़े हैं ।
यह पहला अमरीकी अध्धययन है जिसने इस बीमारी (हॉस्पिटल बोर्न इन्फेक्संज़ ) का जायजा लेकर इसके स्वास्थ्य सेवाओं के बजट पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किया है .इस अध्ययन के एक प्रायोजक रमनन लक्ष्मी नारायण (रिसोर्सिज फॉर फ्यूचर ,ए थिंक टेंक से सम्बद्ध ) कहतें हैं कई मामलों में बेहतर बचावी उपाय आजमा कर ऐसे संक्रमणों से बचा जा सकता था .

सत्य ही रहता नहीं यह ध्यान तुम ,कविता ,कुसुम या कामिनी हो ...

कवि दिनकर ने कुछ देखकर ही कहा होगा -"सत्य ही रहता नहीं यह ध्यान तुम ,कविता ,कुसुम या कामिनी हो "(उर्वशी ).ज़रूर कवि रसलीन ने भी किसी रूपसी की आवर्ग्लास छवि देख कर ही लिखा होगा -कनक छवि सी कामिनी ,कटि काहे को क्षीण /कटि को कंचन काटि विधि ,कुचन मध्य धरदीन्ह ।
अब विज्ञानी भी यही कह रहें हैं आवर ग्लास फिगर यानी कर्वेशियास वोमेन पर नजर पड़ते ही पुरूष के दिमाग का रिवार्ड केंद्र वैसे ही सक्रीय हो जाता है जैसे शराब पी लेने के बाद या फिर किसी मादक पदार्थ के सेवन के बाद ।
अपने अध्धय्यन में साइंस दानों ने महिलाओं की नग्न तस्वीर पुरूषों को दो मर्तबा दिखलाई .एक मर्तबा कोस्मेटिक सर्जरी से पहले और दूसरी दफा आवर ग्लास फिगर में कोस्मेटिक सर्जरी से ढल जाने के बाद .दोनों दफा दिमाग की स्केनिंग की गई .पता चला आवर ग्लास खूबसूरती को देखने के बाद दिमाग सुरूर में आ गया ,दिमागी रिवार्ड केंद्र एकदम से सक्रीय हो उठा .तभी तो कहा गया है -लव इज किर्येतिद अत फस्ट साईट ।
" लाइव साइंस" विज्ञान पत्रिका में इस अध्धय्यन के नतीजे प्रकाशित किये गएँ हैं ।
अध्धय्यन में १४ मर्दों को ७ हसीनाओं के नग्न नितम्ब (नेकिड बोत्म्स )दिखलाए गए थे ।
क्या कहतें हैं इस बारे में एक कोगनिटिव न्युरोसाइन -तीस्त स्टेवें पलटक (जोर्जिया ग्विन्नेत्त कोलिज ,लारेंस विले जोर्जिया )"ह्यूज हेफ्नर कूद हेव टोल्ड अस देत बाई शोइंग अस हाव मैनी जीरोज़ आर इन हिज़ बेंक एकाउंट "वैसे भी शेप्ली हिप्स औरत की उर्वरकता (फर्टाइल होने ) की निशानी समझे गए हैं .अब आप समझ सकतें हैं क्यों कुछ लोगों को पोर्न का चस्का लग जाता होगा .

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

पी नट से होने वाली एलर्जी से छुटकारा .

पी नट एलर्जी केंन बी क्योर्ड इन थ्री ईयर्स " शीर्षक से टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,२३ फरवरी अंक में प्रकाशित स्वास्थ्य समाचार एलर्जी के रोगियों को एक उम्मीद देता है .अब तक एलार्जीज़ को लाइलाज ही समझा जाता रहा है ।
ब्रितानी विज्ञानियों के हाथ एक नया इलाज़ आ गया प्रतीत होता है .जिससे खतरनाक पी नट एलार्जीज़ से तीन सालों में छुटकारा मिल सकता है .लाखों लाख लोग एलार्जीज़ से आजिज़ आ चुके हैं .लगता है अब इनका दुःख दूर किया जा सकेगा ।
अद्देंब्रूकेस अस्पताल केम्ब्रिज के रिसर्चरों ने २१ बच्चों को पी नट एलर्जी से निजात दिलवाने का दावा किया है .इन नौनिहालों को "पी नट फ्लोर "की बहुत कम खुराख दी गई ताकि मूंग फली (चीनीया बादाम ,पी नट ) के प्रति रोग प्रति रोध संस्थान एक प्रति रोध खडा कर सके .इम्युनिटी डिवेलप कर सके पी नट के प्रति धीरे धीरे .

बुढापे तक दिमागी दुरुस्ती के लिए "ओअट एक्सट्रेक्ट "

ओअट एक्सट्रेक्ट खासकर वाइल्ड ग्रीन ओअट्स (हरी जै का सार ) जैव -तौर पर तेजतर्रार (बायोएक्तिव ) पुष्टिकर तत्व है जो दिमाग को रक्त की आपूर्ति में सुधार करने में समर्थ हो सकता है ,दिमाग को पूरी रक्त आपूर्ति अटेंशन और कंसेन्ट्रेशन को बुढापे में भी बनाए रखने में सहायक हो सकता है ।
इसका मतलब यह हुआ ओअट एक्सट्रेक्ट दिमागी क्षमता को बुढापे में भी दुरूस्त बनाए रखने में मदद गार सिद्ध हो सकता है .यही सार है एक अभिनव अध्धय्यन का जिसे यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ ऑस्ट्रेलिया के माहिरों ने आगे बढाया है .बहर सूरत यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ ऑस्ट्रेलिया के माहिर अभी बुढापें में इससे होने वाले लाभ की और जांच कर रहें हैं ।
यु एस ए स्कूल ऑफ़ साइकोलोजी के जनेत ब्र्याँ के शब्दों में "वाइल्ड ग्रीन ओअट्स कन्टेन बायो एक्टिव न्युत्रियेंट्स विच में असिस्ट इन इम्प्रूविंग ब्लड फ्लो इन दी ब्रेन ,विच इन टर्न में हेल्प विद अटेंशन एंड कंसेन्ट्रेशन "

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

नक्कालों से सावधान :फ्रोड स्टेम सेल बैंक्स से बचिए ...

एक अमरीकी साइंसदान ने नकली स्टेम सेल बैंक्स के माया जाल से बचे रहने की हिदायत दी है .कुछ लोग अपने लाडले के अम्बैलिकल कोर्ड से स्टेम सेल्स लेकर इन बेंकों में भविष्य के स्वास्थ्य बीमा के बतौर रखवा रहें हैं ,भारी खर्च उठाकर ।
समझा जाता है इन कलम कोशिकाओं से वक्त ज़रुरत के मुताबिक़ भविष्य में मन वांच्छित अंग प्रत्यारोप के लियें तैयार किये जा सकेंगें .स्व -जातीय अंग को हमारा "इम्यून सिस्टम ",रोग प्रति रक्षा प्रणाली सहज ही अपना लेती है .इसके रिजेक्शन (प्रति -रक्षा तंत्र द्वारा बहिष्करण का ख़तरा नहीं रहता है )।
इसलियें स्टेम सेल्स बैंक्स विक्सित देशों में दिनानुदिन लोकपिर्य हो रहें हैं .लेकिन यहाँ भी जाल साजी है ,नकली गैर प्रामाणिक स्टेम सेल बेंक काम कर रहें हैं .जन मानस से भारी रकम वसूल कर यह चांदी काट रहें है ।थाईलैंड में एक स्टेम सेल बेंक ३६०० डॉलर्स वसूल रहा है .माँ बाप इसे स्वास्थ्य बीमा समझ कर खर्चा उठा रहें हैं ।
बकौल इरविंग वेइस्स्मन (स्टेफोर्ड यूनिवर्सिटी केलिफोर्निया से सम्बद्ध )कितने ही स्टेम सेल बेंक धोखा धडी से पैसा कमा रहें हैं .यह दुर्भाग्य पूर्ण है ।
सन्दर्भ सामिग्री :साइंटिस्ट्स वार्न ऑफ़ फ्रोड स्टेम सेल बैंक्स (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २२ ,२०१० )

आपके अपने स्वान के लिए एंटी -डिप्रेसेंट ....

यदि आपका लाडला स्वान (पैएट) कम्पल्सिव दिसोर्दर का शिकार है ,तो इसमें उसका कोई कसूर नहीं है .कसूर उसके दोषपूर्ण जींस का है जो स्ट्रेस की मौजूदगी में उसे अवसाद ग्रस्त बना सकतें हैं .ऐसे में स्वान (कुत्ता आपका पालतू लाडला )बेहिसाब लिकिंग करने लगता है ,धीरे धीरे क्राई(भों भों )करेगा ,टेल चेजिंग करेगा ।बेइरादा इधर उधर भागेगा .इन लक्षणों से निजात दिलवाने के लियें उसकी टेस्ट बड्स के अनुरूप बीफ फ्लेवर्ड दवा "रीकंसाइल "तैयार की गई है .यह बेमकसद बेचैनी से कभी इधर कभी उधर घूमने से निजात दिलवाएगी ,लार का बेतहाशा टपकना कम करेगी ।
एंटी डिप्रेसेंट दवा "प्रोज़क "जो अवसाद ग्रस्त लोगों को दी जाती है "कम्पल्सिव दिसोर्दर "को कम करने के लिए वहदिमाग में एक न्यूरो -त्रेंस्मितर "सिरोतोनिन "के स्तर को बढा देती है .सिरोतोनिंन एक मूड लिफ्टर रसायन है ।चेक कीजिये "इज यूओर पैएट पूच(डॉग)बार्किंग मेड ?जस्ट गिव ईट सम रीकंसाइल .यह एक एंटी डिप्रेसेंट दवा का स्वान संस्करण (डॉग वर्शन) है .कुत्तों के लिए तैयार की गई अवसाद रोधी दवा है . इसकी आज़माइश की जा चुकी है स्वानों पर जो कम्पल्सिव दिसोर्दर से ग्रस्त थे ।
सन्दर्भ सामिग्री :नाव एन एंटी -डिप्रेसेंट पिल जस्ट फॉर दोग्स (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २२ ,२०१० )

फ्यूज़न पावर के विकाश का आधार तैयार .......

ब्रितानी साइंस दानों ने २०३० तक फ्यूज़न पावर प्लांट खडा करने का मंसूबा बना लिया है .इसकी नींव डाली जा रही है रिसर्च कोंसिल यू के द्वारा .यही वह परिषद् है जो ब्रिटेन द्वारा साइंस और टेक्नोलोजी पर किये गए खर्च की निगरानी रखती है .बकौल इस परिषद् के इस स्वच्छ कार्बन मुक्त ऊर्जा स्रोत के रास्ते में आने वाली आरंभिक बाधाओं पर पार पा ली गई है .और इसी के साथ ब्रिटेन एक बीस साला रिसर्च और कंस्ट्रक्शन प्रोग्रेम में जुट गया है ।
यह "हिपर प्रोजेक्ट "ऑक्सफोर्ड शायर के "दिद्कोट "में खडा किया जाएगा .फ्यूज़न एनर्जी "फ्यूचर ग्लोबल एनर्जी "सिस्टम में बेहिसाब ऊर्जा झोंक सकता है .असीम संभावनाएं छिपाए है "संगलन /संलयन ऊर्जा "यह वही फ्यूज़न रिएक्शन है जो सूरज के गर्भ प्रदेश में पिछले ४.५ अरब वर्ष से चल रही है .सूरज की संगलन भट्टी में हाई -द्रोजन ईंधन के रूप में जलने लगती है .इस प्रकिर्या में अथाह ऊर्जा मुक्त होती है तापीय और दृश्य अदृश्य प्रकाश के रूप में .इलेक्त्रों और प्रोटोन कण भी मुक्त होतें हैं जो सौर पवनों के रूप में हमारी पृथ्वी के मेग्नेतो स्फियर में प्रवेश करके विचलित होते रहतें हैं ।
गौर तलब है ब्रितानी कोंसिल अमरीका की इग्नीशन फेसिलिटी का अनुसरण कर रही है .अमरिकास इग्नीशन फेसिलिटी केलिफोर्निया में काम कर रही है .इसका विकाश लेज़र फ्यूज़न के सिद्धांत को समझाना रहा है .इसमें एक साथ १९२ जाइंट लेज़र्स को समायोजित किया गया है .इसके ज़रिये ५०० ट्रिलियन वाट शक्ति पैदा की जा सकती है .यह अमरीकी नेशनल ग्रिड पावर से १००० गुना ज्यादा है .अलबत्ता यह शक्ति अल्पकालपलांश के लियें ही पैदा की जा सकी है ।
इस ऊर्जा को एक फ्रोजिन ह्य्द्रोजन पैलत पर फोकस किया जाएगा .देखते ही देखते यह पैलत१० करोड़ सेल्सियस तक गर्म हो जाएगा .यह तापमान हाई द्रोजन के इग्नीशन टेम्प्रेचर से बहुत ज्यादा है जिस पर यह गैस ईंधन की तरह जलने लगती है .इस प्रक्रिया में कई चरणों में हीलियम गैस के साथ विशाल मात्र में ऊर्जा मुक्त होती है .हम भी सांस रोके देख रहें है आस लगाए बैठें हैं "नेशनल इग्नीशन फेसिलिटी ,यू एस )"की कामयाबी की .यह एक विधायक क्षण है जिसने फ्यूज़न पावर के विकाश की बुनियाद रख दी है ।
सन्दर्भ सामिग्री :वर्ड्स फस्ट एन -फ्यूज़न प्लांट तूबी रेडी इन २० ईयर्स .(टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २२ ,२०१० )
प्रोजेक्ट

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

एग टाइमर ब्लड टेस्ट क्या है ?

कन्सेप्शन स्पेसलिस्ट (गर्भाधान के माहिर ) पीटर इल्लिंग्वार्थ ने ऑस्ट्रेलियाई रिसर्चरों के साथ मिलकर एक ऐसा ब्लड टेस्ट इजाद किया है जोएक ख़ास फर्टिलिटी हारमोन (गर्भाधान हारमोन )का स्तर नाप कर यह बता सकता है ,एक औरत के अंडाशय (ओवरीज़ )से कितने ओवम बाहर आ सकतें हैं प्रति माह यानी उसके गर्भ धारण की संभावना की प्रागुक्ति (भविष्य वाणी )की जा सकती है ।गर्भाधान से पहले ही .
ज़ाहिर है परिवार नियोजन और फर्टिलिटी उपचार में इससे बड़ी मदद मिलेगी .खासकर उन युवतियों की शिनाख्त वक्त रहते की जा सकेगी जिनकी आगे चलकर गर्भ धारण की संभावना क्षीण हो सकती है .यह कहना है "इनवीट्रो -फ़र्तिलाइज़ेशन, ऑस्ट्रेलिया, "के निदेशक महोदय का ।
इतना ही नहीं उन महिलाओं की शिनाख्त भी की जा सकेगी जिनके वक्त से पहले रजस्वला होने (मीनोपाज़ से गुजरने की जोखिम मुह बाए खड़ी है ।)
यह भी पता लगाया जा सकेगा उसकी ओवरीज़ में कुल कितने ह्यूमेन एग बकाया हैं .अब उसकी मर्ज़ी है वह प्राकिर्तिक तौर पर कन्सेप्शन (गर्भवती होने का इंतज़ार करे या फिर इनवीट्रो फर्तिलाज़ेशन को अपनाए ).फर्टिलिटी तीत्मेंट के बारे में ऐसा होने पर सही वक्त पर सही कदम उठाये जा सकेंगे ।
एंटी -म्युलेरियांन हारमोन टेस्ट का फायदा खासकर उन महिलाओं को मिलेगा जो कैंसर या फिर एन्दोमित्रियोसिस चिकित्सा करवा चुकीं हैं या फिर जिनकी ओवेरियन शल्य चिकित्सा किसी भी वजह से हो चुकी है .टेस्ट की कीमत मात्र ५८ डॉलर्स है .वक्त गुजरने के बाद इनवीट्रो -फ़र्तिलाइज़ेशन चिकित्सा ना सिर्फ महंगी सिद्ध होती है निष्फल भी जाती है ।
जन्म के वक्त एक महिला जन्मना तकरीबन अपनी दोनों ओवरीज़ मेंकुल दो लाख तक ह्यूमेन एग लिए आती है .इनका क्षरण प्रति माह कभी भी मेनोपाज आते आते होता रहता है .एक बीस साल की युवती औसतन २ लाख ह्यूमेन एग अपने अंडाशय में छिपाए रहती है .थर्तीज़ में प्रवेश करने पर यह घटकर एक लाख तथा ४० के पार २००० रह जाती है .संदर्भित रक्त जांच इन्हीं एग्स का जायजा लेती है ।इंडो मित्रियोसिस क्या है ?यह एक ऐसी रोगावस्था है जिसमे म्यूकस मेम्ब्रेन (स्लेश्मल झिल्ली )जो आमतौर पर वोम्ब के अस्तर के रूप में ही मौजूद होती है ,वह अंडाशय और अन्यत्र भी काम करने लगती है .एन्दोमित्रियोसिस इज अ मेडिकल कंडीशन इन विच दी म्यूकस मेम्ब्रेन (एन्दोमित्रीयम )देत नॉर्मली लाइंस ओनली दी वोम्ब इज प्रेजेंट एंड फंक्शनिंग इंडी ओवरीज़ आर एल्स वेयर इंडी बॉडी .
सन्दर्भ सामिग्री :बायलोजिकल क्लोक टिकिंग ?"एग टाइमर "तूअलर्ट वोमेन ,ब्लड टेस्ट तू चेक हारमोन लेविल कूद शेक अप फर्टिलिटी ट्रीटमेंट (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २२ ,२०१० )

आइन्स्तीनियम क्या है ?

भौतिक विज्ञानी और हमारे साइंस दान एहसान फरामोश कभी नहीं रहें हैं .अक्सर विज्ञान जगत ने अपने पूर्व वर्तियों के काम को ना सिर्फ आगे बढाया है उनकी याद उनके योगदान को अमिट भी बना दिया है ,भौतिक इकाइयों (यूनिट्स ऑफ़ फिजिकल क्वान्तितिस ) को ही नहीं कई तत्वों का नामकरण भी नाम चीन विज्ञानियों के नाम पर किया गया है .आइन्स्तीनियम उसी की एक कड़ी मात्र है ,जो एक उत्तर -युरेनियम तत्व है तथा कुदरती तौर पर प्रकृति में नहीं पाया जाता है ।आइन्स्टाइन महोदय को समर्पित है यह तत्व जिन्हें प्रकाश
विद्युत् प्रभाव के लिए १९०५ में नोबेल प्राइज़ से नवाज़ा गया . आइन्स्तीनियम के केंद्र में (नाभिक या न्यूक्लियस /कोर )कुल मिलाकर ९९ प्रोतोंस हैं .इसके नाभिक के बाहर इतने ही इलेक्त्रोंन केंद्र से अलग अलग दूरियों पर केंद्र की परिक्रमा करतें हैं .इलेक्त्रोंन या फिर प्रोटोन की संख्या को ही किसी तत्व का (कुदरती या बम्बार्ड मेंट करके तैयार किया गया ) एटोमिक नंबर (परमाणु क्रमांक ,परमाणु तालिका में सीट नंबर कहा जाता है )कहा जाता है .मेंदेलीव ने यह तालिका तैयार की थी ,जिसमे आइन्दा मिलने वाले तैयार किये जाने वाले तत्वों का भी ज़िक्र था ।
आइन्स्तीनियम अलबर्ट आइन्स्टाइन की याद में दिया गया नामित एक कृत्रिम तत्व है .युरेनियम के बाद इसका तत्व तालिका में सातवाँ स्थान है .तालिका में यह ९९ वां तत्व है ,जिसकी शिनाख्त १९५२ में अलबर्ट घिओर्सो ने अपने सहकर्मियों के संग की है .यूनिवर्सिटी ऑफ़ केलिफोर्निया बर्कली में हाइड्रोजन बम्ब के परिक्षण के बाद निकले कचरे की जांच में यह तत्व मिला है अल्पांश में .यह परीक्षण भी १९५२ में ही किया गया था जिसकी देब्रीज़ की विस्तृत जांच की गई थी ।
आपको बत्लादें "क्युरी "मेडम और पियरे क्युरी दम्पति की याद में रेदिओएक्तिविति को दी गई एक यूनिट का नाम है .इसी प्रकार "रदरफोर्ड "भी एक और यूनिट है रेडियो धर्मिता की ,रदरफोर्ड साहिब के नाम पर .कूलाम चार्ज की तथा एम्पियर करेंट (विद्युत् आवेश )को दी गई इकाइयों का नाम है ।
इसी प्रकार "न्यूटन "आइज़क न्यूटन साहिब के नाम पर फ़ोर्स की इकाई है ."मेक्सवेल "मेग्नेटिक फ्लक्स की यूनिट का नाम है ."हर्ट्ज़ "(हेनरिख हर्ट्ज़ की याद में )फ़्रीक्युएन्सि को दी गई यूनिट का नाम है .एक साइकिल प्रति सेकिंड को एक हर्ट्ज़ कहा जाता है ।" बोसोंस "भारतीय विज्ञानी जगदीश चंद बासु की याद में दिया गया नाम है द्रव्य की कणिकाओं को .एक पूरी स्टेटिस्टिक्स का नाम है "बोस -आइन्स्टाइन स्टेटिस्टिक्स ".गिनती यहीं ख़त्म नहीं होती सिर्फ बानगियाँ पेश की गईं हैं यहाँ .वेबर और टेस्ला मेग्नेटिक फील्ड की इकाइयां हैं नाम चीन विज्ञानियों के नाम पर .

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

बीटी ब्रिंजल में "बीटी" का मतलब क्या है ?

पार- जातीय या फिर आनुवंशिक तौर पर संशोधित फसलों और तरकारियों (ग्रीन वेजितेबिल्स )का दौर है यह .इसी कड़ी में बीटी ब्रिंजल बेंगन की एक पार्जातीय नस्ल है .जिसमे मिटटी में पाए जाने वाले एक बेक्टीरिया "बेसईलास -थ्युरिन-जियेंसिस "से एक जीन क्राई १ ए सी लेकर बेंगनमें मिलाई गई है ।
समझा जाता है यह जीवन -इकाई (जीवन खंड ) बैंगन की फसल की कीड़ों से हिफाज़त करेगा .इन कीड़ों के पेट में एक ख़ास प्रोटीन होती है ,जो बेसईलास थ्युरिन्जियेंसिस में मौजूद विष (जो जीन की उपस्तिथि में ही पैदा होता है )से किर्या करके कीड़ों का खात्मा कर देती है .क्योंकि यह प्रोटीन मनुष्यों में नहीं पाई जाती इसलिए उन्हें किसी किस्म का ख़तरा नहीं है .लेकिन बीटी ब्रिंजल के विरुद्ध खड़े खेमे की माने तो यह बेक्टीरिया मिटटी से नहीं लिया गया है ,लेब में गढ़ा गया है .यह किसी भी तरह निरापद नहीं है .बीटी कोटन से हताश किसान आत्म ह्त्या कर चुका है .

इको -ब्लिंग क्या है ?

इको -ब्लिंग का मतलब किसी पुरानी -धुरानी ऊर्जा खाऊ इमारत को "इको -फ्रेंडली "बनाना है उसमे तबदीली करके .नै फिटिंग्स करके .यह और बात है यह कई मर्तबा बहुत खर्चीला साबित होता है .रेट्रो फिटिंग एक खर्चीली टेक्नीक है .यूँ एक इमारत क्या एक पूरे-महानगर "न्युयोर्क "को रेट्रो फिटिंग्स के ज़रिये "ग्रीन एपिल "बनाने की दिशा में कदम उठाया जा चुका है ।
फिलवक्त न्युयोर्क को "रेड एपिल :का दर्ज़ा मिला हुआ है ,गंधाते पर्यावरण और ऊर्जा खपत की वजह से ।
इको ब्लिंग पर लौटतें हैं .किसी बिल्डिंग को ग्रीन बनाने के लिए रेट्रो फिटिंग के ज़रिये (पुरानी फिटिंग्स के स्थान पर )सोलर पेनल्स फिट किये जातें हैं .हीट-लोस को कम करने के लिए बिल्डिंग को इन्स्युलेट किया जाता है .कोशिश रहती है इसे "जीरो कार्बन एमिशन "के स्तर पर लाया जाए .लेकिन अक्सर यह बहुत ज्यादा महंगा सौदा सिद्ध होता है .रेट्रो फिटिंग्स अक्सर कामयाब भी नहीं होती क्योंकि बिल्डिंग बहुत पुराना डिजाइन लिए होती है .मूल तय पुरानी इमारतें इको फ्रेंडली नहीं होतीं हैं .असरकारी ग्रीन एलिमेंट्स का स्तेमाल प्लानिंग स्टेज पर ही अपेक्षित होता है ।
"इन एन इको -ब्लिंग सीनारियो ,ग्रीन एफर्ट्स कोस्ट मोर टू इंस्टाल देंन दी एनर्जी एंड मनी दे आर मेंट टू सेव "
इसलिए साहिब यह सौदा महंगा ही रहता है .

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

औरत के साथ टिके रहने के लिए जादुई दवा....

शीघ्र पतन से छुटकारे के लिए अब हाज़िर है एक नुश्खे -ई दवा (प्रिस्क्रिप्शन ड्रग )"प्रिलिगी "जो सम्भोग काल को तीन गुना बढा सकती है .यह दवा यूरोप में पहले ही मयस्सर है (ओवर दी काउंटर उपलब्ध है )अब अमरीकी खाद्य और दवा संस्था "ऍफ़ डी ए "की मंज़ूरी का इसे इंतज़ार है ।
ख़तरा बस यही है ,भले चंगे (दुरुस्त सेक्स्युअल हेल्थ वाले लोग )इसके जाल में ना फंस जाएँ .एक कोम्प्लेक्स ना पाल लें .यही दुश्चिंता जोएल लेक्स्चिन को खाए जा रही है .आप स्वास्थ्य सम्बन्धी नीतियों से ताल्लुक रखने वाले प्रोफ़ेसर हैं .आप योर्क विश्विद्यालय टोरोंटो से सम्बद्ध हैं ।
सन्दर्भ सामिग्री :"मिरेकिल पिल "प्रोलोंग्स स्टे -इंग पावर थ्री फोल्ड (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २० ,२०१० ).

मीठी गोली भी रंग लाती है ......

एम् बी बी एस कोर्स में एक चेप्टर होता है ,प्लेसिबो इफेक्ट ऑफ़ दा ड्रग .आदमी इसलिए अच्छा हो जाता है ,फेमिली डॉक्टर ने उसे दवा दी है ,भले ही दवा गलत लिखी गई हो या फिर दवा के नाम पर सिर्फ मीठी गोली (छद्म दवा )ही दी गई हो .दिमाग को एक पोजिटिव सोफ्ट वेयर जाता है .ईट इज आल इन दा ब्रेन .प्लेसिबो अपना असरकारी जैविक प्रभाव भी दिखाने लगती है यही लब्बो लुआब है उस अध्ययन का जो एक रिव्यू के रूप में विज्ञान पत्रिका "लांसेट में छपा है ।
यानी यहाँ दिमाग बाज़ी जीत जाता है माइंड विन्स ओवर मैटर .अंतर्राष्ट्रीय माहिर एक राय हैं ,नीम हकीम भी छद्म दवा (गलत नुस्खा लिखकर )फायदा पहुंचा सकतें हैं ,मरीज़ का अपने भगवान् (डॉक्टर )पर भरोसा जो है .ठीक हो जाने का डॉक्टर द्वारा दिया भरोसा ब्रेन केमिस्ट्री को असरग्रस्त बना देता है .(आखिर ज्यादा तर रोग साइको -सोमाटिक ही तो हैं ,मन से काया में आ जातें हैं ,मन के हारे हार है मन के जीते जीत )।
बहरसूरत रिसर्च के नतीजों पर लौटतेंहैं ।
मनो विज्ञानी लिंडा ब्लेयर के मुताबिक़ (बाथ बेस्ड साइकोलोजिस्ट एंड स्पोक्स -वोमेन फॉर दी ब्रिटिश साइकोलोजिकल सोसाइटी )फायदा प्लेसिबो से नहीं होता है ,लोगों के उस विस्वास से होता है जो उन्होंने इनर्टपदार्थ (जड़ द्रव्य )में आरोपित किया हुआ है ।
डॉक्टरों को यह अच्छी तरह मालूम था ,ड्रग का प्लेसिबो इफेक्ट होता है ,लेकिन यह नहीं मालूम था ,छद्म दवा से भौतिक परिवर्तन भी हो सकतें हैं ।
लांसेट में प्रकाशित अध्धययन पर लौटतें हैं ,पार्किन्संस डिजीज से ग्रस्त लोगों को डमी टेबलेट्स दी गईं ,फिर भी उनके दिमागमें बायो केमिकल डोपामीन पैदा हुआ .दिमाग की दूसरी एक्टिविटीज़ में भी बदलाव आया .यही न्युरोत्रेंस मीटर सुखानुभूति (फील गुड की नवज बनता है )।
वाल्टर ब्राउन (क्लिनिकल प्रोफ़ेसर ऑफ़ साइकोलोजी )क्या कहतें हैं इस बाबत ?
आपके यह सोचने की देर होती है ,आप वह दवा ले रहें हैं जिससे फायदा होने वाला है ,और बस फायदा होने लगता है ,दिमाग ऐसा ही समझने लगता है .लेकिन यह विचार अमली जामा कैसे पहनता यह अभी अनुमेय ही है ।
सन्दर्भ सामिग्री :प्लेसिबोज़ में हेव बायलोजिकल इफेक्ट एज वेळ .(टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २० ,२०१० ).

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

किडनी स्टोन और मोटापा .

गुर्दे की पथरी के जोखिम को दोगुना कर सकता है मोटापा (ओबेसिटी ),यह लब्बो लुआब है उस हालिया अध्धय्यन का जो जोहन्स होपकिंस अस्पताल के साइंस दानो ने संपन्न किया है .अलबत्ता मोटापे का कम ज्यादा होना मोटापे की इन्तेंसिती(मोटापे की हद ,मात्रा ,क्वान्तिती ऑफ़ ओबेसिटी )का किडनी स्टोन के और आगे घटने बढ़ने से कोई मतलब नहीं है ।
अब तक यही समझा जाता था ,मोटापे के बढ़ने के साथ साथ किडनी स्टोन का जोखिम भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है .लेकिन ऐसा इस अध्धय्यन से स्पष्ट नहीं हुआ है .ब्रियन मत्लगा इस अध्धय्यन के अगुवा हैं .आप जोहन्स होपकिंस यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं .

बिरले रोग में एजिंग को मुल्तवी रखा स्टेम सेल्स ने ....

चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल बोस्टन और हार्वर्ड स्टेम सेल इंस्टिट्यूट की एक टीम ने इन्द्युस्द प्ल्युरिपोतेनेट स्टेम सेल्स पर काम करते हुए एजिंग और कैंसर की प्रक्रिया को समझने की दिशा में अचानक ही एक कदम आगे बढा दिया है .इन्द्युस्द प्ल्युरिपोतेनेट सेल्स ऊपरी तौर पर एम्ब्रियोनिक सेल्स के सदृश्य ही लगतीं हैं लेकिन इन्हें आम चमड़ी कोशिकाओं (स्किन सेल्स )से ही तैयार किया गया है .इन कोशिकाओं को तैयार करते वक्त ऐसा प्रतीत हुआ जैसे इसी प्रक्रिया से ना सिर्फ एजिंग और कैंसर को समझने में मदद मिल सकती है ,बुढ़ाने की प्रक्रिया को nilambit bhi रखा jaa saktaa है .multavi रखा jaa saktaa है ।
itnaa ही nahin एक ati viral रोग dyskeratosis को समझने में bhi मदद मिल सकती है yah एक viraast में milne vaalaa रोग है jo वक्त से pahle yaani asamay ही vyakti के बुढ़ाने की vajah ban jaataa है ।
dyskeratosis kyaa है ?
dys is a prefix meaning bad ,difficult ,painful ।
keratosis :growth of hard horny tissue on the स्किन is called keratosis ।
Dyskeratosis :keras ,horn ,+osis,condition
Epithelial altaerations इन which certain isolated malpighian cells become differentiated .It is any alteration इन the keratinization of epithelial cells of the epidermis .This is characterstic of many स्किन disorders ।
स्टेम cells kyaa हैं ?
These are undifferentiated cells that can give rise to other cells of the same type indefinitly or from which specialised cells for example blood cells develop ।
According to स्टेम cell scientists counting from the day of conception (fertilization that is meeting of spermatazon with the human egg i.e.ovam )when the cells are few days older (after cell divisions continued say upto १४ days from the day of conception )the cells are called स्टेम cells .These are undifferentiated cells .But these carry a soft ware to make all sorts of cells and body part .these स्टेम cells are endowed with a soft ware to do so .After a fortnight the cells become differentiated .They now perforf specific functions .स्टेम cells can be coaxed to make specific body parts .These can be used for autologous transplant without fear of rejection .At the time of birth स्टेम cells can be taken from the placenta and can be preserved .Umbilical cord is also a source of स्टेम cells for future use .

झूठ मूठ को ही सही लेकिंखुश रहिये दिल की सलामती के लिए ...

दिल के दौरे से बचे रहना है तो धूम्र पान से परहेज़ रखिये स्वास्थ्यकर भोजन लीजिये कसरत करिए ,लेकिन इससे भी ज्यादा ज़रूरी है ,खुश रहिये .खुश दिखिए झूठ मूठ को ही सही .धनात्मक संवेग (पाजिटिव इमोशंस )और कोरोनरी हार्ट डिजीज में निश्चय ही एक रिश्ता है .परिह्रिद्यधमनी रोग के मूल में ख़ुशी से मेह्रूमियत भी कहीं ना कहीं चस्पां है .यकीं मानिए खुश रहना दिल की सलामती की कुंजी है ।
एक नवीनतर अध्धययन का यही निचोड़ है ,सार है .भले ही आप स्वभाव से ही गुस्सेल हैं बात बात पर चिडजातें हैं .खुश रहने का अभिनय करके ही देखिये ,ऊपरी तौर पर ही सही खुश दिखिए ।
अपने अध्धययन में रिसर्चरों ने कूल्म्बिया यूनिवर्सिटी के तत्वाधान में १७०० लोगों के खुश रहने के स्तर (हेपीनेस लेवल )का जायजा लिया .यह सभी लोग कनाडा वासी थे जिन्हें १९९५ में कोई भी दिल की बीमारी नहीं थी .एक दशक के बाद उन का फिर से जायजा लिया गया .१४५ लोग दिल की बीमारियों की चपेट में आ गए थे .पता चला खुस फ़हम खुश मिजाज़ लोगों के लिए हृद रोगों का ख़तरा कम हो गया था .उनके हृद रोगों की चपेट में आने की समभाव ना भी कमतर रही .योरोपीय हार्ट जर्नल में ओंन लाइन उक्त अध्धययन के नतीजे प्रकाशित हुए हैं ।
करीना डेविडसन (कूलाम्बिया यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर )के नेत्रित्व में यह अध्धययन संपनहुआ है ,आप कहतें हैं "इफ यु आर नोटअ हेपी पर्सन त्र आई जस्ट तू बी वन ,ईट कूद हेल्प यूओर हार्ट ".दिल पे मत ले यार ।
दो फलसफे हैं ज़िन्दगी के एक :"पूछना है गर्दीशे ऐयाम से /अरे हम भी बैठेंगें कभी आराम से
दूसरा नज़रिया कुछ यूँ है :जाम को टकरा रहा हूँ जाम से /अरे खेलता हूँ गर्दिशे ऐयाम से /और उनका गम ,उनका तस्सवुर उनकी याद /अरे कट रही है ,जिंदगी आराम से ।
गर्दिशे ऐयाम =गर्दिश के दिन .

वक्ष की महिमा अपरम्पार .......

कविवर दिनकर ने उर्वशी में लिखा :और वक्ष के कुसुम कुञ्ज सुरभित विश्राम भवन ये ,जहां मृत्यु के पथिक ठहर कर श्रान्ति दूर करते हैं . कवि रसलीन एक कदम और आगे निकल गए उन्होंने कहा :कनक छवि सी कामिनी ,कटी काहे को क्षीण /कटी को कंचन काटि विधि ,कुचन मध्य धरि-दीन्ह ।
अब साइंसदान भी यही कर रहें हैं ,नारी का आकर्षण बिन्दु ,उसकी सबसे बड़ी धरोहर ,माल मत्ता ,संपत्ति उसका वक्ष प्रदेश ,वक्ष स्थल है ।
असेट टेस्ट :मेन लुक एट ब्रेस्ट्स फस्ट (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी १९ ,२०१० ,पृष्ठ १९ केपिटल संस्करण )का भी यही लब्बो लुआब है जिसमे उस अध्धययन का हवाला दिया गया है जो हाल ही में संपन्न हुआ है .पता चला है तकरीबन आधे मर्द औरत का चेहरा बाद में देखतें हैं पहले उनकी नजर चुपके से उसके वक्ष स्थल को चोरी चोरी देख लेती है .एक दीर्घ सर्वे में पता चला है १० में से४ मर्द इस बात की तस्दीक करतें हैं ,वह दिन भर में एक औरत के वक्ष को कमसे कम १० बार तो निहार ही लेतें हैं ।
न्यू कासल के मर्द औरत के वक्ष स्थल के बीच के भाग क्लीवेज को झट से देख लेतें हैं उसकी आँखों में बाद को ही देखतें हैं .(दुनिया भर के मर्दों का यही हाल होगा ,हो भी क्यों ना सबसे पहले शिशु इसी वक्ष से ही तो पेय प्राप्त करता है अमृत पान करता है यही तो उसका प्राकृत टीका करण भी है फस्ट फीड इम्यून सिस्टम को बूस्ट करती है ,इम्युनिटी प्रदान करती है ,तभी से तो यह अनुराग चला आया है .औरत भी इस दौलत से बाखूबी वाकिफ है ,सारी कोस्मेटिक सर्जरी इस वक्ष की पुनर संरचना के गिर्द ही तो घूम रही है ।).
न्यू कासल के मर्दों ने तो मुक्त भाव से इसे माना है १००० मर्दों में से ज्यादातर ने यही कहा पहले हमारे लियें वक्ष पर नजर डालना ज़रूरी हो जाता है .चेहरे और आँखों का नंबर तो बाद को आता है ।
यहाँ तक की युवतियां भी दूसरी युवतियों के वक्ष स्थल का एक दिन में सात बार तक जायजा ले लेतीं हैं ,खासकर अपनी ब्रेस्ट एनवी संग्नियों का ,सहेलियों सहकर्मियों का . १० में से ९ औरतें बराबर ऐसा करतीं हैं .आधी इस बात की तस्दीक करतीं हैं उनकी कई ब्रेस्ट एनवी फ्रेंड्स हैं .ब्रितानी महिलायें तो अपने वक्ष प्रदेश के लघुतर आकार से दुखी हैं ६३ फीसद बड़ा वक्ष स्थल चाहतीं हैं .लेकिन आधे मर्द अपनी जोरू के वक्ष प्रदेश को संतोष जनक मानतें हैं उसमे किसी प्रकार के बदलाव कोस्मेटिक सर्जरी के वह हामी नहीं हैं .

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

गर्भ से ही भाषा सीखता है गर्भस्त ......

बेबीज़ केंन बी बाई -लिग्युअल राईट फ्रॉम वोम्ब .हेअरिंग टु लेग्वेज़िज़ इन नेटल स्टेज हेल्प्स इन पीकिंग अप बोथ (टाइम्स ऑफ़ इंडिया फ़रवरी १८ ,२०१० )।

एक अध्धययन में पता चला है उन गर्भास्थों के द्वि -भाषी होने की प्रवृत्ति ज्यादा रहती है ,जो गर्भ -काल में दो भाषाओं को सुनते रहतें हैं यानी जिनके माँ बाप दो भाषाओं का स्तेमाल करतें हैं .साईं - कोलोजिकल साइंस पत्रिका में इस अध्धय्यन के नतीजे प्रकाशित हुए हैं .लब्बो लुआब अध्धययन का यह है गर्भ से ही बच्चा द्वि -भाषी हो सकता है ।
इस अध्धययन में ब्रिटिश कूलाम्बिया विश्व -विद्यालय के अलावा फ्रांस आर्थिक सहयोग और विकास संघ के एक रिसर्चर शरीक रहें हैं ।
अध्धययन के तहत नवजातों को दो वर्गों में रखा गया .एक वर्ग उनका जिनके माँ बाप अंग्रेजी के साथ साथ फिलिपाईन्स की भाषा तगालोग भी बोलते थे .ये बच्चे गर्भ से ही दोनों भाषा सुनते आये थे .जबकि दुसरे वर्ग के बच्चे सिर्फ अंग्रेजी बोलने वाले परिवार से ताल्लुक रखते थे ।
गर्भ काल में इन्हें दस मिनिट तक हर एक मिनिट के बाद बारी बारी से अंग्रेजी और तगालोग सुनवाई गईं .पता चला ,शिशु को जब कोई भाषा दिलचस्प लगती है वह मनोयोग से स्तनपान करने लगता है ,दिलचस्पी ख़त्म हो जाने पर वह या तो दूसरी भाषा की और मुखातिब होने लगता है या उसी भाषा को दोबारा सुनने लगता है बा शर्ते यह किसी और व्यक्ति के द्वारा बोली जाए या फिर पहले वाली भाषा को दोबारा दिलचस्पी के साथ सुनने लगता है .इसका मतलब यह हुआ भाषा सीखने की प्रवृत्ति गर्भ काल में ही विकसित होने लगती है ,पेट से ही लेकर आ सकता है बच्चा भाषा ज्ञान .

नींद से जुडी है निर्णय लेने की क्षमता ....

विज्ञानियों ने बारहा ६-८ घंटा नींद अच्छे स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी बतलाई है .अब नीदर्लेन्ड इन्स्तित्युत ऑफ़ न्यूरो -साइंसिज़ ने "बायलोजिकल साइकेट्री"पत्रिका में प्रकाशित अपने एक अध्धययन मेंअनिद्रा और हमारे दिमाग के निर्णय लेने की क्षमता में एक़ अंतर सम्बन्ध का पता लगाया है ।
अध्धययन में रिसर्चरों ने २४ उम्रदराज़ लेकिन अनिद्रा रोग से ग्रस्त लोगों के दिमाग के उस हिस्से में वाईट और ग्रे मैटर का ब्रेन इमेजिंग से पता लगाया है जो निर्णय लेने से ताल्लुक रखता है .शरीर को आराम भी यही हिस्सा करवाता है .वाईट और ग्रे मैटर के इस वोल्यूम की तुलना १३ ऐसे लोगों के इसी हिस्से में मौजूद वाईट और ग्रे मैटर वोल्यूम से की गई जो भरपूर नींद लेते थे ,नोर्मल सब्जेक्ट्स थे ये लोग .भौतिक और मनोरोग सम्बन्धी प्रावधानों का भी ख़याल रखा गया ताकि इन वजहों से अध्धययन के नतीजों में विक्षोभ पैदा ना हो ।
गहन अनिद्रा रोग से ग्रस्तलोगों के दिमाग के संदर्भित हिस्से में ग्रे मैटर डेंसिटी ह्रास ज्यादा दर्ज हुआ .अब सवाल यह है :पहले अंडा या फिर मुर्गी यानी ग्रे मैटर डेंसिटी का ह्रास अनिद्रा का कारण बना या अनिद्रा ने ग्रे मैटर के वोल्यूम को कमतर किया ।
अलबत्ता एक बात साफ़ है ,निम्न ओर्बिटो फ्रंटल ग्रे मैटर डेंसिटी अनिद्रा रोग (इनसोम्निया )के जोखिम को बढाता है .अध्धययन के मुखिया एल्लेमारिजिए अल्तेना का यही मानना है .आप केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी विश्विद्यालय के क्लिनिकल न्यूरो -साइंसिज़ विभाग में रिसर्च असोसिएट हैं .आप के ही शब्दों में आइन्दा सभी उम्र के लोगों पर ऐसी ही आजमा -इशें की जायेंगी ताकि यह पता लगाया जा सके ,पहले अंडा या फिर मुर्गी ?
अलबत्ता अनिद्रा रोग न्युरोलोजिकल डेमेज की वजह बन रहा है .उम्मीद रखिये अनिद्रा रोग का बेहतर इलाज़ खोजा जा सकेगा .

मासिक स्राव (मेन्स्त्र्युअल् क्रेम्प्स )के दौरान होने वाली ऐंठनसे राहत के लिए .....

कई युवतियों को माहवारी (मासिक स्राव ,मासिक धर्म ,मेन्स्त्र्युअल् ब्लीडिंग )के दरमियान जोर से और देर तक पेट में होने वाला दर्द ,पेडू की ऐंठन बेहद तकलीफ देह साबित होती है .अमूमन इससे राहत के लिए महिलायें एंटी -स्पाज्मोतिक ,पेंकिलार्स का स्तेमाल करतीं हैं .अब साइंस दानों ने पता लगाया है ,एक्यु -पंचर इस दर्द और असहनीय पीड़ा से राहत दिलवाने का असरकारी ज़रिया बनता है ।
साउथ कोरिया ओरिएंटल अस्पताल और मेडिकल सेंटर के विज्ञानियों ने ३००० महिलाओं पर अब तक किये गए तमाम सर्वेक्षणों की गहन पड़ताल करने के बाद पता लगाया है ,एक्यु -पंचर दवाओं और हर्बल मेडिसिन (जड़ी बूटी चिकित्सा )से ज्यादा असरकारी साबित होता है ."क्युंग ही यूनिवर्सिटी के '"तत्वाधान में स्तिथ है यह चिकित्सा केंद्र ।
दरअसल एक्यूपंचर चिकित्सा स्रावी तंत्र को सक्रीय कर (एन्डोक्राइन सिस्टम को स्तिम्युलेट कर )केन्द्रीय स्नायु तंत्र में एन्दोर्फिंस और सेरोटोनिन के उत्पादन को एड लगा देता है ।
एक लम्बी दौड़ के बाद खिलाड़ियों को इसी एंडोर्फिन की वजह से सुखानुभूति होती है .सेरोटोनिन एक न्यूरो -ट्रेन्स -मीटर है ,जिसे हमारा दिमाग कई अन्य रासायनिक हरकारों (मेसेंजर्स )के साथ तैयार करता है ।
इसीलिए फार्माकोलोजिकल ट्रीटमेंट के बरक्स एक्यु -पंचर को एक बेहतरीन दर्द निवारक का दर्ज़ा मिल रहा है ।
जर्नल ऑफ़ ओब्स्तेत्रिक्स (स्त्री रोग विज्ञान )एंड गा -इनोकोलोजी में उक्त नतीजे प्रकाशित हुए हैं .ताज़ा अंक देखिये इस विज्ञान पत्रिका का .

कूड़े कचरे से चलेंगें अब विमान .

ब्रितानी एयर वेज़ यूरोप का पहला ग्रीन जेट फ्यूल प्लांट लगाने का इरादा रखे है .यह २०१४ तक बाकायदा कूड़े कचरे को ग्रीन फ्यूल (कार्बन -मुक्त ईंधन )में तब्दील कर विमानों को एवियेशन फ्यूल मुहैया कराने लगेगा .अमरीकी बायो -एनर्जी कम्पनी इस प्लांट की एक सहयोगी कम्पनी के बतौर काम करेगी .इस जैव ऊर्जा निगम का नाम है "सोलेना "।
समझा जाता है यहप्लांट २०१४ तक५००,००० टन लेंड- फिल वेस्ट (जिसमे घरेलू तथा उद्योगिक कचरा भी शामिल रहेगा )से तकरीबन १६ मिलियन गेलंन कार्बन न्यूट्रल एवियेशन फ्यूल तैयार करने लगेगा .इसकी मदद से ब्रितानी एयरवेज़ की सभी फ्लाइट्सउड़ाने भरेंगी ।
इससे एमिशन दर (उत्सर्जन दर )केरोसीन ईंधन के बरक्स ९५ फीसद कम की जा सकेगी .यानी आम के आम गुठलियों के दाम .दूसरे शब्दों में यह कदम सड़कों से ४८,००० कारों को हठालेने के तुल्ल्य रहेगा ।
जेट विमानों के लिए जैव ईंधन तैयार करने के मामले में प्रगति की रफ़्तार धीमी रही है तो केवल तकनीकी कारणों से इस ईंधन को निम्तर ताप पर काम में लेना पड़ता है .हाई -एनर्जी केपेसिटी भी बराबर चाहिए ।
लेकिन वाशिंगटन डीसी आधारित सोलेना लंदन प्लांट में अलग किस्म का ईंधन तैयार करने जा रही है .इसमें परम्परा गत जेट ईंधन नहीं मिला ना पडेगा .यह नोर्मल फोसिल फ्यूल जेट फ्यूल का स्तेमाल ग्रीन फ्यूल के साथ मिश्र के रूप में नहीं करेगा .ब्रितानी एयर वेज़ का लक्ष्य २०५० तक उत्सर्जन में ५० फीसद कटौती करलेने का है ।
एक गेलंन ४.५५ लिटर ले बराबर माना जाता है इंग्लेंड में जबकि इसका अमरीकी माप ३.७९ लिटर है .

कैंसर मरीजों की जीवन अवधि बढाने के लिए विटामिन सम्पूरण ...

ब्रिटेन और डेनमार्क के साइंस दानों ने पता लगाया है ,कैंसर मरीजों की जीवन अवधि विटामिन -कोकटेल नियमित लेने से पांच माह या और भी ज्यादा बढ़ जाती है ।
डेनमार्क में इन दोनों देशों के शोध छात्रों (रिसर्चरों ने )स्तन (ब्रेस्ट कैंसर )लंग (फेफड़ों का कैंसर )तथा बड़ी आंतके कैंसर के अलावा अन्य कैंसरों के मरीजों का बरसों रिकार्ड रखा है .विटामिन सम्पूरण देते रहने से इनकी जीवन अवधि औसतन पांच माह तक बढाई जा सकी .यह रोग की आखिरी अवस्था में चले आये थे .ले देकर इन्हें एक साल और ज़िंदा रखा जा सकता था लेकिन पांच में से तीन मरीज़ पांच माह या और भी ज्यादा मोहलत पा गए .इन्हें विटामिन कोकटेल दिया जा रहा था .

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

आदिम -बिग बेंग सूप लैब में ......

साइंस दानों ने अब तक का उच्चतर तापमान लैब में अल्प काल के लिए पैदा कर दिखाया है .४ ट्रिलियन सेल्सिअस है यह उच्चतर ताप मान .(ए थाउजेंड बिलियन इज ए ट्रिलियन ,एंड ए थाउजेंड मिलियन इज ए बिलियन ,ए मिलियन इज टेनलेक )।
समझा जाता है सृष्टि के आरम्भ में एक आदिम -अनु सृष्टि का समस्त गोचर ,अगोचर पदार्थ अपने शून्य आयतन (आकार )में छिपाए था .यह आदि -अणू एक साथ सब जगह मौजूद था .तब ना आकाश काअस्तित्व था ना काल का .इस आदिम अणु में एक अतिउत्तप्त (हॉट सूप )भरा था .एक विस्फोट इस आदि अणु में अब से कोई १३ अरब बरस पहले हुआ .उसी के बिखरते फैलते टुकड़ों से यह सृष्टि बनी .यही "बिग बेंग "कहलाता है .इस क्षण के पुनर -उत्पादन के प्रयास फ्यूज़न के ज़रिये जब तब किये गए हैं ।
उसी की एक कड़ी है "बिग बेंग सूप "की साइंसदानों द्वारा लैब में सृष्टि .इस एवज इन्होनें एक विशाल काय एटम-स्मेषर का स्तेमाल किया है .ब्रूखेवन नेशनल लेबोरेट्री ,न्युयोर्क (अमरीकी ऊर्जा विभाग का एक अंग )में स्तिथ है यह परमाणु तोड़क जिसमे गोल्ड आयनों की ज़ोरदार टक्कर करवाई गई है .इस विस्फोट के फलस्वरूप एक सेकिंड के हजारवें भाग तक अति उच्च ताप पैदा करने में कामयाबी मिली है ।
इस अल्ट्रा हॉट एक्स्प्लोज़ंन जैसी ही परिस्तिथियाँ सृष्टि के उस विधायक पल में रहीं हैं जिसे बिग बेंग कहा जाता है .विज्ञानियों के लिए इसे हासिल करना "होली ग्रेल "रहा है ।
बकौल स्टेवेंन विग्दोर (ब्रुक हेवेन के एक साइंस दान )इस परा -उत्तप्त तापमान पर "न्युत्रोंन "और "प्रोटोन "भी गल पिघल जातें हैं .द्रव्य के यह कण स्वयं क्वार्क्स और ग्ल्युओंस का जमा जोड़ हैं .द्रव्य की बुनियादी कणिकाएं आज भी अपना अस्तित्व तलाश रहीं हैं ।
विज्ञानी यह जान लेने को आतुर हैं महा विस्फोट के बाद ता -इनी इरेग्युलरितिईज़ के तहत ऐसा क्या हुआ जो की पदार्थ एक गठबंधन ,के तहत इस आदिम सूप से अलग हुआ ,अवतरित हुआ गोचर सृष्टि के रूप में .यह जानकारी "स्प्रिन्त्रोनिक्स "के बड़े काम की चीज़ है .स्प्रिन्त्रोनिक्स के तहत लघुतर ,तेज़ी से काम करने वाले (स्पीदियर ),शक्तिशाली कम्प्यूटर्स बनाने की दिशा में काम चल रहा है ।
यह सारा काम अंजाम दिया गया है उस "रिलेतिव्स्तिक हेवी आयन कोला इदर "के ज़रिये जो ज़मीन के १२ फीट नीचे एक २.४ मील के घेरे में स्थापित है .यही वह करामाती पार तिकिल एक्स्लारेटर और कोलाई दर है .कण त्वरक है जो कणों की परस्पर आमने सामने से वेगवान टक्कर करवाता है .नतीज़न कुछ नया घटता है ।
इसी में स्वर्ण आयनों की अरबों टक्कर करवाई गईं हैं .इसे बिग बेंग जैसी परिस्तिथियाँ लैब में पैदा कर्पाने की संभावना के मद्दे नजर ही पैदा किया गया था .इसी के ज़रिये ४ ट्रिलियन सेल्सियस ताप मान पैदा किया जा सका है सेकिंड के हजारवें हिस्से तक यह ताप मान बना रहा है .यह कोई कमतर उपलब्धि नहीं है .२ केल्विन ताप मान पर प्रोतोंस और न्युत्रों कणों के पिघलने का अनुमान लगाया गया है .एक ता -इप २ सुपरनोवा की कोर में २ बिलियन सेल्सियस तथा सूरज का अंतर प्रदेश (कोर )मात्र ५ करोड़ सेल्सियस आंका गया है .१८०० सेल्सियस पर धमन भट्टी में लोहा गल पिघल जाता है .हमारी सृष्टि का वर्तमान में औसत तापमान परम शून्य से मात्र ०.७ केल्विन ऊपर है .फैलते फैलते अपने जन्म के बाद से सृष्टि ठंडी हो गई है ।
विग्दोर जान लेना चाहतें हैं ,आखिर उस प्रैमिवल सूप से क्वार्क -ग्ल्युओंस के संघनन (कंडेंस होने से )से हेद्रोंस (सृष्टि के गोचर कण )कैसे बने ?विज्ञानी इसी पल का पुनर उत्पादन लैब में कर लेना चाहते रहें हैं .एक कदम आगे बढ़ें हैं इसी दिशा में .एक असंतुलन बिग बेंग के फ़ौरन बाद पैदा हुआ था .फलस्वरूप गोचर पदार्थ (मैटर ) ,प्रति -पदार्थ एंटी मैटर से ज्यादा हो गया .यदि ऐसा ना हुआ होता तब सृष्टि में सिर्फ अदृश्य ऊर्जा का डेरा होता .

अब मर्द के लिए गर्भ निरोधी सुइंयाँ .....

अभी तक परिवार नियोजन के उपाय औरत को ही अपनाने पड़ते थे .कारण मर्द हमेशा ही रीयल स्टफ की मांग करता है "कंडोंम "से छिटकता रहा है,ओरल कोंत्रासेप्तिव लेना ऐसे में औरत के ही जिम्मे आता रहा है ,चाहे फिर वहभ्रामक आई -पिल हो ,जो निरापद नहीं है या फिर ६ दिनी आपात कालीन गर्भ निरोधी टिकिया ।या फिर आम गर्भ निरोधी टिकिया .
ऐसे में दो महीने के अंतराल पर लगने वाले दो इंजेक्शन जो मर्द को लगाए जायेंगे औरत के लिए ठंडी बयार के झोंके से कम नहीं है .साइंस दान इस दवा के परीक्षणों पर काम कर रहें हैं ,जिसे हर दो महीने के अंतराल पर दो सुइंयों के बतौर मर्द को लगाया जाएगा ।
इस दवा के परीक्षणों में औरत मर्द के लगभग अस्सी जोड़े भाग ले रहें हैं .एडिनबरा यूनिवर्सिटी में चल रहीं हैं ये आजमाइशें.यह दवा मिश्र होगी मेल सेक्स हारमोन "तेस्तोस्त्रोंन "और फिमेल हारमोन (मानव निर्मित )प्रोजेस्त्रोंन का .यह दवा मिश्र हमारे दिमाग को स्पर्म तैयार ना करने का आदेश पारित करेगी यानी दिमाग को बर्गालाएगी .ऐसे में दिमाग अन्य हारमोन के स्तर में भी कमीबेशी पैदा कर देगा जो स्पर्म उत्पादन को नियंत्रित करतें हैं .साइंसदानों की माने तो यह दवा ९९ फीसद मामलों में कारगर है .सुइंयों का सेवन एक बारगी बंद करने के बाद स्पर्म दोबारा बन ने लगेंगें यानी रिवार्सिबिल है यह गर्भ निरोधी उपाय .ठीक दो महीने के अंतराल पर लगने वाली दो सुइंयाँ .यकीन मानिए "जाब फॉर मेंन में मेक पिल हिस्ट्री ".

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

तुतनखामन रहस्य के परदे से बाहर आये ....

प्राचीन मिश्र में फैरो मिश्र के बाद्शाओं को दी जाने वाली उपाधि थी .इन राजाओं को बेइंतिहा अधिकार प्राप्त थे .लेकिन इनमे सबसे मशहूर और करामाती बादशाह रहें हैं -तूतन
-खामन .आप नौ बरस की उम्र में राजा बन गए थे . कौन हैं यह प्राचीन मिश्र के सबसे मशहूर बाल बादशाह जो जीते जी एक किम्वदंती बन गए थे .एक कल्ट (पूजा -पद्धति )ही चल निकली थी आपके नाम से .लोग इस फैरो (मिश्र के बादशाहों को दी जाने वाली उपाधि )को परमात्मा (अल्लाताला ,खुदा )की तरह पूजने लगे थे .अलबत्ता आदिनांक इनका जन्म और मृत्यु दोनों ही रहस्य के आवरण में रहें हैं .(१३४६ ईसा पूर्व ?-१३२८ ईसा पूर्व )।
अब लगता है इनकी ममीसे डी एन ए लेकर परिक्षण के बाद रहस्य का यह कुहाँसा छटने लगा है .बकौल मिश्र के प्राचीन सभ्यता और इतिहास विद इन्हें गोल्ड कोफीन में रखा गया था .तीन हज़ार वर्ष पूर्व (३००० ईसा पूर्व ).इस विख्यात फैरो की ममी का डी एन ए परीक्षण गत १८ महीनों से चल रहा था .अलावा इसके इन्हीं के बरीयल चेंबर में दो फीटस रखे थे .इनकी भी डी एन ए जांच की गई है ।
१९२२ में इस गुम्बद की खोज प्राचीन इतिहास संस्कृति विद होवार्ड कार्टर (ब्रितानी आर्खियोलोजिस्त )ने की थी .प्राचीन कला और इतिहास का बहुत कुछ धुंध में छिपा है .प्रोद्योगिकी इस पर से रहस्य का आवरण हठाने को तैयार है .उसो के तहत डी एन ए परीक्षण किये गए हैं .अलबत्ता करामाती बाल बादशाह तुतिखामन की अम्मीजान की ममी का अभी कोई सुराग नहीं मिल सका है .आप थीं क्वीन नेफेरतिति .?क्या दोनों भ्रूण जो राजा तुतिखामंन की बगल से मिलें हैं क्वीन की ही संतानें हैं ?
कोई यह भी नहीं जानता बादशाह (टूटन खामन )की मृत्यु कैसे और कब हुई .हो सकता है डी एन ए परीक्षणों के नतीजे कुछ ख़ास बतलाएं ?अमरीकी चिकित्सा संघ ने नतीजों को अपनी विज्ञान पत्रिका (जर्नल )में प्रकाशित किया है .

जीवन को चकमा देकर जान बचाने की कोशिश (ज़ारी ..)

बायलोजिकल स्लीप विज्ञान कथाओं के दायरे से बहार निकल कर जीवन की सेवा को आतुर है .करोड़ों सालों से जीवाणु और पादप -बीजाणु ,प्लांट सीड्स ,स्पोर्स शीत निद्रा में हैं ,फिर आदमी क्यों नहीं रह सकता ?आखिर हार्ट लंग मशीन यही काम कर रही है ,गंभीर चिकित्सा मामलों में ऐसा शरीर को पूर्ण -विराम देने के लिए किया ही जाता है .ताकि वाइटल स्टेबिल रहें शरीर इस दरमियान धीरे धीरे खुद को कालांतर में संभाल लेता है .यही मर्म है ,सस्पेंदिद एनीमेशन ,प्रेरित -शीत निद्रा का भी (इन्द्युस्द -हाइबर नेशन का )।
यूं हाइड्रोजन सल्फाइड गैस मानवीय और पशु कोशिकाओं में कुदरती तौर पर भी अल्पांश में पैदा होकर मेटाबोलिक एक्टिविटी (चयअपचयन प्रक्रिया ,रेट ऑफ़ बर्निंग केलोरीज़ )तथा कोर टेम्प्रेचर को बनाए रखने में एक असरकारी भूमिका निभाती है .लेकिन इसका आधिक्य ओक्सिजन के चय अपचयन को निलंबित करदेता है .रोग की अंतिम अवस्था (टर्मिनल स्टेज ऑफ़ इलनेस )में पहुँच चुके मरीजों की मेटाबोलिक दर को इसकी मदद से कम करके मौत से थोड़ा वक्त उधार लिया जा सकता है .दिल के दौरे के मामले में यह टिश्यु डेमेज को कमतर रखने में सहायक हो सकती है ,चिकित्सा मिलने तक ,यहाँ वक्त ही जीवन दाता बनजाता है .मरीज़ को फ़ौरन चिकित्सा मिलनी चाहिए ,लेकिन मिल कहाँ पाती है .आखिर हृद पेशी का एक हिस्सा मर ही जाता है .ऐसे ही मामलों में "सस्पेंदिद एनीमेशन "करामाती सिद्ध हो सकता है .हाइड्रोजन सल्फाइड मेटाबोलिज्म के लिए एक डिमर -स्विच की तरह काम कर सकती है ।
रथ के ही शब्दों में "हमने इसे एक माँ -उस पर आजमाया है .वी दीद ईट विद ए माउस ,दिस वाज़ कोस्मिक "वी फा -उन्द ए वे तू दू दिस विद ए मेमल .आल यु हेड तू दू वाज़ पुट ईट इन रूम टेम्प्रेचर एंड ईट वाज़ नो वर्स फॉर दी वीय य्र्स .

जीवन की सलामती के लिए मौत को चकमा ....

अकसर किसी दुर्घटना में बहुत अधिक खून बहने से व्यक्ति की मौत हो जाती है ,ऐसा ही मायोकर्दियेक -इन्फाक्षण (एम् आई )के वक्त होता है ,हृद पेशी का वह भाग मृत हो जाता है जिसे रक्त आपूर्ति नहीं हो पाती .अब ऐसे में यदि मेटाबोलिक रेट्स को किसी विध कमतर कर लिया जाए तो जीवन रक्षक चिकित्सा के लिए थोड़ी मौहलत मिल सकती है .सवाल है क्या जीवन को थोड़ी देर के लिए मुल्तवी रखा जा सकता है ,मौत को लौटाया जा सकता है खाली हाथ ?मानव काया को सस्पेंदिदएनीमेशन में रखा जा सकता है ?जीवजगत में ,वनस्पतियों ,बीजों में ऐसा अकसर होता है ,रेंगने वाले प्राणियों से लेकर तक पोलर बियर तक ,बिलों में रहने वाले ग्राउंड -होग तक तमाम तरह के प्राणी प्रतिकूल मौसम में शीत निद्रा में चले जातें हैं ।
किम्वदंती है ,ऋषि मुनि हिमालय की कंदराओं में अकसर अपनी ओक्सिजन खपत न्यूनतम करके यौगिक किर्याओं के ज़रिये शीत निद्रा (हाइबर -नेशन )में चले जाते थे .अब विज्ञानी यही काम हाइड्रोजन -सल्फाइड गैस के ज़रिये कर लेने की ताकमें है .बेशक बहुलांश में यह एक विषाक्त गैस है लेकिन अल्पांश में तमाम जैविक प्रक्रियाओं की रफ़्तार किसी भी ओर्गेनिस्म (जीवित प्रणाली में )यह गैस कुछ समय के लिए थाम सकती है ,चय-अपचय (रेट ऑफ़ बर्निंग केलोरीज़ )को कमतर करके ।
दी स्टॉपिंग आर स्लोइंग ऑफ़ वाई टल फंक्शन्स ऑफ़ एन ओर्गेनिज्म फॉर सम पीरियड ऑफ़ टाइम ,स्पेशियली बाई फ्रीजिंग ,ए स्टेट ओफतिन काज्द बाई एस्फ़ाइग्स्ज़िया (दम घुटना )इन विच एन ओर्गेनिज्म लूज़िज़ कोंशाश नेस एंड स्टोप्स ब्रीडिंग सो देत ईट एपियार्स तूबी डेड ,आर एग जाम्पिल्स ऑफ़ सस्पेंदिद एनीमेशन ।
"इंजर्ड ?हाइबरनेट तू डोज डेथ "शीर्षक है उस रिपोर्ट का जो टाइम्स ऑफ़ इंडिया के १५ फरवरी अंक में छपी है .लब्बोलुआब यही है ,"इन्द्युसिंग सस्पेंदिद एनीमेशन विद हाइड्रोजन सल्फाइड कें हेल्प बाई टाइम तू सेव लाइव्स "बेशक रासायनिक हथियारों में यही गैस ?हाइड्रोजन सल्फाइड जान लेवा साबित होती है लेकिन अल्पांश में यही जीवन रक्षक बन जाती है व्यक्ति को सस्पेंदिद एनीमेशन में लाकर ।
बकौल जैव विद मार्क रोथ यह जीवों को शीत निद्रा में ले आती है .ऐसे में मौत का आभास ज़रूर होता है लेकिन प्राणी जीवित रहता है आवश्य क जीवन रक्षक चिकित्सा के लिए ऐसे में वक्त मिल जाता है .वक्त के साथ ही तो आदमी की जंग चलती है .वक्त अकसर जीत जाता है ।
रोथ मेटाबोलिक फ्लेक्सेलिबिलिती को परत दर परत समझ लेना चाहतें हैं .हो सकता है भविष्य में कोई चिकित्सा तेक्निशीयन आपात कालीन कक्ष में लाये मरीजों को चिकित्सा मुहैया करवाने से पहले थोड़ा हाइड्रोजन सल्फाइड देदे ताकि प्राण पखेरू उड़ने से पहले तसल्ली बख्श आपातकालीन चिकित्सा मिल जाए ।
आखिर जीवन के चिन्ह उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की बर्फ के नीचे कबसे शीत निद्रा में दबे पड़े हैं .फ्रेड होइल (मश -हूर रेडियो खगोल विज्ञानी )ऐसा ही मानतें हैं .यह जीवन धूमकेतु इतर अन्त्रीक्षीय पिंडों से यहाँ पहुंचा है .

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

कामोत्तेजना बढाने के लिए गम (गोंद).....

फ्लोरिडा आधारित एक कम्पनी अब बाज़ार में एक गोंद (गम )लेकर आरही है ,पुरूष की कामोत्तेजना बढाने के लिए .इसके आविष्कार करता टोम्मी बाबिल कहतें हैं -मैंने इसे खुद अपने पर अजमाया है ."सेक्स्लेट्स आपका मूड बना देतीं हैं .इसे बाज़ार में एक संपूरक के बतौर उतारा गया है ,सेक्स्लेट्स गम दिन में बस तीन बार चूसिये और ज़िन्दगी का भरपूर मज़ा लीजिये ।
बकौल बाबिल इसे जिन्सेंग से तैयार किया गया है (जिन्सेंग एक सुगन्धित जड़ है जिसकी शाखाए (फोर्क्स )होतीं हैं .).परम्परागत चीनी दवाओं में जिन्सेंग का स्तेमाल किया जाता रहा है .मरदाना ताकत के लिए यह व्याग्रा है .चीन में इसका स्तेमाल एक टोनिक (आसव )के बतौर किया जाता रहा है .जिन्सेंग इज ए प्लांट देट प्रोद्युसिस दी जिन्सेंग रूट्स .नेटिव टु एसिया ,नोर्थ अमरीका ।
संदर्भित सेक्स्लेट्स जिन्सेंग के अलावा विटामिन -ई ,तथा योहिम्बे (एक वृक्ष )की छाल (बार्क ) से भरपूर हैं .इस वृक्ष की छालसदियों से अफ्रिका महाद्वीप में एक यौन उत्तेजक पदार्थ के रूप में काम में ली जाती रही है .इसमें ओर्चिक पाउडर भी रहता है .समझा जाता है यह वृषभ (बुल )के अन्डकोशों (तेस्तिकिल्स )से तैयार चूर्ण होता है ।
बात साफ़ है यह पुरूष यौन उत्तेजना के ह्रास का दौर है इसीलिए तरह तरह के यौन उत्तेजक पदार्थों का स्तेमाल किया जा रहा है .वाई क्रोमोजोम एक्स के बरक्स बोदा सिद्ध हो रहा है .

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

दो बिल्लियों को नचाने वाला बन्दर .......

"माई नेम इज खान "उर्फ़ दो बिल्लियों के बीच में एक बन्दर .भारत सरकार और बाला साहिब ठाकरे की औकात फिल्म "माई नेम इज खान" के रिलीज़ के सन्दर्भ में दो बिल्लियों से ज्यादा नहीं है जिन्हें नचाने वाले खुद शाह रुख खान हैं ,एक शहीद के पुत्र एक शहीद के भतीजे ,आवाम के अज़ीम तर दोस्त .यहाँ भारत सरकार एक औसत बुद्धि वाले बच्चे की तरह बर्ताव करती रही है ,यदि चाहती ,कह सकती थी ,शाह रुख केआई पी एल बनाम पाकिस्तान वाले वक्तव्य से हम सहमत नहीं हैं ,लेकिन कला का संरक्षण हमारा दायित्व है ,हम फिल्म के ग्लोबल रिलीज़ पर आंच नहीं आने देंगे .इस देश का दुर्भाग्य ,भारत सरकार में आज ऐसे ही औसत सोच वाले लोगों का वर्चस्व है .

ग्राउंड होग दिवस क्या है ?

इस दिन अमरीका और कनाडा में शीत निद्रा छोड़ ग्राउंड होग अपने गर्म बिलों से बाहर निकल आतें हैं .ऐसा यह प्राणी मौसम का जायजा लेने के लिए करता है ।
ग्राउंड होग जिसे वुद्चक भी कहा जाता है एक हेअवी सेट शोर्ट -लेग्गेद मर्मोट है ,जिसका फ़रब्राउनिश रंगत लिए होता है इस पर ग्रे धारिया मौजूद रहतीं हैं .दक्षिण अमरीका में इसका डेरा है ।
"ग्राउंड्स होग डे" एक परम्परा गत अमरीकी त्यौहार है .जिसे हर बरस २ फरवरी को मनाया जाता है .कहतें हैं (स्कोतिश दन्त कथा ):इफ केंडिल मॉस दे इज ब्राईट एंड क्लीयर देयर विल बी टू विंटर्स इन दाईयर .ऐसी मान्न्य्ता है यदि यह प्राणी अपनी गर्म खोह (इलेक्त्रिफ़ाइद bअरो )से बाहर निकलने पर अपनी छाया देख लेता है ,जिसे देख कर यह पुनः गायब हो जाता है शीत निद्रा में चला जाता है ,तब ऐसा मान लिया जाता है ,शीत काल की अवधि ६ हफ्ता और रहेगी .लेकिन यदि इसे अपनी छाया दिखलाई नहीं देती है ,तब शीत काल जल्दी विदा हो जाए गा .तो साहिब मौसमी विज्ञानी है यह जीव .मौसम की टोहले लेता है .

सूर्य और चन्द्र ग्रहण से तालुक रखने वाला "सरोस साइकिल "क्या है ?

एक सरोस साइकिल ६५८५.३२ दिवस के बराबर होता है .यानि तकरीबन १८ साल ११ दिन और ८ घंटा होती है इसकी अवधि .इस अवधि के बाद सूर्य और चन्द्र ग्रहणों की एक सिक्युवेंस में पुनर -आवृत्ति होती है .कहतें हैं प्राचीनबेबीलोनियन सभ्यता के स्तम्भ खगोलविद चल्देंस ने "सरोस साइकिल का पता लगाया था अपने प्रेक्षणों और विश्लेषण से .इस चक्र के आधार पर सन और मून के आइदेंतिकल एक्लिप्सिस की भविष्यवाणी (प्रागुक्ति )की जासकती है .अलबत्ता इसका पीरियड सम्पूर्ण दिवसीय नहीं है (६५८५.३२ दिवस के बाद इसकी पुनर -आवृत्ति होती है ).यही इसका पेचीलापन है .

हेट डेट क्या है ?

ग्रीना ज़ाहिर करने के लिए किसी युवती से पुरूष का मिलना और बेशर्मी के साथ बहुत ही क्रूर तरीके से अपनी चिड या खीज का इज़हार करना "घृणा -मिलन "या फिर हेट डेटिंग कहलाता है .अलबत्ता आज प्रेम दिवस "वेलेन्ताइन्स-डे"पर इन स्त्री -पीडकों miज़ोगाइनिस्त्सकी चर्चा करना थोड़ा अटपटा लग सकता है ,लेकिन औरत जात को हिकारत की नजर से देखने वालों की समाज में कोई कमी नहीं है इस सच से कैसे मुह चुराइए गा .आज के दिन इन मीज़ोगाइनिस्त्स का हम सरयू घाट पर तर्पण करतें हैं .(कथित श्री -राम सेना से क्षमा याचना सहित )।
सच यह भी है ऐसा करके कई मर्द अपनी फालसे इगो (असफल एहम )को सांन देतें हैं .लानत है ऐसे लोगों पर .

एटमी छाता क्या है ?

न्यूक्लीयर अम्ब्रेला क्या है ,कैसे काम करता है ?जब अमरीका और सोवियत संघ के बीच तनाव पसरा रहता था (कोल्ड वार पीरियड )उस दौर में अमरीका ने उत्तरी एटलान्टिक ट्रीटी ओर्गेनाइज़ेशन के तहत ,अपने मित्र राष्टों यथा जापान ,साउथ कोरिया ,तथा ऑस्ट्रेलिया को आश्वस्त किया था ,उन पर हमला होने की स्तिथि में उनकी सुरक्षा की जिम्मेवारी अमरीका की होगी ,वह उन्हें एक न्यूक्लियर अम्ब्रेला देगा ताकि एटमी हमले से उनकी हिफाज़त की जा सके .इस एवाज़ अमरीका ने इन मित्र देशों की चौहद्दी में एटमी असला (एटमी मिज़ैल्स आदि )तैनात कर दी थीं .यही एटमी छाता है .न्यूक्लियर अम्ब्रेला है .

पूत के पाँव पालने में ही दिख जातें हैं .

दो साल के शिशु में भी मोटापे के संकेत साफ़ दिखलाई दे जातें हैं .एज टू इज टिपिंग पॉइंट (टिपिंग पॉइंट इज दी मोमेंट वेंन वन पत्तिक्युलर रिज़ल्ट ऑफ़ ए प्रोसेस बिकम्स दी मोस्ट लाइकली वन ,आफ्टर ए पीरियड वेंन दी रिज़ल्ट इज नोट स्योर )।
और कभी कभी तो ओबेसिटी का पता शिशु के तीन माह का होने पर ही मुखर हो उठता है ,जब वह क्या और कितना खाया जाए पाठ सीख रहा होता है .ईस्टर्न वर्जीनिया मेडिकल स्कूल के साइंस दानों ने पता लगाया है ,थोड़ा हृष्ट -पुष्ट शिशु (प्लंप इन्फेन्ट्स )किशोरावस्था तक आते आते ओबेसिटी का शिकार बनते देखे गए हैं .और ऐसे शिशु अनेक हैं जो आगे चलकर ओबेसी करार दे दिए गएँ हैं .इसीलियें कहा गया है :पूत के पाँव पालने में ही नज़र आ जातें हैं .पारखी दृष्टि चाहिए ,स्वास्थ्य सचेत दृष्टि .

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

चोकलेट्स और स्ट्रोक्स .....

चोकलेट्स और सेरिब्रोवेस्क्युलर एक्सिदेंट्स (स्ट्रोक )के संभावित अध्धय्यन की पड़ताल म्च्मस्टर यूनिवर्सिटी के सरह साहिब ने की है .आपने ऐसे तीन अध्धय्यनों की पड़ताल की है जो फ़्लेवोनोइद्स से भरपूर चोकलेट्स और स्ट्रोक के अंतर्संबंध को लेकर किये गए हैं ,इतना ही नहीं आपने ऐसे तीन अध्धय्यनों का विश्लेषण किया है .जो बतलातें हैं ,चोकलेट्स का सेवन स्ट्रोक और मौत के खतरों को कमतर करता है ।
चोकलेट्स में मौजूद फ़्लेवोनोइद्स बेहतरीन एंटी ओक्सिदेंट्स हैं .यही करामाती फ़्लेवोनोइद्स ह्रदय के लियें मुफीद (लाभदायक )पाए गएँ हैं ।
एक और अध्धययन में पता चला ,जिसमे ४४,४८९ लोगों को शरीक किया गया था ,इनमे से जिन लोगों ने प्रति सप्ताह चोकलेट की एक सर्विंग नियमित ली ,उन्होंने अपने लिए स्ट्रोक के खतरों को २२ फीसद कम कर लिया बनिस्पत उनके जो चोकलेट्स नहीं ले रहेथे ।
अलवा इसके एक अन्य अध्धययन में ११६९ लोग शामिल थे जो हर हफ्ते ५० ग्रेम चोकलेट खा लेते थे ,इनके लिए स्ट्रोक और तद्जन्य मौत का जोखिम ४६ फीसद कम पाया गया ।
फ़्लेवोनोइद्स का सेवन दिल की सेहत के लिए अच्छा पाया गया है.एन्वाय्रंमेंतल तोक्सिंस से (पर्यावरणी -विषाक्त पदार्थों से )सहज हिफाज़त मिलती है ।
अलबत्ता ऐसे और अध्धयन किये जाने चाहिए जो पुष्ट करें ,चोकलेट्स के सेवन से स्ट्रोक का जोखिम घट जाता है .ऐसा भी तो हो सकता है ,हेल्दी लोगों को चोकलेट्स की तलब औरों से ज्यादा होती है .

कैंसर रोधी खाद्य पदार्थों की शिनाख्त .......(ज़ारी ..)

मैसच्यूसेट्स आधारित "एन्जियोजिनेसिस -फाउनदेशन इन दिनों ऐसे खाद्य पदार्थों को पहचान कर सूचि -बद्ध कर रहा है जो शरीर में मौजूद ट्यूमर तक रक्त आपूर्ति को निलंबित रख कर उसके खात्मे का एक कारगर उपाय समझे जा रहें हैं .संस्थान के मुखिया विल्लिं ली कहतें हैं ,इतना ही नहीं यह पदार्थ वसा को भी गला - पिघलाकर शरीर से बाहर कर सकतें हैं जिसके बन ने के लिए रक्त आपूर्ति ज़रूरी है .ग्रीन टी ,अंगूर की एक किस्म केबर्नेट ,चोकलेट्स (डार्क चोकलेट्स जो बिना दूध के तैयार होतीं हैं और बहुत कम मीठास लिए रहतीं हैं .)रेड ग्रेप्स ,ब्लू -बेरीज (जामुन ,शहतूत )आदि ,तथा गार्लिक (लहसुन )ऐसे ही पदार्थ हैं जो कैंसर को भूखा मारकर ठिकाने लगा सकतें हैं ,ट्यूमर तक रक्त आपूर्ति रोक कर .चिकित्सा क्षेत्र एक खाद्य -क्रान्ति का गवाह बन रहा है ।
एंटी -एन्जियोजिनेसिस रणनीति के तहत कैंसर के खिलाफ एक जंग ज़ारी है ,तू डालडाल मैं पांत पांत .अब तीन मर्तबा लिया जाने वाला भोजन ही किमो -थिरेपी बनेगा ,जो ट्यूमर तक रक्त नहीं पहुँचने देगा ओरbअस ट्यूमर का खात्मा .इतना ही नहीं यह तमाम खाद्य वसा को भी पनपने से पहले ही गला -पिघला कर शरीर से बेदखल कर देंगे ,वसा के बननेके लिए भी तो उसके गिर्द रक्त आपूर्ति सतत रक्त प्रवाह ज़रूरी है .

कैंसर से बचाव के लिए अच्छी खबर है ...

साइंस दानों ने पता लगाया है ,केबर्नेट सौविग्नों (काले अंगूर की एक किस्म जिससे रेड वाइन तैयार की जाती है )तरहा चोकलित(चोकलेट )असरकारी दवा हैं कैंसर के सफाए के लिए ।

रेड ग्रेप्स ,डार्क चोकलेट्स (चोकलेट्स जो बिना दूध के तथा कम चीनी से तैयार की जाती है ,कम मीठी होती है ),ब्ल्यू बेरीज (सहतूत और जामुन )लहसुन (गार्लिक )सोय तथा खासकर काली चाय कैंसर को दूर भगाने मुल्तवी रखने का उपाय समझा जाता रहा है ।

एन्जियोजिनेसिस फ़ौंडेशन के मुखिया इन दिनों खाद्य पदार्थों को उनके कैंसर -रोधी गुणों के आधार पर मूल्यांकित (रेटिंग )कर रहें हैं .उन्हीं के शब्दों में :वाट वी ईट इज आवर कीमोथिय्रिपी थ्री टाइम्स ए दे ।

यानी हम तीन मर्तबा जो कुछ भी खाएं वह हामारी कैंसर मेसाच्युसेट्स आधारित (अन्गिओगेनेसिस फ़ौन्दतिओन )ऐसे .

mesaachyusets aadhaarit angiogenesis foundation aise खाद्य पदार्थों की पहचान कर रही है जो ट्यूमर तक रक्त आपूर्ति को निलंबित रखतें हैं और इस प्रकार कैंसर के खात्मे की वजह बनते हैं ।एक चिकित्सा क्रान्ति चुपके चुपके संपन्न हो रही है हमारे गिर्द ।

एंटी -एन्जियोजिनेसिस रन -नीति के तहत ऐसी तकरीबन एक दर्ज़न दवाएं प्रचलन में हैं जो ट्यूमर तक रक्त आपूर्ति (ब्लड -सप्लाई )को मुल्तवी रखतीं हैं .यही काम अब खाद्य सामिग्री से लेने की तैयारी है .ऐसे खाद्य वसा को भी ख़त्म करके दम लेंगे जिसका बनना रक्त प्रवाह पर ही तो निर्भर करता है .

डार्क मेटर का सुराग मिला ......

जिस तरह ऊर्जा उत्पादन के मामले में "फ्यूज़न एनेर्जी "एक अप्राप्य चीज़ रही है वैसे ही रेडियो -खगोल विज्ञानियों ,साइंसदानों के लिए डार्क मेटर"होली ग्रेल "की तरह रहा है .गत ८० सालों से यह अंध पदार्थ न्यूट्रिनो की तरह हाथ ना आने वाली सोने की मछली सा रहा है ।
ग्रह विज्ञानियों को अब यह आभास मुखर हो रहा है ,शायद उन्हें "डार्क मेटर "की एक झलक मिल ही गई है .इस प्रतीति का आधार वह "दो हिट्स "बन रहें हैं ,जो एक पार्टिकल -डिटेक्टरमें दर्ज हुएँ हैं .यह कण टोहकक्रायोजेनिक डार्क मेटर सर्च २ में रखा हुआ है ,जो खुद ज़मीन के २००० फीट नीचे है .इसे सौदान आयरन माइंस ,मिन्नेसोतामें भूमि के नीचे तकरीबन आधे मील के गिर्द समायोजित किया गया है ।
कण टोहक में जब कोई क्षण जीवी कण दाखिल होता है ,अपनी जीवन लीला भुगताने से पहले अपनी ऊंगलियों के निशाँ छोड़ जाता है ।
ये निशाँ (दोनों हिट्स )वीकली इन्तेरेक्तिंग मेस्सिव पार्तिकिल्स सदृश्य ही हैं ।
विम्प्स (वीकली -इन्ते -रेक्तिंग -मेस्सिव पार्तिकिल्स )को साइंसदान (भौतिकी विद ) संदर्भित डार्क मेटर का आवश्यक घटक मानतें हैं .समझा जाता है ,सृष्टि का तीन चौथाई हिस्सा जो अगम -अगोचर ,आदिनांक अद्रश्य ही बना हुआ है ,इन्हीं विम्प्स का बना है ।
रेडियो -खगोल विज्ञान एक प्रेक्ष्नीय (ओब्ज़र्वेश्नल साइंस )विज्ञान हैं ,जहां प्रेक्षणों के आधार पर निष्कर्ष निकाले जातें हैं .पता चला ,निहारिकाओं (गेलेसीज़ )के घूर्रण गति में ,रोटेशन या स्पिन में निहारिकाओं के समूह में समायोजित होने में एक असामान्य व्यवहार दिखलाई देता है .यह सब डार्क मेटर की ही अदृश्य लीला है ,जिसने निहारिकाओं के उद्भव और विकास में एक एहम भूमिका निभाई है .विज्ञानियों के लिए यह होली ग्रेल की मानिंद रहा है डार्क मेटर .गेलेसीज़ के स्पिन में एक एब्नोर्मलिती इसी अंध पदार्थ की वजह से दिखलाई देती रही है ।
विम्प्स :एक परिकल्पनात्मक (हाइपो ठेतिकल ) नान बेरियोनिक सब -एटोमिक पार्तिकिल है जिसकी अवधारणा डार्क मेटर की व्याख्या के लिए ही प्रस्तुत की गई है .विम्प्स का विस्तार है :वीकली -इन्तेरेक्तिंग -मेस्सिव -पार्तिकिल्स .नेयुत्रोंन और प्रोतोंस से भारी कणों को बेरियोंस (बेरियोज्ज़ यानी भारी ) कहा जाता है .कितने अव -पर्मानुविक कण परमाणु अपने छोटे से कलेवर छिपाए हुए है ,अभी अनुमेय ही बना हुआ है .

बचपन का मोटापा उम्रदराज़ नहीं होने देता ?

एक बहुत ही विरल अलग से और अनोखे अध्धय्यन में सेकड़ों हज़ारों बच्चों का वयस्क होने के बाद भी स्वास्थ्य रिकार्ड रखा गया .पता चला इनमे से जो बच्चे सबसे ज्यादा मोटे थे सबसे पतले बच्चों के बनिस्पत पचपन से पहले ही उनके किसी बीमारी या फिर सेल्फ इन्फ्लिक्तिद इंजरी से मौत के मुह में चले जाने की संभावना और ख़तरा दोगुने से भी ज्यादा बना रहता है ।
इनमे से जो युवा होते होते प्रीदाय्बेतिक्स होतें हैं उनकी ५५ से पहले आकस्मिक मृत्यु का ख़तरा दोगुना और इनमे से भी जो युवा हाइपर्तेन्शन(उच्च रक्त चाप )से ग्रस्त हो जातें हैं उनके लिए यह ख़तरा दोगुने से भी ज्यादा हो जाता है .दोनों ही स्तिथियों में ओबेसिटी को कुसूरवार पाया गया है ।
इस अध्धय्यन में अमरीकी इंडियंस को शरीक किया गया था .यही वह वर्ग है जो अन्य अमरीकियों के बरक्स जल्दी मोटापे और मधुमेह (दाया -बितीज़ ) की गिरिफ्त में आया है ।
इसे अब तक का सबसे बड़ा अध्धय्यन बतलाया जा रहा है ,जिसमे बच्चों के बारे में कई दशकों तक जानकारियाँ जुताई गईं हैं .इनके भार (वेट )तथा अन्य रिस्क फेक्टर्स का यथा कोलेस्ट्रोल सम्बन्धी आंकड़ों का अध्धय्यन विश्लेसन करने के बाद ही उक्त निष्कर्ष निकाले गए हैं .बात साफ़ है मोटापे पर बचपन से ही काबू पाना चाहिए ,बड़े होने पर यह गुल खिलाता है .

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

क्या है थर्ड हेंड स्मोक ?

सिगरेट बीडी पीने वाला व्यक्ति जो धूयाँउगलता है वह सेकेंडरी स्मोक कहलाता है ,प्राइमरी स्मोक धुम्र्पानी अन्दर फेफड़ों में भरता है ,जो धूयाँ दो कशों के बीच सुलगती सिगरेट से निकलता रहता है ,वह साइड -स्ट्रीम स्मोक कहलाता है ।
क्या है थर्ड हेंड स्मोक ?यह है सिगरेट -धुयें का रेज़िद्यु(बिना जला बचा खुचा अंश )जो कारपेट ,सोफा ,फर्श और पर्दों आदि से चस्पां रहता है ।
यह एक विष है .अन्य एयर बोर्न तोक्सिंस में शामिल है -नाइट्रस एसिड ,अनवेंतिद गैस अप्लाइयेन्सिज़ ,व्हीकल इंजिन्स इसका प्रमुख स्रोत बनतें हैं ।
थर्ड हैण्ड स्मोक पर लौटतें हैं .वही तुबेको रेज़िद्यु जो सर्फेसिस से महीनों चिपका रह सकता है ,बाशर्तेजोरदार तरीके से वेक्यूम क्लीनिंगना की जाए .घरेलू नाइट्रस एसिड से मिलकर यह नाइट्रो -समिंस बना डालता है ।
लारेंस बर्कलीनेशनल लेबोरेट्री केलिफोर्निया के साइंस दानों ने पता लगा या है ,निकोटिन स्पेसिफिक नाइट्रो -समिंस एक असरदार (शक्तिशाली ,पोटेंट )कार्सिनोजन (कैंसर पैदा करने वाला )तत्व है ।
यानी थर्ड हैण्ड स्मोक भी कैंसर का सामान है खासकर शिश्युओं और बच्चों के लिए .यही है थर्ड हैण्ड स्मोक और उसकी सौगात .

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

हलकी चपेट लगाना बुरा नहीं हैं ,डाट डपट झिडक्ने से ..

स्पेयर दा रौडएंड स्पोइल दा चाइल्ड या फिर मार पीट करने ज्यादा डाट डपट करने से बच्चे ढीठ हो जातें हैं .बहस बहुत पुरानी और बेनतीजा है ।
लेकिन इधर ड्यूक यूनिवर्सिटी में केनीथ डोडगे द्वारा संपन्न एक अध्धय्यन का हवाला दे रहें हैं ,"नर्चार शोक "के लेखक पो ब्रोंसों .यह इस दौर में अमरीका में सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों में से एक है ।
ब्रोंसों कहतें हैं लालन -पालन के दौरान आवेश में आकर बच्चों को डाटने से बेहतर है ,बिना क्रोध में आये हलकी चपत जड़ देना .यह बच्चों को सलीका सिखाने ,अनुशाशन सिखाने केलिए एक कारगर उपाय हो सकता है ।
लेकिन इसका तरीका सधा हुआ होना चाहिए .किताब के सह लेखक आश्ले मेर्र्य्मन भी स्मेकिंग को चाइल्ड रीयारिंग के लिए ज़रूरी बतलातें हैं ।
अलबत्ता आप किस तरह से डाट डपट करतें हैं ,सचमुच आवेश में आकर या अभिनय के स्तर पर इसका बच्चे के व्यक्तित्व विकास पर अपना प्रभाव पड़ता है .या तो बच्चा बहुत ज्यादा आक्रामक (अग्रेसिव )हो जाता है या दब्बू (पेस्सिव ).सवाल यह है आपके स्मेकिंग करने का तरीका क्या रहा है ?क्रोध में आकर बच्चे पर टूट पढ़ना बदतर है ,हलकी चपेट शांत भाव से लगाना इससे कहीं अच्छा है .

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

खुराखी सिलिकान का महत्वपूर्ण स्रोत है -बीयर

साइंसदानों के मुताबिक़ बीयर अस्थियों (बोन्स)के लिए अच्छी है क्योंकि यह दाइत्री(खुराखी )सिलिकान का एक एहम स्रोत है .सिलिकान बोन मिनरल डेंसिटी (अस्थि खनिज घनत्व )में इजाफा करता है .बीयर का मोडरेट सेवन ओस्टियो -पोरोसिस के खिलाफ जेहाद में मदद गार हो सकता है .अस्थि -क्षय (लास ऑफ़ बोन मॉस )होने लगता है ओस्टियो -पोरोसिस में अस्थियाँ भंगुर होकर उठने बैठने में भी टूट सकतीं हैं ।
महिलाओं में रजोनिवृत्ति के बाद इसके मामले बढ़ जातें हैं ,क्योंकि स्त्रोजन स्त्री हारमोन बन्ना कमतर होता चला जाता है .योनी भी अन्दर से सूखने लगती है ।
६० के पार मर्द भी इसकी उतना ही चपेट में आने लगतें हैं .बार्ले (जों )से तैयार बीयर में सिलिकान का बाहुल्य रहता है .यह किण्वन (ब्रूइंग -प्रोसिस )के बाद भी ओर्थो-सैलिसिक एसिड के रूप में बना रहता है ।
सिलिकान की मौजूदगी लो बोन मॉस डिसीज़ ओस्टियो -पोरोसिस को मुल्तवी रखने में मदद गार हो सकती है .(हृद -रोगी अपने कार्डियोलोजिस्ट के परामर्श के बिना ,बीयर तो क्या रेड वाइन लेने से पहले भी परामर्श करलें ।)
बीयर में माल्टिद-बार्ले और होप्स का स्तर ऊंचा पाया जाता है ,इसीलिए सिलिकान भी ज्यादा रहता है .कमाल जौं की भूसी (बार्ले हस्क)का है जिसमे सिलिकान है .

पेंक्रियाज़ (अग्नाशय )कैंसर के खतरे को बढाता है -शक्कर युक्त सोडा ?

सिंगापुर में तकरीबन ६०,००० लोगों पर संपन्न एक अध्धय्यन से पता चला है ,जो लोग नियमित शक्कर युक्त सोडा का सेवन करतें हैं ,उनके लिए पेंक्रियाज़ -कैंसर का ख़तरा बढ़ जाता है ,जबकि ज्यूस (ताज़ा फलों का )लेने वालों के लिए यह ख़तरा उतना नहीं आंका गया है .इसका कारण पेप्सी और कोक लंच पैकेज में शामिल रखने वालों के ओवर -आल खान -पान में छिपा है .खराब होतीं हैं इन लोगों की और भी आदतें ।
यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिनेसोटा के मार्क परेरा इस अध्धय्यन के मुखिया रहें हैं .पूअर हेल्थ हेबिट्स पेंक्रियेतिक -कैंसर के खतरे को और भी बढा देती हैं ,जो अपने आपमें एक विरल लेकिन खतरनाक किस्म है कैंसर की ।
सोफ्ट ड्रिंक्स दरसल शक्कर से लदी रहतीं हैं ,सुगर की लोडिंग होती है इनमे जिसके सेवन से खून में इंसुलिन का स्तर बढ़ जाता है .पेंक्रियेतिक कैंसर सेल ग्रोथ का कारण यही बनता है ।
अमरत्व प्राप्त कर लेती है कैंसर कोशिका ,मरना भूल जाती है ,अनियंत्रित कोशिका विभाजन ही ट्यूमर की वजह बन जाता है ।
अग्नाशय (पेंक्रियाज़ ग्रंथि )ही इंसुलिन तैयार करती है ,जो शक्कर को जलाकर ऊर्जा में बदलने का काम अंजाम देती है .लेकिन इंसुलिन का अतिरिक्त स्तर मेटाबोलिज्म (चया-अपचयन )को असर ग्रस्त बना देता है .ऑटो इम्यून डिजीज है मधुमेह ।
विकराल रूप है ,पेंक्रियेतिक कैंसर .विज्ञान पत्रिका "कैंसर एपी -देमियालोजी बायो -मार्कर्स एंड प्रिवेंशन "के ताज़ा अंक में इस १४ साला अध्धय्यन के नतीजे प्रकाशित हुए हैं जिसमे कुल मिलाकर ६०,५२४ लोगों को शामिल किया गया था और जिसे सिंगापुर चाइनीज़ हेल्थ स्टडी कहा गया है .इसमें औरत -मर्द दोनों शामिल रहें हैं ।
इस दरमियान १४० स्वयं सेवियों (सब्जेक्ट्स )को पेंक्रियेतिक -कैंसर हो गया .जो प्रति सप्ताह दो या और भी ज्यादा सोफ्ट -ड्रिंक्स लेते थे उनमे पेंक्रियेतिक कैंसर का ख़तरा ८७ फीसद ज्यादा देखा गया .यह तमाम लोग पेंक्रियेतिक कैंसर से ग्रस्त पाए गए ।
शोपिंग और ईटिंग इन दिनों अमीर देशों में शबाब पर है ,सिंगापुर पश्चिमी देशीं की तरह संपन्न देश है ।
बेशक और विस्तृत अध्धयन की दरकार है ,लेकिन यह तो पुष्ट है ,शक्कर (सफ़ेद चीनी )भोजन के स्वास्थ्य -मान ,पोषक तत्वों को कम करदेती है .भारतीय खुराख में तो अनाजों में शक्कर वैसे ही मौजूद है .अलग से खाने से पहले सोच समझ लेने में क्या हर्ज़ है ?हो सकता है अध्धय्यन के नतीजे एक एक केज्युअल -लिंक (आकस्मिक -अनुसंबंध )ही हो ?फिर भी ,बचाव में ही बचाव है .

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

ग्यानी होतें हैं बिल्ली पालक कुत्ते वालों से ...

नानी कहा करती थी ,बिल्ली शेर की मौसी होती है ,शेर को तमाम दावपेच उसी ने सिखाये हैं .एक दिन शेर ने पूछा :मौसी ट्रेनिग खत्म ."हाँ "ज़वाब मिला .शेर बिल्ली को खाने के लिए दौड़ा ।
यह क्या बिल्ली तो पेड़ पर चढ़ गई .शेर टापता रह गया .बिल्ली ने शेर को यह आखिरी दाव इसीलिए तो नहीं सिखाया था .अब विज्ञानियों ने पता लगाया है ना सिर्फ बिल्ली कुत्तों से ज्यादा चालाक होती है ,बिल्ली मालिक भी (केट ओनार्ज़ )भी कुत्ते वालों के बरक्स ज्यादा बुद्धिमान (ज्ञानी )होतें हैं ।
कुत्ते को एक स्ट्रक्चर्ड रूटीन में रखना पड़ता है ,सैर के लिए ले जाना पड़ता है .बिल्ली के संग ऐसा कोई लफडा नहीं है .थोड़ा सा संग साथ आदमी का उसकी तसल्ली करदेता है ।
यह पता लगा या है ,ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के साइंस दानों ने २९८० पेट ओनार्ज़ पर संपन्न एक अध्धय्यन के बाद .

टिकाऊ शादी के लिए जीन -पत्रा (जेनेटिक टेस्टिंग )

साइंस ऑफ़ हार्ट ,प्रेम का रसायन शास्त्र कहीं ना कहीं हमारे शरीर -प्रतिरक्षा तंत्र के मिजाज़ से जुड़ा है .देह का अपना रस रूप और गंध है .अब पता चला है ,जिन औरत मर्दों के इम्यून -सिस्टम जुदा हैं उनमे प्रबल और टिकाऊ आकर्षण पैदा हो सकता है .इसीलियें अब साइंस दानों ने जेनेटिक -मार्कर्स के ज़रिये टिकाऊ प्रेम और रोमांस की शिनाख्त कैसे की जाए इस एवज साइंटिफिक मेच .कोम के ज़रिये जीवन साथी की तलाश को ज्यादा भरोसे मंद होने की तरकीब बत्लादी है .अपना और अपने भावी साथी का जीन -पत्रा (जीन चिठ्ठा ),जेनेटिक मार्कर्स समेत बनवाइए ।
पता चला है औरतें उस मर्द पर रीझतीं हैं जिसका रोग -प्रति -रक्षा तंत्र उसके अपने इम्यून सिस्टम से अलग किस्म का है ,उसी के शरीर की गंध उसे विमोहित करती है .इस एवज बाकायदा वेब -साइटें हैं .बातार्ज़ जीवन साथी .कोम ।
आज के सन्दर्भ में जेनेटिक मेच -मेकिंग जबकि लोग साफ़ साफ़ खानदानी और मनो -रोगों को छिपा जातें हैं ,और भी ज्यादा ज़रूरी है .स्वास्थ्य -जांच भी शादी से पहले करवा लीजिये .फिर पछताए होऔत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत ।
ना सही जेनेटिक मेच मेकिंग ,सीधे सच्चे प्रेम की तलाश एक एग्ज़ेक्त साइंस .साइंस तो है .इसे भी आजमाइए .डेटिंग -वेब साइट्स मौजूद हैं .खर पतवार संबंधों से निकाल फेंकिये -विवाह पूर्व .बाद -विवाह मुमकिन नहीं होगा ।
हर आदमी की एक पर्सनालिटी करेक्टर स्टिक्स (बायलोजिकल मार्कर्स )होती है .इन्हें मालूम करके आप रोमांटिक रिलेशन बना सकतें हैं .विज्ञानियों ने पता लगाया है नेट -फिक्सिंग की है लव की ,औरतें उसी पर मरतीं हैं जिसका जीन नक्शा ,इम्यून सिस्टम जुदा है ,मानस -गंध जुदा है .

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

एक पोंड मधु बनाने के लिए मधुमख्खी कितने पुष्पों से रस लेती है ?

एक अनुमान के अनुसार एक मधुमख्खी अपने जीवन काल में २० लाख पुष्पों से रस ग्रहण करती है .इस एवज उसे ८०,००० किलोमीटर लम्बी यात्रा करनी पड़ती है ,मकरंद की तलाश में .इसे यूं भी कह समझ सकतें हैं ४५४ ग्रेम शहद जुटाने में उसे दो मर्तबासे भी ज्यादा बार पृथ्वी की सैर करनी पड़ती है ।
बेशक कुछ तथ्यों को यहाँ ज्यों का त्यों ग्रहण कर लिया गया इसका सबूत वक्त के धुंधलके में खो सा गया है ।
१९४९ में एक कीट -विज्ञानी सी .आर .रिब्बंड्स ने पता लगाया था ,कई सौ पौधों के गिर्द एक मधुमख्खी स्वीट क्लोवर ग्रहण करने के लिए चली आती है .और तकरीबन ११००-१४४६ पादपों से उसे मिलन मनाना पड़ता है तब कहीं जाकर थोड़ा सा "लिमंठेस नेक्टार "हासिल होता है ।
स्वीट क्लोव :एक छोटा सा पादप है जिसके तने से तीन पत्तियां-फूटतीं हैं .जिसकिसी पादप के तने से चार पत्तियां निकलतीं है उसे लकी माना जाता है .क्लोवर को फोरेज़ प्लांट के बतौर इरोज़ंन कंट्रोल के लिए उगाया जाता है .

क्या है सृष्टि के नष्ट होने का भय (कोस्मो-फोबिया )?

आदी-मानव ही नहीं आधुनिक इंसान भी अतार्किक श्रृष्टि के विनष्ट होने के भय के नीचे जीता रहा है .कुछ धार्मिक -प्रतिष्ठान भी इस भीती को हवा देते रहें हैं .विज्यान कथाओं पर आधारित फिक्शन फिल्मों ने भी इस इसे तरजीह दी है ।
कोस्मो फोबिया अन्य किसी भी भीती की तरह एक अतार्किक भय है ,सृष्टि के विनाश के सन्निकट होने का .एक जन विस्वास इसे खाद पानी मुहैया करवाता रहा है ।
"२०१२ "फिल्म इसी की नवीन कड़ी रही है .लगातार एक भय अप्रत्यासित बाढ़ ,भूकंप और विश्व -मारी (पेंदेमिक )समझी गई कुछ आई गई बीमारियों का ,कभी स्वेन फ्लू बनकर तो कभी बर्ड फ्लू ,मेडकाओ दीसीज़ बन मानव को घेरे रहा है .अक्सर ढोल की पोल ही सिद्ध हुआ है यह अतार्किक भय ।
कहा गया माया केलेंडर २१ दिसंबर २०१२ को समाप्त हो रहा है और इसी के साथ सृष्टि का अंत भी गूंथा हुआ है ।
जलप्लावन के किस्से साहित्य (कामायनी )से लेकर अनेक धर्म ग्रथों (बाइबिल आदि )में जगह बनाए रहें हैं ।
पूर्व में ईयर टू-थाउजेंड को लेकर भी कम अफरा -तफरी नहीं मची थी .होना हवाना तो क्या था .काल का पहिया अपनी लय-ताल से बहता है ,आगे और आगे की और .सभ्यता को घसीट कर तरह तरह की भीतियों से घेर लेने की कोशिशें ज़ारी हैं ,कोशिशें ,भविष्य कथन जिनका कोई सिर पैर कभी नहीं रहा है ।
जहां तक सृष्टि के बन्ने बिगड़ने का सवाल है यह सब एक कोस्मिक स्केल पर ही होता है .सृष्टि का बन ना बिगड़ना नियम है ,अपवाद नहीं .एक आवधिक घटना है .जो आया है वह जाएगा ,चाँद सितारे दूध गंगाएं ,निहारिकायें ,क्वासर्स ,पल्सार्स ,ब्लेक होल्स सभी अंत में उस अना -दीअनु में विलीन हो जाने है जिससे यह कोसमोस (यूनिवर्स )बना है .ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया ...

प्लूटो का मायावी संसार .

बेशक २००६ में प्लूटो को ग्रह -कुल (ग्रह-pअरिवार )से बहिष्कृत कर प्लेनेटोइड(ड्वार्फ -प्लेनेट )का दर्ज़ा दे दिया गया ,लेकिन सौर मंडल का यह सबसे बाहरी ग्रह समझा जाता था ,जिसका रेदिअस पृथ्वी के रेदिअस का ०.१८ मात्र है ,द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का ०.००४ ,पृथ्वी से जिसकी दूरी ३९.३३ ए यु (अस्त्रोनोमिकल यूनिट )है .पृथ्वी और सूरज के बीच की औसत दूरी को एक ए यूं कहा जाता है (एक ज्योतिर्विग्यानिक इकाई )।
लेकिन हबिल दूरबीन से ली गई प्लूटो की तस्वीरे प्लूटो पर पृथ्वी की मानिंद होने वाले मौसमी बदलावों ,एवं वायुमंडलीय बदलाव की खबर दे रहीं हैं .ना सिर्फ इसकी रंगत (लूक्स )बदल रही है ,हिम चादर भी अपना स्थान बदल रही है ।
तस्वीर दर तस्वीर एक नै इबारत लिख रही है .कहीं बर्फीली सीरे सी रंगत (दी थिकसिरप द्रैंड फ्रॉम सुगर इन दी प्रोसिस ऑफ़ रिफाइनिंग त्रेअक्ले इस काल्ड मोलासिस और सीर /खांड इन हिंदी ).तो कहीं प्लूटो की चित्तीदार छवि मौसम के साथ अपना रंग रूप बदल रही है .सतह की रंगत के साथ साथ इसकी ब्राइटनेस भी बदल रही है ।
चिर यौवना के रूज़ लगे कपोलों सी आभा हो गई है प्लूटो की .जबकि इसका रोशन उत्तरी -गोलार्द्ध और चमकीला (ब्राईट )होता जा रहा है ।
इसकी वजह संभवतय सूरज से आलोकित ध्रुवीय सतह से हिम का सीधे सीधे वाष्प में बदलना (सब्लिमेट)होना है ।
जबकि सूरज से परे वाले ध्रुव पर इस राशि का दोबारा हिमराशी (हिम )में बदलना है . ऐसा इसके २४८ दिनी सीजनल साइकिल (पीरियड ऑफ़ रिवोल्यूशन २४७ .७ ईयर्स )की अवधि में हो रहा है .यानी सूर्य के गिर्द परिक्रमा के दरमियान इसका रंग रूप बदल रहा है ।
इसकी एक और वजह इसके परिमंडल (वायुमंडल )में मीथेन का डेरा है .हम जानतें हैं इस गैस में कार्बन और हाइड्रोजन परमाणु होतें हैं .(एक मीथेन अनु एक कार्बन और चार हाइड्रोजन परमाणु लिए है .सौर पवन (सोलर विंड )हाड्रोजन के अनु को हाइड्रोजन से अलग कर देती है .सतह पर रह जातें हैं ,कार्बन बहुल क्षेत्र .यही लाल और दार -कर दिखलाई दे रहें हैं .

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

सूर्य से प्रकाश ग्रहण कर स्वतः काम करने वाली युक्तियाँ ..

साइंसदानों ने एक ऐसा सर्किट (विद्युत् परिपथ )तैयार कर लिया है जो सूर्यप्रकाश से शक्ति (पावर ग्रहण )लेकर काम करने लगता है इसी के साथ ऐसी टच स्क्रीन युक्तियों के निर्माण की संभावनाओं के द्वार खुल गए है जो आप से आप पावर प्राप्त करेंगी ।
डिस्कवरी न्यूज़ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ यह दुनिया का पहला फोटो -वोल्टिक सर्किट है .जिसे अमरीका की पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी ने तैयार किया है .इसी के अनुसार अभिनव उपभोक्ता उपकरणों के निर्माण का रास्ता साफ़ हो गया है .यहाँ तक की एक न्यूरल सर्किट ,दिमाग का छोटा मोटा प्रारूप (मॉडल या निदर्श )बनाया जा सकेगा एक पूरी पीढ़ी ओप्टिकल और इलेक्ट्रोनिक युक्तियों की तैयार करलेने का भरोसा दिया है इसी फोटो -वोल्टिक -सर्किट ने ।
अब आपके कंप्यूटर का टच स्क्रीन एक इलेक्ट्रिकल चार्जर का काम करने के अलावा कंप्यूटर -चिप का भी काम कर सकेगा ।
बेशक वर्तमान में बहुत ही बारीकी के साथ ऐसे सर्किट से जतन पूर्वक बहुत काम मात्रा में ही बिजली (विद्युत् शक्ति )पैदा की जा रही है लेकिन निकट भविष्य में इस अल्पांश में पैदा बिजली की मात्रा को बढाया जा सकेगा ,अपेक्षाकृत ज्यादा इलेक्त्रिसिती पैदा की जा सकेगी ।
और तब नै युक्तियाँ इसी सर्किट से संचालित हो सकेंगी ।
क्रित्रिम तौर पर न्यूरल सर्किट तैयार किया जा सकेगा निकट भविष्य में ।
फोटो -वोल्टिक सेल ?
यह एक ऐसी युक्ति है जो प्रकाश की मौजूदगी और मात्रा (इन्तेंसिती ),प्रकाश की तीव्रता का पता लगा लेती है बस दो विभिन्न धातु चाहिए .दोनों को जोड़ कर एक जंक्शन पर प्रकाश डाला जाता है ,दूस -रे को बचा कर रखा जाता है .बस एक वोल्टेज (पोटेंशियल डिफ़रेंस ) अल्पांश में पैदा हो जाता है .क्योंकि वोल्टेज का स्रोत प्रकाश है इसी लिए इस युक्ति को फोटो (प्रकाश )विद्युत् चालित सेल कहा जा ता है ।
फोटो वोल्टिक इफेक्ट क्या है ?
प्रकाश विद्युत् प्रभाव का मतलब क्या है ?
दी प्रो -दक्षण ऑफ़ ऑफ़ ए पोटेंशियल डिफ़रेंस अक्रास दी जंक्शन ऑफ़ दिस -सिमिलर मेटीरियल्स आर इन ए नान -होमोजीनियास सेमिकंदाक्टर मेटीरियल बाई दी एब्ज़ोर्प्शन ऑफ़ विजिबिल लाईट आर अदर इलेक्त्रोमेग्नेतिक रेडियेशन इस काल्ड फोटो -वोल्टिक इफेक्ट ।

मोटापे के पीछे अन -फिट- नेस जींस का हाथ ...

कई लोग बेतहाशा वक्त जिम में बितातें हैं ,वर्क आउट करतें हैं ,लम्बे समय तक (वातापेक्षी व्यायाम इनके काम नहीं आता ).,मोटापा ज्यों का त्यों बना रहता है .वजह व्यक्ति के जीवन खण्डों की प्रवृत्ति में मौजूद रहती है .अन -फिट -नेस जींस लिए होता है ऐसा व्यक्ति .दुनिया भर के १४ संस्थानों ने अपनी रिसर्च से पता लगाया है ,पांच में से एक ओबेसी अन -फिट -नेस जीवन इकाइयां लिए होता है .यही अस्वास्थाय्कर जीन व्यक्ति की केलोरी खर्च करने की दर को असरग्रस्त बनाती है .व्यक्ति हाड तोड़ कसरत करता फिर भी वही ढाखके तीन पांत ।

इसी अन्वेषण ने एक आम रक्तजांच के ज़रिये यह पता लगाने की दिशा को एड लगादी है ,जो यह फैसला करसके ,क्या व्यक्ति यह जींस जन्मना लेकर इस दुनिया में आया है ,खानदानी विरासत के बतौर ?

अध्धय्यन के तहत उन ६०० लोगों की जांच की गई जो नियमित साइकिल चलाते थे .इनकी एरोबिक फिट नेसमें आये संभावित सुधारों की जांच की गई . ओक्सिजन कीकुल खपत का पता लगाया गया ,अलावा इसके इनके डी एन ए का अध्धय्यन कर ऐसे ३० जीवन खण्डों (जींस )का पता लगाया गया ,जो ओक्सिजन खपत को प्रभावित करतें हैं ।

inme से ११ का सम्बन्धसेसे इनकी एरोबिक फिट नेस था .इन जीवन खण्डों में बदलाव एरोबिक फिटनेस को प्रभावित कर रहा था ।

एप्लाइड -फिजियोलोजी के एक जर्नल में इस अध्धय्यन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई है .पांच में से एक व्यक्ति ऐसा मिला ,जिसमे जींस का ऐसा संयोजन (कोम्बो )था जो ओक्सिजन खपत में बदलाव ही नहीं होने देता था .फेट को जलाने में इन्हें साइकिलिंग से कोई फायदा नहीं ये ।

सिर धुनते रहे हफ़्तों ये तमाम लोग ,फेट कम नहीं हुआ .

गुज़रे ज़माने की बात हो चली है -डाइटिंग .

डाइटिंग को अब क्लासिक ,आउट डेटिड गुज़रे ज़माने की चीज़ माना जा ना लगा है .ऐसा हम नहीं स्वास्थ्य -विज्ञान के माहिर कह रहें हैं .मोटापे को घटाने का लेदेकर सर्जरी (शल्य चिकित्सा )ही एक मात्र ज़रिया नज़र आ रहा है .लेदेकर आदमी वजन तो फौरी तौर पर घटा लेता है ,असल बात उस घटे हुए वजन को बनाये रखने की है ।
जैसे ही आदमी डायटिंग शुरू करता है ,शरीर तंत्र में हारमोन बदलाव होने लगतें हैं .इसकी भरपाई के लिए शरीर को अतरिक्त चर्बी (फेट )बढाने का उकसावा मिलता है ।
ऐसे में सर्जरी ही एक मात्र समाधान है ,हारमोन बदलाव को लगाम लगाने का .यूनिवर्सिटी कोलिज लन्दन के राचेल बत्तेरहम ऐसे ही राय व्यक्त करतें हैं .स्थाई समाधान मोटापे से छुटकारे का शल्य कर्म ही है .

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

मुंबई का हाल ?

यहाँ संविधानिक पद कोंग्रेस -एन सी पी के पास हैं ,क़ानून राज ठाकरे का चलता है .ज़रा हठके ज़रा बचके यह बोम्बे मेरी जान .......
तो आज बोम्बे उर्फ़ मुंबई उर्फ़ राज ठाकरे का यह हाल है ,नामी ग्रामी लोगों को धमकाया जाता है .इतने बड़े देश में शाह रूख खान की हिमायत में खुलकर उन्हें सेक्युलर बतलाने समझने वाली लेदेकर एक प्रीती ज़िंटा हैंअनुपम खैर हैं ,अपने महेश भट्ट हैं और बस ।
युवा तुर्क २६ /११ के कमान्दोज़ की आंचलिकता का बिहार में जाकर हवाला दे रहें हैं ,रूपसियों के समुन्दर में .मान्य वर कमसे कम संविधान का तो हवाला दीजिये .यही कहा जा सकता है ,सेक्युलरवाद की कमाई पर पल रही राजनीति खीसे निपोड़ रही है .

कैंसर जिन्हें टाला जा सकता है ....

दुनिया भर में तकरीबन १.५ करोड़ लोगों में जांच के बाद कैंसर का पता हर साल चलता है ,इनमे से ४० फीसद मामलों को सिर्फ अपनी जीवन शैली बदल और संक्रमण से बचते हुए मुल्तवी रखाजा सकता है .इंटर -नॅशनल यूनियन अगेंस्ट कैंसर ,जिनेवा के अनुसार गर्भाशय गर्दन और लीवर कैंसर की वजह इन्फेक्शन ही बनता है .टीके लगवा कर इनसे साफ़ बचा जा सकता है .दुनिया भर के देशों को इस तरफ तवज्जो देनी चाहिए .

एडिक्टिव नेट सर्फिंग का मतलब ..?

लॉन्ग आवर्ज ओंन इंटरनेट टाइड टू डिप्रेशन ?गलत भी हो सकती है यह बात .यह भी हो सकता है अवसाद ग्रस्त लोग नेट से चिपके रहतें हैं ,हुक्द हो जातें हैं इंटरनेट से .आप चाहें तो इसे एडिक्टिव सर्फिंग भी कह सकतें हैं .ब्रितानी विज्ञानी इसी अध्धय्यन को आगे बढा रहें हैं ।
लीड univarsity ke mano vigyaani aisaa saaf saaf dekh रहें हैं ,इंटरनेट से behad pyaar karne vaale लोग besaakhtaa चिपके rahne vaale लोग apne saamaajik sarokaaron ,saamaajik uth baith को भी chait room me le aayen हैं ,social intarekshan ki jagah chat room le rahaa है .reeal laaif varchyual hone lagi है .real laaif sichyueshan ki spes नेट ne hathiaayaa li है ।
socail नेट working sights dinaanudin lokpriy इसी vajah से हो rahin हैं ।
manovigyaanik vikaar jaise depression is stithi me हो jaanaa koi azoobaa kaise kahaa jaa सकता है ।
hamaare maansik svaasthay को asargrast banaa सकता है,इंटरनेट obsession .नेट से judi है hamaari sehat ki nvz .

कनक छवि सी कामिनी ,कटि काहे को क्षीण ...

कवि रसलीन ने टेलर -मेड सौन्दर्य पर रीझकर ही लिखा होगा :कनक छवि सी कामिनी ,कटि काहे को क्षीण /कटि को कंचन का -टि-विधि ,कुचन मध्य धर दीन्हि.आज विज्ञान ने यह सचमुच मुमकिन कर दिखाया है ,कटि -प्रदेश से चर्बी निकालकर सुडोल वक्ष ,बना लेने की तकनीक विकसितकर ली है ,जिसे ब्रेस्ट -इम्प्लांट से बेहतर बतलाया जा रहा है .कामयाबी पूर्वक इस तकनीक की आज़माइश कर ली गई है ,होलीवुड की जानी मानी हस्तियों (रूपसियों )ने इसे आजमाया है .कुल खर्च आता है ८००० पोंड .यानी अब अवांछित जगह से चर्बी हठाकर उसका मनमाना स्तेमाल किया जा सकता है ।
इस प्रोद्योगिकी का एक आयाम और भी है .एक ऐसा शक्ति शाली किरण पुंज (लेज़र )तैयार कर लिया गया है जो देखते ही देखते अवांछित जगह से फेट सेल्स का सफाया करदेता है .दो हफ्ते में आप अपनी ड्रेस का साइज़ दो नंबर तक घटा सकतें हैं .ना डाइटिंग का झंझट ना व्यायाम की दरकार .हींग लगे ना फिटकरी रंग चोखा ही चोखा ।
४० -४० मिनिट के ६ सेशंस (६ मर्तबा )में १००० पोंड की खर्ची से आप अपनी ड्रेस का साइज़ घटा सकतें हैं ।
जेरोना (लेज़र )आप की चमड़ी के नीचे छिपी फेट सेल्स को रप्चर कर देता है .इन्हें आपकी एनाटोमी से बेदखल कर दिया जाता है ।
पश्चिमी लन्दन के केंसिंग्टन में एक लेज़र लोंज़ ततिअना करेलिना चला रहीं हैं .यही वह आविष्कार है जिसका बरसों से हर आधुनिका को इंतज़ार था ।
अमरीकी खाद्य और दवा संस्था (ऍफ़ डी ए )की माने तो एक औसत मरीज़ इसके स्तेमाल से वेस्ट ,हिप्स और थाईज़ से ३.६४ इंच तक कम कर लेता है .कुछेक ने ९ इंच तक इन मापों को कम किया है .बेशक लेज़र ओबे -सीज (मोटापे से ग्रस्त ) पर कारगर नहीं है .यह चर्बी को परत दर परत नहीं काट सकता है ।
अलबत्ता ब्रेस्ट एन्हांसमेंट सर्जरी इस तरीके से कामयाब है .

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

वियाग्रा नहीं सूर्य स्नान ....

यह तो पहले ही पता चल चुका था ,एक घंटा जो लोग सन बाथ ले लेतें हैं ,नंगे बदन जो सूरज की रौशनी में नहा लेते हैं ,उनके रक्त में पुरूष सेक्स हारमोन तेस्तो -स्तेरान का स्तर ६९ फीसदतक बढ़कर हो जाता है .पुरूषों में यह हारमोन ना सिर्फ सेक्स ओर्गेंस (जनन अंगों )के विकाश के लिए उत्तरदाई है ,मेल सेक्स्युअल करेक्ट -अर्स्तिक्स कों बनाए रहने ,यौन इच्छा और शुक्राणु (स्पर्म्स )के निर्माण में भी यही विधाई भूमिका निभाता है ।
सूर्य -विकिरण में मौजूद विकिरण का परा -बेंगनी अंश हमारी त्वचा से विटामिन -डी का ९० फीसद तक तैयार करवा लेता है .यही अल्ट्रा -वाय-लत अंश एक उत्तेजक (स्तिम्युलेंत )की तरह काम करता है ।
अब एक ऑस्ट्रियाई अध्धययन से पता चला है ,औसतन हमारे रक्त में प्रति -मिलीलीटर ३० नेनो -ग्रेम विटामिन -डी की मौजूदगी एक पाजिटिव रोल के लिए ज़रूरी है ,जबकि ४० -६० नेनो -ग्रेम प्रति मिली लीटर इसकी मौजूदगी आदर्श समझी गई है ।
ऑस्ट्रिया की ग्राज़ स्थित मेडिकल यूनिवर्सिटी ग्राज़ द्वारा संपन्न अध्धय्यन के अनुसार हमारे रक्त में मेल सेक्स हारमोन का स्तर विटामिन -डी के स्तर के सम-अनुरूप बढ़ता चला जाता है .मेल लिबिडो का संचालन यही तेस्तो -स्तेरोंन करता है .विटामिन -डी एक वाइटल पोषक तत्व है ,मॉस -मच्छी में इसका डेरा है .हमारा शरीर सूरज की रौशनी से उत्तेजन लेकर इसे खुद बा खुद तैयार कर लेता है .इसीलिए पौर्वात्य -दर्शन -चिंतन में सूर्य स्नान की बड़ी महिमा है .संक्रांति में सूर्य स्नान का विधान है .प्रत्येक १४ जनवरी कों यह सूर्य -पर्व आता है ।
विटामिन -डी यक्त वानस्पतिक तेल एवं अन्य खाद्य पोषक समझे गए हैं .