शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

एक प्रतिक्रिया ब्लॉग पोस्ट : किस्सा ड्रेस-कोड का . ..तब और अब ......

लाज़वाब सेतु संयोजन 


FRIDAY, FEBRUARY 1, 2013


(वात्स्यायन के कामसूत्र को एक औरत की चुनौती: चर्चा मंच 1142)

 .इस वक्त की आंच लिए प्रासंगिक मुद्दों का उत्कर्ष लिए .वर्जनाओं को तोड़ना ,वर्जनाओं का टूटना आज बहुत ज़रूरी 

है .साथ ही नवमूल्यों  का निर्माण भी ,उस समाज में जहां 

पुरुष नारी देह का अतिक्रमण कर ऊपर नहीं उठ पा रहा है दैहिक सौन्दर्य से ऊपर उसकी आभा ,प्रभा मंडल (दिव्यता) से साक्षात्कार नहीं 

कर पा रहा है .आँखों में इंच टेप /सी टी स्केन /लिए घूम रहा है 

उसके अंगों का नाप 

लेता, .निम्नांग से उच्चांग तक उसके वस्त्रों की पैमाइश करता .इवोल्व नहीं हो रहा है  मर्द .मैं जानता हूँ और अच्छी तरह से मानता हूँ 

सामजिक वर्जनाओं के टूटने से अभी इतनी जल्दी कुछ हासिल 

भी 

न होगा  समाज रचना इतनी जल्दी नहीं बदलेगी . लेकिन एक चिंगारी तो उठे एक विचार का पल्लवन तो हो जो नर का आवाहन करता चले -ये मादा तुमसे भिन्न नहीं है .यह भी 

आधुनिक मानव है .होमोसेपियन है .माँ ,बहन ,बेटी से इतर 

यह 

एक खूब सूरत बिंदास शख्शियत भी है  कमल पुष्प सी पूर्ण खिली हुई आत्म विश्वास  से लबरेज़ .

हर तीसरे दिन का किस्सा है हिन्दुस्तान में कभी सानिया मिर्ज़ा की स्कर्ट की ऊंचाई पर विवाद .कहीं किसी महिला कालिज में जींस टॉप 

पर पाबंदी .किसी यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह के मौके पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में मिनी स्कर्ट पहन के पश्चिमी शैली की 

नृत्य पर पा -बंदी .तुर्रा यह कि कार्यक्रम हूट होगा लड़के सीटी बजायेंगे .जबकि सीटी बजाना कार्यक्रम से उत्सर्जित आनंद का ही हिस्सा है 

उनकी पसंदगी है .

याद कीजिए नारी मुक्ति आन्दोलन की मुखिया महिलाओं ने प्रतीक स्वरूप चोलियाँ जलाई थीं .यह विद्रोह था समाज के दोहरे पन  के 

खिलाफ .

पूर्णनग्न होकर महिलाओं ने उत्तरपूर्व के एक राज्य में फौजियों की बदसुलूकी के खिलाफ मार्च किया था उनके कैम्पों के बाहर .

महिला की खुली और बंद स्किन के माप से बाहर निकलिए .दूकान बढ़ाके ब्लोगिंग से  मत भागिए .

एक प्रतिक्रिया ब्लॉग पोस्ट :


मंगलवार, 29 जनवरी 2013


किस्सा ड्रेस-कोड का . ..तब और अब ......



                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                        यूं तो बहुत पहले से ही आधुनिका नारियां, नारी –स्वतन्त्रता का अर्थ -- मनमानी ड्रेस पहनना व अपनी इच्छानुसार  कहीं भी ,कभी भी घूमने फिरने की स्वतंत्र जीवन-चर्या को कहती रही हैं  | परन्तु अभी हाल में ही ‘निर्भया’ बलात्कार काण्ड के पश्चात जहाँ देखें,जिसे देखें.. अपनी-अपनी कहता\कहती –चिल्लाता/चिल्लाती  घूम रहा है, पुरुषों पर कठोर बंधन, आचरण, पुरुषवादी सोच, घिनौने विचार, समाज की रूढ़ियाँ –संस्कृति  आदि को गरियाना...पुराण-पंथी बताना जोर-शोर से चल रहा है | यद्यपि कहीं कहीं , किसी-किसी कोने से कुछ विपरीत विचार भी आजाते हैं परन्तु वे ‘नक्कारखाने में तूती की आवाज़’ की भांति रह जाते हैं|  तमाम विचार, टीवी शो, वार्ताएं, ब्लाग्स, आलेख ,महिला-कार्यकर्ताओं, महिला संगठनों , युवा संगठनों,  महिलाओं के लिए महिलाओं-पुरुषों द्वारा गठित एनजीओ  आदि के विचार ,देखने पढ़ने सुनने  के पश्चात मेरे मन में भी कुछ विचार उठे ,( हो सकता है किसी आलेख आदि पढ़कर आये हों ) -----

1-पहले... गाँव के स्कूल में लड़कियां साड़ी-कमीज़  व लडके पायजामा-कमीज़  या नेकर-कमीज़  पहन कर जाया करते थे ....शहरों के स्कूलों –कालेजों में  लड़के पेंट और कमीज पहनते थे और लडकिया सलवार- कमीज और दुपट्टा पहनती थीं....
---------- लड़के तो अभी भी पेंट और कमीज पहनते हैं पर लडकियाँ ...स्कर्ट-टॉप  पहन कर स्कूल जाती हैं...जो कि समय के साथ-साथ हर ओर से छोटी होती जा रही है...

2.पहले... विविध पार्टियों अदि में  ..पुरुष ...पेंट, कमीज और कोट पहन कर जाते थे और महिलायें साड़ी के साथ पूरी बांह का ब्लाउज और ऊपर से कार्डिगन-शाल आदि या शलवार-सूट-दुपट्टा  पहन कर जाती थीं.....
--------पुरुष  की ड्रेस तो आज भी वही है....पर महिलाओं  की ड्रेस में साडी और ब्लाउज के बीच दिन प्रतिदिन दूरी बढ़ती जा रही है....साडी ऊपर से  नीचे जा रही है और ब्लाउज नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे आ रहा है, पीठ पर से कपड़ा बचाया जा रहा है और नयी अधुनिकाएं तो जींस-नाभि दर्शना टॉप या छोटी होती हुई स्कर्ट-टॉप में  जैसे-- कि औरतें तन ढकने के लिए नहीं बल्कि तन-बदन  दिखाने के लिए कपडे पहनती हों .....??

३-.पहले ...दफ्तर में  पुरुष कर्मचारी  की ड्रेस पेंट कमीज और कोट होती थी और महिला-कर्मचारियों  की साडी- ब्लाउज या फिर सलवार-कमीज कार्डिगन के साथ होती थी....
---------पुरुषों की तो ड्रेस अब भी  वही है पर महिलाओं की ड्रेस में एक पीस के कपडे आ गए हैं जो कि वक्षस्थल से लेकर कमर तक  नितम्बों से कुछ नीचे तक ही पहने  जाते हैं....या फिर स्कर्ट और टॉप जो कि क्रमश  छोटे होते जा रहे हैं....

परंपरागत साड़ियाँ














                   पुरुष  की शर्ट की कालर आज भी ऊपर से ही शुरू होती है...और बाहें....वहीँ  तक हैं ( कुछ अमरीकी-परस्त  युवा व प्रौढ़ भी बरमूडा-कीमती बनियान  पहन कर भी घूमने लगे हैं ताकि कहीं वे कम कपडे पहनने की आधुनिकता में लड़कियों से पीछे न  रह जायं )....जबकि स्त्रियों  की ड्रेस  ऊपर से नीचे आती जा रही है...और नीचे से ऊपर जाती जा रही है.....और ब्लाउज स्लीव लेस से गुजर कर और भी ज्यादा डीप कट, लो-कट,  ब्रेस्ट-दर्शना, ब्रा-दर्शना ,  बेकलेस ..  बनने लगे हैं...ताकि आगे –पीछे नंगा बदन -नंगी पीठ अधिकाधिक दिखाए दे  पहले महिला  की ब्रा दिखाई देना एक बहुत बड़ी  व अशोभनीय बात मानी जाती थी और अब एक फेशन  बनगयी है |




--------यक्ष-प्रश्न यह है कि  युगों-सदियों से जिस भारत जैसे देश में शर्म औरत का गहना कहा जाता था...महिलायों –लड़कियों का शरीर दिखाना उचित नहीं माना जाता था, असभ्यता, अशालीनता, अशोभनीय  माना जाता था ... उस देश में ऐसा क्या हुआ कि औरत फैशन के नाम पर दिन पर दिन नंगी होती जा रही है,  और पुरुष के विभिन्न फैशन के कपडे भी पूरे शरीर को ढंकने वाले होते हैं|..क्यों.... क्या इसके कुछ लाभ भी हैं जो मैं नहीं समझ पा रहा हूँ .........??
                       क्या महिलायों को पुरुष के सामने चारे की भाँति परोसा जा रहा है( या वे स्वयं, स्वयं को परोसना चाहती हैं ) और पुरुष को महिलाओं की नज़रों से छिपाकर रखना इसका उद्देश्य है.....ताकि महिलायें बिगड़ें नहीं |

                                     ---- सभी चित्र गूगल साभार ....

7 टिप्‍पणियां:

शालिनी कौशिक ने कहा…

veerubhai ji dekha jaye to dr.shyam gupt ji kee post poori tarah se galat bhi nahi hai .aadmiyon ke kapde unki shobha badhate hain to nari kaise ye samjhti hai ki uska tan uski sundarta badhayega .vastrheen to chhota bachcha bhi achchha nahi lagta ..सार्थक प्रस्तुति नसीब सभ्रवाल से प्रेरणा लें भारत से पलायन करने वाले
आप भी जाने मानवाधिकार व् कानून :क्या अपराधियों के लिए ही बने हैं ?

Arvind Mishra ने कहा…

समाज रचना इतनी जल्दी नहीं बदलेगी .....
जी बजा फरमा रहे हैं -न तो समाज न वे ही ....आपको जिसके जवाब का कहीं इंतजार है वो भी नहीं! आप उनके लक्ष्य समूह में नहीं है :-)

Arvind Mishra ने कहा…

सोहे न बिना वसन वर नारी

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

और भी गहन विचार के बिन्दु, नित ही खुलते जा रहे हैं।

madhu singh ने कहा…

सर जी ,बड़ी बिडम्बना है नारी देह को
लेकर,निर्वसन नारी स्वार्थ की अग्नि
में जल रही होती एक खिलौना ही होती है
जिसके लिए अश्मिता का कोइ अर्थ नहीं
होता,भौतिकता की चकाचौंध ने उसे अँधा
बना दिया है,हर औरत की अपनी अपनी
अलग सोच होती है चाँद सिरफिरे मर्दों
और सिरफिरी औरते यदि घृणित कृत्य
करने पर आमद ही है तो इसे रोकने का
कोए कारगर तरीका होना ही चाहिए
जिससे हमारा समाज विक्रितिओन की
आग न चढ़ जाय,मर्द चिर हरण को जब तक
तक शान समझते रहेंगे तब तक औरते
कोपभाजन की शिकार होती ही रहेगी,
पर औरतो को भी मर्दों के
सीमा के उलंघन का पुरजोर विरोध करना
ही होगा साथ ही स्वयम को भी मर्यादा
की सीमा में बंधना ही पड़ेगा (taksal)

Pratibha Verma ने कहा…

अब क्या कहें ...सर जी ..ऐसा भी नहीं है ये कि सिर्फ टीवी स्क्रीन तक सीमित है ...अब तो ये आम बात है ...:)

डॉ टी एस दराल ने कहा…

डॉ श्याम गुप्ता ने दिलचस्प उपरी तथ्य दिए हैं।
लेकिन कसूर नारी की पोशाक का नहीं है। कसूर आदमी की सोच का है। आदमी के कपड़ों की तरह उसकी सोच भी नहीं बदली। इस मामले में युवा पीढ़ी आगे है।