शनिवार, 1 दिसंबर 2012

होमवर्क की सलीब पर लटके बच्चे

होमवर्क की सलीब पर लटके बच्चे 

वर्जिनिया  विश्वविद्यालय के रिसर्चरों ने हाल ही में अपने एक अध्ययन से पता लगाया है ,होमवर्क से

बच्चों को लादे रखने का कोई बढ़िया नतीजा नहीं निकलता है .सिर्फ खाना पूर्ती के लिए होमवर्क के वास्ते

होमवर्क नौनिहालों को दे दिया जाता है यह कक्षा में सीखे  गए पाठों की निरंतरता को न तो आगे बढ़ा रहा है

और न ही इससे नौनिहालों के स्कूल ग्रेड में ,कोई सुधार आ रहा है .

एक तो बसते का बोझ ऊपर से होमवर्क का अतिरिक्त बोझ .पौ फटते ही स्कूल पहुँचने की दौड़ शुरू हो

जाती है .घर पहुँचते ही होमवर्क का डंडा बच्चों की मेधा के पंख कुतर रहा है .सीखने की कुदरती प्रवृत्ति के

पंख नोंच रहा है .


स्कूल जन्य अ -स्वस्थतायें ,पेटदर्द ,सिर  दर्द ,बे -चैनी और अंत में बे -तुकी परीक्षा के नतीजे हर बरस

कितने ही बच्चों की जान ले लेते हैं .

जबकि कोई दस बरस पहले यशपाल समिति ने स्कूल के बसते का वजन कम करने की सिफारिश की थी

.बसते के इसी वजन से जुड़ा है होमवर्क .उन सिफारिशों को ठंडे बसते में डाल दिया गया .

अमरीका ,जापान डेनमार्क जैसे विकसित देशों में होमवर्क को तकरीबन समाप्त कर दिया गया है .

होमवर्क के तरफदार कहतें हैं एक तो भारत में समर्पित शिक्षकों का अभाव है ,शिक्षकों की गुणवत्ता भी

संदेह के दायरे में बनी रहती है ऊपर से  60-90 बच्चों के पीछे एक शिक्षक .ऐसे में दवा सम्पूरण ,सम्पूरकों

की

तरह होमवर्क को लाज़मी बतलाया जा रहा है .

जबकि होमवर्क से बच्चे ही नहीं माँ बाप अन्य अभिभावक भी आजिज़ आ चुकें हैं .हर लम्हा तनाव रिश्ता है

इस होमवर्क से .यहीं से शुरू होती है ट्यूशन की दौड़ .माँ बाप को आसान लगता है हर विषय की ट्यूशन

दिलवाना खुद होमवर्क करवाने का न हरेक के पास वक्त है न सामर्थ्य .

इम्तिहानी लाल बना भी दिया तो  फायदा क्या होगा ?96 %अंक वाले को यहाँ मनमाने पसंदीदा कोलिज में न

दाखिला मिलता है न विषय चयन की सुविधा .सिर्फ चार फीसद लाभन्वित हो रहें हैं इस शिक्षा व्यवस्था से

जिसकी बुनियाद होमवर्क से ट्यूशन /कोचिंग सेंटर्स तक विस्तारित है .


रिसर्च रिपोर्ट से हटके जब होम वर्क के मुद्दे पर हमने डॉ .वागीश मेहता (विचारक एवं साहित्य -कार ) से बात की

वह बेहद व्यथित नजर आये .कहने लगे बहुत पहले की बात नहीं  है किसी का बच्चा उस वक्त इस वजह से

अपढ़ नहीं

रहता था की उसके बाप के पास पढ़ाने के लिए पैसे नहीं हैं .शिक्षा कोर्पोरेटीकरण  से दूर थी .सरकारी या फिर

निजी स्कूल में शरण मिल जाती थी .बस इतना भर कहना होता था मास्टर जी आज से ये बच्चा आपके हवाले

कहके निश्चिन्त  हो रहते थे माँ बाप .आज तो माँ बाप की सारी कमाई ही यह नाकारा शिक्षा व्यवस्था खा जाती

है .

होम वर्क तो इस अ -व्यवस्था की एक छोटी सी कड़ी मात्र है क्लास के पाठ को भी यदि होमवर्क आगे बढ़ा  रहा है

तो

स्वयं उस पाठ की समाज के लिए क्या उपयोगिता है .

अलबत्ता होमवर्क बच्चे को ठीक से रोना सिखा  देता है .स्कूल इस पर फख्र कर सकता है .कह सकता है देखो

आपके बच्चे को हमने ठीक से रोना सिखा दिया .लेकिन बच्चे को

सीधे सीधे सजा नहीं दे सकता होम वर्क की और बात है .

शिक्षा साक्षरता और जानकारी बाँट रही है संस्कार पैदा नहीं कर रही है .नोलिज इकोनोमी को लेकर हम फूले

नहीं समा रहें हैं .




7 टिप्‍पणियां:

shalini ने कहा…

बिल्कुल सही लिखा है वीरू भाई ...मैं तो रोजाना ही इस हालत से बाबस्ता होती हूँ... नन्हें नन्हें बच्चे अपने वज़न से दुगना बोझ उठाये आपने तथाकथित भविष्य का निर्माण करने चल देते हैं... इस पर अंकुश लगाना आवश्यक है.

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

होमवर्क के वि‍रूद्ध कानून होना चाहि‍ए

मनोज कुमार ने कहा…

सारा मामला बस्तों का है, कोई भारी बस्ता उठाने को मज़बूर है, कोई ठंडे बस्ते में चीज़ों को डाल देने के लिए मशहूर है।

शालिनी कौशिक ने कहा…

सही कहा आपने होमवर्क से शुरू ट्यूशन की दौड़ .बहुत सुन्दर सार्थक बात कही है आपने. आभार [कौशल ]आत्महत्या -परिजनों की हत्या [कानूनी ज्ञान ]मीडिया को सुधरना होगा

शिखा कौशिक ने कहा…

प्रेरक सार्थक पोस्ट हेतु आभार हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

सतीश सक्सेना ने कहा…

अनूठी पोस्ट , बच्चों के बारे में कोई नहीं सोंचता ..
केवल एक चाह रहती है कि बच्चा ह्मारा बड़ा नाम करेगा !
मानसिक समस्यायों से जूझते यह मासूम अपने बचपन में अक्सर प्यार को महरूम रह जाते हैं !
सादर वीरू भाई !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रेरक प्रस्तुति..