सोमवार, 31 दिसंबर 2012

फैसला निर्भया की मौत से पहले और बाद का


 फैसला निर्भया की मौत से   पहले और बाद का 


निर्भय को सिंगापुर ले जाने का फैसला सरकार का था चिकित्सा माहिरों का नहीं .सरकार की अपनी

खुफिया एजेंसी है जिसने साफ़ बतलाया था दिल्ली को आग लग जायेगी निर्भया  की इस तरह होने वाली

मौत से .

माहिरों के  अनुसार निर्भया को ऐसी दिमागी नुकसानी उठानी पड़ी थी जिसकी भरपाई  हो नहीं सकती थी .

मंगल वार की रात गए बुद्धवार की सुबह उसे यह अ -पूर्ण -नीय  नुकसानी उठानी पड़ी थी .

इस नुकसानी की वजह बना था -Thromboembolic attack .

खून का थक्का आ फंसा था उसकी रक्त वाहिनी में .इसी का नतीजा थे एक के बाद एक दो हार्ट अटेक .

पहला दिल का दौरा दुरुस्त कर लिया गया बिजली का झटका देकर लेकिन इसी दुरुस्ती  के दौरान दिमाग

को ऐसी नुकसानी उठानी पड़  गई जो अन्ततया मौत का सबब बनी .

हवाई सफर में दिल की लुब डूब को तबदील  करके बलिकृत करके  चलाये रखने के लिए निर्भया को

Inotropic drugs दवाएं

दी गईं .


Inotropic drugs a change the strengths of heart beats and are used to 

manage various heart 

conditions.


फ़ौरन  बाद आँख की पुतलियों पर टोर्च की तेज़ रोशनियाँ डाली गई .ना -मालूम सी प्रतिक्रिया हुई .स्नायुतंत्र

के रोगों के माहिर (न्यूरोलोजिस्ट )की राय  में इस स्थिति में किसी भी विध किसी भी प्रकार का अंग

प्रत्यारोपण संभव ही न था .

कुछ माहिरों के अनुसार निर्भया की दूसरे  दिल के दौरे के बाद ही दिमागी मृत्यु हो चुकी थी ,उस दरमियान

जब तीन चार मिनिट तक उसकी नव्ज़ की हरारत  गायब हो गई थी .रक्त चाप गायब था .

फिर भी उसे ले जाया गया सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल जिसे अंग प्रत्यारोप में महारत हासिल है .
उसे इस हालत में ले जाना चाहिए था या नहीं यह  सवाल अन -उत्तरित रहेगा आने वाली संततियों के लिए

.सम्बद्ध माहिर इस दरमियान हमारे बीच मौजूद न रहेंगे अपना पक्ष रखने के लिए .वस्तु   स्तिथि का

खुलासा करने के लिए .ये विचार व्यक्त किये थे साहित्यकार एवं चिन्तक डॉ .वागीश मेहता जी ने .

तब क्या उसे ब्रेन डेथ हो जाने के बाद ले जाया गया ताकि भारत में होने वाली अप्रत्याशित प्रतिक्रिया से

बचा जा सके ?

हमने जब यह सवाल मशहूर मनोविज्ञानी (पूर्व में नेशनल प्रोफ़ेसर आफ साइकोलोजी ) डॉ .इन्द्रजीत सिंह

मुहार से किया वह बोले :


इतना साख वाला अस्पताल भारत सरकार के साथ मिलकर इतनी बड़ी नौटंकी नहीं कर सकता .उनके इस

ड्रामे में शरीक हो जाए .अलबत्ता सरकार का यह कदम देर से उठाया गया कदम था लाज बचाए रखने के

लिए .

सरकार तो निकम्मी है ही यह पुलिस आम आदमी के किसी काम की नहीं है .

अलबत्ता यह आंच जलती रहनी चाहिए .स्थितियां हाथ से न निकलने देने चाहिए .असल सवाल इस

आन्दोलन को बनाए रखने ,मुद्दे उठाए रखने का है जो एक विधायी भूमिका निभा सकता है आइन्दा के लिए

.अब सवाल निर्भया की मौत के बाद की अटकल का है .कहाँ किया गया निर्भया का अंतिम संस्कार ?दिल्ली

या बल्लिया ?

सरकार का निवेदन उसका आदेश ही होता है .उसके माँ बाप के लिए सरकार का निवेदन उसका आदेश ही

था .कोई सनद कोई चित्र नहीं है उसके अंतिम संस्कार का .यह कैसी मृत सरकार है जो उसकी मौत से भी

डरी  हुई है .जन्तर मंतर  पर बैठे जिंदा प्रदर्शन कारियों से भी .खुद अपनी उलटी गिनती गिन रही है सरकार .

एक बात बिलकुल  साफ़ है  सरकार का मुंह बेशक लटका हुआ है लेकिन इसकी वजह निर्भया की मौत नहीं

है . सरकार अपनी आसन्न मृत्यु देख रही है अपना अवसान देख रही है उसे लग रहा है उसने अपना ही

अंतिम संस्कार किया है निर्भया के गम में दुखी नहीं है सरकार .

सरकार अपने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान की सलाह को धता बताकर खुद ही जब त्रेहन के मेदान्ता में गई

उनकी सलाह को तरजीह दी तब उसने खुद ही अपने गाल पे कसके तमाचा नहीं मारा क्या ?यह उसका

अपना निजाम था .

पुनश्चय :





   जब समूह की चेतना राष्ट्रीय चेतना ,जन चेतना बन जाती है तब उन 

निजामों और सरकारों को जागना पड़ता है जो पुलिस का 

इस्तेमाल वेतन के अलावा मिलने वाली विशेष सुविधा ,Perks की तरह 

करती 

आई हैं . .उनकी  गति और नियति वही  होती है जो इस समय दिल्ली 

दरबार की है .

सरकार इतना डरी हुई थी निर्भया के जीर्ण शीर्ण निष्प्राण शरीर को दिल्ली 

लाना ही नहीं चाहती थी पडोसी राज्यों को खंगाला गया कहीं से 

कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया न मिली ,इस दरमियान शाम 

पांच बजे से रात दस बजे तक निष्प्राण शरीर सिंगापुर हवाई अड्डे पर बना 

रहा .जबकि एयर इंडिया के विशेष विमान AI Flight 380 A को 

प्राथमिकता के आधार पर उड़ने की अनुमति काफी पहले 

मिल 

चुकी थी .एक ऊहापोह की स्थिति बनी हुई थी दिल्ली का कोई ज़िक्र नहीं 

था ,संभावना तलाशी जा रही थी कलकत्ता /लखनऊ अन्यत्र 

विमान को हांक के ले जाने की .

(Body kept waiting 3 hrs in S'pore as govt wanted to avoid 

chaos in Delhi ./MumbaiMirror/Monday,December 

31,2012)

सरकार शव को दिल्ली लाना ही नहीं चाहती थी .हौसला ही नहीं था .

निर्भया के माँ बाप अन्यत्र जाने को राजी न हुए .

निर्भया अकेली नहीं है प्रतीक है आधी आबादी की ताकत की  अब .हौसला 

बनाए रहें .यह सात्विक आंच जलती रहे जीत लोक शक्ति की 

ही होगी जिसके आगे राज्य की शक्ति बौनी रह जायेगी .





6 टिप्‍पणियां:

Ashok Saluja ने कहा…

भारत की बेटी का बलिदान व्यर्थ न जाये ...अब ये ही हमारा धर्म है ....
शुभकामनायें!

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत दुखद...पर यह बलिदान व्यर्थ नहीं जाना चाहिए...

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 02/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

shikha varshney ने कहा…

न जाने क्या हो रहा है. न जाने क्या होगा.:(

कविता रावत ने कहा…

बहुत ही दुखद हुआ ...अब यह बलिदान व्यर्थ न जाय ..यही करना है ..

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

हमारे समाज का दोग़लापन कैसे दूर हो ?
आपने जिस बात को उठाया है, उस पर वाक़ई विचार किया जाना चाहिए। इससे आगे बढ़कर यह भी सोचा जाना चाहिए कि बलात्कार या हत्या के जिन मुजरिमों के लिए कोर्ट सज़ा ए मौत मुक़र्रर करता है। उन्हें राष्ट्रपति द्वारा माफ़ कर दिया जाता है। इसी के साथ समाज को ख़ुद अपने बारे में भी सोचना होगा क्योंकि ये सारे बलात्कारी और हत्यारे इसी समाज में रहते हैं।
ऐसी धारणा बन गई है कि सामूहिक नरसंहार और बलात्कार के बाद भी सज़ा से बचना मुश्किल नहीं है अगर यह काम योजनाबद्ध ढंग से किया गया हो। पहले किसी विशेष समुदाय के खि़लाफ़ नफ़रत फैलाई गई हो और उस पर ज़ुल्म करना राष्ट्र के हित में प्रचारित किया गया हो और इसका लाभ किसी राजनीतिक पार्टी को पहुंचना निश्चित हो। ऐसा करने वालों को उनका वर्ग हृदय सम्राट घोषित कर देता है। वे चुनाव जीतते हैं और सरकारें बनाते हैं और बार बार बनाते हैं। देश के बहुत से दंगों के मुल्ज़िम इस बात का सुबूत हैं। राजनैतिक चिंतन, लक्ष्य और संरक्षण के बिना अगर अपराध स्वतः स्फूर्त ढंग से किया गया हो तो एक लड़की से रेप के बाद भी मुजरिम जेल पहुंच जाते हैं जैसा कि दामिनी के केस में देखा जा रहा है।
दामिनी पर ज़ुल्म करने वालों के खि़लाफ़ देश और दिल्ली के लोग एकजुट हो गए जबकि सन 1984 के दंगों में ज़िंदा जला दिए गए सिखों के लिए यही लोग कभी एकजुट न हुए। इसी तरह दूसरी और भी बहुत सी घटनाएं हैं। यह इस समाज का दोग़लापन है। इसी वजह से इसका अब तक भला नहीं हो पाया। दूसरों से सुधार और कार्यवाही की अपेक्षा करने वाला समाज अपने आप को ख़ुद कितना और कैसे सुधारता है, असल चुनौती यह है।