बुधवार, 26 दिसंबर 2012

हाई -कमान गिरवीं कोष


हाई -कमान गिरवीं कोष 

कांग्रेस इस देश में एक प्रतिष्ठित दल रहा है .गांधीजी के समय में भी इसकी सदस्यता शुल्क चवन्नी थी 

दीगर है की गांधीजी इसके चवन्निया सदस्य भी नहीं थे .फिर आया हाईकमान का दौर .होते होते यह हुआ 

की अब सदस्यता तो निश्शुल्क है लेकिन हाईकमान गिरवीं कोष में दिमाग गिरवीं रखना पड़ता है .

अब सारे कांग्रेसी हाईकमान की भाषा बोलते हैं .आदमी काठ का बन्दा बना दिया गया है इसका मूर्त रूप 

हमारे प्रधान मंत्री हैं .जो निर्भाव ,निर - मुद्रा ,बिना देह भाषा के बने रहतें हैं .चेहरे पे न कोई भाव न अनुभाव 

,स्पंदन हीन    चेहरा   न कोई हर्ष न विषाद .  भले कुछ भी  होता रहे देश में .

समत्व योग कहते हैं इस स्थिति को .दिल्ली में कुछ गड़बड़ है यह समझने में प्रधानमन्त्री को पूरा एक 

हफ्ता लग गया .एक हफ्ते बाद उन्होंने बतलाया उनके तीन बेटियाँ हैं इससे पहले देश वासियों को इसका 

इल्म न था .

गृह मंत्री गदगद हैं सोनिया जी आकाश से उतर कर नीचें आईं निर्बुद्ध प्रदर्शनकारी फिर भी रो रहें हैं .इतनी 

बड़ी बात हो गई और प्रदर्शनकारी अ -संतुष्ट बने हुए हैं . निर भाग हैं .

वित्त मंत्री जी कहतें हैं हम चित्त नहीं हुए  हैं ,सामने वाला ही थप्पड़   मारते मारते  हर बार थक जाता है 

हमारी 


हार भी गुजरात में हमारी जीत है .

क्योंकि लोगों के दिमाग गिरवीं पड़ें  हैं इसलिए यहाँ किसी को यह पता ही नहीं है कब क्या बोलना है .एक 

ख्यात विदेश मंत्री हुए हैं वह यू एन ओ में किसी और देश का ही भाषण पढ़ने  लगे स्थानीय एमिसरी ने उन्हें 

अलग लेजा के बतलाया यह भाषण गलत है यहाँ नहीं पढ़ना था .

हर मंत्री बैनी प्रसाद वर्मा हो गया है .एक वक्रमुखी दुर्मुख अचानक चुप हो गया है .इसे मंद मति कांग्रेसी 

बालक का भोपाली गुरु समझा जाता रहा है .इसे शायद इल्म हो गया है यही वक्त है अब हाई कमान कोष 

में से गिरवीं रखा दिमाग छुड़ा  लिया जाए .कल का कोई निश्चय नहीं .

यदि कांग्रेस 2014 आम चुनावों में हार गई तो दिमागों की अदला बदली भी हो सकती है इसका दिमाग 

उसके पास उसका इसके .सोचिए तब कैसा आलम होगा .शरीर किसी का दिमाग किसी का .और फ़र्ज़ करो 

हाई कमान इटली के लिए निकल जाए .सारे दिमाग लापरवाही से फैंक कर  के    कहें          उठा लो अपना 

 अपना 

मैं 

चली 

अब भारतवासी राज करेंगे यहाँ  ,इंडिया में मेरा दिल नहीं लगता . 

मंद  बुद्धि  वालों       का  इलाज़ तो  है बंद बुद्धि वालों का इलाज़ अभी विज्ञान के पास भी नहीं है .   

   और भाई साहब अब सरकार और अपराध तत्व पर्यायवाची हो गए हैं .बलात्कारी अन्दर भी हैं सरकार के

बाहर भी .चुनावी पर्चा भरते समय इस बात की बा -कायदा तस्दीक की गई है ताकि सनद रहे .

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति .