शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

सत्ता जीती संसद हारी ,


ऍफ़ डी आई के मुद्दे पर लोकसभा में जो कुछ भी हुआ ,तथा 'सपा 'और 'बसपा 'ने जो कुछ किया उस पर टिपण्णी करने की तो देश को कोई 

ज़रुरत नहीं है ,पर जो कुछ इस देश ने महसूस किया है उस 

पर विचारक कवि डॉ .वागीश मेहता की ये पंक्तियाँ पठनीय हैं :

सत्ता जीती संसद हारी ,

हारा जनमत सारा है ,

चार उचक्के दगाबाज़ दो ,

मिलकर खेल बिगाड़ा है .

प्रस्तुति :वीरुभाई (वीरेंद्र शर्मा )

5 टिप्‍पणियां:

यादें....ashok saluja . ने कहा…

वीरू भाई कौन सी अनोखी बात हुई ? उन्होंने तो हमेशा की तरह अपना काम किया है ...
हम ही पीनी से डूबते बिच्छू को निकालते हैं और डंक खाते हैं..???
राम-राम !

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

ये तो होना ही था,
राजनीति में ये कोई नई बात नही है,,,

शालिनी कौशिक ने कहा…

.पूरी तरह से सही विचारणीय प्रस्तुति आभार .आत्महत्या-प्रयास सफल तो आज़ाद असफल तो अपराध . sath hi शोध -माननीय कुलाधिपति जी पहले अवलोकन तो किया होता .

madhu singh ने कहा…

Sir Ji aap ne "ham hare ham doob gye, dekh ke maya tut gye,kya kahte kyo doob gye,mat poocho ham tut gye.....jahar ki pudiya apna kam kar hi gyee aur ham khade khade es mulk ka malal dekhte rahe....

संजय भास्कर ने कहा…


बहुत ही विचारणीय प्रस्तुति शर्मा जी
कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ
मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है
http://sanjaybhaskar.blogspot.in/2012/12/2.html#links