गुरुवार, 1 अगस्त 2013

अर्जुन विषाद योग

अर्जुन विषाद योग 

अध्याय -१ ,श्लोक (२ ६ -४ ७ )

मन से आते हैं काया में रोग ,कायिक रुग्णता। जब आदमी का मन बीमार हो जाता है शरीर उसका अनुगामी

बन उसका अनुकरण करने लगता है उसके पीछे पीछे चलने लगता है। अर्जुन भगवान कृष्ण को बतलाते हैं :

युद्ध के मैदान में अपने ही स्वजनों को शश्त्र  सज्जित देख कर मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं। शरीर में कंपकंपी हो

रही है। मेरे हाथ से वही  गांडीव छूटा जा रहा है जिसकी प्रत्यंचा खींचने मात्र से दिशाएँ भी कम्पित हो जाती थीं।

मेरा बदन मेरी त्वचा जल रही है। मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। मेरा सिर दुःख रहा है चक्कर खा रहा

है। मेरा दिमाग घूम रहा है। शरीर शिथिल हो रहा है हलक सूख रहा है.ये वैसे ही लक्षण हैं जैसे आजकल आम

फ्लू में आये दिन हो जाते हैं। अमरीका की तो राष्ट्रीय बीमारी है फ्लू हर साल टीके बनते हैं फिर भी बे -

काबू  रहती है रुग्णता ।

हर साल नया विषाणु इसकी वजह बनता है।

अर्जुन का मन हार जाता है युद्ध क्षेत्र के बीचों बीच ला खडा करते हैं अर्जुन को भगवान जहां से वह दोनों ओर

की सेनाओं योद्धाओं को साफ़ देख रहा है।

आदमी का मन प्रसन्न होता है तो रोम रोम भी पुलकित होता है। प्रसन्न बदन होता है ख़ुशी में आदमी।


अर्जुन कहते हैं हे केशव मैं सारे अपशकुन देख रहा हूँ। सारे लक्षण विपरीत दिखलाई देते हैं मुझे। यह वैसे  ही है

जैसे वैश्य के हाथों से तराजू गिर जाए लेखक के हाथ से कलम। अपने स्वजनों  को मारकर मैं कोई कल्याण

नहीं देख पा रहा हूँ।

भगवान कहते हैं :अर्जुन मोह ग्रस्त हो गया है  मोहपाश में फंसकर जो कुल के राष्ट्र के दुश्मन हैं धर्म के

विपरीत आचरण कर

रहें हैं उन्हें अपना स्वजन बतला रहा है। विषाद ग्रस्त अर्जुन कहता है कृष्ण मैं किसी तरह की कोई जीत नहीं

चाहता इतने लोगों को मारकर कष्ट देककर मुझे कोई राज्य भी नहीं चाहिए। ऐसे जीवन ऐसी सफलता सुख

भोग से क्या हासिल है जो इतने सारे लोगों को दुःख देकर मिले। जिन अपनों के लिए राज्य चाहिए सुख भोग

चाहिए धन चाहिए जब वे ही न रहेंगें मारे जायेंगे इस युद्ध में तो उन लाखों रुपयों पैसों का राज्य का हम क्या

करेंगे ?भोगों के

आनंद  क्या हम ले सकेंगे ?कौन चाहता है अकेले सैर सपाटा सुख भोग सब परिवार के संग स्वजनों के साथ ही

तो इन्हें सांझा करना चाहते हैं।

अर्जुन युद्ध न करने के कारण बतला रहें हैं :

अर्जुन कहतें हैं अपने ही रिश्तेदार आमने सामने खड़े हैं   एक ही परिवार दो भागों में बंटके आमने सामने

शश्त्र ताने खडा है।जिन्होनें ने मुझे प्रत्यंचा पर तीर रखना सिखाया अर्जुन बनाया उन गुरुजनों पर अपने ही

पुत्रों ,पुत्रों के भी पुत्रों पर ,अपने तमाम  मित्रों पर  मैं शश्त्र  कैसे उठाऊँ ?

हे मधुसूदन !इस छोटे से पृथ्वी राज्य की तो बात कौन करें तीनों लोकों का राज्य भी मुझे मिले तो भी मैं इन्हें

नहीं मारना चाहता। मधु सूदन नामक राक्षस को मारने के कारण ही आपका नाम मधु-सूदन पड़ा। लेकिन मेरे

सामने तो कोई राक्षस नहीं मेरे अपने हैं। ये सारे मेरे रिश्तेदार हैं मैं इन पर तीर या तलवार कैसे उठाऊँ ?इनके

सामने तो गाली देना अपशब्द कहना भी पाप है।

हे जनार्दन !धृत राष्ट्र के पक्ष वालों को मारकर भी भला हमें क्या प्रसन्नता होगी। इन दुष्टों को मारकर तो हमें

पाप ही लगेगा। इन्फेक्शन ही लगेगा इन्हें छूकर। इन आतताइयों को मारकर के तो हम पाप के भागी ही

बनेंगे।

भगवान् कहते हैं अर्जुन की मोह में फंसी बुद्धि यह समझ नहीं प् आरही है -ये अधर्मी तो पहले से ही मरे हुए हैं इन्हें मारने से कोई पाप नहीं लगेगा। 

ये राष्ट्रकुल ,धर्म के दुश्मन हैं ,अनीति के समर्थक हैं ,मानव द्वेषी हैं। बोझ हैं ये इस धरा पर तू इस धरा को पाप मुक्त करके इसका कुछ बोझ कम कर। स्वस्थ चित्त बन। 

अर्जुन फिर कहतें हैं -अपने ही बांधवों को मारकर हम माधव सुखी कैसे हो सकतें हैं। युद्ध के मैदान में अपने ही बंधु - बांधवों को देखकर  अर्जुन का मन विषाद ग्रस्त हो रहा है। जिसके फ्ल्यू जैसे सिमटम  काया में आपसे आप आते जा रहें हैं। जबकी भगवान साफ़ देख रहें हैं :

अर्जुन का शरीर तो एक दम से स्वस्थ है बीमार है ही नहीं बाहर की माया ,बाहर से आया मन ही उसे बीमार बना दे रहा है। इस प्रकार गीता मनोकायिक रुग्णता(Psychosomatic diseases ) का बेहतरीन समाधान प्रस्तुत करती है। पहले आदमी का मन ही विकारों में आता है। अर्जुन "मेरे अपने "मेरे ,मेरे के भ्रम से बिंध गया है। शरीर तो मन का ही अनुगामी है और मन बाहर से आता है। मन युद्ध के मैदान को देख विषाद ग्रस्त हो रहा है। इसलिए हे अर्जुन स्वस्थ चित्त बन। स्थित प्रज्ञ बन। ये शरीर एक माया है। सत्य नहीं है। यह न पहले था न बाद में रहेगा। 

ॐ शान्ति। 

सन्दर्भ -सामिग्री :योगीआनंदजी का स्काइप पे क्लास रूम। 


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Posted: 31 Jul 2013 10:37 PM PDT
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English Murli

Essence: Sweet children, this confluence age is the land of Brahmins in which you become the children of Brahma. You have to claim your inheritance from the unlimited Father and also enable others to claim it.
Question: What type of intellect do you need in order to understand this knowledge very well?
Answer: Those with business intellects will understand this knowledge very well. This is an unlimited business. The Father continues to show you children many different methods to earn an income. The task of you children is to make effort. You should invent such methods that you continue to accumulate an income for yourselves and in which there is also benefit for others. The remembrance of the Father and service are the means to earn an income.
Song: O traveller of the night don’t be weary! Your days of happiness are about to come.
Essence for dharna:
1. In order to become the first ones in the rosary of Rudra, stay in constant remembrance of the Father. Make yourself pure by remembering the Father and the sweet home.
2. Become a spiritual guide and take everyone on the true pilgrimage. Follow the shrimat of the one Father and make yourself double crowned.
Blessing: May you have a right to double fruit and serve by considering yourself to be a server while carrying out any duty.
While carrying out any task, going to your office or doing business, have the awareness that you are performing that duty for service. “I am doing this service as an instrument” and service will automatically come to you. Then, however much service you do, that much your happiness will increase. Of course you will accumulate for your future, and you will also receive the instant fruit of happiness. So you will have a right to double fruit. When your intellect is busy in remembrance and service, you will then constantly continue to eat the fruit of service.
Slogan: Those who remain constantly happy are loved by the self and by everyone.

Hindi Murli

मुरली सार:- “मीठे बच्चे-यह संगमयुग है ब्राह्मणों की पुरी, इसमें तुम ब्रह्मा के बच्चे बने हो, तुम्हें बेहद के बाप का वर्सा लेना है और सभी को दिलाना है”
प्रश्न:- इस ज्ञान को अच्छी रीति समझने के लिए किस प्रकार की बुद्धि चाहिए?
उत्तर:- व्यापारी बुद्धि वाले ही इस ज्ञान को अच्छी रीति समझेंगे। यह है बेहद का व्यापार। बाप बच्चों को भिन्न-भिन्न कमाई की युक्तियां बताते रहते हैं। बच्चों का काम है मेहनत करना। ऐसी युक्ति निकालनी चाहिए जिससे स्वयं की भी कमाई जमा होती रहे और सर्व का भी कल्याण हो। बाप की याद और सेवा ही कमाई का साधन है।
गीत:- रात के राही थक मत जाना……
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) रूद्र माला में पहला नम्बर आने के लिए निरन्तर बाप की याद में रहना है। बाप और स्वीट होम की याद से स्वयं को पावन बनाना है।
2) रूहानी पण्डा बन सबको सच्ची यात्रा करानी है। एक बाप की श्रीमत से स्वयं को डबल सिरताज बनाना है।
वरदान:- कोई भी ड्युटी बजाते हुए स्वयं को सेवाधारी समझ सेवा करने वाले डबल फल के अधिकारी भव
कोई भी कार्य करते, दफ्तर में जाते या बिजनेस करते – सदा स्मृति रहे कि सेवा के लिए यह ड्युटी बजा रहे हैं। सेवा के निमित्त यह कर रहा हूँ – तो सेवा आपके पास स्वत: आयेगी और जितनी सेवा करेंगे उतनी खुशी बढ़ती जायेगी। भविष्य तो जमा होगा ही लेकिन प्रत्यक्षफल खुशी मिलेगी। तो डबल फल के अधिकारी बन जायेंगे। याद और सेवा में बुद्धि बिजी होगी तो सदा ही फल खाते रहेंगे।
स्लोगन:- जो सदा खुशहाल रहते हैं वह स्वंय को और सर्व को प्रिय लगते हैं।


"स्वदेशो भुवनत्रयम्‌"

इस जगत में जो लोग भी अपना अस्तित्व संसार से मानते हैं, उनके लिये ये संसार कभी ना कभी बेवफा, बेगाना अवश्य हो जायेगा, परन्तु जो अपना अस्तित्व एक मात्र भगवान से मानते हैं, उनके लिये तो यह बेगाना संसार भी भगवान का ही एक स्वरुप बन जाता है ।

Yogi Anand Ji

3 टिप्‍पणियां:

Vikesh Badola ने कहा…

वाह स्थिति प्रज्ञता पर देशवासियों को अर्जुन बनाकर अच्‍छा पाठ सिखाया। उठ चल खड़ा हो मरे हुए हैं जो उन्‍हें मार कर कैसा पाप। यह तो धरती पर उपकार होगा। नवांकुरों के लिए वरदान होगा यह निर्णय।

पुरुषोत्तम पाण्डेय ने कहा…

भगवदगीतां सार पर टिप्पणी करना सूरज को दीपक दिखाने के समान है. आदरणीय व्यासपीठ को नमन के साथ ही आपको इसे ब्लॉग के माध्यंम से प्रकाशित करने के लिए साधुवाद.

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत ही सहज और सुंदरता से समझाया आपने, बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.