सोमवार, 6 जून 2011

लोकतंत्र में जो हो जाए थोड़ा है ....

लोक तंत्र में जो हो जाए थोड़ा है :
बाबा को पहना दै कल जिसने सलवार ,
अब तो बनने से रही फिर उसकी सरकार ,
रोज़ रोज़ पीटने लगे बच्चे और लाचार ,
है कैसा ये लोकमत कैसी है सरकार ।
और जोर से बोल लो उनकी जय जयकार ,
सरे आम पीटने लगे मोची और लुहार ,
संसद में होने लगा ये कैसा व्यापार ,
आंधी में उड़ने लगे नोटों के अम्बार ,
संसद बनके रह गई कुर्सी का हथियार ,
कुर्सी के पाए बने मोटे गैंडे चार ।
भाई साहब कोंग्रेस के मुंह में आखिरी निवाला ,बाबा गले की हड्डी बनने वाला है ।

2 टिप्‍पणियां:

Vivek Jain ने कहा…

बहुत बढ़िया, लाजवाब!

विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Chandra Bhushan Mishra 'Ghafil' ने कहा…

आपने बहुत अच्छा लिखा लोकतन्त्र और उसके भविष्य पर ज़रा इन लाइनों पर ग़ौर करें-

"ज़ुल्मो-सितम को ख़ाक करने के लिए,
लाज़िमी है कुछ हवा की जाय और।
उस लपट की ज़द में तो आएगा ही;
बाबा या नाती या चाहे कोई और।।

एक जब फुंसी हुई ग़ाफ़िल थे हम,
शोर करने से नहीं अब फ़ाइदा।
अब दवा ऐसी हो के पक जाय ज़ल्द;
बस यही है इक कुदरती क़ाइदा।।

वर्ना जब नासूर वो हो जाएगी,
तब नहीं हो पायेगा कोई इलाज।
बदबू फैलेगी हमेशा हर तरफ़;
कोढ़ियों के मिस्ल होगा यह समाज।।"