गुरुवार, 2 जून 2011

ग़ज़ल (रिमिक्स ):दिन बीता और आई रात ,कैसी ये दुखदाई रात .

ग़ज़ल (रिमिक्स ):दिन बीता और आई रात ,कैसी ये दुखदाई रात ।
गज़लकारा:डॉ .वर्षा सिंह .
दिन बीता और आई रात ,कैसी ये दुखदाई रात ,
आँखें अपनी सपने उनके कैसे हुई पराई रात ,
बरखा की छप छप बौछारें ,जिनमे खूब नहाई रात ,
चंदा की चंदनियां में फिर उजली धुली धुलाई रात ,
चन्दा की चंदनियां में फिर गोरे बदन सुहाई रात ।
चाँद का मुखड़ा लगे सलौना यौवन में गदराई रात ,
मिलकर उससे करे ठहोका लेके फिर अंगडाई रात .
होंठों पर अश -आरे मोहब्बत फिर से है शरमाई रात ।
चाँद सितारे फरियादी हैं ,करती है सुनवाई रात ,
जाने कितने ख़्वाब मिटाकर हौले से मुस्काई रात ,
यादों की जलती तीली ने धीरे से सुलगाई रात
सुलग गई जब रात सुहानी काटे न कट पाई रात ।
बीती नहीं बिताई जाए अब तो ये हरजाई रात ।
रिमिक्स :वीरेंद्र शर्मा ,डॉ नन्द लाल मेहता "वागीश ",श्री अरुण कुमार निगम ,
श्री हेम पाण्डेय ।
(गुस्ताखी मुआफ :वीरुभाई ).

3 टिप्‍पणियां:

Dr Varsha Singh ने कहा…

वीरू भाई... आप भी न...

ved parkash ने कहा…

सुलग गई जब रात सुहानी काटे न कट पाई रात ।

वाह जी वाह,,,,,,,,,,,,,,,,,, कलम तोड़ दी शर्मा जी

मनोज कुमार ने कहा…

बरखा की छप छप बौछारें ,जिनमे खूब नहाई रात ,
चंदा की चंदनियां में फिर उजली धुली धुलाई रात ,
क्या खूब ग़ज़ल है, क्या खूब रिमिक्स है!!