मंगलवार, 7 जून 2011

ये आदमी करता क्या है ?

अजीब संकट में फंस गए थे .इससे तो वही दौर अच्छा था जब हम वैश्य कोलिज में पढ़ाते थे और ठेठ शहर में रहते थे ,कभी सिविल रोड ,कभी संत नगर और कभी आर्य नगर .किस्सा १९६७-१९७० तक के बीच का है .कोलिज रेलवे स्टेशन के उस पार पड़ता था .इस पार मुख्यशहर था उस पार काठ मंडी.जाते हम तब भी साइकिल से थे .उस दौर में इक्का दुक्का लोगों के पास ही स्कूटर थे .साइकिल को एक सम्मान जनक दर्जा हासिल था .अलबत्ता यह जरूर देखा जाता था ,साइकिल कौन सी है हरक्युलिस की या रेले की .रेलवे रोड पर ब्रेक मारते थे ,(अ )नाज -मंडी के बाहर एक ख़ास नुक्कड़ की दूकान से पान लेके खाते थे .मौज मस्ती के दिन थे ।
इन्हीं सालों में नेकी राम शर्मा राजकीय महाविद्यालय से हमारा नाता जुड़ा.पहला ग्रेड रिविज़न(७००- १६०० ) होते ही कई महाविद्यलयों से प्राध्यापकों की छंटनी हुई .लेकिन उस दौर में जॉब कोई समस्या नहीं थी .हम एम् एससी (फिजिक्स )थे .जॉब आगे पीछे मिल जाती थी ।
पेट्रोल पम्प तक मज़े से टांगें में बैठ के आते थे .टांगें की टप-टप की आवाज़ ,घोड़े का लीद करना हमें पशु जगत से जोड़े रहता था .यहाँ ज्यादा लोगों के पास स्कूटर थे .क्यों थे यह हमें बाद में पता चला कई सालों बाद .लोग हमें घूरके देखने लगे थे लेकिन हमारी वाक्पटुता और मिलन सारी ,बहिर्मुखता से घबराते भी थे .अंग्रेजी और हिंदी हम शुरू से ही साहित्यिक बोल लेते थे .क्या करें हमारे तो शहर की भाषा ही उपन्यासिक भाषा रही है .ब्रिज मंडल का हरा भरा इलाका बुलंद शहर खड़ी बोली के परिष्कृत रूप का गढ़ .हम यु पी के भैये हो गए .आम आदमी के साथ टांगें से उतरते देखे जाते थे .लेकिन हमारी अपनी नजर में हम हम ही थे .लखनवी आभिजात्य ओढ़े हमसोचते .इन रांगड़ -इयों को आता क्या है हम ही तो इनका भाषिक श्रृंगार कर रहे थे .बदले में ये हमें घूरते थे ।
बहुत बाद में पता चला इन्हें हमसे ख़तरा क्यों था ?
हम इनके सम्मान को आहतकर रहे थे ,एक तो तांगा ऊपर से थैला जिसमे चंद अखबार ,डिक्शनरी और बीडी सिगरेट माचिस सब कुछ का अमलगम ।
असली संकट तब शुरू हुआ जब हम मोडिल टाउन में आके रहने लगे ।यह हब था ट्यूशन -बाजों का आसपास कोलिजों का डेरा था .इसीलिए डॉ और व्याख्याता (यहाँ लेक -चरार कहते थे लोग )यहाँ इफरात से थे .ट्यूशन का ठेका उठता था पूरे एक विषय के पाठ्य क्रम का .कई ट्यूशन -माहिरों ने घर में फाटो -स्टेट मशीनें लगा लीं थीं .ग्रुप्स को नोट्स की कोपी निकाल के देते थे ताज़ी .बाकायदा ट्यूशन थियेटर में ब्लेक बोर्ड था .सब कुछ व्यावसायिक अंदाज़ लिए हुए .इसी लिए लोग हम से फुंकते थे हम उनकी ज़मात में "पढू "कहाँ से आगये जो ट्यूशन से इतर बात करते थे .क्लास में पहले ५-१० मिनिट विज्ञान जगत की नै हलचलों को दिए जाते .नवीनतम आविष्कारों ,बीमारियों के इलाज़ और दवाओं के अवांछित परिणामों को दिए जाते .हम पाठ्य क्रमसे बाहर भी रहते थे ,और कोर्स का समापन भी जल्दी करते थे .पांच मिनिट पहले क्लास में पहुंचना ,पांच मिनिट बाद क्लास छोड़ना ,कभी हाजिरी नहीं लेना ,किसी की हाजिरी चालीस सालों में कम नहीं की .जिसे अच्छा लगे आओ .ज्ञान पाओ .छात्र हम पे जान छिड़कते थे . उनसे गाढ़ी छनती थी हर विषय समस्या पर खुलके संवाद करना हमने उन्हें सिखाया था .
हम किराए के मकान में ही रहते थे .तिस पर तुर्रा ये हमारे घर के सामने या दरवाज़े पर कभी और साइकिलें नहीं देखी गईंहमारी पुरानी साइकिल के सिवाय .उठ बैठ भी हमारी अखबारी और रेडिओ -लालों के साथ थी जहां ग्लेमर और धसक तो थी पैसा नहीं था .हिंदी पत्रकारिता तो वैसे भी हमेशा से ही दारिद्र्य भोगती आई है .
कई पान वाले हमें डॉ .समझते कई रेडिओ वाला .बहर- सूरत हमने कभी किसी कि खुश -फ़हमी को तोड़ाभी नहीं ,रेडिओ से हम टाकर थे (वार्ता के लिए हमें कहाँ भी फिट कर दिया जाता ,गांधी चर्चा से लेके मनोरोगों की परिचर्चा संचालन तक ..असली संकट हमारा नहीं आस पास के लोगों का था .लोग सोचते रहते ये आदमी करताक्या है ,.लेक्चार्रार तो है नहीं इसके घर के बाहर साइकिलें तो है नहीं ,ज़ाहिर है ये ट्यूशन के ग्रुपतो निकालतानहीं है ,पडोसी सोचते डॉ भी नहीं है फिर करता क्या है .
हमने अपने कई साथियों से कहा ,भाई साहब आप हमारे घर को साइकिल स्टेंड ही बनालीजिये ,ट्यूशन को आये बच्चों से कहिये साइकिल हमारे घर के बाहर खड़ी कर दिया करें .कुछ हमारा भी स्टेटस बढ़ जायेगा .लेकिन साहब हमें किसी ने गंभीरता से नहीं लिया ।
फिर आया स्कूटर और कारों का दौर बच्चे कोलिज स्कूटर से और हमारे सहयोगी कार से आने लगे .हमने साइकिल से नाता नहीं तोड़ा .साथी पूछते स्कूटर क्यों नहीं खरीदते मैं कहता जब पैसे हो जायेंगे नै साइकिल खरीदूंगा ।
बतलादें आपको हम पद प्रतिष्ठा पीड़ित कभी नहीं रहे .न कभी किसी की कार पे नजर डाली न कोठी बंगले पे .अलबत्ता नारी को हमने नारी के रूप में ही लिया . अपनी पराई का भेद नहीं किया जहां खूबसूरती दिखी उसे भरपूर निहारा भी सराहा भी ,बतिया भी .बस यहीं हम इन रांगड़ -इयों से आगे निकल जाते थे .आज भी देखने में ठीक ठाक हैं .चेहरे पर संतोष का धन है .बौद्धिक खूबसूरती है ।
उस दिन वह समाज शाश्त्र वाली मेडम कह रहीं थीं-सर हम आपको नहीं आपके खूबसूरत थैले को देख रहें हैं .हमने झट कहा में बीस साल बाद मिलीं हैं आप .हमसे बीस साल पहले आपका परिचयहो गया होता तो पहले हमें बाद में थैले को देखतीं .हाँ हम कलात्मक शोल्डर बेग्स के शौक़ीन रहें हैं .हमारे पास दो चीज़ें इफरात से होतीं हैं खूबसूरत कलात्मक तौलिये और शोल्डर बेग्स .नवीनतम शब्द कोष हर विषय के शब्द कोष .पेंग्विन से नीचे की सब्जेक डिक्शनरी कभी नहीं खरीदी .और अंग्रेजी शब्द कोशों की तो क्रेज़ रही है .आप कोई भी नाम ले दीजिए हमारे पास वह मौजूद है .चाहे वह माइक्रो -सोफ्ट एनकार्टा हो ,या डेनियल जोन्स की इंग्लिश प्रोनाउन्सिन्गडिक्शनरी हो ,या हिंदी -अंग्रेजी ,अंग्रेजी -अंग्रेजी -हिंदी ,या फिर मेडिकल की डोर्लेंद या टेबर्सऔर वह भी नवीन -तम संस्करण २०११ का (यदि उपलब्ध है ).
(ज़ारी ...).

2 टिप्‍पणियां:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

हम पद प्रतिष्ठा पीड़ित कभी नहीं रहे .
न कभी किसी की कार पे नजर डाली न कोठी बंगले पे

जियो वीरु जी आपके ये शब्द पढकर मैं धन्य हो गया

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

बस मेरी और से एक शब्द और ना पराई नार पर, आपने लिखा तो यही है पर घुमा फ़िरा कर,
मेरा व आपका विचार एक से है,
जय हिन्द, जय भारत,