मंगलवार, 7 जून 2011

ये आदमी करता क्या है ?(क्षेपक ).

ये आदमी करता क्या है ?(क्षेपक ).

गत पोस्ट से आगे ....
समय हमने अपना कभी नहीं बेचा .नौकरी की पूरी गरिमा के साथ .ट्यूशन -खोर का ठप्पा हमें नहीं लगा इसलिए भौतिक दौड़ से हम बचे रहे .यकीन मानिए कार -स्कूटर आदि की कभी यूं ज़रुरत भी महसूस नहीं हुई .अब बात और है पहले प्रोलेप्स डिस्क (स्लिप दिश्क और फिर इन्सिश्जन ऑफ़ ए दिश्क )और फिर ओपन हार्ट सर्जरी भुगताने के बाद अब बसों में दौड़ के चढ़ नहीं सकते .टेक्सी स्कूटर तिपहिया अब ज़रूरीयात में आ गए ।
एक मर्तबा हमारे एक छात्र जो अब हमारे सहयोगी भी बन गए थे हमारे बहुत नज़दीक आके कहने लगे -शर्मा साहब हमारा भी मन करता है हम कभी साइकिल सेकोलेज आयें .हमने कहा तो इसमें संकट क्या है आजाया करो .कहने लगे शर्म आती है .लोग क्य़ा कहेंगें साइकिल से आता है ।
हमने मन ही मन अपना माथा पीट लिया .ऐसे छात्र भी हमसे पढ़ गए जिनकी दृष्टि आज भी पर्यावरण सचेत नहीं है .हमने कहा भाई कुछ पर्यावरण का भी सोचो -हमारा वाहन पर्यावरण फ्रेंडली है .इस छोटे से शहर में रस्सा स्टार्ट स्कूटरों ने पहले ही शहर की आबो -हवा को गंधा दिया है और फिर शहर में अब कार चलाने की जगह भी कहाँ बची है .रेलवे फाटक बंद मिला तो आधा घंटा बेकार .धुआं -पान करो .पैदल चलने या साइकिल से चलने में ऐसा कोई संकट नहीं है वाहन उठाओ निकल जाओ ,छोटे से संकरे रास्तों से .हम आज भी इन्हीं सर्विस लेंस में शहरों की चल रहें हैं .लेकिन वहां भी खोमचे वाले आगये हैं .जगह जगह कचरा पड़ा है .,जिसने कुछ लोगों के तो दिमाग में ही जगह बना ली है .यही तमाम पद पीड़ित लोग हैं ।
(समाप्त ).

1 टिप्पणी:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

बताओ जी साईकिल चलाने में भी शर्म आती है,
फ़िर तो हम बेशर्म ठहरे?