रविवार, 5 जून 2011

वीक एंड एम् बी ए .

आज का दिन हमारे लिए थोड़ा हटकर ही नहीं अति महत्वपूर्ण भी रहा ,वगरना रोज़ की तरह कंप्यूटर से चिपके ब्लोगिंग कर रहे होते .भला हो अमित भाई का जो हमारे दामाद दोश्त हैं और पेशे से क्राइसलर मोटर कम्पनी में प्रोडक्ट इंजीनियर हैं जो हमें अपने साथ ले गए थे ।
मकसद था उनका हेनरी जेम्स सेंटर आफ एग्ज़िक्युतिव एज्युकेशन (मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी ,ईस्ट लेंसिंग )में वीक एंड एम् बी ए प्रोग्रेम अगस्त २०११ के ओरिएंटेशन के लिए रिपोर्ट करना ।
कोई एक घंटा लगा हमें केंटन से ईस्ट लेसिंग पहुँचने में जो इत्तेफाक से मिशिगन राज्य की राजधानी भी है ,मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी कैम्पस भी .
कार पार्क करने के बाद हमने जेम्स सेंटर में प्रवेश किया .अन्दर आते ही वहां की एम्बियेंस ने हमें मन्त्र मुग्ध कर दिया .किसी के चलने की आवाज़ नहीं .भाई साहब चलने का भी सलीका होता है सिर्फ कार्पितिंग करने सेमोटे मोटे कालीन बिछाने से कुछ नहीं होता .बेशक यहाँ सीढियां भी कार्पित से ढकी रहतीं हैं .सेमीनार हाल में पहुँचने से पहले कई जीने नीचे और नीचे की ओर उतरते रहे .ज़ाहिर है क्लास रूम्स पर भी नजर पड़ती रही -चलते चलते देखा बड़ा रिलेक्स्ड सा माहौल ,वही काफी और सोडा के पेपर मग्स कईयों के सामने रखे हुए थे ।
लेकिन कहीं कोई आवाज़ नहीं जैसे पेय सिर्फ दिखाने के लिए रखे गएँ हों ।
सेमीनार हाल का नजारा और भी व्यवस्थित था .यहाँ लोग दिखाई दिए गोल मेजों के गिर्द बैठे हुए ,आते जा रहे थे लोग बैठते जा रहे थे .फाइव कोर्स लंच था .ज़ाहिर है पांच बार अलग अलग आइटम सर्व किये गए .लेकिन असल बात हमारे लिए यह नहीं थी ।असल बात थी सर्व करने वाले जो एक स्पेक्ट्रम प्रस्तुत करते थे उम्र का अकादमिक अनुशाश्नों का भी .
यही यूनिवर्सिटी का ऑन कैम्पस "वैट स्टाफ था "यूनिवर्सिटी किचिन सेवा की वर्दी में .इनमें युवा छात्र भी थे, सीधी भर्ती वाले +२ से सीधेमिशिगन युनिवर्सिटसे ग्रेज्युएशन के लिए पहुँचने वाले ,.उम्र दराज़ भी .अलग अलग अनुशाश्नों से आये बौद्धिक और प्रोफेशनललोगों का एक जगह होना था यह .
हमारी मेज के गिर्द हमारे अमित भाई के अलावा एक डॉ दम्पति थे जिनमें डॉ .साहब रेडियोलोजिस्ट थे किसी अस्पताल में और उनकी पत्नी न्यूक्लियर मेडिसन से सम्बद्ध एक निजी अस्पताल में काम कर रहीं थी .कमसे कम पांच बरसों के व्यावसायिक अनुभव के बाद इस वीक एंड एम् बी ए के दरवाज़े आपके लिए खुलतें हैं .हर अनुशाशन और उम्र का व्यक्ति यहाँ इस कोर्स के लिए ओरिएंटेशन के लिए पहुंचा था .हमारी अपनी उम्र ६४ बरस है हमसे उम्र में दस बरस बड़े भी लोग यहाँ छात्र बनने को आतुर थे ।सच है सीखने की न कोई सीमा होती है न उम्र .यहाँ अमरीका में आकर देखो -उम्र दाराज़ ७० ,५ की उम्र के पेटे में आये लोग भी मुस्तैदी से काम कर रहे होतें हैं .यहाँ सेवानिवृत्त होने जैसी कोई अवधारणा कोई गफलत नहीं है .
हम अभि -भूत थे अपने आप को इन व्यवसाय कुशल और माहिरों के बीच इस बेहतरीन आबो -हवा ,परिवेश में पाकर ।
एक बार ऐसा ही अनुभव तब हुआ था जब हम पहली बार ब्रह्माकुमारीज़ विश्वविद्यालय के मुख्यालय माउंट आबू (आबू रोड स्टेशन ) में एक सेमीनार करने पहुंचे थे जो डॉक्टरों और पत्रकारों ,अध्यापकों के लिए था .वहां की व्यवस्था ने और आध्यात्मिक स्पंदन ने लंच करते वक्त भी इसी तरह छुआ था .वहां अध्यात्म का जादू था जो सिर सर चढ़के बोल रहा था ,व्यवस्था गत ,स्वेत -परिधान -गत शाश्वत आध्यात्मिक सौन्दर्य था और यहाँ बौद्धिक ।
लंच कब सम्पन्न हुआ इसका इल्म तब हुआ जब स्टेज पर पेनालिस्ट आ गए ।
इन पेनालिस्ट में इसी कोर्स को मार्च २०११ में संपन्न करने वाले युवा भी थे .उम्र दराज़ पूर्व छात्र भी (एल्मुनाई भी ).एक रूप रेखा अपने अपने अनुभवों की सबने सांझा की ।
कैसे यहाँ आकर एक साथ कई लोगों को तीन तीन मोर्चो के बीच संतुलन साधने की कला साधनी पड़ती है .एक मोर्चा घर परिवार का ,बीवी बच्चों का ,एक व्यवसाय का और तीसरा इस कोर्स का ।
जिसमें अमरीकियों के लिए ख़ास वीक एंड को ही १८ महीनों तक होम करते रहना पड़ता है ।
टाइम मेनेजमेंट और टीम वर्क .टीम के साथ काम करना एक रिदम में बड़ी चीज़ बनता है कामयाबी के पायदानों पर पहुँचने के लिए इस एक कदम को बेहद ज़रूरी बतलाया गया ।
इस कार्यक्रम की निदेशिका के अलावा दो फेकल्टी मेम्बर्स ने भी ओरिएंटेशन के लिए आये लोगों को संबोधित किया .दो बार उन्होंने (प्रोफ़ेसर वेगनर )ने कहा-यु आर स्केअर्ड.तीसरी बार भी कहते तो हम मान ही लेते ऐसाकहना बोलना "यु आर स्केयर्ड प्रोफ़ेसर साहब का तकिया कलाम है .लेकिन उनका मकसद डराना नहीं सचेत करना था ।जिसमें प्रोफ़ेसर जॉन वेगनर कामयाब थे .अमित बतला रहे थे ये पिछले साल भी यही शर्ट और पेंट पहने हुए थे उससे पिछले भी .यह अमित भाई का तीसरा चांस था .पारिवारिक तकाजों की वजह से आगे नहीं बढ़ पाए थे -ओरिएतेशन से ,इस मर्तबा इरादा पक्का है .हालात भी अनुकूल हैं .
ये वक्त (आज ४ जून २०११ से अगस्त १ ,२०११ तक का ,जी हाँ इसी दिन से कोर्स कमेंसहोगा बीच में २४ जुलाई को एक और ओरिएंटेशन है ।)बेहद कीमती है .किताबें आपके हाथ में आ गईं हैं .अब सो लीजिये जितना सोना है .एक हफ्ते की रेजिडेंसी भी आएगी .टाइम इज गोल्ड ।प्रोफ़ेसर वेगनर यही बारहा दोहरा रहे थे .
और भाई साहब हो भी क्यों न इस १८ महीने के कोर्स की फीस है ,६० ००० डॉलर है .
हमें लगा यहाँ भी समय की नौक पर वैसे ही चलना होता है जैसे खडग -वासला की नेशनल डिफेन्स एकाडमी में केदिट्स को .वहां भी दो विभागों के बीच खासा फासला रखना होता है और अलग अलग पीरियड्स में भागते भागते पहुंचना होता है .मख्खन दूध दही ,फ्रूट्स ,फल फूल भरपूर होता है लेकिन वक्त खाने का वैसे ही और उतना ही मिलता जितना वीक डेज़ में अमरीकियों को ड्राइव थ्रू से कुछ भी लेके खाने को मिलता है .

7 टिप्‍पणियां:

ved parkash ने कहा…

ना तूने ही बुलाया ना मै ही बुलाउ ं
ना तूने कुछ खिलाया ना मैं ही खिलाउ

ये ब्लोगिए भी अजीब इंसान होते हैं,
दूसरों के घरों मे बिन बुलाए मेहमान होते हैं

veerubhai ने कहा…

इसीलिए लौट के तेरी महफ़िल में आ गया हूँ मैं ,
शायद मुझे निकालके पछता रहें हों आप .

Arvind Mishra ने कहा…

Now I am scared to see your longing for ambient places and also a bit envious :)
Good report in a captivating style!

veerubhai ने कहा…

अरविन्द जी शुक्र गुज़ार हूँ आपकी हौसला अफजाई का !

Kunwar Kusumesh ने कहा…

वहां की आबो-हवा से आचार-व्यवहार से आपने हमें घर बैठे रूबरू कराया. आभार.
आपकी प्रतीक्षा है मेरी नई पोस्ट पर .

Vivek Jain ने कहा…

वाह, बढ़िया
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

mahendra verma ने कहा…

रोचक लगा यह आंखों देखा हाल ।
शुभकामनाएं।