रविवार, 15 अप्रैल 2012

सेहत :सीरत को देखो सूरत न देखो .

सीरत को देखो सूरत न देखो .


आज  एक  से एक बड़े  माल्स , सुपर     मार्किट्स  ,बिग  बाज़ार  ,फ़ूड कोर्ट्स में  बिकने  वाले चिकने चुपड़े  दर्शनीय  सुदर्शन फल  औरसुदर्शना  तरकारियों  के बरक्स इनकी पुरानी प्रजाति के सहोदर कहीं ज्यादा स्वास्थ्य कर और पोषक तत्वों से युक्त हैं
'Older varieties of fruits ,veggies were healthier 'Newer Super Markets Stocks Are Less Nutritious :Study
OLD IS GOLD :Today supermarkets select the best -looking stock when ,in fact ,plants produce  more nutritious chemicals if they have bruises./TIMES TRENDS/THE TIMES OF INDIA,BANGALORE,APRIL 13,2012,P15.
एक पायलट स्टडी से इल्म  हुआ है विक्टोरिया काल से चले आये वह सेब जो डेज़र्ट्स (मिष्ठान्न ) आदि में स्तेमाल होते आयें हैं बीमारियों से बचाव करने वाले एक रसायन की दस गुणा ज्यादा मात्रा  से संयुक्त रहतें हैं बरक्स इनके  लोक लुभाऊ संस्करणों के जो आज बड़े बड़े स्टोर्स की शोभा बढाते हें .
एक तीन साला अध्ययन में आइन्दा साइंसदानों की एक टीम शिरकत करने को तैयार है जो सेव ,केला ,आम ,चाय आदि के परम्परा गत किस्मों का सूक्ष्म अध्ययन विश्लेषण करेगी .
यह पहले ही जाना जा चुका है कि  Cider बनाने में प्रयुक्त होता आया 'Egremont Russet  apple '  किस्म का सेव अपने ही चमकदार      पतले    छिलके   वाले संकर संस्करणों  ,अपने ही  दिखाऊ  सहोदरों  के  बरक्स एक रसायन 'Phloridzin' से कहीं  ज्यादा  सना हुआ है .यह रसायन हमारे पाचन तंत्र से कहीं  ज्यादा शर्करा खुद   ज़ज्ब कर लेता है . और इस प्रकार सेकेंडरी डायबितीज़ के खतरे के वजन को कम कर देता है .
लेकिन प्रति एकड़  फसल  इसका उत्पादन अपेक्षाकृत कम रहता है .अलावा इसके इसकी शक्ल सूरत भी गुमटेदार है साफ़ सुथरी आकर्षक नहीं है . इसलिए इसके उत्पादन को बढ़ावा नहीं दिया  गया है .
पहली और पिछली पीढ़ी के फल   और  तरकारियाँ सैंकड़ों ऐसे उपयोगी      रसायनों से संसिक्त रहते थे जो  सैंकड़ों  ऐसी बीमारियों  से बचाए रहते थे जिनसे आज हम ग्रस्त हो जाते थे ..
इन रसायनों में शामिल थे -सैली -साय्लेट्स (एस्पिरिन इसी से बनाई जाती है ),इसके संशोधित संस्करण का कैंसर रोग समूह से बचाव में भी आज हाथ पाया गया है .
आज महीनों महीना बड़े पैमाने  पर उत्पादित होने वाले फल और तरकारियाँ कोल्ड स्टोरेजों में पड़े रहतें हैं .ताकि इनके पकने की प्रक्रिया को देर तक मुल्तवी रखा जा सके .लेकिन इस सबके चलते इनके छिलकों और चमड़ी में से विटामिन्स बड़ी मात्रा में छीज जाते हैं .
सुपर मार्केट्स का पूरा फोकस इनकी रंगत पर होता है सूरत पर होता है  सीरत पर नहीं .जबकी इनकी ही गुमटेदार (bruised fruits )वेरायटी कहीं ज्यादा पोषक तत्व समेटे रहती है . इनमें     कहीं ज्यादा पुष्टिकर   पादप रसायनों का डेरा   रहता है .ये  ब्रूज़िज़  एक डिफेन्स    मिकेनिज्म(बचावी रणनीति )    के तहत  पनप  आतें  हैं .ताकि पोषक तत्वों की हिफाज़त हो सके .
ध्यान फलों के पुष्टिकर तत्वों उन्हें सेहत के मुफीद बनाए रखने की तरफ दिया जाना चाहिए न की उनकी बाहरी टीम टाम दिखाउपन पर ,ललचाऊ रंगत पर .
पाषण युग में आदि मानव बीस पच्चीस किस्म के फल और तरकारियाँ खा जाता था दिन भर में .कंद मूल ही उसका भोजन था . आज हम गिनती के फल और तरकारियाँ ही खा रहें हैं रोज़ -बा -रोज़ वही की वही .अलबत्ता उनकी भड़काऊ रंगत पर ज़रूर रीझ रहें हैं . 
 
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5 टिप्‍पणियां:

babanpandey ने कहा…

वीरू भाई old is gold शायद यहाँ भी लागू होता दिख रहा है ... जय हो मुझे तो हर पुराने चीज से प्यार है ... चाहे वह सब्जी हो ...

Arvind Mishra ने कहा…

आगाह कर के आपने अच्छा किया

Dr. Ayaz Ahmad ने कहा…

Rachnatmak .

औरत को पियक्कड़ शराबियों के दरम्यान छोड़ देने का मतलब है उसे बर्बाद होने के लिए छोड़ देना ?

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सजाने के चक्कर में सजा पाते हम सब।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सही कहा वीरुभाई जी ।
अभी बहुत दिनों बाद खुशबू वाले गुलाब के दर्शन किये , लेकिन दिल्ली में नहीं ।