शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

काव्यांश :वो कौन है ?

आज हर आदमी भावात्मक और रागात्मक रूप से उदासीन लोगों के बीच रह रहा है .शुधान्शु भी इसका अपवाद नहीं था .इसी नीरसता जीवन पर पसरे एकाकी भाव को तोड़ने वह अपने बाल सखा रहे अन्तरंग मित्र के पास पुदुचेरी चला आया था .दिन बढ़िया राग और भाव के साथ कट रहे थे .मित्र की माँ श्री भी यहाँ पधारी हुईं हैं जो अकसर पर्यटन पर रहतीं हैं कभी बेटियों के पास और कभी यहाँ पुत्र के पास और कभी इस तीर्थ कभी उस तीर्थ .यहाँ माँ श्री से भी संवाद के तार सीधे जुड़तें हैं चर्चा चाहे साहित्यिक  हो या घरेलू माँ श्री की शिरकत कमतर नहीं रहती .और घर को चलाने में सहयोग भी सबका पूरा .आदमी इसी संवाद  का   भूखा है इसी जुड़ने  शेयर करने की नियत से अभाव पूर्ती के लिए भाव -विरेचन के लिए वह कुछ ख़ास स्थानों ठिकानों पर जाता है .पुदुचेरी ऐसा ही एक ठिकाना है .
माँ श्री नहा के जब निकलतीं हैं पूरे कपडे पहनके निकलतीं हैं फिर भी अपने को व्यवस्थित करने के लिए वह दूसरे कमरे में चली जातीं हैं .८५ -८६ की उम्र में भी उनमे नारिपन की सुघड़ता और पैरहन के प्रति संभाल और करीना मुखरित रहता है .वह अपने को दबे ढके रहतीं हैं .सचेत भी .
पुरुष की दृष्टि नारी के शरीर पर पहले पडती है .सम्बन्ध भावना जागृत बाद में होती है -खुद को हम बतलातें हैं यह मेरी माँ है यह भाभी है यह चाची है आदि .शुधान्शु  को एक जोर का झटका लगता है वह कौन है  फिर नारी की खाल में (लिबास में)जिसे वह अपनी  पुत्र वधु समझता है .जो स्नान करके शमीज़ और  और तौलिए में निकल आती है .मर्दों वाला निकर पहने रहती है .मर्दों की तरह घुटने  मोडके कमर टिकाके बैठती है .यहाँ वहां सब जगह .ये कैसा पैरहन है माँ श्री और पुत्र वधु के लिबास में इतना फर्क क्यों है .क्यों एक तरफ नारीपन ज्यादा  है दूसरी तरफ सिरे से नदारद मुखरित है तो पौरुष की दबंगई है .कबीलाई अंदाज़ है . 
लेबल :पैरहन ,बदलाव ,परम्परा ,संक्रमण ,सम्बन्ध ,सम्बन्ध भावना .
वह कौन है ?काव्यांश :वो कौन है ?

6 टिप्‍पणियां:

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

बहुत सुन्दर कथानक!...भारतीय संकृति और संस्कार का सदैव स्वागत है!...सुन्दर प्रस्तुति!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

वाह! जी वाह!

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

bahut badhiya ....

रविकर फैजाबादी ने कहा…

अधिकारों के प्रति रहे,
मुखरित और सचेत |
पिता, पुत्र पति में बही
व्यर्थ समय की रेत |

व्यर्थ समय की रेत
बराबर हक़ पायी है |
आजादी के गीत,
जोर से अब गायी है |

चाल-ढाल ड्रेस वाद,
थोपिए अब न इनपर |
माँ क्या जाने आज,
नारियां चलती तनकर ||

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

विचारणीय .... बहुत बदलाव आ गया है आज की पीढ़ी में .... सामंजस्य रखना है तो खुद की सोच को बदलना होगा .... अच्छी प्रस्तुति

smt. Ajit Gupta ने कहा…

वर्तमान का यही सत्‍य है।