बुधवार, 18 सितंबर 2013

When the astrologer tells us our destiny ,we can prepare ourselves for it .Isn't it very beneficial to go to astrologers ?

भविष्य कथन से जुड़े मसले 

गैर लाभ का अहितकर सौदा है ज्योतिषियों द्वारा बताया गया भाग्य फल। मान लीजिये आप एक व्यावसाई हैं और कोई ज्योतिषी आपको बतलाता है दो साल बाद आपका धंधा खूब फले फूलेगा। आप इसे जानकार फूल कर कुप्पा हो जायेंगे। पुरुषार्थ आपका शलथ (ढीला )पड़ जाएगा। कामयाब तो मुझे होना ही है। अब काहे की भागदौड़ करनी ,हाथ पैर मारने। 

दूसरी तरफ मान लीजिये इसके उलट कोई भविष्य फल वेत्ता आपको कहे -आपका धंधा दस साल बाद चौपट हो जाएगा। सुनकर आपके हौसले पस्त होने लगेंगे। हे भगवान् तब  क्या होगा ?धंधा धौरी चौपट हो न हो आपका दिल ज़रूर बैठ जाएगा। इसीलिए कहा गया है :चिंता चिता समान।

इस प्रकार अच्छा भाग्य फल सुनकर आप अपने प्रयत्नों के प्रति लापरवाह हो जायेंगे और बुरा आपको रात दिन की दुश्चिंताओं में डाल  देगा। 

अलावा इसके ये भाग्य फल आंशिक रूप से ही खरे साबित होते हैं। इस घोर कलियुग में चांदी कूटने वाले ज्यादा है विद्वान ज्योतिष बहुत कम हैं।बस थोड़ा सा उनका बताया सही निकल आये उनका धंधा चल निकलता है। 

खुशवंत सिंह जी उन दिनों मशहूर साप्ताहिक "Illustrated Weekly "के सम्पादक थे (१९७० का दशक ,1970's).भाग्य फल लिखने वाला उनका किराए का  ज्योतिषी जब नौकरी छोड़ के चला गया  .  उन्होंने इसके तीन साल बाद तक किसी को भी नियुक्त नहीं किया। वह खुद ही भवष्य कथन स्तंभ लिखने लगे। सम्पादक के नाम लिखे पत्रों में कई भाग्य फल बांचने वालों ने उनके खूब कसीदे काढे। खुशवंत सिंह जी मन ही मन मुस्काये और बोले -

"What quackery is to medicine so is astrology to astronomy ."

So a good policy is to take the predictions of astrologers with a pinch of salt ,and instead focus on your efforts .A famous Urdu poet put it very aptly when he said :

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले ,

खुदा खुद बंदे से पूछे बता तेरी रजा क्या है। 

Make your efforts so strong that before giving you the results of your destiny God Himself asks you what you want."

3 टिप्‍पणियां:

Anita ने कहा…

ज्योतिष भी एक शास्त्र है पर अनपढ़ जब ज्योतिषी बन जाते हैं तब...

Vikesh Badola ने कहा…

खुशवंत सिंह जैसे अगर ज्‍योतिषाचार्यों को नौकरी देने लगते हैं तो ऐसे ज्‍योतिषाचार्यों के प्रति उदासीनता बढ़ना स्‍वाभाविक है। महाराज वास्‍तविक ज्‍योतिषाचार्य तो नौकरी करते ही नहीं थे, और ना वे किसी अपशकुन के बाबात किसी को बताते थे। वे तो हाथ दिखाने या जन्‍मपत्री बंचवाने आए जजमान को केवल सद्कर्मों से जुड़े रहने को प्रेरित करते थे। और इसी के बल पर भाग्‍यचक्र के घूमने की गारंटी देते थे। आजकल तो ज्‍योतिषाचार्यों के रुप में पण्‍डागीरी फलफूल रही है। इन्‍होंने भी ठीक आसाराम जैसों की तरह असली सन्‍तों को बदनाम करते हुए असली पण्डितों, ज्‍योतिषियों को बद्नाम कर दिया है।

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

विकेश बडोला जी सहमत आपसे बात आज के सन्दर्भ में कही गई है।