रविवार, 8 सितंबर 2013

मेरी पसंद मानस से : (१ )तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता ,तपबल बिष्णु सकल जग त्राता , तपबल संभु करहिं संघारा ,तपबल सेषु धरइ महिभारा।

मेरी पसंद मानस से :

(१ )तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता ,तपबल बिष्णु सकल जग त्राता ,

तपबल संभु करहिं संघारा ,तपबल सेषु धरइ महिभारा। 

तपके बलसे ब्रह्मा संसार को रचते हैं और तपके बलसे ही शम्भु (रूद्र रूप से जगतका )संहार करते हैं और तपके बलसे ही शेषजी पृथ्वी  काभार धारण करते हैं। 

(२)तप अधार सब सृष्टि भवानी ,करहि जाइ तपु अस जियँ जानी ,

    सुनत बचन बिसमित महतारी ,सपन   सु -नायउ गिरिहि हँकारी। 

हे भवानी !सारी  सृष्टि तपके ही आधार पर है ,ऐसा जीमें जानकर तू जाकर   तप कर। यह बात सुनकर माताजी को बड़ा अचरज हुआ और उसने हिमवान को बुलाकर वह स्वप्न सुनाया। 

(३)मातु पितहि बहुबिधि समुझाई ,चलीं उमा तप हित हरषाई ,

    प्रिय परिवार पिता अरु माता ,भए बिकल मुख आव न बाता। 

माता -पिता को बहुत तरह से समझाकर बड़े हर्ष के साथ पार्वतीजी तप करने के लिए चलीं। प्यारे कुटुम्बी ,पिता और माता सब व्याकुल हो गए। किसी के मुंह से बात नहीं निकलती। 

(४)उर धरि उमा प्रानपति चरना ,जाइ बिपिन लागीं तप करना ,

     अति सुकुमार न तनु तप जोगू ,पति पद सुमिरि तजेउ सब भोगू। 

प्राणपति (शिवजी )के चरणों को हृदय में धारण करके पार्वतीजी वन में जाकर तप करने लगीं। पार्वतीजी का अत्यंत सुकुमार शरीर तप के योग्य नहीं था ,तो भी पति के चरणों का स्मरण करके उन्होंने सब भोगों को तज दिया। 

(५ )नित नव चरन उपज अनुरागा ,बिसरी देह तपहिं मन लागा,

       संबत  सहस मूल फल खाए ,सागु खाइ सत बरष गवांए। 

स्वामी के चरणों में नित्य नया अनुराग उत्पन्न होने लगा और तप में ऐसा मन लगा कि शरीर की सारी सुध बिसर गई। एक हजार वर्ष तक उन्होंने मूल और फल खाए ,फिर सौ बरस साग खाकर बिताये। 

(६ )कछु दिन भोजन बारि बतासा ,किए कठिन कछु दिन उपबासा ,

      बेल पाति महि परइ सुखाई ,तीनि सहस संबत सोइ खाई। 

कुछ दिन जल और वायु का भोजन किया और फिर कुछ दिन कठोर उपवास किये। जो बेलपत्र सूखकर पृथ्वी पर गिरते थे ,तीन हजार वर्ष तक उन्हीं को खाया। 

(७ )पुनि परिहरे सुखानेउ परना ,उमहि नामु तब भयउ अपरना ,

      देखि उमहि तप खीन  स -रीरा ,ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा। 

फिर सूखे पर्ण (पत्ते )भी छोड़ दिए ,तभी पार्वती का नाम 'अपर्णा 'हुआ। तप से उमा का शरीर क्षीण देखकर आकाश से गंभीर ब्रह्मवाणी हुई। 


                      दोहा -भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिराजकुमारि ,

                               परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि। 

हे पर्बतराज  की कुमारी !सुन ,तेरा मनोरथ सफल हुआ। तू अब सारे असह्य क्लेशों को (कठिन तप )को त्याग दे। अब तुझे शिवजी मिलेंगे। 

(८ )अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी ,भए अनेक धीर मुनि ग्यानी ,

      अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी ,सत्य सदा संतत सुचि जानी। 

हे भवानी !धीर ,मुनि और ग्यानी बहुत हुए हैं ,पर ऐसा कठोर तप किसी ने नहीं किया। अब तू इस श्रेष्ठ ब्रह्मा की वाणी को सदा सत्य और निरंतर पवित्र जानकर अपने हृदय में धारण कर। 

(९ )सुनत गिरा बिधि गगन बखानी ,पुलक गात गिरिजा हरषानी ,

उमा चरित सुंदर मैं गावा ,सुनहु संभु  कर  चरित सुहावा। 

इस प्रकार आकाश से कही हुई ब्रह्मा की वाणी को सुनते ही पार्वतीजी प्रसन्न हो गईं और हर्ष के मारे उनका शरीर पुलकित हो गया। 

याज्ञवल्क्य जी भरद्वाज जी से बोले कि मैं ने पार्वती का सुन्दर चरित्र सुनाया ,अब शिव जी का सुहावना चरित्र सुनो। 

ॐ शान्ति। 





1 टिप्पणी:

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

सुन्दर प्रसंग !!