सोमवार, 16 सितंबर 2013

श्रीमदभगवाद गीता :श्लोक छब्बीसवां

श्रीमदभगवाद गीता अध्याय तीन :श्लोक छब्बीसवां 

न बुद्धिभेदं जनयेद ,अज्ञानां कर्मसँगिनाम ,

जोषयेत सर्वकर्माणि ,विद्वान युक्त :समाचरन। 

na buddhi -bhedam janayed ajnanam karma -sanginam ,

joshyet sarva -karmani vidvan yuktah samacharan 

na -not ;buddhi -bhedam -discord in the intellect ;janyet -should create ;ajnanam -of the ignorant ;karma -sanginam -who are attached to fruitive actions ;joshayet -should inspire (them )to perform ;sarva -all ;karmani -prescribed ;vidvan -the wise ;yuktah -enlightened ;samacharan -performing properly .

ग्यानी कर्मफल में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे तथा स्वयं (अनासक्त होकर )समस्त कर्मों को भलीभांति करता हुआ दूसरों को भी वैसा ही करने की प्रेरणा दे। 

प्रतिभा संपन्न व्यक्ति की महत्ता उसके दो विरोधी विचारों और विरोधाभासों को संभालने की क्षमता में है ;जैसे संसार में निरासक्त आसक्ति के साथ जीना। अधिकाँश व्यक्ति केवल तभी परिश्रमपूर्वक काम करते हैं ,जब उन्हें कर्मफल के भोग या आर्ष ध्येय की प्राप्ति की प्रवर्तक शक्ति ऐसा करने की प्रेरणा देती है। ऐसे व्यक्तियों को हतोत्साहित नहीं करना चाहिए ,न उनकी भर्त्सना करना ज़रूरी है। संपत्ति के प्रति अत्यधिक आसक्ति ,न कि स्वयं संपत्ति दुःख का कारण बनती है। जिस प्रकार व्यक्ति के लिए पूजा ,प्रार्थना आदि करने में पूर्ण एकाग्रता ज़रूरी है ,उसी प्रकार व्यक्तियों के लिए सांसारिक कर्तव्यों की पूर्ती में भी सम्पूर्णत:ध्यानावस्थित होना आवश्यक है,पूरी तरह यह भी जानते हुए कि संसार और इसके क्रियाकलाप क्षणिक हैं ,संचारी हैं। सांसारिक कर्तव्यों की अवहेलना करके व्यक्ति को भगवान् के ध्यान में रत नहीं रहना चाहिए। श्री योगानंद जी का कथन है -ध्यान के प्रति भी उतनी ही निष्ठा रखो जितनी धनोपार्जन में। व्यक्ति को केवल एकतरफा जीवन नहीं जीना चाहिए। 

The wise should not create discord in the intellects of ignorant people ,who are attached to fruitive actions ,by inducing them to stop work .Rather ,by performing their duties in an enlightened manner ,they should inspire the ignorant also to do their prescribed duties.

Great persons have greater responsibility because common people follow them .So Shree Krishana urges that wise people should not perform any actions or make any utterances that lead the ignorant toward downfall .It may be argued that if the wise feel compassion for the ignorant ,they should give them the highest knowledge -the knowledge of God -realization .Lord -Krishna neutralizes this argument by stating na vichalayet ,meaning the ignorant should not be asked to abandon duties by giving superior instructions they are not qualified to understand .

Usually ,people in material consciousness consider only two options .Either they are willing to work hard for fruitive results or they wish to give all exertions on the plea that all works are laborious ,painful and wrought with evil .Between these ,working for results is far superior to the escapist approach .Hence ,the spiritually wise in Vedic knowledge should inspire the ignorant to perform their duties with attentiveness and care .If the minds of the ignorant become disturbed and unsettled then they may lose faith in working altogether ,and with actions stopped and knowledge not arising ,the ignorant will lose out from both sides.

If both the ignorant and the wise perform Vedic actions ,then what is the difference between them ?Apprehending such a question ,Shree Krishna explains this in the next two verses(3.26,3.27). 

1 टिप्पणी:

Kuldeep Thakur ने कहा…

सर्वप्रथम आप की लेखनी को मेरा नमन... आज आज के इस भागदौड़ भरे माहौल में गीता का अर्थ समझाने का प्रयास कर रहे हैं...

पहले मैं भी केवल आप के प्रत्येक भाव को अनदेखा कर जाता था। पर मैंने सोचा कि हर रोज एक विषय पर लिखा जा रहा है इसे पढ़ा जाए। ऐसा नहीं कि गीता से मेरा परिचय नहीं था। ये नाम बचपन से सुना है। कुछ श्लोक भी सुने अवश्य थे पर सच्च कहूं ध्यान नहीं दिया। आप द्वारा इस भावआर्थ से गीता का कुछ अर्थ समझ पा रहा हूं।

उजाले उनकी यादों के पर आना... इस ब्लौग पर आप हर रोज 2 रचनाएं पढेंगे... आप भी इस ब्लौग का अनुसरण करना।

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