सोमवार, 10 सितंबर 2012

आलमी हो गई है रहीमा शेख की तपेदिक व्यथा -कथा (आखिरी से पहली किस्त )

आलमी हो गई है रहीमा शेख की तपेदिक व्यथा -कथा (आखिरी से पहली किस्त )

एक साल तक रहीमा शेख, सिंह साहब के इलाज़ के तहत ही रहीं उसके बाद सिंह साहब ने खुद ही हाथ खड़े कर दिए .२००८ बीत रहा था डॉ .सिंह ने उनके भाई से कहा अब किसी बेहतर जगह दिखाओ इन्हें .

ये लोग कानपुर चले आये और डॉ .एस .के .कटियार साहब से इलाज़ कराना शुरु किया .डॉ .कटियार ने इनका रिकार्ड देखा और कहा पचास फीसद से भी कम चांस बचा है अब इनके बचने का .बचे रहने का .रोग मुक्त हो जाने का .

रहीमा के भाई ने राजी राजी सब कुछ जानते हुए भी उन्हें कहा वह तैयार है सब कुछ करने और फीस देने के लिए .यह कहते हुए भाई ने उनके ड्रग रेजिस्टेंस परीक्षणों की तमाम  रिपोर्ट डॉ .कटियार को थमा दीं.

डॉ .सिंह ने रिपोर्ट वापस करते हुए कहा इन रिपोर्टों की  उन्हें कोई ज़रुरत नहीं है .कोई भी लेब भरोसे की नहीं है यहाँ किस पे भरोसा करें .इसीलिए सरकार अब इन्हें मान्यता प्रमाण पत्र देने के  बारे में सोच रही है और इसके लिए लेब्स को ही  पहल करनी होगी साकार से मान्यता प्राप्त करने की जो पर्याप्त निरीक्षण के बाद ही दी जायेगी .  

डॉ .कटियार ने जो सात दवाएं दीं उनमें वह  तीन  दवाएं भी शामिल रहीं जिनके प्रति रहीमा दवा प्रतिरोध दर्शा चुकी थी .दो हफ्ते का बिल बना २८,००० रुपया जो जैसे तैसे करके रहीमा के भाई और अब्बाजान ने मिलजुलकर जुटाया और उन्हें चुकता किया .अब दोनों खुक्कल हो चुके थे .

धन इकठ्ठा कर दीन दुखियों की सहायता करने वाली एक संस्था भी कानपुर में तपेदिक के मरीजों का इलाज़ करती है .यहाँ तपेदिक की दवाओं  पर राज्य सरकार से भी मदद मिलती है .दो साल तक उसने यहाँ भी टिक के इलाज़ करवाया .

उसका गोरा चिट्टा रंग अब स्याह पड़ चुका था .कितने गुमान से उसके अब्बा ने पत्रकारों को बतलाया था फूल से भी सुन्दर थी मेरी बेटी अपनी माँ की तरह गोरी चिट्टी .

सन २०१० आ गया 

जैसे ही सर्दी का मौसम  आया    उसके सारे बदन पे खाज होने लगी .यह दवाओं का पार्श्व प्रभाव था .डॉ .के परामर्श पर उसने सब दवाएं बंद कर दीं .गत दो सालों से वह ऐसी दवाएं ले रही थी जो प्रतिरोध को घटाके  कमतर कर दें .उसी का नतीजा थी ये बे -शुमार बर्दाश्त के बाहर  खुजली .

अफ़सोस जताते हुए पश्च बुद्धि समझदारी  दिखाते हुए डॉ .ने अपनी एक बातचीत में साफ़ साफ़ कहा -हमें रहीमा की दवाएं बंद नहीं करवानी चाहिए थी लेकिन उसके लिए उसकी हालत देख कर  हम भी बहुत परेशान हो उठे थे .

दिसंबर (२०१० )लगते ही रहीमा को खांसी के साथ खून आने लगा .

एक बार फिर किस्मत उन्हें मुंबई ले आई .रहीमा के खाबिन्द को मुंबई के डॉक्टरों पर अब भी बहुत भरोसा था .

गाँव के धान के खेत ४०,०० ० रूपये में गिरवीं रख दिए गए .

ये लोग सत्तर साला डॉ .के .सी .मोहंती की शरण में  आगये .डॉ .मोहंती सौमैया अस्पताल में  छाती रोगों के माहिर हैं .चेस्ट मेडिसन के मुखिया हैं .आपने भी रेजिस्टेंस टेस्ट्स को नज़रंदाज़ किया .रहीमा के रिकार्ड बतलातें हैं वह पाँचों  दवाएं वह पहले भी खा चुकी थी जो अब  मोहंती साहब ने तजवीज़ की थीं .

आप एक बातचीत में कहतें हैं मैंने अपने लम्बे क्लिनिकल तजुर्बे पे भरोसा करते हुए रहीमा के ड्रग सेंस्तिविती टेस्ट्स की अनदेखी की थी .उसी तजुर्बे के आधार पर  ड्रग रेजिमेन का चयन किया था .

ये दवाएं भी काम की साबित न हुईं .बे -असर रहीं .छ :सप्ताह बाद रहीमा का बेक्टीरिया लेविल ४ + था .यानी १-४ तक के रोग सूचक पैमाने पर अधिकतम .

अब तक वह ४० ,०० ० रुपया भी ठिकाने लग चुका था .

अब बारी थी जी .टी .अस्पताल की जो एक सरकारी सहायता प्राप्त (खैराती अस्पताल )अस्पताल है जहां से उन्हें उम्मीद थी निश्शुल्क चिकित्सा मिलने की .यहाँ तपेदिक प्रभाग के मुखिया हैं  डॉ जयसिंह फडतरे.आप  ने रहीमा का सारा रिकार्ड देखा .आप वह तमाम दवाएं खा चुकीं हैं जो हिन्दुस्तान में तपेदिक के लिए तजवीज़ की जातीं हैं फडतरे साहब ने कहा .

आपने चार दवाएं तजवीज़ की जिनमे एक वह दवा भी शामिल थी जिसे देने में डॉ .सिंह संकोच कर गए थे कि वह बहुत मंहगी रही थीं   यानी Capreomycin .

लेकिन अभी भी रहीमा की तपेदिक का प्रकोप कम नहीं हुआ .जुलाई २०११ में रहीमा को दोबारा ड्रग सेन्सटीविटी  टेस्ट करवाने के लिए कहा गया .

अब वह तपेदिक के लिए प्रयुक्त १२ दवाओं के प्रति दवा प्रतिरोध दर्शा रही थी .ड्रग रेज़ीस्तेंट थी १२ दवाओं के प्रति .तमाम की तमाम दवाएं उसके मामले में बे -असर हो चुकी थीं ,निष्प्रभावी  थीं अब.

रहीमा के इस  दवा प्रतिरोध ने उस लेब के मुखिया का ध्यान भी अपनी तरफ खींचा जहां यह टेस्ट करवाया गया था .इस माहिरा और डॉ .ज़रीर उद्वाडिया (तपेदिक के माहिर हिंदुजा अस्पताल मुंबई )पहले भी ऐसे कई मामले अब तक देख चुके थे जहां तपेदिक का मरीज़ तमाम दवाओं के प्रति प्रतिरोध प्रदर्शित करने लगा था .

आपने एक मेडिकल जर्नल को ऐसे ही चार मामलों की इत्तल्ला दी जो "टोटल ड्रग रेजिस्टेंस "के ही मामले थे .सरकार और उसके सरकारी चिकित्सा अधिकारियों ने इसका प्रबल विरोध किया .लेब की साख को ही निशाने पे ले लिया गया .पत्र कि  भाषा पार भी तकनीकी तौर पर  एतराज जतलाया गया .
There could be no "total drug resistance ," the officials said ,because the WHO has no category called "total drug resistance ."

आगे की कथा बहुत मार्मिक है आखिरी किस्त ज़रूर पढ़िए .

(ज़ारी ) 

3 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

शरीर यदि दवाओं को पहचानने से इन्कार कर बैठे तो इलाज कौन करेगा भला..

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

बहुत खूब सर .ड्रग रेजिस्टेंस सरल शब्दों में समझा दिया .

दिगम्बर नासवा ने कहा…

उफ़ ... मार्मिक है अब तक भी ये कहानी ...