रविवार, 23 सितंबर 2012

ब्लॉग जगत में शब्द कृपणता ठीक नहीं मेरे भैया ,

ब्लॉग जगत में शब्द कृपणता ठीक नहीं मेरे भैया ,

नाव भंवर में अटक गई तो ,कोई नहीं नहीं खिवैया |

विषय बड़ा सपाट है अभिधा में ही आगे बढेगा ,लक्षणा और व्यंजना की गुंजाइश ही नहीं मेरे भैया .चिठ्ठा -कारी भले एक व्यसन बना कईओं का ,फिर भी भैया सहजीवन है यहाँ पे छैयां छैयां 

.चल छैयां छैयां छैयां छैयां .आ पकड मेरी बैयाँ बैयाँ .

क्यों शब्द कृपण दिखता है रे ! कन्हैयाँ?

धन कंजूस चल जाता है .भई किसी का कुछ ले नहीं रहा ,अपना फायदा कर रहा है .सीधा सा गणित है कंजूसी का :मनी नोट स्पेंट इज मनी सेव्ड .लेकिन यहाँ मेरे राजन यह फार्मूला लगाया  तो सारे समर्थक ,अभी तलक टिपियाए लोग आपके दायरे से बाहर आ जायेंगें .शब्द कृपणता आपको  आखिर में  निस्संग कर देगी .आप  भले "निरंतर ",लिखें "सुमन" सा खिलें ,

साथ में चिठ्ठा -वीर और बिना बघनखे धारे चिठ्ठा -धीर  दिखें .आखिर में कुछ होना हवाना नहीं है सिवाय इसके -

चल अकेला चल अकेला ,चल अकेला ,तेरा "चिठ्ठा "कच्चा फूटा राही चल अकेला .

यहाँ कुछ लोग आत्म मुग्ध दिखतें हैं .आत्म संतुष्ट भी .महान होने का भी भ्रम रखतें हैं/रखती हैं  .आरती करो इनकी करो इनकी "वंदना "हो सकता है हों भी महान  .शिज़ोफ्रेनिक भी तो हो सकते है .मेनियाक फेज़ में भी हो सकतें हैं बाई -पोलर इलनेस की ,मेजर -डिप्रेसिव -डिस -ऑर्डर की ..

ये चिठ्ठा है मेरे भाई ,अखबार की तरह एक दिनी अवधि है इसकी. बाद इसके कूड़े का ढेर .

इतनी अकड काहे की ?

निरभिमान बन ,मत बन शब्द कृपण .आपके दो शब्द दूसरे को सारे दिन खुश रख सकतें हैं .

शब्दों से ही चलती है ज़िन्दगी प्यारे .

कुछ शब्द हम अपने गिर्द पाल लेतें हैं .

"अपनी किस्मत में यही लिखा था भैया ,अपनी तो किस्मत ही फूटी हुई है ,कोई हाल पूछे तो कहतें हैं बीमार हूँ भैया "-बस तथास्तु ही हो जाता है .

बस इतना ध्यान रख तुझे लेके कोई ये न कहे मेरे प्रियवर तू मेरी टिपण्णी को तरसे .सारे दिन तेरा जिया धडके ...

और तू गाये :जिया बे -करार है ,छाई बहार है आजा मेरे टिपिया तेरा इंतज़ार है .

यहाँ प्यारे! आने- जाने का अनुपात सम है .स्त्री -पुरुष की तरह विषम नहीं .तेरा चिठ्ठा भी प्यारे कन्या भ्रूण की तरह किसी दिन कूढ़े के ढेर पे मिल सकता है .तू  मेरे घर आ! मैं आऊँ तेरे. .जितनी मर्जी बार आ ,खाली हाथ न आ .भले मानस दो चार शब्द ला .

पटक जा मेरे दुआरे !

गुड़ न दे, गुड़ सी बात तो कह .

एक टिपण्णी का ही तो सवाल है जो दे उसका भला ,जो न दे उसका भी  बेड़ा रामजी पार करें .

राम राम भाई !

सुन !इधर आ !

मत शरमा !

जिसने की शरम उसके फूटे करम

शर्माज आर दा मोस्ट बे -शर्माज . .

"मौन सिंह" मत बन .

इटली  का  कुप्पा सूजा मत दिख .

निर्भाव न दिख ,भाव भले ख़ा ,भावपूर्ण दिख .

प्यार कर ले नहीं तो पीछे पछतायेगा .

साईबोर्ग मत बन ,होमो -सेपियन  बन ,

सीढ़ी -दर-सीढ़ी ऊपर की तरफ चढ़ ,

शब्द कृपण मत बन !

चढ़ लोगों की आँखों में चढ़ .

दिल में जगह बना सबकी !

खिलखिला के हँस !

असम्भाव्य ही है स्टे -टीन्स(Statins) से  खून के थक्कों को मुल्तवी रख पाना  


Blood Clots Unlikely To Be Prevented By Statins 


.डॉ .अरविन्द मिश्रा जी को समर्पित है यह   पोस्ट जिनके आग्रह पर इसकी पहल हुई है .



Despite previous studies suggesting the contrary, statins (cholesterol-lowering drugs) may not prevent blood clots (venous thrombo-embolism) in adults, according to a large analysis by international researchers published in this week's PLOS Medicine. 

Venous

रुधिरवाहिनियों से (शिराओं से )जो खून दिल की ओर लौटता है वह वीनस कहलाता है .THROMBUS कहतें हैं खून के थक्के को .तथा थ्रामबोसिस कहतें हैं ,रक्त ज़माव या शिराअवरोध को .हृदय या रक्त नाली में थक्का ज़मने का यह एक गंभीर रोग है थ्रोमयोसिस .या थ्रोम्बो -एम्बोलिज्म .

EMBOLISM

यह वह रोगात्मक स्थिति है जिसमें हृदय को खून ले जाने वाली धमनी में कोई एमबोलस(खून का थक्का )कहीं ओर से आके फंस जाता है .EMBOLUS का बहु वचन है EMBOLI.

समझा जाता था ,खून में घुली चर्बी को घटाने वाली दवाएं (स्टेटइन्स ) शिराओं में बहते खून में  थक्कों  को भी बनने से रोकें रहतीं हैं .लेकिन एक व्यापक अध्ययन विश्लेषण के बाद यह अवधारणा एक खामखयाली ही सिद्ध हुई है .

२००९ में एक बेतरतीब नियंत्रित परीक्षण (  randomized controlled trial )"जुपिटर" किया गया था .पता चला था ROSUVASTATIN(रोसुवास्तेतिन/रोज़ुवास्टेटिन नामी एक स्टेटिन  

) का नियमित सेवन साफ़ तौर पर तंदरुस्त दिखते लोगों में शिरावरोध के मामलों के जोखिम का वजन घटाके आधा कर देती है ,यानी वीनस थ्रोम्बो -एम्बोलिक इवेंट्स का वजन घटाके 

आधा कर देती है .  

लेकिन यह एक छोटा ट्रायल था जिसमें थ्रोम्बो -एम्बोलिक -इवेंट्स के कम ही मरीज़ शामिल किये गए थे ( ३४ बनाम ६० ).

स्तेतिंस के संभावित लाभ के और साक्ष्य जुटाने के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने एक बड़ी पहल हाथ में ली .रिसर्चरों के इस समूह ने प्रकाशित और बे तरतीब नियंत्रित 

लेकिन अ -प्रकाशित २९ अध्ययनों का जिनमें कुलमिलाकर १०,००० प्रतिभागी थे और वीनस -थ्रोम्बो -इवेंट्स के तकरीबन १००० मामले दर्ज़ हुए थे पूरा जायजा लिया .

प्रकाशित रिपोर्ट में ऐसे मात्र दो अध्ययन  ही  शामिल थे जिनमें इन इवेंट्स का उल्लेख    किया गया था .लेकिन ये दोनों ही बदतरीन इवेंट्स थीं शामिल किये गए सभी परीक्षणों से .

कुल मिलाके हुआ क्या ?नतीज़ा वही ढ़ाक के तीन पात ?

जो  रोज़ुवास्तेतिन ले रहे थे उनमें ०.९ % और जो नहीं ले रहे थे उनमें भी कुल  १%मामले दर्ज़ हुए .ज़ाहिर है  स्टेटिन की भूमिका नामालूम सी ही रही है थक्कों को मुल्तवी रखने में .जुपिटर ट्रायल को बाहर रखने पर भी नतीजे जस के तस रहे .रोसुवास्तेतिन की हाई या लो डोज़ लेते रहने का भी कोई असर नहीं देखा गया .

पूर्व में किये गए अध्ययनों के बरक्स यहाँ नतीजे उलट थे .स्टेटिन का कोई प्रत्यक्ष लाभ मिलता दिखलाई नहीं दिया .


Blood Clots Unlikely To Be Prevented By Statins


ज़नाब हिंदी में भी आयेगा ये आलेख .डॉ .अरविन्द मिश्रा जी को समर्पित है यह भी और वह  पोस्ट जिनके आग्रह पर इसकी पहल हुई है .




Despite previous studies suggesting the contrary, statins (cholesterol-lowering drugs) may not prevent blood clots (venous thrombo-embolism) in adults, according to a large analysis by international researchers published in this week's PLOS Medicine. 

In 2009, an additional analysis of data from a randomized controlled trial called the JUPITER trial reported that the statinrosuvastatin halved the risk of venous thromboembolic events among apparently healthy adults. However, this finding was based on a small number of patients who had thromboembolic events (34 vs 60). To gather more evidence about the possible benefits of statins, a group of international researchers led by Kazem Rahimi from the George Centre for Healthcare Innovation at the University of Oxford in the UK, combined the results (performed a meta-analysis) of 29 suitable published and unpublished randomised controlled trials of the effects of statins involving over 100 000 participants and more than 1000 events: Only two studies presented venous thrombotic events in the published report, but such events had been recorded as adverse events in all of the included trials, which the authors were able to include in their analysis. 

In the combined analysis, the authors found that venous thrombosis occurred in 0.9% of people taking statins compared to 1% of people not taking statins, which suggests that statins have a very small, if any, effect. These results did not change when the authors excluded the findings of the JUPITER trial. The authors also found that there was no effect at all in people taking high doses and low doses of statins. 

The authors conclude: "this study provides a more detailed assessment of the potential effects of statins (or higher dose statins) on venous thromboembolic events than has previously been possible. We were unable to confirm the large proportional reduction in risk suggested by some previous studies." 

The authors add: "However, a more modest but perhaps clinically worthwhile reduction in venous thromboembolic events in some or all types of patient cannot be ruled out." 

In an accompanying Perspective article, Frits Rosendaal from the Leiden University Medical Center in The Netherlands (uninvolved in the study) argues that even if the study cannot provide definite answers to the statin question, some tentative conclusions can be drawn. He says: "Firstly, that for the association between statins and venous thrombosis the methodologically strongest analysis shows at most a very small effect. Secondly, if we do not wish to discard the possibility of a beneficial effect for the whole class, any such effects are limited to rosuvastatin."

13 टिप्‍पणियां:

पुरुषोत्तम पाण्डेय ने कहा…

गुड जैसी बातें, रूटीन लेखन से हट कर बहुत सुन्दर लेखन. साधुवाद.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

शब्द काहे को धरे हुये है,
मन को कब से भरे हुये है...

Arvind Mishra ने कहा…

वीरू भैया काहें ऐसे काकटेल बनाते हैं? -विषय कुछ शीर्षक कुछ और इंट्रो कुछ, कंटेंट और कुछ -मूड का कबाड़ा हो जाता है!
बहरहाल मूल लेख तक पहुंचा -बढियां अपडेट किया है आपने -और मेरा उद्धरण देने की जरुरत नहीं थी

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

कृपया दो बातों पर वि‍चार करें:-

1 आपको अपने ब्‍लॉग का टैम्‍पलेट बदलना चाहि‍ए
जि‍सका पोस्‍ट वाला हिस्‍सा और चौड़ा हो क्‍योंकि‍ आप केवल लेख लिखते हैं. इससे लाइनें लंबी दि‍खेंगी.
2 कई बार आपके दो तीन लेख एक ही पोस्‍ट का हि‍स्‍सा लगते हैं. एक पोस्‍ट में एक ही लेख रखें.

यादें....ashok saluja . ने कहा…

वीरू भाई राम-राम ......
आज का अंदाज़े-बयाँ कुछ और ही कह रहा है
अमरीका का हवा-पानी क्या रास आ रहा है ..??

लगे रहो वीरू भाई .....

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

वाह!
आपकी इस ख़ूबसूरत प्रविष्टि को कल दिनांक 24-09-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1012 पर लिंक किया जा रहा है। सादर सूचनार्थ

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत कुछ मिला जुला आज की पोस्ट में ...
ब्लॉग जगत की मस्ती और सीरिअस बात चीत ...
अच्छी खोजी खबर ...
राम राम जी ..

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

काजल कुमार जी की बातों पर ध्यान दीजिए सर जी। पहला भाग पढ़कर आनंद आया।

Kailash Sharma ने कहा…

पोस्ट का पहला भाग पढ़ कर आनन्द आ गया..बहुत रोचक और सार्थक..

Asha Saxena ने कहा…

जानकारी देता लेख अच्छा लगा |

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

भाई साहब !उन जुडवा आलेखों को जिनके शरीर आपस में जुड़े हुए थे ,सर्जरी करके अलग कर दिया गया है आइन्दा ध्यान रखा जाएगा "राम राम भाई "पर सियामीज़ ट्विन्स "पैदा न हों .शुक्रिया आपका .ब्लॉग टेम्पलेट भी सुधारा जाएगा .आप सभी दोस्तों मेहरबानों का शुक्रिया .

नेहा एवं आदर से

वीरू भाई .

सुशील ने कहा…

वाह जी वाह
मजा आ गया !

वीरू भाई ने जब से
अपनी फोटो लगाई है
लेखनी ने कुछ कुछ
पलटी भी खाई है
जरा सा हटके मिर्ची
भी कहीं कहीं लगाई है !!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

आज 25/09/2012 को आपकी यह पोस्ट (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति मे ) http://nayi-purani-halchal.blogspot.com पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!