रविवार, 9 सितंबर 2012

A Woman's Drug -Resistant TB Echoes Around the World

A   Growing Threat

India is home to a quarter of the world's tuberculosis patients

World    8.8 ,illion

India       2.3 million

China      1.0 million

Russia     150,000


Brazil      85,000

US            13,000

कौन है यह रहीमा शेख जिसकी तपेदिक व्यथा कथा आज आलमी स्तर पर चर्चित है ? गत छ :सालों में यह भारत के एक से दूसरे  कौने तक इलाज़ कराने पहुंची है .लेकिन मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की .इस दरमियाँ   बाप भाई की सारी  कमाई ज़िन्दगी भर की बचत खेत खलिहान दांव पर लग गए आज यह भारत की पहली ऐसी     मरीज़ा बन गई है जिस पर तपेदिक के लिए  मंजूरशुदा ,स्वीकृत कोई भी दवा असर नहीं करती .

हालिया दशकों में यह घातक संक्रमण जिसमे खांसी के साथ खून तक आजाता है आम तौर पर ठीक कर लिया जाता था .

वालस्ट्रीट जर्नल ने रहीमा शेख के पूरे मेडिकल रिकोर्ड का पुनरआकलन किया है .उन तमाम डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के  साथ खुलकर बात की है जो इस मोहतरमा के इलाज़ से जुड़े रहें हैं .पत्रकार उसके संग संग गएँ हैं जहां भी वह इलाज़ के लिए ख़ाक  छानती  हुई पहुंची है .

लाइलाज बनती तपेदिक का उसका छ :साला सफ़र भारतीय चिकित्सा नौकर शाहों का एक समझ न आने वाला ,अस्वीकार्य रवैया  उजागर करता है .

आखिर क्यों दवा रोधी तपेदिक की भारत भर में व्यापक जांच और इलाज़ का सिलसिला शुरू नहीं किया गया ?

इस अनदेखी का ही नतीज़ा है एक साध्य रोग अब असाध्य हो चला है .उत्परिवर्तित हो चली है तपेदिक की किस्म साध्य  से असाध्य की ओर .

आलमी स्तर पर इसे लेकर चिंता का आलम है .दुनिया भर के चिकित्सा अधिकारियों ने भारत और ऐसे तमाम अन्य देशों से जहां  दवा रोधी तपेदिक किस्म सर उठा रही है ,इसे  रोकने के भरपूर प्रयास करने की पेशकश की है .

इंग्लैण्ड ने अब भारत से छ :माह या और अधिक अवधि के लिए भ्रमण पर जाने वाले नागरिकों के लिए वीज़ा देने से पूर्व तपेदिक जांच  को अनिवार्य बना दिया है .

कोई राष्ट्रीय रजिस्टर नहीं है हमारे पास ,कितनेतपेदिक  मरीज़ हैं जो एक या फिर बारह की  बारह दवाओं के प्रति जो तपेदिक के इलाज़ में आमतौर पर प्रयुक्त की जातीं हैं उन सभी के प्रति प्रतिरोध दर्शा रहें हैं .

भारत सरकार उस एकल अध्ययन का हवाला देती है जो गुजरात राज्य में हुआ है और  जिसमें कुल 3 %ऐसे रोगी मिलें हैं जो कमसे कम दो असरदार दवाओं के प्रति दवाप्रतिरोध दर्शा रहें हैं .

माहिरों के अनुसार ये आंकड़ें समस्या की सही तस्वीर नहीं है .

दिसंबर 2011 में मुंबई हॉस्पिटल में चार परिपूर्ण दवा रोधी मरीजों का पता चला था मई 2012 तक इनकी संख्या बढ़के 15 हो गई थी .

मुंबई और उत्तर प्रदेश में संपन्न छुटपुट अध्ययनों से इल्म हुआ है ,13%फीसद या इससे ज्यादा मरीज़ वहां Multi-drug -resitant strains (एक से ज्यादा दवाओं के प्रति बेअसर रहने वाली तपेदिक )से ग्रस्त   हैं।

किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी की माइक्रोबायलोजी प्रोफ़ेसर अमिता जैन कहतीं हैं भारत एक तपेदिक बम के मुहाने पे बैठा हुआ है मैंने रहीमा शेष जैसे हज़ारों मामले देखें हैं जहां मरीज़ अधिक से अधिकतर दवाओं के प्रति प्रतिरोध दर्शा रहें हैं .ज्यादातर दवाएं इनके इलाज़ में निष्प्रभावी सिद्ध हो रहीं हैं .




ग्लोबल हो गई रहीमा की तपेदिक व्यथा 

तपेदिक मरीज़ की सोहबत से उसके  खांसने से भी लग जाती है तपेदिक छूत .लेकिन हवाई जहाज जैसी  तंग (बंद )जगहों पर यह ख़तरा तब और भी बढ़ जाता है जव सवारी करता हुआ  कोई दवा रोधी मरीज़ भी वहां मौजूद हो .विश्वस्वास्थ्य संगठन की हिदायतें ऐसे लोगों के लिए यह हैं कि वह हवाई यात्रा न करें .

लेकिन रहीमा शेख के खाबिन्द और तीन बच्चे तपेदिक से बचे रहें हैं संग साथ के बावजूद .निष्क्रिय पड़ा रहता है तपेदिक का जीवाणु हम में से कितनों में ही .

संयुक्त राष्ट्र संघ पहल के तहत भारत ने खुद अपने  को और दुनिया भर को यह भरोसा सन २००० में दिलाया था कि २०१५ तक हम तपेदिक के मामले और बीमारी से होने वाली मौतें घटाके आधी कर लेंगे .इस एवज १३ ,००० तपेदिक रोग निदान केंद्र भी खोले गए लेकिन अपने ही लक्ष्य से कोसों दूर है अभी भी भारत .

बेशक बीमारी की दर घटी भी है लेकिन अभी भी २३ लाख नए तपेदिक रोगी हर साल सामने आतें हैं .किसी भी और रोग संक्रमण से ज्यादा मौतें आज भी तपेदिक से ही हो रहीं हैं .(वजह जो भी हो गरीबी या कुव्यवस्था ,दवा बीच में छोड़ना ,कुपोषण आदि ).

जहां आम तपेदिक  के मामले साल छ :महीने में (छ : से नौ माह ) में मात्र ५५० रुपया औसतन खर्च के साथ निपट जातें हैं वहीँ दवा रोधी तपेदिक के प्रबंधन में कमसे कम साल दो लग जातें हैं खर्ची आती है एक लाख दस हज़ार रुपया कमसे कम भी .

जुलाई २००६ में तपेदिक के पहले लक्षण प्रगट हुए रहीमा शेख  में तब जब वह अपने गाँव रामपुर में ही थी नेपाल सीमा के नजदीक .उसकी खांसी लगातार बनी हुई थी .ठीक होके न देती थी .

सितम्बर ८ ,२०० ६  से  एक सरकारी क्लिनिक से उसने तपेदिक की दवा लेनी शुरु की . मानक छ :महीने के इलाज़ पर उसे रखा गया .एक  महीने के बाद ही उसे खांसी के साथ खून भी आया .वह बेहद खौफ खाने लगी .सहम गई .यही भय  उसे मुंबई ले आया जहां उसका खाबिन्द (पति )दर्जी का काम करता था .लेकिन जल्दी ही उसे अपने गाँव लौटा आना पड़ा .उसे बताया गया भारत में तपेदिक का इलाज़ यकसां हैं .शहर और गाँव में .

एक महीने तक वह इसी गफलत में दवा न खा सकी .डायरेक्ट ओब्ज़र्वेशन ट्रीटमेंट (DOT )के तहत मरीज़ को स्वास्थ्य कर्मी की मौजूदगी में ही दवा खानी पड़ती है .

दवा छोडके फिर से  शुरू करना दवा रोधी तपेदिक की वजह बन जाता है .

विशेष भारत के सन्दर्भ में :

अमीर   देश इसीलिए पहले ड्रग रेजिस्टेंस टेस्ट करतें हैं मरीज़ का फिर ख़ास उसीके लिए तैयार(टेलर मेड ) इलाज़ शुरू होता है .ऐसे में ड्रग रेजिस्टेंस का जोखिम कम रहता है .

लेकिन अभी हमारे यहाँ ऐसी पहल कहाँ ?

१९९० में तपेदिक कार्यक्रम जब शुरू हुआ था ,यहाँ दवा रोधी  तपेदिक का नामो निशाँ भी नहीं था ,रहा होगा कोई इक्का दुक्का मामला .

रहीमा दवा लेने के बाद भी लगातार पोजिटिव बनी रही .नवम्बर २००६ में प्रोग्राम दोबारा शुरू करने पर तब उसका स्तर ३+ था एक से चार अंक वाले रोग सूचक  पैमाने पर.

इसके नौ महीने बाद भी पुन : जांच करने पर रोग का स्तर पाया गया २+.

स्थानीय टी बी वर्कर रामदयाल तिवारी कहतें हैं इस दरमियान रहीमा आती जातीं रहीं हैं लेकिन उन्हें रोग मुक्त कभी नहीं देखा गया .

तिवारी और उनके साथियों ने उसे एक नजदीकी अस्पताल में छाती के रोगों के माहिर डॉ .एम.पी .सिंह को दिखलाने की सलाह दी .

यहाँ से शुरू होती है एक अंतहीन व्यथा कथा .

आलमी हो गई है रहीमा शेख  की तपेदिक व्यथा -कथा (ज़ारी )

बकौल डॉ .ऍम.पी .सिंह रहीमा शेख  उनके दफ्तर में हँसते हुए दाखिल हुईं ऐसी थी उनकी जिजीविषा जबकि बहुलांश ऐसे मरीजों का  बहुत जल्दी हार मान के घर बैठ जाता है और मौत को याद करता है .

भारत सरकार देश के ज्यादातर हिस्सों में दवा रोधी तपेदिक की जांच और इलाज़ दोनों के लिए ही कुछ नहीं करती है .गरीबों की मदद यहाँ भगवान् बनके कोई और ही करता है .रहीमा के एक भाई आबिदुला सिद्दीकी साहब उनकी दवा रोधी जांच के लिए आगे आये .

क्योंकि रहीमा पहले ही कोई साल भर से दवा ले रहीं थीं इसलिए डॉ .सिंह ने उनके लिए  दवा रोधी परीक्षण करवाना ज़रूरी समझा .पता चला रहीमा के मामले तपेदिक की टफ किस्म नौ दवाओं के प्रति प्रतिरोध दर्शा रहीं हैं . 

कब कहतें हैं तपेदिक के माहिर किसी मरीज़ को टोटली रेज़ीस्तेंट (परिपूर्ण दवा प्रतिरोधी )?

विश्वस्वास्थ्य संगठन ने तपेदिक के इलाज़ के लिए कुलमिलाकर १७ दवाओं को मंज़ूरी दी हुई है .अपने असर में इन  सबका दर्जा यकसां या बराबर नहीं है .पहली लाइन की दवाएं असरकारी ज्यादा हैं जबकि इनके टोक्सिक असर (विषाक्त प्रभाव )कमतर हैं .

दूसरी पंक्ति की दवाएं असर में उतनी ज़ोरदार नहीं हैं ,मरीज़ के लिए तकलीफ देह भी ज्यादा हैं .

जब मरीज़ पहली पंक्ति की सभी तथा दूसरी पंक्ति की सभी आम दवाओं के प्रति प्रतिरोध प्रदर्शित करता है तब उसे टोटली ड्रग रेज़ीस्तेंट कह देतें  हैं .

वालस्ट्रीट जर्नल के लिए ये रिपोर्ट तैयार करने वाले पत्रकार कहतें  हैं -जितने भी तपेदिक के माहिर कायाचिकित्सकों और रिसर्चरों ने रहीमा के मामले का पुनरआकलन किया है वह सभी मानतें हैं इन्हें शुरु में ही तपेदिक की Tougher strain से संक्रमण लगा होगा .भारत में इलाज़ के शुरु में ऐसी कोई दवा रोधी तपेदिक  जांच ही नहीं की जाती है जबकि अमीर देशों में इलाज़ का यह शुरूआती बिंदु होता है ,ऐसी जांच के बाद ही इलाज़ शुरु किया  जाता  है जो हर मरीज़ के लिए ख़ास होता है टेलर मेड रहता है उसके संक्रमण के स्वरूप के अनुरूप .

माहिरों के अनुसार लेकिन लाइलाज नहीं हैं  ये तमाम मरीज़ भी .तपेदिक की टफर स्ट्रेन का भी इलाज़ हो सकता है . 

लेकिन इसके लिए शुरूआती जांच मायने रखती है .ज़रूरी भी रहती है .ताकि संक्रमण के अनुरूप व्यापक इलाज़ शुरु में ही किया जा सके व्यक्ति विशेष के रोग की दवा रोधी किस्म के अनुरूप .रहीमा के मामले में इसी चरण में चूक हुई है .
(ज़ारी )

ग्लोबल हो चुकी है रहीमा की तपेदिक व्यथा -कथा (गतांक से आगे ...)



क्या कहतें हैं हिन्दुस्तान के चोटी के तपेदिक अफसर अशोक कुमार जी ?

भारत में दवा प्रति रोध कोई कोई गंभीर मसला नहीं है .ऐसा वह आग्रह पूर्वक और दृढ विश्वास के साथ कहतें हैं .

तीन घंटे तक वाल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकारों के साथ चली लम्बी बातचीत में आप कहतें  हैं :तपेदिक भारत में अन्य रोगों के बरक्स एक दम से साध्य है .मधुमेह से बेहतर है तपेदिक की चपेट में आना,हाइपरटेंशन या मनोविक्षिप्त हो जाना  (अब अशोक जी से कोई पूछे -भले आदमी बीमारी कौन सी अच्छी होती है ?अस्पताल और कचहरी तो भगवान किसी को न ले जाए ).

आगे आप फर्मातें हैं भारत जल्दी ही दवा रोधी तपेदिक की जांच के लिए व्यापक स्तर पर योजना बनाएगा .कुछ इलाकों में वह ऐसा कर भी रहा है .लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा अंतरजाल होगा तभी जब देश में इस एवज जांच के लिए बड़ी संख्या में नै लेब्स खुलेंगी .इस काम में अभी सालों लग जायेंगे .(ये है ज़नाब पुरसुकून लालफीताशाही यहाँ की ).

डॉ .सिंह ईमानदारी के साथ मानतें हैं वह कोई तपेदिक के माहिर नहीं हैं .रहीमा के मामले में मैंने विश्वस्वास्थ्य संगठन के निर्देशों का पूरी तरह पालन करते हुए रहीमा का इलाज़ किया है सभी मंज़ूर शुदा दवाओं को प्रतिरोध के खिलाफ आजमाया है .

विश्वस्वास्थ्य संगठन कमसे कम चार दवाओं की दवा प्रतिरोध के खिलाफ एक साथ दिए जाने की सिफारिश करता है.इन्हें लेने के दौरान रहीमा बीमार नहीं हुई है और न ही इनके खिलाफ उसके प्रतिरोध की जांच ही की गई है .रहीमा ने उनके कहे अनुसार ये चारों दवाएं भी लीं .लेकिन उसकी चिल्स और खांसी ने पिंड नहीं छोड़ा है रहीमा का .

जिन माहिरों ने रहीमा के तमाम मेडिकल रिकोर्ड को वालस्ट्रीट जर्नल के लिए खंगाला है वह क्या कहतें हैं इस बाबत ?

डॉ .सिंह ने जो दवाएं  आजमाई वह उतनी असरकारी ही नहीं थीं ,अपर्याप्त थी कमज़ोर थीं तपेदिक की उस किस्म के खिलाफ जो रहीमा को दबोचे रही है .और इसीलिए तपेदिक का जीवाणु उसकी काया में और भी अपना रूप बदल बहरूपिया हो गया ,उत्परिवर्तित (म्यु -टेट )हो गया .

जब चार साल बाद उसकी  दवा रोधी जांच फिर से की गई तब पता चला डॉ .सिंह ने जिन चार दवाओं का कोम्बो रहीमा पर आजमाया था उनमें  से ही  दो के प्रति रहीमा  प्रतिरोध दर्शाने लगी थी .

ईमानदारी के साथ अपने ही दिए इलाज़ का पुनरआकलन करने पर डॉ .सिंह ने आखिरकार माना ,उन्हें अपने ड्रग रेजिमेन में एक दवा की खुराख दोगुनी कर देनी चाहिए थी .

Capreomycin जैसी असरदार (असर में तेज़ ,स्ट्रोंग )दवा आजमानी चाहिए थी .लेकिन इसके एक शोट की कीमत २०४ रूपये थी जो उस गरीब के बूते के बाहर की बात थी .इसके बेहद के टोक्सिक असर भी हैं और रहीमा पहले ही बहुत संवेद्य थी सेंसिटिव थी .

लेकिन कुल मिलाकर वह आज भी यह मानने को राजी नहीं हैं कि उनके नुसखे(ड्रग रेजिमेंन )ने रहीमा का दवा प्रति रोध और भी बढा दिया था .वह आज भी हत प्रभ हैं यह सोचकर आखिर  उनके बताये नुसखे ने काम क्यों नहीं किया ,साथ ही बुद्बुदातें हैं दवा प्रतिरोध को ठीक  करना बड़ा मुश्किल और दुस्साध्य काम है .

दवा प्रति रोधी हो जाने पर तपेदिक एचआईवी -एड्स से ज्यादा घातक हो जाती है . 

(ज़ारी )






सन्दर्भ -सामिग्री :-A Woman's Drug-Resistant TB Echoes Around the World (Cover/Lead story/THE WALL STREET JOURNAL /WEEKEND /SATURDAY/SUNDAY ,SEPTEMBER 8-9 ,2012 P1,A12FULL PAGE STORY)

विशेष : "बोम्बे मेरी जान" के तहत हमने दवा रोधी तपेदिक पर धारावाहिक राम -राम भाई /साइंस ब्लोगर्स अशोसियेशन ब्लोग्स पर लिखा था .यह उसी की नवीनतम कड़ी है .आप सहयोग दीजिएगा पूरी कथा सामने लाई  जाएगी  किश्तों में -रहीमा  की तपेदिक व्यथा -कथा .

4 टिप्‍पणियां:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

वाह!
आपके इस उत्कृष्ट प्रवृष्टि का लिंक कल दिनांक 10-09-2012 के सोमवारीय चर्चामंच-998 पर भी है। सादर सूचनार्थ

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चिंतापरक लेख ...आगे की कड़ी का इंतज़ार रहेगा

सुशील ने कहा…

वीरू भाई का अंदाज
अपने में निराला है
हर एक लेख उनका
स्वास्थ जागरूकता
जगाने वाला है

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत ही सुन्दर अंदाज मे विचारणीय लेख..आभार वीरु जी..