रविवार, 18 सितंबर 2011

Stress, Dust of 9/11 Linked to Acid Reflux

ग्यारह सितम्बर २००१ के विश्व्यापार केंद्र विस्फोट की विनाश लीला जिन अभागों ने देखी थी और जो इस विस्फोट से पैदा धूल की चपेट में आये थे उनमें एक तरफ दमा की शिकायत ज्यादा देखी गई दूसरी तरफ दहशत से पैदा "पोस्ट ट्रौमेतिक स्ट्रेस "का सामना भी इन लोगों को बेहद ज्यादा करना पड़ा है बरक्स उन लोगों के जो विस्फोट स्थल या उसके आसपास (ग्राउंड जीरो ) उस वक्त कहीं नहीं थे ।
लेकिन अम्ल शूल (हार्ट बर्न ,तेज़ाब बनने की समस्या )से ये बाद वाले लोग भी अधिकाधिक ग्रस्त हैं .बच नहीं सकें हैं हार्ट बर्न से ये तमाम लोग भी ।
ग्राउंड जीरो के गिर्द ड्यूटी पर तैनात और उसके आसपास मौजूद रहे तकरीबन ३७,००० लोगों पर संपन्न एक आधिकारिक अध्ययन के नतीजे अब सामने आयें हैं ।
पता चला है :पता चला विस्फोट के तीन बरसों के अरसे में इनमे से पांचवे हिस्से को यानी २०%लोगों को जीवन में पहली बार अम्ल शूल (हार्ट बर्न )अपच (इनडायजेश्चन ),या फिर एसिड रिफ्लक्स का सामना करना पड़ा है ।
यहाँ तक हुआ है कि विस्फोट के पांच छ :बरस बाद भी इनमें से १३%लोगों में "गैस्ट्रोईसाफेजियल रिफ्लक्स डिजीज "
gastroesophageal reflux disease, or GERD.के लक्षण देखे गएँ हैं ।
लोगों की जान बचाने वाले ,रेस्क्यू ओपरेशन से जुड़े लोगों में से इन लक्षणों का प्रगटीकरण और दर और भी ज्यादा रही एक तिहाई में २००४ में शुरु होकरइनमे से एक चौथाई में उसके और भी तीन साल बाद तकलक्षणों का उग्र रूप (यानी २००७ तक) कायम देखा गया ।
इस स्थिति में अमाशय (उदर या पेट )में बनने वाले तेज़ाब ग्रास नाली तक रिसकर पहुँचने लगतें हैं .अलावा इसके दमे की शिकायत के साथ दवाब कारी स्थितियां मय पोस्ट ट्रौमेतिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के भी घेरे रहतीं हैं ।
इतना ही नहीं लगातार बने रहने वाले दवाब ने इनकी अंतड़ियों को भी असर ग्रस्त किया .लपेटे में लिया ।
रोल ऑफ़ सिरोंटोनिंन ?
केवल एन्ग्जायती (बे -चैनी,और अतिरिक्त रूप से बढे हुए औत्सुक्य स्तर )और डिप्रेशन (अवसाद) से ही रिश्ता नहीं है दिमागी जैव -रसायन 'सिरोंटोनिं 'का यह हमारे आंत्रक्षेत्र (गट या अंतड़ियों )की भी निगरानी और विनियमन करता है .पाचन तंत्र के प्रति हमारे रवैये की भी पड़ताल करता रहता है यह न्यूरो -ट्रांसमीटरपाचन क्षेत्र से होने वाली तमाम आवाजाही पर भी इसकी नजर होती है
वास्तव में उदरआंत्र क्षेत्र (गैस्ट्रोइन्तेस्तिनल ट्रेक्ट ) भी एक नर्वस सिस्टम (स्नायुविक तंत्र )से लैस रहता है .यह दिमागी स्नायुविक प्रणाली की तरह ही पेचीला होता है
यकीन मानिए जितनी नसें (नाड़ियाँ या नर्व्ज़)अंतड़ियों में होतीं हैं उतनी ही रीढ़ रज्जू (स्पाइनल कोलम )में होतीं हैं.
चौंक गए आप !दवाब के तहत किये गए व्यवहार के समय भी इतनी ही नर्व्ज़ हरकत में आतीं हैं
Stress-related behaviors may be involved as well, however. People who are stressed out are more apt to smoke, overeat, and drink alcohol, all of which can make acid reflux more likely by relaxing or putting pressure on the esophageal sphincter, which connects the stomach to the esophagus, Dr। Prather explains.
दवाब ग्रस्त व्यक्ति सिर्फ बे हिसाब धूम्रपान कर सकता है ,बे -हिसाब खा पी भी सकता है .बिंज ड्रिंकिंग करने की ओर प्रवृत्त भी होता है
और यही रुझान दवाब ग्रस्त व्यक्ति का एसिड रिफ्लेक्स के मौके बढा देता है ,ज्यादा से और ज्यादा अवसर पैदा कर देता है .ईसाफेगस (भोजन नाली )तक आमाशय से चलकर पहुँचने वाले तेजाबी रिसाव की यही वजह बनता है .
Stress isn’t the only culprit involved in post-9/11 acid reflux। The study authors suspect that the toxic Ground Zero dust may be responsible as well.
स्ट्रेस के अलावा ग्राउंड जीरो के आसपास विषाक्त धूल का प्रसार -फैलाव ,पसराव भी उत्तर /११ वेला (फिजा )में एसिड रिफ्लेक्स की वजह बनता गया .
इसमें एल्केलाइन सीमेंट का बहुलांश मिला है जो /११ के बहुत पहले से ही दमे को हवा देने में उस्ताद माना समझा गया है .सीमेंट फेक्ट्री में काम करने वाले कारिंदे इसी के चलते अपच के शिकार बनतें रहें हैं
As with PTSD, the likelihood of experiencing acid reflux symptoms was highest among the study participants with the most exposure to the dust। Thirty-one percent of the people who experienced “intense” dust exposure while working at the wreckage site reported symptoms by 2004, compared to 19% of the workers who had no exposure to the dust—a pattern that persisted three years later.

12 टिप्‍पणियां:

mahendra verma ने कहा…

उपयोगी जानकारी।
कुछ सीखने को भी मिला।
आभार आपका।

रविकर ने कहा…

बहुत सुन्दर --
प्रस्तुति ||
बधाई |

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

दुख और वेदना शरीर पर भी असर दिखाती है।

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

आगे भी पता नहीं कब तक तंग होते रहेंगे।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 19-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

Dr Varsha Singh ने कहा…

इस ज्ञानवर्धक लेख के लिए हार्दिक धन्यवाद!

Arvind Mishra ने कहा…

इसी को हर्ट बर्न भी कहते हैं न ?

Arvind Mishra ने कहा…

आपने अच्छा अनुवाद किया -अम्ल शूल !

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

बढ़िया जानकारी।

Rakesh Kumar ने कहा…

अच्छी जानकारियाँ देते हुए इस लेख के
लिए आभार.

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.

मनोज कुमार ने कहा…

आपके ब्लॉग पर हर बार कुछ नया सीख कर जाता हूं।

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया जानकारी।

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा...
ननिहाल की कुछ यादें 
मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है
आइये चले मेरे साथ छिंदवाड़ा स्थित श्री बादल भोई जनजातीय संग्रहालय.....
http://sanjaybhaskar.blogspot.com/2011/09/blog-post_19.html