शनिवार, 10 सितंबर 2011

अब वो अन्ना से तो पल्ल्ला छुडा रहें हैं .

राघोगढ़ के राजा दिग्विजय सिंह जी ने अन्ना जी के बारे में अपना रुख यकायक बदल लिया है .अब वह कहतें हैं उन्होंने अन्नाजी को आर एस एस का मुखोटा कहा ही नहीं .वह अन्ना जी का सम्मान करतें हैं .बहरहाल उन्होंने अपने इस ख्याल परिवर्तन का कारण नहीं बताया ।
कहीं उनको यह तो पता नहीं चल गया कि अन्ना जी उन्हें दो बार पागल कह चुकें हैं तीसरी बार कह दिया तो वह मान्यता प्राप्त पागल कहलायेंगें ।
देश को इंतज़ार है दिग्विजय सिंह जी आर एस एस के बारे में अपने विचार कब बदलेंगें ?
एक दुष्ट जो अकसर भारत धर्मी समाज का अपमान करता है यदि आर एस एस के गांधी टोपी पहनन से अपनी दुष्टता छोड़ता है तो भारत धर्मी वृहद् समाज इस पेश कश पर विचार कर सकता है .आर एस एस अपनी कुछ प्रिय चीज़ें छोड़ सकता है .काली टोपी पहननी भी छोड़ देगा ।आइन्दा गांधी टोपी पहनेगा .
कब कब कह कर दिग्विजय अपने ही कहे को मुकरेंगें .आर एस एस तो एक संस्था है वह उन्हें संश्था गत नोटिस भी भेज सकती है .यह भारत धर्मी समाज की अहिंसक जनता नहीं है जो अपना मन मसोस के रह जाती है और यह आदमी गाहे बगाहे एक राष्ट्र की मेधा का अपमान करता रहता है ।
बेहतर हो यह आदमी संभल जाए .
वगरना नोटिस तो किधर से भी आ सकता है. (संशोधित संस्करण गत पोस्ट में प्रकाशित ग़ज़ल का )0
शान सत्ता की फकत ,एक लम्हे में जाती रही ।

इस कदर बदतर हुए ,हालात मेरे देश में ,

लोग अनशन पे सियासत ,मौज से खाती रही ।

एक तरफ मीठी जुबाँ तो, दूसरी जानिब यहाँ ,

सोये थे सत्याग्रही ,वो लाठी चलवाती रही ।

हक़ की बातें बोलना अब ,धरना देना है गुनाह ,

ऐसी आवाजें सियासी ,कूंचों से आती रहीं ।

हम कहें जो है वही सच ,बाकी बे -बुनियाद है ,

हुक्मरां के खेमे से ,ऐसी खबर आती रही ।

ख़ास तबकों के लियें हैं खूब ,सुविधाएं यहाँ ,

कर्ज़ में डूबी गरीबी ,अश्क बरसाती रही ,

चल चलें 'हसरत 'कहीं ऐसे ही दरबार में ,

इंसानियत की एक जुबाँ ,हर हाल में गाती रही ।
गज़लकार :सुशील 'हसरत 'नरेलवी,चंडीगढ़ .

10 टिप्‍पणियां:

रेखा ने कहा…

शायद दिग्विजयजी पर आपकी सलाह का ही असर हुआ है ........

SM ने कहा…

sweet tongue and changing colors
to fool citizens
very well written

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

नेताओं का क्‍या भरोसा है। कभी थूकें और कब उसे चाट लें, कुछ नहीं कहा जा सकता।

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ब्‍लॉग समीक्षा की 32वीं कड़ी..
पैसे बरसाने वाला भूत!

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

वीरेन्‍द्र जी, साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन में ड्राफ्ट रूप में सेव की गयी आपकी सभी पोस्‍ट प्रकाशित हो गयीं हैं। समय मिले, तो कुछ और लिखिएगा।

और हां, मैंने आपको टिप्‍पणी में लिंक लगाने का तरीका भेजा था, मिला होगा।

Sunil Kumar ने कहा…

राम राम जी आज तो अच्छा सबक सिखाया दिग्गी राजा को लेकिन कल यह भूल जायेगा

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

बेहतरीन आकलन किया है आपने.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सबको सम्मति दे भगवान।

डॅा वेदप्रकाश श्योराण ने कहा…

दिगगी मिंयां कां मैडम ने आते ही डांट पिलाइ है

Dr Varsha Singh ने कहा…

सही विवेचना की है आपने ।

रविकर ने कहा…

आँखे - माखू दूसता, संघ - हाथ बकवाद ||
अर्जुन का यह औपमिक, है औरस औलाद |
है औरस औलाद, कभी बाबा के पीछे ,
अन्ना की हरबार, करे यह निंदा छूछे |
सौ मिलियन का मद्य, नशे में अब भी राखे,
बड़का लीकर किंग, लाल रखता है आँखे ||
(२)
आतंकी की प्रशंसा , झेले साधु-सुबूत
जहल्लक्षणा जाजरा, महा-कुतर्की पूत |
महा-कुतर्की पूत, झाबुआ रेप केस में,
दोषी हिन्दू-संघ, बका था कहीं द्वेष में |
भागा भागा फिरा, किया भारी नौटंकी,
लिया जमानत जाय, चाट कर यह आतंकी ||
(३)
क्रूर तमीचर सा बके, साधु-जनों पर खीज ||
तम्साकृत चमचा गुरु, भूला समझ तमीज |
भूला समझ तमीज, बटाला मोहन शर्मा,
कातिल नहीं कसाब , बताता है बे-धर्मा |
कहे करकरे साब, मारता हिन्दू-लीचर ,
पागल करे प्रलाप, विलापे क्रूर-तमीचर ||
(४)
वो माया के फेर में, करे राम अपमान,
मिले राम-माया नहीं, व्यर्थ लड़ाए जान|
व्यर्थ लड़ाए जान, बुड़ाया अपनी गद्दी,
गले नहीं जब दाल, करे तरकीबें भद्दी |
बोला तब युवराज, अशुभ है इसका साया,
हूँ मुश्किल में माम, बड़ी टेढ़ी वो माया ||