शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

एक तलब से दूसरी की तरफ जाया जा सकता है ?

क्या आप जानतें हैं ,हमारा दिमाग एक सोफ्ट वेयर लिए है ,हार्ड वायर्ड है ,एक क्षमता लिए हे है अंतर -जात जन्मना कि आसपास कोई केलोरी सघन खाद्य (केलोरी डेंस ,केलोरी रिच फ़ूड ) मौजूद है ।?
रिसर्च से पता चला है हमारी खाने पीने की तलब ,हमारे अपने परिवेश की ही उपज है ,हम कहाँ बड़े हुएँ हैं ,वहीँ का खान पान हमें ललचाता रहता है .
लेकिन फिर भी एक तलब को छोड़ दूसरी अपना लेने की कूवत हमारा दिमाग रखता है .हम ही वाकिफ नहीं है दिमाग की इस सर्व -ग्राही ,सर्व -समावेशी क्षमता से भारतीय संस्कृति की तरह जो हर तरफ से अच्छे तत्व लेकर आगे बढती रही है ।
तीस साल की उम्र में ही फॉक्स का वजन ४० पोंड बढ़ गया था .थेंक्स टू हर थ्री प्रग्नेंसीज़ एंड चोकलेट क्रेविंग्स ।

देखते ही देखते वह साइज़ चार से साइज़ दस तक पहुँच गई .अपनी बे -डौल आकृति डीलडौल और अपनी माँ का वह मिलान करती जो ठीक इसके विपरीत अपना तीस पोंड वजन कम कर चुकीं थीं इसी दरमियान .
माँ ने टफ्ट्स विश्विद्यालय में पोषण विज्ञान की माहिर सुसान रोबर्ट्स का एक वर्क शॉप अटेंड किया था जिसमें अपनी तलब को अपने बस में करना रखना सिखलाया गया था .उसने अपनी बेटी फॉक्स से भी इसे आजमाने के लिए कहा ।
रोबर्ट्स ने एक किताब लिखी है :"The Instinct Diet,".फॉक्स अपनी किताब में खुलासा करतीं हैं उन जैविक कारणों का जो दिमाग को किसी ख़ास खाने ,पेय आदि का तलबगार बना देतें है ,लेकिन साथ ही तेज़ी से जोड़तीं हैं इस सहज प्रवृत्ति में रद्दोबदल संभव है .दिमाग चोकलेट की तलब छोड़ ब्रोक्कली का तलबगार भी बन सकता है .
१४ महीने लगे फॉक्स को जो "चोकोहोलिक"चोकलेट पर ही ज़िंदा थी अब सलाद प्रेमी बन चुकी थी .अपना वजन उसने ३६ पोंड घटाया है ,अब वह फिर से "साइज़ फोर"है .इसीलिए तो कहा गया था -
करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान ,
रसडी आवत जात के सिल पर पडत निशान.
The caveman's इंस्टिंक्ट:
"Monell Chemical Senses Center in Philadelphia."के खाद्य प्रोद्योगिकी के माहिर खाद्य विज्ञानी मर्सिया पेल्चत कहतें हैं इतिहास पर विहंगम दृष्टि डालिए ,पता चलता है ,आदमी के पास खाने पीने को कुछ ख़ास नहीं था ।
भूखों मरने से बचाव के लिए दिमाग एक सोफ्ट वेयर लिए आया ,टोह लेने की ताकत दिमाग के पास अंतरजात ताकत थी केलोरी -लदा भोजन अपने परिवेश से आसपास से .
यही वजह है मिष्ठान्न देखकर आप पार्टीज़ में उसी और दौड़ ने लगतें हैं जहां गरम गरम गाज़र का हलुवा हो ,गुलाबजामुन हो या फिर मूंग की दाल का हलुवा या फिर वासुन्दी ।जबकि आपको हिदायत है आप ज़रा संभल के खाए ,अपनी बे डौल होती काया की हदबंदी पहचाने .फिर भी साहब तलब आखिर तलब है ।जो करादे सो कम .इसी तलब से छुटकारे का उपाय बतातें हैं खाद्य विज्ञानी ।
यकीन मानी पुनर्वास चिकित्सा के दौरान ड्रग एडिक्ट के साथ भी ऐसा ही होता है ,अफीमची को अफीम चाहिए ।
पेल्चत कहतें हैं बेशक हम एक जन्म जात तलब को लेकर इस दुनिया में आयें हैं लेकिन हम जो भी चीज़ ज्यादा -ज्यादा खाने लगतें हैं जैसे कोई खाने से पहले एक फुल प्लेट सलाद ही खाजाता है रोज़- बा -रोज़ .बस आदत पड़ जाती है दिमाग उसी वक्त सलाद की बाट जोहने लगता है .,रोज़ -बा -रोज़ .
सुसान ने अपने अध्ययन में अपने सब्जेक्ट्स को दो सप्ताह तक वनिला -जायके और स्वाद वाले पेय पर रखा .इसमें संतृप्त वसाएं नाम भर को थीं .दो हफ्ते बाद ही सुसान के सब्जेक्ट्स में से एक तिहाई को इस पेय का चस्का लग गया हालाकि यह उतनी सुस्वादु भी नहीं थीं .It was chalky and not very युम्मी।
जापानी रिसर्चरों के मुताबिक़ क्रेविंग्स (ललक )का सम्बन्ध हमारे आंचलिक खान पान से हमारे परिवेश से है जैसे एक जापानी को "सुसी" की तलब रहती है ।Research in Japan also shows that cravings are influenced by our environment. A study at Tohoku University found that many Japanese women crave sushi. "These findings suggested that the craving for some kind of food is influenced by the tradition of food products and cultures," the authors concluded.
ज़ाहिर है खान पान की आदतें आंचलिक परम्परा और खान पान से असर ग्रस्त होतीं हैं .इन्हीं में से रिसती है तलब .
फॉक्स का हाल चाल जानतें हैं -जिसे पहले चोकलेट की तलब रहती थी अब उसे मिचली आने लगती है चोकलेट खाने से .आज क्या कह रहीं हैं फॉक्स जानिएगा -
'Chocolate makes me nauseous!'
आप को अब सलाद की तलब रहती हैं .यदि किसी पार्टी में डेज़र्ट सर्व होती हैं फॉक्स वहां से खिसकने में देर नहीं लगातीं घर आके मज़े से खुराकी रेशों से लदा सीरियल खातीं हैं वह भी" लो केलोरीज़- वाला" जिसमे मेवों का डेरा न हो ।"I make one every night for dinner -- leafy greens and chopped up cucumbers. I don't use dressing -- just a little bit of olive oil and salt and pepper, because I crave a natural taste," she says. "This is such a huge difference for me."Every so often, Fox says she gets a "ping" for chocolate. But then when she eats it, it makes her feel sick.
अगली किश्त में पढ़िए चिकनाई सने भोजन से सेहत के लिए मुफीद (माफिक )भोजन की तरफ कैसे आयें .?

18 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

तलब स्वाद की |

कइयों को बर्बाद की ||

रेखा ने कहा…

बहुत सारी जानकारी उपलब्ध करायी आपने .आभार अगले पोस्ट का इंतजार रहेगा ..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मन लगाये रहने से आदत बन जाती है।

Arvind Mishra ने कहा…

मेरे फायदे की पोस्ट

डॉ टी एस दराल ने कहा…

ये दिमाग है कि मानता ही नहीं । बस यूँ ही खाते खाते मोटे हो जाते हैं ।

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

अगली किश्त का ज्यादा इंतजार है जी,

Dr Varsha Singh ने कहा…

Another great post with a very important message, Thanks.

सतीश सक्सेना ने कहा…

काम की जानकारी ! हार्दिक शुभकामनायें !

कुमार राधारमण ने कहा…

निश्चय ही,हमारा खान-पान ज़रूरत से ज़्यादा आदत है। बढ़ते शरीर को अधिक भोजन की आवश्यकता होती है किंतु वृद्धि रूक जाने के पश्चात्,केवल उसे मेन्टेन करने भर खाना चाहिए जो बहुत कम होता है। मैंने महसूस किया है कि खान-पान संबंधी हमारी ग़लत आदतों के लिए,हमारी अप्राकृतिक जीवन-शैली और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भ्रामक आलेख भी ज़िम्मेदार हैं।

G.N.SHAW ने कहा…

दिमागी सर्वर बहुत तेज है ! इसे वायरस से वचाना चाहिए ! फिर भी जीभ बहुत तेज है !

मनोज कुमार ने कहा…

अपनी तो तलब स्वाद की नहीं है फिर भी ..
ज्यों दवा की, मर्ज़ बढ़ता ही गया।

Rakesh Kumar ने कहा…

एक तलब से दूसरी की तरफ जाया जा सकता है.
कोशिश से 'सत्-चित-आनंद' को पाने की तलब को भी जगाया जा सकता है.
यह तलब जगी तो सभी तलब इसमें समां जायेंगीं

बहुत सुन्दर प्रस्तुति की है आपने वीरू भाई

राम राम भाई.

kumar ने कहा…

ये स्वाद तो ले ही डूबता है....चाट ही जाता है...सबकुछ.....

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

ये सोफ्टवेयर बहुत खतरनाक है। कल चील्हे बनाए गए बेसन के नमकीन और आटे गुड़ के मीठे। हम एक ज्यादा खा गए। रात को पेट ढोल हो रहा था। उसे पिचकाने के लिए नक्स वोमिका-200 की खुराक लेनी पड़ी तब जा कर सो पाए। आज सुबह भोजन का अवकाश है।

अभिषेक मिश्र ने कहा…

बिलकुल मैं भी मानता हूँ कि तलब को दूसरी तरफ ले जाया जा सकता है, और ऐसा किया जाना भी चाहिए.

ZEAL ने कहा…

बहुत उपयोगी आलेख ! निश्चय ही दिमाग का ये सोफ्टवेयर हमें भिन्न-भिन्न परिस्थितियों , खाद्य पदार्थों और अन्य रुचियों में अनुकूलन पैदा करता है ! बस थोडा instruction देने की ज़रुरत है मस्तिष्क को ! थोड़ी सी विल पॉवर चाहिए , बदलाव अपने हाथ में है !

An old adage goes thus -- " Where there is will, there is a way "

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चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहुत अच्छा ब्लॉग बहूत अच्छी जानकारियां देता हुआ...आभार वीरू भाई

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

बहुत ही उपयोगी और ज्ञानवर्द्धक जानकारियां परोस रहे हैं आप।
हम तो आपके पहले से ही मुरीद हैं इस मामले में।

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कम्‍प्‍यूटर से तेज़...!
सुज्ञ कहे सुविचार के....