शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

लम्पटता के मानी क्या हैं ?


लम्पटता के मानी क्या हैं ?







यूं अखबार वालों की  स्वतंत्र सत्ता नहीं होती है.अखबार श्रेष्ठ नहीं होता है औरों से ,अन्य माध्यमों से ,अखबार की एक नियत बंधी बंधाई भाषा होती है उसी के तहत काम करना होता है हमारे मित्र बाबू लाल शर्मा (पूर्व सम्पादक ,माया ,दैनिक भास्कर ,अब स्वर्गीय ) बतलाया करते थे वीरू भाई कुल २२,००० शब्द होतें हैं जिनके गिर्द अखबार छपता है .अखबार की एक व्यावहारिक सी भाषा होती है जिसमें कोई ताजगी नहीं होती .








सन्दर्भ :
लंपटक्या हममें से अधिकांश लंपट हैं???
आज अख़बार में छपे एक रपट पर नज़र पड़ी, जिसका शीर्षक है –
ब्लॉग की दुनिया में लंपटों की कमी नहीं

9 टिप्‍पणियां:

Arvind Mishra ने कहा…

लगता है चित्र में लम्पटों को देखकर ऐसा विचक्षण विवेचन कर डाले हैं वीरुभाई !ऐसी ही स्नेह वर्षा होती रहे :-)

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सार्थक आलेख...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हम भी सीख रहे हैं..

Kunwar Kusumesh ने कहा…

लगता है extempore बोलने के चक्कर में और जल्दबाज़ी के कारण लम्पट जैसे अनुपयुक्त शब्द का प्रयोग वक्ता ने कर दिया जिसका अहसास उसे बाद में ज़रूर हुआ होगा.हड़बड़ी में ये गलतियाँ कभी कभी हो जाती हैं.

मनोज भारती ने कहा…

एक विश्लेषणात्मक लेख ...बधाई!!!

SM ने कहा…

yes he has used his freedom of speech.
thoughtful article yes one needs to think before writing and using words.

शालिनी कौशिक ने कहा…

achchha vishleshan kiya hai aapne .nice . कैराना उपयुक्त स्थान :जनपद न्यायाधीश शामली :

Aparajita ने कहा…

bahut acchhey dhang se bahut hi sahi baat kahi hai aapne.....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अखबार में कहा गया है कि सुभाष राय ने अपने वक्तव्य में कहा .... और अखबार ने उसे हाइडिंग बना कर छाप दिया .... कई लोग जो वहाँ उपस्थित थे उनका कहना है कि सुभाष जी ने ऐसा कुछ नहीं कहा .... यदि शब्द के अर्थ को गंभीरता से लेते हैं तो सुभाष जी को अखबार पर मुकदमा ठोक देना चाहिए ...... दूसरों कि गलतियों को क्षमा करना हमारी प्रवृति में शामिल है इसी लिए अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है ...

सार्थक विश्लेषण