शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

PUSHING MOM,DOUBTING KIDS(II)

माहिरों के अनुसार सुमति की  सोच निर्दोष नहीं है .बच्चों की अकाद मिक क्षमता और उनकी अकादमिक कमजोरी को नजर अंदाज़ करके अपनी अपेक्षाओं का बोझा उनके नाज़ुक कन्धों पर डालना अकलमंदी नहीं है .कितने ही माँ बापों को यह इल्म भी नहीं होता उनका बच्चा सुनके सीखने में दक्ष है दिलचस्पी लेता है या देखके सीखने में .डॉ केलकर ऐसे माँ बाप से दो टूक पूछते हैं .

माँ बाप पेरेंटिंग मेटीरियल ऐसे स्रोतों से भी जुटाके पढ़ लेते हैं जो मानक और प्रामाणिक स्रोत नहीं होते हैं .कई माँ बाप सोचते हैं बच्चे में करुणा  भाव और दया का उदय मात्र उसे एक कर्म काण्ड के रूप में उसके हर जन्म दिन पर अनाथ आश्रम के बच्चों से मिलवाने ले जाने से पैदा हो जाता है .संवेदनाएं और संवेगात्मक रागात्मक धन इस तरह नहीं जुटाया जा सकता है यह कहना है डॉ शेट्टी का .

सवाल उठता है क्या Pushy ज़रुरत से ज्यादा बच्चों के हर मामले में दखलअंदाजी करने वाली Mom वाकई इतनी बुरी है .रिसर्च के अनुसार इसका उत्तर सकारात्मक है" हाँ" में है .हाँ वाकई ऐसा ही है .नतीजा क्या होता है ऐसी  माताओं के बच्चे आत्मविश्वाष में पिछड़ जाते हैं अपने हमजोलियों के बरक्स .

स्वतन्त्र रूप सोचने ,निर्णय लेने का मौक़ा इन बच्चों को मिलता ही नहीं है .इनकी दखलू माँ इनकी तरफ से सोचने का काम करती है .

कामयाबी की इनकी परिभाषा का दायरा भी बड़ा सीमित होता है .इनकी धारणा अगर यह बन जाती है ,डॉ कामयाब रहते हैं जीवन में तो बस इसी अवधारणा के तहत यह अपने बच्चों को डॉ बनाने की ठान लेती हैं .

दिमाग में इनके अगर यह बैठ गया की अमुक स्कूल अच्छा है क्योंकि इसके बारे में लोगों की आम राय यही है ,वह ठान लेती है मेरे बच्चे भी इसी स्कूल में जाना चाहते हैं .

जीवन और जगत के बारे यह नज़रिया बड़ा सीमित दायरे वाला है .माहिरों का यही कहना है .

It's best not to restrict the child to such narrow confines .

"What parents need to do is to find their child's strengths .Don't focus only on their grades but give give them exposure to learn different things .And above all ,give them freedom to make mistakes and learn from those mistakes ,"advises Dr Kelkar .

THE PROBLEM WITH PUSHY\HELICOPTER PARENTING

Studies have defined helicopter parenting as parents who stayed in close contact with their college-aged children and intervened frequently on their behalf

The parent's need to stay over-involved in even an older child's life, stifles the child's bids for independence and autonomy

It robs the child of the opportunity to think for themselves

When parents constantly fix the mistakes of the child, the child isn't given the opportunity to learn.

An American study in 2007 said college students with helicopter parents actually have lower grades than other students.

Be Gentle, But Firm

Always explain a command: Instead of telling a child to go to bed, try something innovative like, `You need to go to bed now if you want to be bright and early for swimming.'

Don't chide the child, criticize the behavior: Instead of saying that Anu is a bad girl for kicking others, say kicking hurts, don't do it

Be consistent: If you don't like children jumping of the sofa, stick to the rule at all times. Don't make an exception just because you are feeling guilty about scolding the child or making her study longer than usual

Ask her to speak up: If your child never manages to get a chance at the swing in the colony's playground, teach her to demand her share. Tutor her for different situtations where other children may not be giving her a turn or bullying her

Discourage peer worship: If your child copies her `friend' in the classroom or is a follower of the popular child in class, teach her or him to think independently. Ask them to choose vegetables at the supermarket or eatables in a restaurant



11 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

हिंदी में पढ़कर विषय स्पष्ट हो गया-
बढ़िया विषय उठाया है भाई जी-
शुभकामनायें -

Vikesh Badola ने कहा…

इस तरह की समस्‍याओं से तनाव उत्‍पन्‍न हो जाता है घरों में। विशेषकर अध्‍यापिकाओं के पास इतना विवेक ही नहीं है कि कहां वे 4-साढ़े चार, 5 साल तक के बच्‍चों को जबरन मैनर सिखाने, अक्षर रटाने या जिद करने पर डांट पिलाने से उनका या समाज का भला होगा। यही शिकायत वे मां-बाप से करते हैं कि आपका बच्‍चा कुछ नहीं बोलता, जिद करता है। बड़ी घातक स्थिति बना दी है तन्‍त्र ने प्राइवेट स्‍कूलों औन इनसे उपजे माहौल को अधिकृत कर। काश सरकारी स्‍कूलों के बच्‍चों की स्‍वच्‍छंदता को प्राइवेट स्‍कूलों में भी सुविधा और निगरानी के अन्‍तर्गत फलने फूलने दिया जाए तो कितना भला हो बच्‍चों का घर स्‍कूल दोनों जगह। बढ़िया विषय है लेकिन समस्‍या हल होने तक तनाव बरकरार है। विशेषज्ञों से ज्‍यादा विश्‍लेषण हम लोग कर सकते हैं इस बारे में पर हमारी आपकी सुनेगा कौन। कौन हमारे सुधारक आग्रहों विषयों को कानून में शामिल करेगा। शर्मा जी बड़ी विकट स्थिति में फांस दिया है इस भारतीय तन्‍त्र ने। न हम पूर्ण भारतीय ही रहे और न पाश्‍चात्‍य ही बन सके। हिंजड़े से हो गए हैं सब।

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…


स्वतन्त्र रूप सोचने ,निर्णय लेने का मौक़ा इन बच्चों को मिलता ही नहीं है ..bilkul sahi bat kahi aapne ..

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

bilkul sahi kaha aapane.

ramram.

SM ने कहा…

nice topic
parents and kids need the healthy communication but in India education is everything and in that tension majority parents ignore everything.

Aziz Jaunpuri ने कहा…

सर जी ,गंभीर मुद्दा है ,अभिभावक
इतने परेशांन लगते हैं कि मनो पहाड़
गिरनेवाला ही है ,दबाव का स्तर
विस्फोटक होता जा रहा है

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

बच्चों की रचनात्मकता और कल्पनाशीलता को भी मौका मिलना चाहिए.... वे बेहतर ही करेंगें

Sunitamohan ने कहा…

baaten gyaan ki! aaj parents ko lagta hai apne bachche ko maximum sikha den...use best dekhna chahte hain. Apka ye lekh aise parents ko achchhi raah dikhata hai.

Rajendra Kumar ने कहा…

बच्चों पर हम वेवजह अपनी सोंच थोपते रहते है जो की एकदम से सही नही है.

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

बच्चे का भी अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व होता है, उसे ज्यादा चाभी नहीं देनी चाहिए

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बच्चे आपकी हर प्रतिक्रिया देखते हैं, कोई भेद होने पर इंगित भी कर देते हैं।