मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

आखिर यह वाईट कोट इफेक्ट प्रेशर इतना ज्यादा क्यों होता है?

Why does the white coat affect blood pressure so much ?

दरअसल लोग जब डॉक्टर के पास पहुँचते हैं वह अपनी सेहत के बारे में 

ज्यादा सचेत और व्यग्र व्(बे -चैन )हो जाते हैं .वाईट कोट को देखके ही वह दवाब में आ जाते हैं .डॉ जोशी इसे एक जैवरासायनिक प्रतिक्रिया कहते हैं .स्ट्रेस और एंगजायटी (तनाव और तात्कालिक तद्जन्य बे -चैनी )हारमोन catecholamines के स्तर को बढ़ा देती है .यही वह हारमोन है जो हमारी 

अधिवृक्क ग्रंथि (अडरीनल ग्लेंड)तनाव के वक्त स्रावित करती है .यही 

अतिरिक्त स्राव ब्लड प्रेशर को बढ़ा देता है .

हालाकि बकौल डॉ अनूप मिश्रा इसे आसानी से बे -असर (उदासीन ,न्यूट्रल )किया जा सकता है .जांच कराने आये व्यक्ति को जांच से पहले आराम से पांच सात मिनट कुर्सी पर बैठे रहने के लिए कहा जाना चाहिए वह भी इस तरह की उसके  पाँव जमीन का स्पर्श करते रहें .तथा हाथ टेक लिए रहें दिल  के लेवल पर .

केफीन तथा स्मोकिंग का सेवन  जांच से कमसे कम ३ ० मिनिट पहले तक न करें .
The medical advise  now is to have at least two -three BP readings before ruling that the pressure is indeed high and starting medication (बेहतर हो यह जांच एक पखवाड़े में एक ही बार हो ,लगातार तीन पखवाड़े हो एक के बाद एक बोले तो हर चौदह -पंद्रह दिन बाद यानी महीने में दो बार ).कुल मिलाके तीन बार .
"The only exception would be if the patient's first visit BP is very high ,"says Dr Mishra .

The Dyke University study had ,in fact said that repeated measurements should be taken at home to get an accurate picture of BP control than a single reading in a doctor's office ."In fact ,we now order an ambulatory blood pressure reading for some patients ,"points out Dr Joshi .The patient has to walk around with a tiny machine that records various readings over a 2 4 -hour period.


तकरीबन तेरह करोड़ नब्बे लाख भारतीय उच्च रक्त चाप की गिरिफ्त में हैं .माहिर लगातार इस दबे पाँव आने वाली महामारी की ओर  हमारा ध्यान आकृष्ठ कर रहें हैं .खासकर ग्रामीण अंचलों में इसका तब तक इल्म ही नहीं होता है जब तक या  तो  यह  हाइपरटेंशन किसी अंग ही को न ले बैठे या फिर वह पूरी क्षमता से काम न कर पाए .

इस बरस का प्रतिपाद्य(विषय वस्तु ) विश्वस्वास्थ्य संगठन ने उच्चरक्त चाप का इलाज़ न हो पाने पर इससे  हमारे दिल ,दिमाग और गुर्दों के लिए  पैदा  होने वाले खतरों को बनाया है .दूसरे  छोर पर डॉ के पास पहुँचने पर अपने बारे में ज्यादा सोचने  चिंता करने से भी  हमारा रक्त चाप  बढ़ जाता है .इसे ही कहते हैं -वाईट कोट हाइपरटेंशन .

उच्चरक्त चाप का निदान न होने के बारे में पहले भी काफी लिखा जा चुका है लोग अक्सर इस सायलेंट किलर से अनजान बने रह जाते हैं और यह अपना काम चुपके से कर जाता है लेकिन यह पहली मर्तबा हुआ है चिकित्सा जगत के माहिरों ने  इसकी ओवरडायग्नोसिस (ज़रुरत से ज्या रोग निदान होने )फिर गैर ज़रूरी इलाज़ होने के बारे में भी दो टूक अपने विचार रखे हैं .ओवरडायग्नोसिस के अपने खतरे हैं .

The reaction to the white coat -awarded a medical nomenclature as the 'white -coat affect ( hypertension )-creates a huge increase in BP readings ."Many patients will have high blood pressure when visiting their doctor's office ,"says Dr Anoop Mishra ,who heads the department of diabetes and metabolic diseases in Fortis Hospitals ,Delhi .

बकौल स्रावीविज्ञान के माहिर डॉ शशांक जोशी (लीलावती अस्पताल ,मुंबई )तकरीबन ३ ० % मरीज़ जो अस्पताल पहुँचते हैं डॉ को देखकर चिंता से वाईट कोट इफेक्ट से असर ग्रस्त हो जाते हैं डॉ को देखा और इनका रक्त चाप बढ़ा .

अमरीका के  ड्यूक विश्वविद्यालय में माहिरों की एक टीम ने बाकायदा इस पूरी तरह समझ न आने वाली सचाई(वाईट कोट इफेक्ट  ) का उच्च रक्त चाप के प्रबंधन के मुताल्लिक (सन्दर्भ में )व्यापक अध्ययन किया है .
In the study ,published in the Annals of Internal Medicine ,BP readings taken in doctors' offices were consistently higher than taken at home or in a research setting .The study concluded that the white -coat effect was responsible for patient over -treatment .

भारत में जहां औसतन हरेक  पांच में से एक किसी किसी शहर में चार में से एक व्यक्ति उच्चरक्त चाप से दो चार हो रहा है -वाईट कोट इफेक्ट की बाकायदा शिनाख्त (निशान  देही ,पहचान )होनी चाहिए .

"Piolts often have a higher BP reading at their aviation company doctor's clinic .But when they are sent to us for a re-evaluation ,the pressure is lower ,"says cardiologist Ganesh Kumar with LH Hiranandani Hospital in Mumbai .

सेवा नियुक्ति के बाद लेकिन सेवा  ज्वाइन करने से पहले भी मुलाज़िमों के साथ हेल्थ चेक अप्स  के दौरान ऐसा ही होता है .

आखिर यह वाईट कोट इफेक्ट प्रेशर इतना ज्यादा क्यों होता है ,उत्तर पढ़िए अगली किश्त में .








(समाप्त )

सन्दर्भ -सामिग्री :-FEELING THE PRESSURE /MY HEALTH My Life/SUNDAY TIMES OF INDIA ,MUMBAI ,APRIL 7 ,2013 P-19




7 टिप्‍पणियां:

सदा ने कहा…

बहुत सही कहा आपने ...

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

उम्दा,जानकारी देती प्रस्तुति !!!
अगली पोस्ट के इन्तजार में,,,,,

recent post : भूल जाते है लोग,

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

sahmat hoon ......kuch to paristhitiyaan se hi ghabra jaate hain .....

सतीश सक्सेना ने कहा…

व्हाईट कोट इफैक्ट !!
नयी जानकारी मिलू वीरू भाई !
आभार आपका !

Rajendra Kumar ने कहा…

डॉक्टर के सामने उनके सफेद कोट का इफेक्ट तो मरीज पर पड़ता ही है.बहुत ही उपयोगी जानकारी की प्रस्तुती.हमारी सोंच का इफेक्ट हमारे ब्लड प्रेशर पर ज्याद पड़ता है.

Anita ने कहा…

कुछ लोग तो डॉ के पास पहुंच कर निश्चिंत हो जाते हैं..कहते हैं आधा रोग तो ऐसे ही दूर हो जाता है..

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सफ़ेद कोट का असर ...
इसके बारे में नहीं पता था ... वैसे डाक्टर सामने आ जाए बिमारी में तो हिम्मत बंध जाती है ...
राम राम जी ...