बुधवार, 17 अप्रैल 2013

Kids averse to wearing glasses ,parental apathy makes it worse

AN EYE -OPENER FOR PARENTS(दूसरी किश्त )

नेत्र दोषों का दीर्घावधि तक समाधान न करा पाने का परिणाम बड़ा संतापकारी सिद्ध हो सकता है यही कहना है डॉ वंदना जैन का .आप Cornea and refractive surgeon हैं .इस अध्ययन की मुख्य अन्वेषणकरता भी रहीं हैं आप .

बकौल आपके जीवन के प्रथम १  १ वर्ष बच्चे के जीवन में आँख के विकास में बड़े महत्वपूर्ण होते हैं .इस दरमियान नेत्र दोष होने पर refractive errors मौजूद रहने पर यदि समाधान कारी उपाय नहीं अपनाए जाते हैं तब बच्चे की बीनाई (vision ,नजर )मुकम्मिल तौर पर भी कमज़ोर पड़ सकती है .

कुछ माँ बाप यह सोचकर बच्चों को नेत्र रोगों के माहिर के पास लाते हैं कि यह पढ़ाई से बचने के लिए नौटंकी कर रहा है बहानेबाजी कर रहा है .आदर्श बात  तो यह है माँ बाप को नेत्र जांच पर भी उतनी ही तवज्जो देते रहना चाहिए जितना की टीकाकरण ,पोषण और सांस्कृतिक गतिविधियों पर .

कोई सीधा उत्तर और वजह दिखलाई नहीं दे रही है माहिरों को बच्चों में  

इन बढ़ती  नेत्र समस्याओं की 

बेशक ऐसे कोई अध्ययन अभी नहीं हुए हैं भारत में जो गेजेट्स के बढ़ते चलन और आँख के अप -वर्तन संबंधी  दोषों में ,निकट दृष्टि और दूर दृष्टि दोषों में परस्पर किसी सीधे सम्बन्ध की पुष्टि करते हों .लेकिन इन गेजेट्स के दिनानुदिन बढ़ते चलन को नज़रंदाज़ भी नहीं किया जा सकता .

Surgeon and member of the Bombay Ophthalmogists 'Association (नेत्र रोगों के माहिरों के संघ के एक सदस्य और शल्यक )डॉ एस एस भट्ट कहते हैं -इस बात की भी छानबीन की जानी चाहिए कहीं जन्म से(जन्मना ही ) ही तो अब ज्यादा बच्चे नेत्र सम्बन्धी समस्याएं लिए नहीं आ रहे हैं .

"Use of gadgets may strain the eyes ,but not necessarily give rise to refractive errors .It could also be due to genetic reasons and better diagnosis contributing to the rising trend ."

बकौल भट्ट गेजेट्स का इस्तेमाल आँख को दवाब में तो ला सकता है लेकिन अपवर्तन समस्याएं ही पैदा करे यह ज़रूरी नहीं है खानदानी (आनुवंशिक )वजहों के अलावा अब रोग निदान के बेहतर साधनों का रहना भी बालकों में बढ़ते नेत्र रोगों के दिखलाई देने (नेत्र सम्बन्धी समस्याओं )की वजह हो सकता है .

जो भी हो ज़रूरी है :

स्कूल में नेत्र जांच की बेहतर व्यवस्था समय समय पर उपलब्ध करवाई जाए .घर के लोगों में भी जागरूकता का होना ज़रूरी है .बच्चों में इन समस्याओं के चलते पढ़ाई लिखाई में अच्छा न कर पाने की वजह से हीन भावना पनप सकती है आत्म विश्वास की कमी भी .व्यक्तित्व विकास सम्बन्धी अन्य समस्याएं भी सर उठा सकती हैं .यह कहना है नेत्र  रोगों की माहिरा डॉ प्राची अगाशे का .आप इस छानबीन का एक सक्रीय हिस्सा रहीं हैं .

"The child may not get to see the black board and play games ,or may have difficulty coping with writing ,"she said ."But all this can be avoided by wearing a simple pair of glasses."

(ज़ारी )


8 टिप्‍पणियां:

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

सटीक जानकारी |

कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
Tamashaezindagi FB Page

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आँख और दाँत, नियमित जाँच होनी चाहिये, नहीं तो लापरवाही बरतते हैं बच्चे भी।

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

जांच तो बच्चों की समय २ पर कराते रहना चाहिए ,आभार,
RECENT POST : क्यूँ चुप हो कुछ बोलो श्वेता.

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

समय रहते ध्यान रखा जाये, यही हल है, अच्छी जानकारी दी

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

सुन्दर जानकारी

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

सुन्दर जानकारी

Anita ने कहा…

आदर्श बात तो यह है माँ बाप को नेत्र जांच पर भी उतनी ही तवज्जो देते रहना चाहिए जितना की टीकाकरण ,पोषण और सांस्कृतिक गतिविधियों पर .

बहुत सही कहा है..

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

upyogi jaankari ....