शनिवार, 20 अप्रैल 2013

Antibiotics find dips ,only 1 developed sine 2010

यह बेहद की चिंता और समझ में न आने वाली बात है कि २ ० १ ० के बाद से अब तक सिर्फ  एक ही नया एंटीबायोटिक तैयार किया जा सका है जबकि दिनानुदिन कई जीवाणु इनके खिलाफ प्रतिरोध खड़ा  करके इन्हें निष्प्रभावी ,बे -असर बना चुकें हैं .

यकीन मानिए २ ० १ ० में ही Infectious Diseases Society of America (IDSA)ने 10 X 20 अभियान छेड़ा था .कहने की ज़रुरत नहीं दवा रोधी जीवाणुओं के पनपने के इस दौर में जब कभी भी गाहे बा -गाहे सुपरबग की चर्चा जोर पकड़ लेती है आज अभिनव प्रोद्योगिकी से तैयार नायाब जीवाणु -रोधी दवाओं की पहले से कहीं ज्यादा ज़रूरत पैदा हो गई है .

जबकि IDSA ने कुल मिलाके 2 0 1 0 के बाद से अब तक सात नै दवाओं की ही  शिनाख्त (निशान देही ) की है जो दवा रोधी जीवाणुओं से पार पाने की क्षमता लिए होंगे.ये अभी विकास के बहुमंजिला चरण में हैं .समझा जाता है ये दवाएं Multidrug -resistant gram -negative bacilli (GNB)जो इस दौर की महती आवश्यकता हैं इन जीवाणुओं का खात्मा कर सकेंगी .

ऐसा लगता है नौ नै दवाओं को २ ० २ ० तक स्वीकृति मिलने में आने वाली बाधाओं से पार पाना उतना आसान नहीं होगा .दवाओं को गहन परीक्षणों ,क्लिनिकल ट्रायल्स के विभिन्न चरणों  से गुजरना पड़ता है खाद्य एवं दवा संस्था की मंजूरी से पहले .

यही कहना है हेनरी चैम्बर्स का .आप IDSA 's Antimicrobial Resistance Committee के मुखिया हैं .

Helen Boucher from IDSA said :We're losing ground because we are not developing new drugs in pace with superbugs ' ability to develop resistance to them .

We are on the precipice of returning to the dark days before antibotics enabled safer surgery .

ज़ाहिर है तू डाल डाल मैं पात पात की दौड़ में हमारे प्रयास पिछड़ गए हैं सुपरबग आगे निकल गए हैं जीवाणु रोधी दवाओं को बे -असर साबित करने में .

कहीं हम एक मुश्किल दौर में न खिसक आयें वैसा दौर जो पेंसिलिन से पहले का दौर था जब शल्य उतना सुरक्षित नहीं था .आज तो पूर्व और उत्तर शल्य संक्रमण से पार पाने के लिए हमारे पास जैसे भी हैं जीवाणु रोधी हैं तो तब तो कुछ भी नहीं था .

सन्दर्भ -सामिग्री :- Antibiotics find dips ,only 1 developed since 2 0 10 /THE TIMES OF INDIA ,MUMBAI ,APRIL 19 ,2013 P19


सेहतनामा 

(१)दालचीनी का सेवन (cinnamon )दिल की सेहत को नुकसान पहुंचाने वाली खून में घुली चर्बी की एक किस्म bad cholesterol को कम करता है .अलावा इसके इसका नियमित सेवन खून में तैरती शक्कर के स्तर को भी कम करता है .शरीर की इन्सुलिन पैदा करने की क्षमता को भी बढ़ाता  है  .

(२ )अनानास (Pineapple )मसूढ़ों (Gums )को मजबूती प्रदान करता है ,जोड़ों के दर्द की उग्रता का शमन करता है ,जुकाम खांसी से बचाव करता है (मीठा अनानास ही खाएं ).

(३ )DEPRESSION RISK FACTOR COULD BE CONTAGIOUS

A particular style of thinking that makes people vulnearble to depression can actually "rub off "on others ,increasing their symptoms of depression six months later ,a study has found .This can be used to predict which individuals are likely to experience a depressive episode in the future.

एक ख़ास तरह की सोच (आम तौर पर नकारात्मक ,खुद को अनउपयोगी मान लेना ,जीवन को निस्सार निरर्थक मान  लेना ,छल फरेब से भरा मान के बैठ जाना )जो लोगों को अवसाद की कगार पे ले आती है छूतहा होती है ,अन्य लोग भी जो ऐसी सोच रखने वाले व्यक्ति के   संपर्क में आते हैं छ :महीने बाद अवसाद के उग्र (बढ़े हुए )लक्षणों से घिर सकते हैं .इसीलिए कहते हैं संग का रंग चढ़ता है .खरबूजे को देखके खरबूजा रंग बदलता है .

इस प्रवृत्ति को भांप कर यह प्रागुक्ति (भविष्य कथन )की जा सकती है ,कौन निकट भविष्य में अवसाद की चपेट में  आ सकता है .

(4)Smoking tobacco through a Hookah ,popular mostly among the college crowd ,is not a harmless alternative to cigarettes ,scientists warn .In a new study by University of California ,San Francisco ,researchers measuring chemicals in the blood and urine concluded that hookah smoke contains a different -but still harmful -mix of toxins .Peyton Jacob III ,a UCSF research chemist ,and Neal Benowitz  , a UCSF tobacco researcher said hookah use exposes smokers to higher levels of carbon monoxide ,especially hazardous to those with heart or respiratory conditions ,and to higher levels of benzene ,long associated with leukaemia.

हुक्का बार एक नया ट्रेंड बन चला है छात्रों में .लेकिन यह सिगरेट स्मोकिंग का सुरक्षित विकल्प नहीं है .केलिफोर्निया विश्वविद्यालय ,सैन -फ्रांसिसको कैम्पस के साइंसदानों द्वारा किये गए एक नवीन अध्ययन     में साइंसदानों ने हुक्का सेवियों के रक्त और मूत्र में मौजूद रसायनों की जांच माप के बाद बतलाया है ,इनमें जुदा किस्म का विष का मिश्र मौजूद है .

जो लोग हुक्का सेवी हैं वह ज्यादा कार्बनमोनोऑक्साइड गैस का अपने अनजाने ही सेवन कर लेते हैं .दिल और श्वसन सम्बन्धी समस्याओं से ग्रस्त लोगों के लिए हुक्के का सेवन बेहद का खतरनाक साबित होता है .अलावा इसके हुक्के के धुएं में बेंजीन का स्तर बढ़ा हुआ  रहता है जिसका रक्त कैंसर से सम्बन्ध जोड़ा जाता रहा है .

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6 टिप्‍पणियां:

पुरुषोत्तम पाण्डेय ने कहा…

हमेशा की तरह ही बहुत संग्रहणीय व ग्राह्य जानकारिया आप प्रस्तुत करते हैं.आपकी जितनी तारीफ़ की जाये कम है.
सेहतनामे में तेजपात के बारे में आपने लिखा है कि ये बैड क्लोरोस्त्रोल कम करता है,ये बिलकुल सही है, चार वर्ष पूर्व ये बात 'भाव प्रकाश ग्रन्थ में भी मैंने पढ़ी थी कि ह्रदय रोगों में दालचीनी के पेड़ के छिलके व पत्ते जिन्हें तेजपात कहा जाता है बहुत गुणकारी है. अस्तु मैंने पहाड़ से एक पेड़ मंगवाकर अपने आँगन में लगाया जो अब बृक्ष बन गया है.

Aziz Jaunpuri ने कहा…

सर जी , बहुआयामी ,ज्ञानवर्धक एवम जीवन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष स्वास्थ्य से जुडी बेहतरीन प्रस्तुति

रविकर ने कहा…

सटीक प्रस्तुति-

Vikesh Badola ने कहा…

सेहत बुलेटिन घर करता जा रहा है।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

ज्ञानवर्द्धक

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

नये एंटीबायोटिक का एडवांसड रूप नही खोजा जाना निश्चित ही चिंता का विषय है, बहुत ही उपयोगी टिप्स.
रामराम.