शनिवार, 3 दिसंबर 2011

कैंसर भी पैदा कर सकता है सन स्क्रीन .

कैंसर भी पैदा कर सकता है सन स्क्रीन
(Sunscreen may be cancerous:short cuts/TOI,MUMBAI ,DEC2,2011/P17).
एक धात्विक यौगिक अकसर उपभोक्ता सामिग्री ,उपभोक्ता उत्पादों और सन स्क्रीन्स लोशनों में भी पाया जाता है जो कैंसर पैदा कर सकता है .इस यौगिक का नाम है जिंक ऑक्साइड जिसका स्तेमाल नुकसान दायक परा -बैंजनी विकिरण (Ultra-violet radiations ) की ज़ज्बी (अवशोषण )के लिए किया जाता है .लेकिन जब यह नेनो -आकारीय कणों में (आणविक या और भी अव -परमाणुविक आकारों)में टूट जाता हैं तब यह घात लगाके मानवीय कोशाओं में दाखिल हो जाता है .फलस्वरूप यह उपभोक्ता का DNA नष्ट कर देता है damage कर देता है .
राम राम भाई !राम राम भाई !
मुंबई दिसंबर ३ ,२०११
नए गुल खिलाता है रोग निदान के अभाव में तपेदिक .का लौटना .
(Untreated TB causes fatal fungal infection)
तकरीबन दस लाख ऐसे मरीज़ जिन्हें बा -कायदा तपेदिक रोग होने की नैदानिक पुष्टि हो जाती है आगे चलके एक ला -इलाज़ लेकिन प्रबंधन योग्य फंफूंद संक्रमण (fungal infection )की चपेट में आजातें हैं .इसे तपेदिक का लौटना समझ लिया जाता है जबकि यह एक फफून्दीय संक्रमण होता है जिसका रोग निदान ही नहीं हो पाता है .और इसीलिए यह चुपके चुपके बढ़ता रहता है और बे -काबू होके ला -इलाज़ हो जाता है .
इस तथ्य का खुलासा हालिया प्रकाशित विश्व स्वास्थ्य संगठन की उस रिपोर्ट में हुआ है जिसे प्रस्तुत किया है मानचेस्टर तथा टोरोंटो विश्वविद्यालयों के रिसर्चरों ने .बकौल शोध कर्ताओं की इस टीम के इस बीमारी (फंगल इन्फेक्शन )के एक्स -रे फीचर्स तथा आम लक्षण तपेदिक से इतने मिलेजुले से होतें हैं कि अकसर माहिर इसका गलत रोगनिदान कर जातें हैं .तथा गलत इलाज़ भी शुरु कर देतें हैं .फलस्वरूप सैंकड़ों लोग बे -मौत मारे जातें हैं .
इस फंगल इन्फेक्शन का पूरा नाम है Chronic pulmonary aspergillosis (CPA) .यह हमारे रोग प्रति -रोधी तंत्र से बचके निकल जाता है चकमा दे जाता है इस रोग निरोधी तंत्र को फेफड़ों में जबकि इस की दस्तक रहती है .ऐसे में यह घात लगाके चुपके चुपके बढ़ता रहता है और बरसों बरस इसका निदान ही नहीं हो पाता है .जब तक कि यकायक इसके लक्षणों के रूप में तौल में गिरावट ,बेहद की थकान ,कफ़ का निरंतर हमला होना कफिंग और रक्त स्राव का प्रगटीकरण नहीं होने लगता .
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है ऐसे में कामयाबी के साथ इलाज़ की संभावना क्षीण हो जाती है .लिहाजा ५०%मरीजों की इसके साथ बने रहने की संभावना पांच साल से ज्यादा नहीं रह जाती है .
भारत अफ्रीका और चीन के लिए इस रिसर्च के गहरे अर्थ हैं जहां CPA का रोग निदान न हो पाना एक आम बात हो गई है .पश्चिमी देशों में ये हालत नहीं है .
बेशक १९९५-२००८ की अवधि में तीन करोड़ साठ लाख लोगों को तपेदिक से मुक्ति दिलवाई गई लेकिन इसी दरमियान नब्बे लाख नए मामले भी तपेदिक के सामने आये .जिन लोगों को दीर्घावधि यह समस्या बनी रहती है वे चिंता ज़रूर पैदा करतें हैं स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अपनों के लिए यकसां .
सन्दर्भ- सामिग्री :TIMES TRENDS/THE TIMES OF INDIA ,MUMBAI,DEC3,2011/p19.

3 टिप्‍पणियां:

Rajeev Panchhi ने कहा…

Congrats on writing such a informative post!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

धूप में निकला न करो...

mahendra verma ने कहा…

स्वास्थ्य संबंधी उपयोगी जानकारी प्राप्त हुई।
आभार आपका।