रविवार, 11 दिसंबर 2011

घुप्प अँधेरे में छ :से लेकर आठ घंटा सोना क्यों ज़रूरी है ?

घुप्प अँधेरे में छ :से लेकर आठ घंटा सोना क्यों ज़रूरी है ?
(The Truth About .........SLEEPING AT NIGHT.TAKE NOTE :Sleeping for six to eight hours in complete darkness is important for good health and looking young )/BODY AND SOUL:BOMBAY TIMES/THE TIMES OF INDIA P11.
जब बिजली नहीं थी लोग सांझ ढले सूर्यास्त के बाद ही सो जाते थे और पौ फटते ही उठ जाते थे .मानों सूरज एक घडी हो .इसका फायदा यह होता था लोग पर्याप्त और घोड़े बेचके गहरी और चैन की नींद लेलेते थे .
आदमी ही क्यों बदलती ऋतुओं से साफ़ से संकेत तो पशु पक्षी भी ग्रहण कर अपना व्यवहार तबदील करलेतें हैं .उनका प्रजनन ,शीतकालीन निद्रा (Hybernation ),देशाटन महाद्वीपों के पार का सफ़र सब कुछ ऋतू चक्र से संचालित होता आया है .रोशनी और अँधेरे के लम्बाते साए ,Patterns of light and dark से एनिमल्स ऋतुओं के बदलने की आहट भांप लेते हैं .
"समय करे नर क्या करे समय समय की बात ,किसी समय के दिन बड़े ,किसी समय की रात ." प्राणि मात्र समझता बूझता है इन पंक्तियों का सार .पशु पक्षी इसका अपवाद नहीं नियम हैं .मदद करता है प्राणियों का स्रावी तंत्र (Endocrine system),हारमोन मिलेटोनिंन का स्राव .पतझड़ की अवधि में जब दिन की अवधि घटने लगती है मिलेटोनिंन उत्पादन प्राणियों में कुदरती तौर पर बढ़ जाता है क्योंकि जिस अनुपात में दिन छोटा होने लगता है रातें लम्बी (बड़ी )होने लगतीं हैं .ऐसा न हो तो प्राणि शीत निद्रा में न जा पाएं .शीत निद्रा को बनाए रहता है यही स्राव .
लेकिन जब spring (वसत ऋतु ) में दिन बड़े होने लगतें हैं पीयूष ग्रंथि (Pineal gland )मेलाटोनिन का स्राव कमतर करने लगती है .इसका भौतिक गतिविधियों पर भी स्पष्ट प्रभाव पड़ता है .लेकिन अतिउद्योगीकृत राष्ट्रों में (पहली दुनिया जिसे आज कहा जाता है नोर्थ कहा जाता है ,विकसित उद्योगिक सभ्यता कहा समझा जाता है )बिजली के बल्ब ने दिन की अवधि १२ से बढ़ाकर २४ घंटा ही कर दी है .और इन्हीं राष्ट्रों में अधिकाधिक लोग आज नींद से महरूम हैं वंचित हैं .यही मेह्रूमियत न सिर्फ मानसिक बल्कि भौतिक कायिक क्षमताओं में भी दोष या दुर्बलता ला रही है .रात को मिटाने का प्रयास कृत्रिम तौर पर रात को सीमित पहर में समेटने की कोशिश अपनी कीमत भी वसूल रही है .
मेलाटोनिन हमारी पीयूष ग्रंथि द्वारा तैयार किया जाने वाला एक कुदरती हारमोन है .दिन के उजाले में हमारी पीयूष ग्रंथि निष्क्रिय बनी रहती है . सूर्यास्त के बाद अँधेरी की चादर के तनते ही पीयूष ग्रंथि सक्रिय हो अपना काम करना शुरु कर देती है मेलाटोनिन का स्राव करती है जो हमारे रक्त संचरण में चला आता है .इसी लिए मेलाटोनिन को कभी कभार 'Dracula of hormones'कह दिया जाता है क्योंकि इसकी दस्तक अँधेरे में ही पैदा होती है .
पौ फटते ही जब हमारा सामना प्रभात से उजाले से होता है मेलाटोनिन का उत्पादन बंद हो जाता है तथा अन्य हारमोनों का स्राव हमारा स्रावी तंत्र करने लगता है और हम दैनंदिन कामों में लग खप जातें हैं .यह रोजमर्रा की लय ताल रिदम ही हमारी भौतिक कायिक परिस्थिति , सामर्थ्य ,बौद्धिक क्षमताओं एवं संवेगात्मक रागात्मक स्वास्थ्य को बनाए रहती है .
पीयूष ग्रंथि और उससे स्रावित मेलाटोनिन हमारे प्राथमिक टाइम कीपर्स पहर पल के नियंता हैं ,इन्हीं के पास है समय के बीतने का ब्योरा .दिन रात के पहर की इत्तला ऋतुओं का लेखा दिमाग और काया की प्रावस्था का विवरण .इस कुदरती घडी में विक्षोभ इस रिदम में तबदीली करना शरीर को ओवर टाइम में झोंकना है .जीवन की लयताल को तोड़ना है .(काल सेंटर्स ,दिन रात की निरंतर बदलती पाली यही काम कर रहीं हैं .)..
नतीज़न कुदरत के साथ संतुलन टूट रहा है सक्षमता छीज रही है .
आवश्यक रसायनों का परस्पर संतुलन टूट रहा है उमरिया घट रही है .बुढापा लम्बी और जल्दी पींग बढा रहा है शरीर को आराम नहीं थकान की भरपाई नहीं .शरीर तो ओवर टाइम काम कर रहा है .बंधक बना हुआ है हालातों का .
मेलाटोनिन हमारे अन्दर की बात जानता है आंतरिक प्रक्रियाओं को असरग्रस्त करता है शरीर तंत्र के हिस्सों को प्रणालियों को परस्पर संयोजन बनाए रखने में मिलजुलके काम करने में मदद करता है .इस आंतरिक व्यवस्था और रचाव के बिखर जाने पर शरीर अनेक रोगों के लिए खुली सराय बनके रह जाता है क्योंकि हमारी नींद न सिर्फ हमारी मानसिक चार्जिंग करती है हमें मानसिक ऊर्जा से भर्ती है शरीर को भी फुर्ती चुस्ती से भर्ती है .स्वस्थ रखती है नीरोग रखती है .सोते वक्त भी तन और मन जोरशोर से कार्य रत रहतें हैं खोया हुआ संतुलन पुनर -प्राप्त करने में प्रयासरत रहतें हैं .
इम्युनिटी हमें यही संतुलन प्रदान करता है .समुचित और मान्य स्तर पर हमारे रक्त चाप को भी यही अहर्निश काम बनाए रहता है तन और मन का इसके संतुलन का .याददाश्त को बनाए रखने में भी नींद विधाई भूमिका में रहती है.
देर रात तक काम करते रहने वालों में मेलाटोनिन पर्याप्त स्तर हासिल नहीं कर पाता .वजह हमने रात की अवधि को क्रत्रिम रूप से सीमित करके अँधेरे को उजाले से भर दिया है .लेदेके एक विंडो छोड़ी है रात के नाम पर मुंबई की लाइफ लाइन लोकल्स की तरह .
इसीलिए बेड रूम में घुप्प अन्धेरा ज़रूरी है .खिड़की से आती मद्धिम रौशनी ,रौशनी का टुकडा ,बंद लेकिन रोशन कमरों से रिश्ता प्रकाश भी पर्याप्त मेलाटोनिन बनने में खलल पैदा करता है इसलिए सोने के लिए अन्धेरा चाहिए नाईट लेम्प एक विक्षोभ है .उजाला विच्छिन्न कर देता है मेलाटोनिन निर्माण की प्रक्रिया को इसीलिए छ :से आठा घंटा की निर्बाध नींद ज़रूरी है घुप्प अँधेरे में .

8 टिप्‍पणियां:

यादें....ashok saluja . ने कहा…

कितने कमाल की जानकारियां जुटा रहें हैं आप ...आज की पीढ़ी के लिए कोई इनको परखे तो जाने इनके फ़ायदे..पर हाय रे ..आज का समय?
पर लगे रहो वीरुभाई.....
राम-राम !
आभार!

"जाटदेवता" संदीप पवाँर ने कहा…

वीरु जी, राम-राम लेख में बिल्कुल सही बताया है

Rashmi Swaroop ने कहा…

Bahut sahi.. mai to paryapt soti hoon..! Tabhi baki kaamo par concentrate kar pati hoon.
Significant post.

मनोज कुमार ने कहा…

इसके बारे में जानकारी नहीं थी। आभार आपका।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

मेलाटोनिन का बहुत सही विश्लेषण किया है ।
अच्छी जानकारी ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हमेशा से यह अनुभव तो होता था कि दिन की नींद में वह बात नहीं है जो रात की नींद में है। आपने तार्किक ढंग से समझा दिया आज।

Rajeev Panchhi ने कहा…

Really very informative information !
Thanks!

डॅा वेदप्रकाश श्योराण ने कहा…

इसीलिए बेड रूम में घुप्प अन्धेरा ज़रूरी है