सोमवार, 18 मार्च 2013

जरा सी कहीं सेकुलर बे -बसी है -डॉ वागीश मेहता

जरा सी कहीं सेकुलर बे -बसी है -डॉ वागीश मेहता


अगर नाम भारत ,

तो गारत  ही गारत .

जो है नाम इंडिया ,तो सोने की हंडिया .


फिर तो लूटो -लुटाओ ,

सभी मिलके खाओ .

प्रजातंत्र अपना अनूठा ,दिखादो सभी को अंगूठा .


गो पाकीज़ा ,है तो कमल .

भकुए तो कहतें हैं कमुनल .

ये जो कमाल -ए -कमाल ,कितना है जाहो -जलाल .


ये जो मानव -अधिकारं ,

खाओ गोली यारं .

पर ,खुद चलानी नहीं ,दोस्ती हमको गंवानी नहीं .


समाचारकुल का यह दीपक ,

कलम मुखबिरी में है कामिल .

यादों में है ख़ूब पाकी ,लाहौरी है पक्का कज़ाकी .

 बन्दा है पप्पट खिलौना ,

ना ज्यादा लम्बा ,न बौना .

लल्चप्रा है ये बे -गैरत ,अपने भी करते हैं हैरत .

घुसा चोर है ,घर के अन्दर ,

क्यों बाहर उठाते बवंडर .

भोंपू तो बोले कड़ी चौकसी है ,ज़रा सी कहीं सेकुलर बे -बसी है .

प्रस्तुति :वीरेंद्र शर्मा (वीरुभाई )

जाहो -जलाल =शानो -शौकत ,

कामिल =माहिर ,एक्सपर्ट

कज़ाकी  =शातिर बदमाश



12 टिप्‍पणियां:

Rajendra Kumar ने कहा…

बहुत ही सार्थक प्रस्तुति शेयर किये ,आभार.

रविकर ने कहा…

बहुत बहुत बहुत बढ़िया-
आदरणीय आभार

Sunitamohan ने कहा…

bahut arthpurn aur mazedar......!!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वाह ... बहुत ही प्रभावी ...
सटीक व्यंग है ... आज की राजनीति ओर माहोल पर ....
बेबाक कहने का अंदाज़ ओर चुभती हुई बात को सीधे कहना खासियत है वागीश जी की ...

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।

Vikesh Badola ने कहा…

विचारणीय।

RAHUL- DIL SE........ ने कहा…

कुछ समझ से परे ....

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति !!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सन्नाट व्यंग..

madhu singh ने कहा…

बहुत खूब सर जी ;कुछ नई विधा के साथ
सुन्दर और सार्थक और सटीक कटाक्ष

Aziz Jaunpuri ने कहा…

सुन्दर बहुत बढ़िया व्यंग

Arvind Mishra ने कहा…

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