रविवार, 24 सितंबर 2017

कहो दिल खोलके जो भी कहो अपनों से कहना है

अभी से थक के बैठे हो अभी तो दूर जाना है ,

वही किस्से  पुराने हैं उन्हें क्या आज़माना है।

वो अपनी राह जाते हैं तुम्हें अपनी पे रहना है ,

तुम्हें क्या उनसे लेना है तुम्हे क्या उनको देना है।

न कुछ उनसे है अब कहना न कुछ उनसे  सुनना है।

कहो  दिल खोलके जो भी कहो अपनों से कहना है। 

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (25-09-2017) को
"माता के नवरात्र" (चर्चा अंक 2738)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'