रविवार, 18 अक्तूबर 2015

पहली बार दिखी हैं लाशें पहली बार बवाल हुए। पहली बार मरा है मोमिन पहली बार सवाल हुए।।

ये जो तिकड़म लगाके छद्म पुरूस्कार पा गए ,


पुरूस्कार लौटाई ने इनकी पोल खोल दी है

From a friends walll with thanks साहित्य पुरुस्कारो को लौटाने पर कवि की रचना ___

 हैं साहित्य मनीषी या फिर अपने हित के आदी हैं।

 राजघरानो के चमचे हैं,वैचारिक उन्मादी हैं।। 

दिल्ली दानव सी लगती है,जन्नत लगे कराची है।

 जिनकी कलम तवायफ़ बनकर दरबारों में नाची है।।

 डेढ़ साल में जिनको लगने लगा देश दंगाई है। 

पहली बार देश के अंदर नफरत दी दिखलायी है।।

 पहली बार दिखी हैं लाशें पहली बार बवाल हुए। 

पहली बार मरा है मोमिन पहली बार सवाल हुए।। 

नेहरू से नरसिम्हा तक भारत में शांति अनूठी थी । 

 पहली  बार खुली हैं आँखे,अब तक शायद फूटी थीं।।

 एक नयनतारा है जिसके नैना आज उदास हुए। 

जिसके मामा लाल जवाहर,जिसके रुतबे ख़ास हुए।।

 पच्चासी में पुरस्कार मिलते ही अम्बर झूल गयी।

 रकम दबा सरकारी,चौरासी के दंगे भूल गयी।। 

भुल्लर बड़े भुलक्कड़ निकले,व्यस्त रहे रंगरलियों में। 

मरते पंडित नज़र न आये काश्मीर की गलियों में।। 

अब अशोक जी शोक करे हैं,बिसहाडा के पंगो पर। 

आँखे इनकी नही खुली थी भागलपुर के दंगो पर।। 

आज दादरी की घटना पर सब के सब ही रोये हैं। 

जली गोधरा ट्रेन मगर तब चादर ताने सोये हैं।। 

छाती सारे पीट रहे हैं अखलाकों की चोटों पर।

 कायर बनकर मौन रहे जो दाऊद के विस्फोटों पर।।

 ना तो कवि,ना कथाकार,ना कोई शायर लगते हैं।

 मुझको ये आनंद भवन के नौकर चाकर लगते हैं।। 

दिनकर,प्रेमचंद,भूषण की जो चरणों की धूल नही। 

इनको कह दूं कलमकार,कर सकता ऐसी भूल नही।।

 चाटुकार,मौका परस्त हैं,कलम गहे खलनायक हैं। 

सरस्वती के पुत्र नही हैं,साहित्यिक नालायक हैं ।।��

जैश्रीकृष्णा !

2 टिप्‍पणियां:

kuldeep thakur ने कहा…

जय मां हाटेशवरी....
आप ने लिखा...
कुठ लोगों ने ही पढ़ा...
हमारा प्रयास है कि इसे सभी पढ़े...
इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना....
दिनांक 19/10/2015 को रचना के महत्वपूर्ण अंश के साथ....
चर्चा मंच[कुलदीप ठाकुर द्वारा प्रस्तुत चर्चा] पर... लिंक की जा रही है...
इस चर्चा में आप भी सादर आमंत्रित हैं...
टिप्पणियों के माध्यम से आप के सुझावों का स्वागत है....
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
कुलदीप ठाकुर...


रचना दीक्षित ने कहा…

कल ABP news पर बड़ी विस्तृत चर्च चल रही थी. उसमे ही मुनव्वर राना ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया. सवाल यह उठता है कि अगर वह चर्चा को देख कर पुरस्कार लौटना चाहते थे या पहले से तैय्यारी कर के आये थे.

मुझे तो लगता है की इस विषय में ढेठ राजनीति हो रही है वर्ना ऐसा कुछ विशेष घटित हुआ तो लगता नहीं. कविता एक दम प्रासंगिक है.