मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

साधना की पहली सीढ़ी श्रवण है। जब आप अच्छा सुन रहे होते हैं अच्छा स्टोर कर लेते हैं ,तब बेकार आपके अंदर से निकल जाता है

ब्रह्मनिष्ठ लोकपावना

ये वो लोग हैं ऋषि मुनि हैं  जिन्हें एक हज़ार बार गंगा पैदा करने की  सामर्थ्य प्राप्त है। इनके भरोसे ही मैं तुझे धरती पर भेज रहा हूँ। ये उद्बोधन था  शिव का गंगा को। गंगा तो पृथ्वी पर आना ही नहीं चाहती थी उसने भगीरथ से कहा भले तेरा तप बहुत बड़ा है पर ये मृत्युलोक के लोग मुझे गंदा करके छोड़ जाएंगे। शिव ने गंगा से कहा तू मैली हो ही नहीं सकती। जो  शिव के माथे  पर बैठ कर  भगवान विष्णु के चरणों का स्पर्श करके  निकली है जिसने ब्रह्मा जी के कमण्डलु और हाथ का स्पर्श किया है वह गंगा कैसे मैली   हो सकती है। शिव ने कहा देख मृत्यु लोक में नीचे झांककर देख यहां कैसे कैसे ब्रह्मनिष्ठ लोकपावना ऋषि मुनि भी हैं। भारद्वाज जब स्नान करने निकलते थे  गंगा सात कदम चलकर आती थी।

साधु  सन्यासियों के भरोसे ही गंगा धरती पर उतर  कर आईं  थीं। पांच गकार ऐसे हैं जो मनुष्य के लिए सेवन के योग्य हैं जिनके सेवन करने से सब कुछ मिल जाता है। ऋषि इन पांच (गुरु ,गौ गंगा ,गायत्री ,गीता ) का सेवन करते हैं। इन पांच गकारों के सेवन से मोद , मुक्ति ,और माधुर्य की तो प्राप्ति होती ही है बाकी सब कुछ भी मिल जाता है। हमारी संस्कृति केवल तीन शब्दों में मिल जाएगी। एक है तर्पण दूसरा है अर्पण और तीसरा है समर्पण।

तर्पयामि तर्पयामि। ये तरपन कौन करता है।

पितरों का तर्पण किया जाता है। जो गंगा किनारे होता  है या अन्य  तीर्थों पर भी किया जाता  है।भल्गु तीर्थ ,गया ,ब्रह्म कपाली आदि तीर्थों में  होगी तर्पण क्रिया। गंगा के जल में वह तरंगें  हैं ,   वह सामर्थ्य है जो हमें  पितरों से कनेक्ट कर देतीं  है। इस आशय के अनेक रिसर्चपेपर (शोधपत्र )आये हैं वहां (पश्चिम )के विश्विद्यालयों में प्रयोगों के बाद।  ये तर्पण की परम्परा बहुत वैज्ञानिक है ,इस सार्वभौम सत्य को स्थापित करती है तर्पण विधि। भारत के पास यह सबल वैज्ञानिक विधि है श्राद्ध विधि है पितरों से संपर्क करवाने की। ऐसा अब पश्चिम भी मानने लगा है।

अर्पण क्या है ?कुछ खाना पीना अर्पित करके ही हम कुछ खाते पीते हैं। कुछ अर्पण करके ही हम खाना पीना लेते हैं। तीसरा क्या है समर्पण। ये तीनों शब्द पश्चिम की संस्कृति में नहीं हैं। ये सारे उपदेश भरद्वाज ऋषि के आश्रम में मिले।विश्वामित्र से मिले। समर्पण (शब्द )एक बड़ी साधना है। उपदेशात्मक जीवन होना चाहिए हमारा। उपदेश के प्रति अरुचि नहीं होनी चाहिए। संत चलते फिरते ज्ञान मंदिर होते हैं। सत्संग औषधि है। संत वैद्य हैं। कुछ लोग कहतें हैं हमने सब कुछ सीख लिया। इससे बड़ी मूढ़ता कुछ और हो नहीं सकती। यहीं से हमारा पतन शुरू हो जाता है। गुरुओं के संग से जीवन जीने का सलीका मिलता है। विश्वामित्र के आश्रम में ये सारे के सारे उपदेश मिले। जिज्ञासु बने रहना। उपदेश लेते रहना। कैसे सेवन किया जाए संत का। संत औषधि हैं। कैसे ली जाए ये औषधि ?कुछ आसव हैं कुछ भस्म हैं कैसे ली जाएं ये ?गोली कैसे ली जाए कोई भी। यह ऋषि बतलायेगा। 

जब साइनायड जैसे पदार्थ में इतनी ताकत है कि इसका अल्पांश भी जिभ्या पे जाए तो प्राणों का संतुलन लड़खड़ा जाता है। जिभ्या बोल नहीं पाती ,अकड़ जाती है ,तब संत से प्राप्त ज्ञान में क्या ताकत नहीं होगी।एक छोटी सी गोली आपको नींद में ले आती है। जब विषैली वस्तु ऐसी हैं तब ज्ञान में भी कोई ताकत तो ज़रूर होगी।

 राम जंगल में निकल पड़े। एक मुद्दा उनके सामने ये है कहाँ रहें कैसे रहें और किस दिशा में रहें ?ये  घर कैसा बनाये।
ये जो चार दिशाएं हैं और इनके अंदर जो चार दिशाएं हैं वे हमारे औरा हमारे तेज और हमारे भीतर के विचारों का हमारी ऊर्जा का संतुलन बनाके रखतीं है।उत्तर और पूरब के बीच की  दिशा जल की दिशा है।  पूरब और पश्चिम के बीच की दिशा जिसे अग्नि कौण  कहते हैं -वो अग्नि का स्थान है जल और अग्नि इन दोनों में संतुलन रहना चाहिए।

 जो बीच का स्थान है वह आकाश का स्थान है वहां से आकाश निहारता रहे ,वहां पवन आती रहे ,आकाश ,निहारिकाएं ,नक्षत्र ,प्रकाश झांकता रहे। जो नार्थ वेस्ट है वह अतिथि का स्थान है। जो  साउथ ईस्ट है वो अग्नि कौण  है वहां पर अग्नि रहनी चाहिए। जो साउथ वेस्ट  है वह थोड़ा ऊंचा सा हो वहां आप स्वयं रहें।

जिस घर में तुलसी है हवन होता रहता है रामायण का,पुराणों ,निगम आगम का  पाठ होता रहता है वहां का वास्तु अपने आप ठीक हो जाएगा। जीवन के बड़े निर्णय बड़ों से माँ बाप से गुरु से पूंछ कर लेना। शास्त्र सम्मत ,गुरु द्वारा समर्थित मार्ग पर चलें  वह आपका जीपीएस बनें। उस मार्ग से चलें जो गुरु द्वारा उपदेशित है जहां से महापुरुष गए हैं।शास्त्र सम्मत मार्ग हो। भटका वह है जिसके पास आदर्श नहीं है।  जीवन में आदर्श की स्थापना कीजिये। आदर्श के अभाव में आप डी -ट्रेक्ट हो जाएंगे। ऑटो पायलट होता है आजकल। कहाँ उतरना है वह बस सॉफ्ट वेयर डालता है। सही स्थान पर वायुयान उतरता है।

राम ने सीता से पूछा हम कहाँ रहें वे त्रिकाल दर्शी ऋषि तय करेंगे। गुरुदेव से पूछेंगे। राम जीवन भर गुरु का आदेश मानते हैं उनसे पूछे बिना कुछ नहीं करते। राम वाल्मीकि के आश्रम में पहुँचते  हैं। वाल्मीकि को देखकर साष्टांग दंडवत हो गए राम। वाल्मीकि ने उन्हें उठाया। वे अकेले संत हैं जो जानते हैं राम किस पल छिन आएंगे। वाल्मीकि कहतें हैं आप जिस शरीर में हैं इस कारण मैं आपको आशीर्वाद दे   रहा हूँ। मैं भली भाँती जानता हूँ, आप कौन हैं। मुझसे ये अनभिज्ञता नहीं कि आप कौन हैं। विधि ,विष्णु ,शंकर को  आप कई बार नचा देते हैं ये मैं जानता हूँ। न न मैं इतना महान नहीं हूँ बोले राम।
राम कहते हैं मैं दशरथ पुत्र हूँ ये मेरा छोटा भाई लक्षमण है। मैं ये जानने आया हूँ मुझे कहाँ रहना चाहिए।
जिनके श्रवण समुद्र समाना ,
विधि ,हरि, शम्भु नचावन  हारे।
उमा दारु जो सुख की नाहिं  ,
सदैव नचावत  राम गोसाईं।
जिनके कान और साइज़ समुद्र जैसे हैं कथा सुन सुनकेभी  जो अघाते नहीं थकते नहीं उनके हृदय में रहना-बोले वाल्मीकि राम से।

 साधना की  पहली सीढ़ी श्रवण है। जब आप अच्छा सुन रहे होते हैं अच्छा स्टोर कर लेते हैं ,तब बेकार आपके अंदर  से निकल जाता है। वह चीज़ जो दुःख देने वाली है जिससे अवसाद पैदा होता है वह निकल जाएगी। परीक्षित ने सुना शुकदेव को ,मृत्यु का उनका भय चला गया। जानकारी एक प्रकार की सम्पदा है।गरुण ने कथा सुनी काग भुसुंडी  जी से उनका भरम चला गया , पार्वती ने सुनी  कथा शिव से सुनकर उन्हें अलग अनुभव हुआ। कृष्ण ने अर्जुन को सुना उनका मोह नष्ट हो गया। सुनने की एक विधि है अगर आप ठीक ढंग से सुने ,सुनने के आप अधिकारी हैं , सुनना आपको आ गया है तो आपको निरंतर लाभ मिलेगा ।  कथा भी कॉन्सलिंग है।

गुरु कौन है -जो दुर्बोध को सुबोध कर दे ,वही गुरु है। ज्ञान गुरु है। उपदेश गुरु है।जो कठिन को सरल बना दे ,दूर को पास कर दे ,अलभ्य को लभ्य कर दे वही गुरु है । शब्द गुरु है।गणेश जी के कान देखें हैं कितने बड़े हैं पहले सुनो अधिक ,देखो कम ,बोलो सीमित ,सोचो ,फिर आपको देखना आ जाएगा। संतुलन कर लो आपको क्या बोलना है तब बोलो।
जो उद्यम शील हैं विवेकी हैं उनके पास रहिये बोले वाल्मीकि राम से। जो निश्छल हैं। छल नहीं करते सरल हैं उनके पास रहिये। भक्तों के उद्यमियों के हृदय में आप रहिये राम।

वाल्मीकि ने कहा  आप चित्रकूट में जाकर रहिये। चौदह साल के वनवास में राम बारह साल चित्रकूट के आश्रम में रहे। सबसे पहले घर में तुलसी की स्थापना करें घर के बीचों बीच में। तुलसी के बिरवे के  दो मीटर के दायरे में ,रेडियस में, प्राण रहते हैं। काशी के विद्या निवास मिश्र ने ब्राज़ील के अर्थ सम्मिट में पर्चा पढ़ा था इसी आशय का। पीपल ,कदम्ब ,मौली प्राण वायु तो देते हैं प्राण नहीं। तुलसी प्रसाद का निर्माण करती है। तुलसी जो रोज़ छू लेते हैं उनमें असंतुलन पैदा नहीं होता है।

तुलसी का बिरवा रोपने के बाद फिर एक छोटी सी यज्ञ वेदिका  बनाई राम ने। कुछ वृक्ष लक्षमण ने रोपे। और इस तरह से भगवान मुनि मंडली के साथ जंगल में रहे। जंगल के लोग उनके लिए फल लेकर आते हैं उन्हें प्रणाम करते हैं। उधर अयोध्या में क्या हो रहा है। ये आगे के सत्संग में पढ़िए।
जैश्रीकृष्णा !

1 टिप्पणी:

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत बढ़िया चिंतन प्रस्तुति ...