शनिवार, 6 अक्तूबर 2012

चील की गुजरात यात्रा


चील की गुजरात यात्रा 

अधिक नहीं बस चार कौवे थे ,

कभी कभी ऐसा जादू हो जाता   है ,

ये सब कौवे चार बड़े सरताज हो गए ,

इनके मुखिया चील गिद्ध और बाज़ हो गए .

                    ----------स्व .भवानी प्रसाद मिश्र . 

ये चील उड़के गुजरात पहुँचती है और पूछती है राज्य सरकार गुजरात वासियों को तीन गैस के सिलिंडर और क्यों नहीं देती .भाई साहब चील से पूछा जाना चाहिए जहां गैस घर घर पाइप से 

सस्ते में पहुँच रही है वहां सिलिंडरों की क्या ज़रुरत है .

गुजरात जाके वहां से गुजरने वाली एक नदी के बारे में ये कहतीं हैं नदी का नाम नर और मादा है नर्मदा नहीं है .यानी यहाँ कोई  नर है कोई मादा है .भाषा के लोग अब इस तरफ ज़रूर ध्यान 

दें 

यहाँ अमरीका में भी उनके अनेक अनिवासी भारतीय प्रशंसक हैं अनेक सुशीलाएं भी हैं जो जानना चाहतीं हैं ,माताजी ये शब्द मूल रूप में है क्या ?

ज़ाहिर है वह महिला जो ३० -३२ सालों में शब्द बोलना भी ठीक से न सीख सकी वह गुजरात  और भारत का गौरव क्या समझेगी .

एक मर्तबा ये माताजी हरियाणा आईं थीं .वहां मुख्य मंत्री भूपेन्द्र हुड्डा जी हैं जो अपने आपको कई मर्तबा B.Hudda (बी,हूडा)भी लिखतें हैं अब अंग्रेजी में डबल ध्वनी तो होती नहीं है हुड्डा को हूडा ही कह दिया जाता है .

माताजी के जब बोलने की बारी आई आपने संबोधन में माननीय मुख्य मंत्री जी को कहा -बे-हूदा साहब !.अब इसमें वैसे माता जी का कोई दोष इसलिए नहीं है कि माताजी हिंदी रोमन लिपि में लिखके ले जातीं हैं .अब अंग्रेजी में "ड" के स्थान पर "द "होता है अकसर .

हमारा यहाँ वहां सर्वत्र जहां जहां उनकी प्रशंसिकाएं बैठीं हैं उनसे कर जोड़ निवेदन है वह उन्हें शुद्ध भाषा लिखके भेज दिया करें .

और उन्हें ये भी समझा दें हिंदी देवनागरी में लिखी जाती है रोमन लिपि में नहीं .

भारत में पंजाबियों में वढेरा हुआ करते थे .अभी भी हैं .  हमारे बड़े लोगों और पूर्वजों को कहा जाता था वढेरा .चील के खानदान से जुड़ने के बाद वह भी वा -ढ -रा हो गए .जिसका कोई भी अर्थ नहीं है .कोई हमें बतलाए क्या होता है यह "वा -ढ -रा " 

लोग मुझसे पूछते हैं ये वा -ढ -रा क्या है .उनके जो समर्थक बैठे हैं वह मुझे बतलादें यह वा -ढ -रा क्या है ?

क्या "वा -ढ -रा "  उसे कहतें हैं जिसे बिना किसी ब्याज के बिना किसी गारंटर के ६० -७० करोड़ रूपये का उधार(रिण,ऋण  ) मिल जाता है .

चील की वजह से वह संस्था जो किसानों के उपजाऊ खेत सस्ते में खरीद कर औने पौने दामों पे बेचती है इन वा -ढ -रा साहब को ऋण दे देती है .इस संस्था का नाम है DLF .इसने DLF

ENCLAVE नाम का पूरा एक साम्राज्य खड़ा कर रखा है दिल्ली -गुडगाँव मार्ग के गिर्द . 

कहतें हैं चील एक मील की ऊंचाई से उड़ते उड़ते भी चावल के एक दाने को रोटी के आकार में साफ़ साफ़ देख लेती है इसीलिए कहा जाता है गिद्ध दृष्टि .नर -मादा में नर को गिद्ध कहतें हैं .मादा को चील . 

वैसे जिसका स्विस बैंकीय खाता ज्यादा फूला हुआ होता है उसे भी चील ही कहा जाता है अब हिन्दुस्तान में .भगवान् बचाए इसकी दृष्टि से . 

3 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

क्षमा सहित ।।

बी हूडा बेहूदा बोले, नर्मदा कहे नर-मादा ।

होती क्यूँ तकलीफ आपको, बोलो भीड़ू दादा ।

सास-ससुर की प्रकृत-सम्पदा, हरियाना का हरिया -

बाड्रा है दामाद हमारा, ब्लॉग वर्ल्ड मत कान्दा ।।

गिद्ध दृष्टि कहिये ना भाई, चील चील क्यूँ रटते ।

बीमारी में भी क्या कोई, रहा आज तक खटते ।

भारत आओ बँटे रेंवड़ी, रेवाड़ी में ले लो-

लूट रहे हैं अंधे सारे, पर अंधे न घटते ।।

Arvind Mishra ने कहा…

बढ़िया लखेदा है !

shalini ने कहा…

क्या बात है वीरेंद्र जी ..बहुत अच्छा व्यंग्य लिखा है..