शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

तर्क की मीनार

35) "मेरा सुझाव अच्छा लगे तो कड़वे घूँट का पान करें"मित्रों! बहुत दिनों से एक विचार मन में दबा हुआ था! हमारे बहुत से मित्र अपने 

ब्लॉग पर या फेसबुक पर अपनी प्रविष्टि लगाते हैं। वह यह तो चाहते हैं कि लोग उनके यहाँ जाकर अपना अमूल्य समय लगा कर विचार कोई बढ़िया सी

 टिप्पणी दें। केवल इतना ही नहीं कुछ लोग तो मेल में लिंक भेजकर या लिखित बात-चीत में भी अपने लिंक भेजते रहते हैं। अगर नकार भी दो तो वे फिर 

भी बार-बार अपना लिंक भेजते रहते हैं। लेकिन स्वयं किसी के यहाँ जाने की जहमत तक नहीं उठाते हैं..

एक प्रतिक्रिया :वीरुभाई 

ब्लॉग का मतलब ही है संवाद !संवाद एक तरफा नहीं हो सकता .संवाद है तो उसे विवाद क्यों बनाते हो ?जो दोनों के मन को छू जाए वह सम्वाद है जो 

एक 

के मन को आह्लादित करे ,दूसरे 

के मन को तिरस्कृत वह संवाद नहीं है .

भले यूं कहने को विश्व आज एक गाँव हो गया है लेकिन व्यक्ति व्यक्ति से यहाँ बात नहीं करता .पड़ोसी पड़ोसी को नहीं जानता .व्यक्ति व्यक्ति के बीच 

का संवाद ख़त्म हो रहा है .जो एक प्रकार का  खुलापन था वह खत्म हो रहा है ब्लॉग इस दूरी को पाट सकता है .ब्लॉग संवाद को  जिंदा रख सकता है .

इधर सुने उधर सुनाएं .कुछ अपनी कहें कुछ हमारी सुने .

गैरों से कहा  तुमने ,गैरों को सुना तुमने ,

कुछ हमसे कहा होता ,कुछ हमसे सुना  होता .

जो लोग अपने गिर्द अहंकार की मीनारें खड़ी करके उसमें छिपके बैठ गएँ हैं वह एक नए वर्ग का निर्माण कर रहें हैं .श्रेष्ठी वर्ग का ?

बतलादें उनको -

मीनार किसी की भी सुरक्षित नहीं होती .लोग भी ऊंची मीनारों से नफरत करते हैं .

बेशक आप महानता का लबादा ओढ़े रहिये ,एक दिन आप अन्दर अंदर घुटेंगे ,और कोई पूछने वाला नहीं होगा .

अहंकार की मीनारें बनाना आसान है उन्हें बचाए रखना मुश्किल है -

लीजिए इसी मर्तबा डॉ .वागीश मेहता जी की कविता पढ़िए -

तर्क की मीनार 

मैं चाहूँ तो अपने तर्क के एक ही तीर से ,आपकी चुप्पी की मीनार को ढेर कर दूं -

तुम्हारे सिद्धांतों की मीनार को ढेर कर दूं ,

पर मैं ऐसा करूंगा नहीं -

इसलिए नहीं कि मैं तुमसे भय खाता हूँ ,सुनो इसका कारण सुनाता हूँ ,

क्योंकि मैं जानता हूँ -

क़ानून केवल नाप झौंख कर सकता है ,

क़ानून के मदारी की नजर में ,गधे का बच्चा और गाय का बछड़ा दोनों एक हैं -

क्योंकि दोनों नाप झौंख में बराबर हैं .

अभी भी नहीं समझे ! तो सुनो ध्यान से ,

जरा इत्मीनान से ,कि इंसानी भावनाओं के हरे भरे उद्यान को -

चर जाने वाला क़ानून अंधा है ,

कि अंधेर नगरी की फांसी का फंदा है ,

जिसे फिट आजाये वही अपराधी है ,

और बाकी सबको आज़ादी है .

(समाप्त )

वीरुभाई :

इसीलिए मैं कहता हूँ ,कुछ तो दिल की बात कहें ,कुछ तो दिल की बात सुने।

नावीन्य बना रहेगा ब्लॉग जगत में 

4 टिप्‍पणियां:

शालिनी कौशिक ने कहा…

सही कहा है आपने बड़ी मीनारों में बैठने वाले केवल घुटता हैं .वागीश जी की कविता पढवाने हेतु आभार

संदीप पवाँर (Jatdevta) ने कहा…

वीरेन्द्र जी बहुत ही जोरदार बात आपने कही है। देखे कितने लोग मानते है?

रविकर ने कहा…

पत्नी भोजन दे पका, स्वाद लिया भरपूर |
बेटा रूपये भेजता, बसा हुआ जो दूर |
बसा हुआ जो दूर, हमारी तो आदत है |
नहीं कहें आभार, पुरानी सी हरकत है |
गरज तुम्हारी आय, ठोकते रहिये टिप्पण |
बिगाड़ सके क्या मोर, ढीठ रविकर है कृ-पण ||

रविकर ने कहा…

उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।