रविवार, 24 जून 2012

पलट तेरा ध्यान किधर है

पलट तेरा ध्यान  किधर है 

Eavesdroppers beware ,habit can make you ,'deaf'/TIMES TRENDS/THE TIMES OF INDIA,MUMBAI ,JUNE 21,2012,P15.

कन  सुई  करने ,कन्या सुलभ दीखने,व्यवहार करने छिपकर किसी की बात को कान देने का मतलब अपने आसपास से बे -खबर हो जाना है कुछ लोग इतनी तल्लीनता से औरों की बात छिपकर सुनने में मशगूल रहतें  हैं कि उन्हें अपने बिलकुल पास पैदा होने वाली आवाजों का जरा सा भी इल्म नहीं होता भले कोई बिलकुल ही असामान्य अंदाज़ में बा -रहा कह रहा हो -'मैं गोरिल्ला हूँ ....'

रोयल होलोवे यूनिवर्सिटी लन्दन के रिसर्चरों ने पता लगाया है कि जो पुरुष औरताना अंदाज़ में महिलाओं की गुफ्तगू चोरी छिपे सुनने में मशगूल रहतें हैं उन्हें १९ सेकिंड तक अपने बिलकुल करीब बोली गई असामान्य बात मैं गोरिल्ला हूँ ..का भी इल्म नहीं होता है .वह इतने तल्लीन  और रम जातें हैं कन सुई में कि अपने आसपास की आवाजों पर उनका ध्यान ही नहीं जाता .सारा कमाल दिमाग की फ़ोकसिंग ,कान देने का है दिल चस्पी का है कन सुई की  लत का है .

विज्ञान पत्रिका Cognition में प्रकाशित यह रिसर्च रिपोर्ट हमें समझाती है कि किस प्रकार किसी की गहन बातचीत में तन्मय होकर खो जाना हमें अपने आसपास की आवाजों से पूरी तरह काट देता है .

आप एक तरह से बहरे हो जातें हैं इन परिवेशीय  आवाजों के प्रति .

ध्यान का बराबर एक तरफ पूरा लगे रहना हमें याद दिलाता है उस अध्ययन की जिसमें  कुछ दर्शक फ़ुटबाल मैच देखने में इतने खो जातें हैं कि उनके सामने एक व्यक्ति गोरिल्ला के लिबास में अपनी छाती पीटता बे -साख्ता निकल जाता है और ये लोग उसका नोटिस ही नहीं ले पाते .

डेली मेल के अनुसार इस अध्ययन के अनुसार हमारा श्रवण भी इसी तरह असर ग्रस्त हो जाता है कन सुई से .

अपने प्रयोगों में रिसर्चरों ने दो पुरुषों को एक कक्ष में एक मेज पर बिठला दिया .दो महिलाओं को  एक दूसरी मेज पर बिठलाया गया .उनकी बातचीत रिकोर्ड की गई जिसमेउनके किसी  पार्टी के लिए तैयार होने की  बातें की जा रहीं थीं .

बातचीत के ठीक बीच में एक और आदमी इस कमरे में दाखिल हुआ ,वह बुदबुदा रहा  था -'मैं गोरिल्ला हूँ ...'

अब इस बातचीत को स्वयं सेवियों के एक वर्ग को सुनवाया गया .

कुछ लोगों ने आदमी की बुदबुदाहट सुनी कुछ ने सिर्फ औरतों की गुफ्तु -गु .

जब उनसे यह जानने की कोशिश की गई कि क्या उन्होंने कोई अजीबोगरीब असामान्य बात सुनी तब पता चला इनमें  से जो औरतों की बातचीत सुन रहे थे उनमें  से सिर्फ तीस  फीसद को ही मैं गोरिल्ला हूँ सुनाई  दिया . 

तब क्या यह समझा जाए कन सुई करना आपको बहरा बना सकता है परिवेशी आवाजों के प्रति ?

12 टिप्‍पणियां:

Anjani Kumar ने कहा…

हर आहट पर कान धरना..... और फिर कहना "मैं गोरिल्ला "...क्या बात है
बहुत खूब

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

क्या बात है!!
आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 25-06-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-921 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

dheerendra ने कहा…

क्या बात बताई ,,,,बहुत खूब,,,,

RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि ...: आश्वासन,,,,,

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हम तो पहले ही कहते थे कि यह गड़बड़ आदत है..

रविकर फैजाबादी ने कहा…

उत्कृष्ट |
बहुत बहुत बधाई |

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

दिलचस्प जानकारी....
सादर आभार.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ऐसा होता है ... ध्यान लगा कर कोई काम करने से ऐसा होता है कभी कभी ...
राम रा जी ..

SM ने कहा…

दिलचस्प जानकारी

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार २६/६ १२ को राजेश कुमारी द्वारा
चर्चामंच पर की जायेगी

डॉ टी एस दराल ने कहा…

कान लगाना भी ध्यान लगाने जैसा है --मेडिटेशन !

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

बड़ी ही दिलचस्प बात बताई है.

बेचारा था सुन रहा,बहुत लगा कर ध्यान
ये भी न मालूम चला, खुद के बहरे कान |

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

रोचक जानकारी