गुरुवार, 7 जून 2012

कल का ग्रीन फ्यूल होगी समुद्री शैवाल

कल का ग्रीन फ्यूल होगी समुद्री शैवाल 

प्रकाश संस्लेषी वनस्पति है समुद्री शैवाल या समुद्री खर पतवार .लेकिन यह उष्ण कटिबंधी वनस्पति अन्य पादपों से इस मायने में भिन्न है ,इसमें न वास्तविक पादपों सी पत्तियाँ होतीं हैं न तना न  जड़ .

कुछ माहिरों की मानें तो यह पृथ्वी पर मौजूद कुल ऑक्सीजन का ७१% तैयार   कर लेती है और बदले में लेती है सिर्फ पानी और कार्बन डाय -ऑक्साइड .

एक तरह से कार्बन का तो यह सोखता ही है .कार्बन अवशोषी है .

समझा जाता है यह वाहनों से निकलने वाले कारबन   को सोख कर हमारी हवा को अब और गंधाने से रोक सकती है .

उच्चतर अक्षांशों  पर  तैनात हमारे फौजियों को ऑक्सीजन मुहैया करवा सकती है .

अम्लीकृत  होते समुन्दरों से तेज़ाब की ज़ज्बी कर सकती है बा शर्ते इसकी बड़े पैमाने पर खेती की जाए .

विश्व -व्यापी तापन को कम करवा सकती है एल्गी ग्रीन हाउस गैसों में से एक कार्बन -डाय -ऑक्साइड को वायु  मंडल  में दाखिल होने से रोक कर .

क्या है आधार भारत के सन्दर्भ में इस आशावाद का ?

दिल्ली विश्व -विद्यालय से सम्बद्ध वनस्पति शास्त्री डॉ दीन बंधू साहू साहब एल्गी से कार चलाने का दावा प्रस्तुत करतें हैं .

हमारे पर्यावरण और पेट्रोलियम उत्पादों के हाथों पिटते रूपये का अवमूल्यन रोक सकतें हैं .

आपने समुद्री शैवालों की हज़ार से भी ज्यादा किस्मों का अन्वेषण  करके कुछ ऐसी स्टेंन ढूंढ निकालीं हैं जो वाहनों के एग्जास्ट से निकलते जले अधजले कार्बन को चूस सकतीं हैं .

इस प्रकार व्युत्पन्न तरल का तकरीबन ४०% अंश आपके अनुसार जैव ईंधन में भी तबदील किया जा सकता है .

इतर उद्योगों के लिए तेल भी इसी बिध पैदा किया जा सकता है .

आपके अनुसार कुल २०,००० -२५,००० के आरंभिक विनिवेश की भरपाई तीन से चार सालों में ही की जा सकेगी .

आपने इस प्रोद्योगिकी की आज़माइश अपनी मारुती ८००   पर कर ली है .आपने  इसे एक ऐसे टेंक से जोड़ा है जिसमे आधी राशि जल की रखी गई आधी शैवाल की .

कार का एग्जास्ट पाइप इसी टेंक से सम्बद्ध किया गया है .

आपकी कार कमतर ग्रीन हाउस गैस कार्बन दे  -ऑक्साइड गैस दिल्ली के पर्यावरण में छोड़  रही है ,आम मोडलों के बरक्स .

आप आलमी शैवाल संघ के एक सक्रीय सदस्य हैं .

काश भारत के अब तक की सबसे काबिल (नाकारा पढ़ें इसे )सरकार तथा तेल कम्पनियां शैवाल की बड़े पैमाने पे फार्मिंग को बढ़ावा  दे पायें ,सरकारी अनुदान (सहायता )मुहैया करवा सकें .

काश एक श्रृंखला बद्ध आपूर्ति प्राविधि अस्तित्व में आसके ,जहां  इस्तेमाल हो चुकी शैवाल पहुंचाई जा सके .

भारत अपनी ज़रूरीयात का ७०% तेल आयात करता है .यह तेल विकलांगता दिनानुदिन बढती ही जानी है .

जटरोपा से बेहतर है एल्गी 

इसे किसी भी तापमान पर तथा विभिन्न पर्यावरणी परिस्थितियों   में ,उगाया  जा सकता है .

उड़ीसा ने इसकी खेती के लिए एक ९५ लाख की प्रायोजना  हाथ में ली है .

यह अंगुल जिले के गंधाते ताप बिजली घरों के गिर्द उगाई जायेगी .ताकी हमारी हवा से प्रदूषकों को विश्व -व्यापी तापन के लिए जिम्मेवार ग्रीन हाउस गैसों को अलग किया जा सके .

लद्दाख और जम्मू कश्मीर के उच्चतर अक्षांशीय    इलाकों में तैनात हमारे प्रतिरक्षा कर्मियों को एल्गी प्रति -रक्षा शोध    प्रति -रक्षा संघ (DRDO) एल्गी  की  मारफत  ही  ऑक्सीजन  मुहैया  करवाएगा  .

हम  देर  से  ही  सही  अभी  भी  चेत  सकतें  हैं 

अमरीका चीन दक्षिण कोरिया ,कनाडा आदि मुल्क इस राह पे कबके चल चुके हैं . .

8 टिप्‍पणियां:

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

आपकी जानकारी है तो बहुत दमदार पर सराकार की कनपटी पे कौन ठोके कि‍ जूँ रेंगने लगे

मनोज कुमार ने कहा…

शोध करने वाले अपना काम कर रहे हैं, पर सत्तासीनों को अपना काम करना कौन सिखाए।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सच है, पेट्रोल समाप्त होने के पहले ही कुछ ढूढ़ लें..

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

विकल्प तो ढूँढने ही होंगें

dheerendra ने कहा…

[card="yellow"] नए विकल्प तलाशने ही होगें [ /card ]

SM ने कहा…

information thoughtful post

यादें....ashok saluja . ने कहा…

वीरू भाई .आप ने तो कुण्डी खटखटा दी ....
अब कोई दरवाज़ा भी तो खोले ???
शुभकामनाएँ!

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

acchi jankari.....