सोमवार, 31 अक्तूबर 2016

दिवाली पर लक्ष्मी पूजन क्यों ?

Virendra Sharma मान्यवर रणवीर सिंह ने बड़ा मौज़ू सवाल उठाया है दिवाली पर लक्ष्मी पूजन क्यों ?दरअसल यदि हम कुछ आध्यात्मिक शब्दों के अर्थ समझ लें तो कई भ्रांतियां शायद दूर हो जाएं। राम का अर्थ है जो रमैया है रमा हुआ है ज़र्रे -ज़र्रे में वह राम है (इसका मतलब यह नहीं है वह रामायण का रामचरित मानस का राम नहीं है ,दशरथ पुत्र राम नहीं है वह भी उसी में शामिल है ,कृष्ण का अर्थ है जो आकर्षित करे ,गोविन्द का अर्थ है जो हमारी इन्द्रियों को आकर्षित करे। मानस में बाबा तुलसी कहते हैं :


सियाराम मय सब जग जानि,

करहुँ प्रणाम जोरि जुग पाणि।

गुरुग्रंथ साहब की वाणी कहती है :

अवल अल्लाह नूर उपाया ,कुदरत के सब बन्दे ,

एक नूर ते सब जग उपजौ कौन भले कौन मंडे।

पूरे गुरु ग्रन्थ साहब में एक ही ज्योत है नानक की (महला एक ,दो ...नौ आदि अलग अलग शरीरों को दर्शाते हैं ज्योत एक ही है जिसका इन शरीरों को एहलाम होता है।वह अलग अलग हैं इसलिए कहीं नानक लिखा है कहीं नानकु। ये महले अलग अलग कालखण्डों को सवा दो सौ साला मिथिहास को दर्शाते हैं। कुरआन शरीफ और कुरआन मज़ीद में मोहम्मद एक शरीर है जिसे एहलाम होता है रिवेलेशन होते हैं अल्लाह के यही किस्सा बाइबिल का है।

गीता में श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं -अर्जुन जो मुझे जिस रूप में भजता है मैं भी उसे उसी रूप में भजता हूँ प्राप्त होता है। अब चाहे आप गणेश को पूजो या लक्ष्मी को ,देवताओं को पूजने से प्राप्ति जल्दी होती है लेकिन वह टिकाऊ नहीं होती सारा लक्ष्मी पूजन लाभ केंद्रित है ,शुभ लाभ ,वणिक वर्ग के लिए इसका ,लक्ष्मी पूजन का बड़ा महत्व है। इति आपका मान्यवर एक बार फिर से शुक्रिया आपने बड़ा प्रासंगिक सवाल उठाया सकाम कर्म से जुड़ा हुआ -लक्ष्मी पूजन क्यों दिवाली पर।


पावर्स सारी एक की हैं उसे कृष्ण कहो या राम ,राम कहो या रहीम ,अलबत्ता देवताओं को अंतरित की गई हैं।

विज्ञानियों ने अक्सर हिग्स फील्ड की सर्व -व्यापकता की बात की है लेकिन इसकी पुष्टि के लिए स्वयं हिग्स बोसॉन के अस्तित्व पर मोहर लगना ज़रूरी था। स्विट्ज़रलेंड के प्रयोगों से आदिनांक अर्द्ध सत्य ही सामने आया है। आ -दिनांक कोई नहीं जानता -पदार्थ के बुनियादी कणों को पदार्थ होने का बुनियादी गुण द्व्यमान (संहति या मॉस )कौन प्रदान करता है। अनुमान मात्र है यह काम हिग्स बोसॉन का है जो द्रव्य का एक बुनियादी लेकिन अति -अल्पकालीन कण है जिसका अस्तितिव वन टेंथ सेकिंड्स आफ ए सेकटीलियन (टेन टू दी पावर माइनस ट्वैंटीटू )बताया गया है।

जो काम ईश्वर का है वह विज्ञान के भौतिक उपकरणों की पकड़ में कभी नहीं आएगा। ठीक इसीप्रकार सियाराम का द्वैत है।


Hanuman is a Servitor (Search Engine )of Ram only and works and exercises His powers only .

All powers rests in Him and controlled by Him .The universe is the creation of these powers only and is controlled too .

DrArvind Mishra स्वान्त: सुखाय रघुनाथ गाथा के गायक को क्यों कोस रहे हैं?

Ranbir Singh Phogat चूंकि सीता के साथ पक्षपात हुआ. सब आप की तरह पढ़े-लिखे थोड़े ही थे. वशिष्ठ मुनि ने राम को क्या शिक्षा दी थी?

Virendra Sharma Krishna is the source of all incarnations the rest are His plenary powers .Ram is not different form sita and so is krishna with Radha .Gopis are the plenary powers of Radha.All Godesses are the plenary power of that personality of God head i.e Lord of Lords Krishna .He can be present in past ,present and future and beyond that also .He is both within and without .The whole universe (and there are infinite universes )exists in Him and His expression only .Ram-Sita ,Krishan -Radha are just akin to space-time continuum ,and are one and no second .

avinder Jeet Singh कहानी तो कहानी है।

Devi Saini Commercialisation of this festival of light is directly or indirectly symbolises the importance of goddess laxmi instead of Raam... perhaps time is the sole witness of this change of values ... the subjects of King Raam have left the way to the devotee of Laxmi...reasons may be numerous... as far as celebration of diwali festival is concerned modern generation is least concerned with the historical background ...they just believe in epicurian philosophy of eat drink nd be merry where enjoyment is supreme to all other facts and facets of life...

Ranbir Singh Phogat The glorification of Rama and consequently he became the Lord. As Jat I am more concerned with Hanuman ji than any of the characters of Ayodhya's ruling family.

Virendra Sharma विद्या (ईश्वर की परा शक्ति ,चैतन्य शक्ति जिसमें मनुष्य अग्रणी है )और अविद्या (ईश्वर की जड़ शक्ति या त्रिगुणात्मक प्रकृति ,नदी पहाड़ परबत नाले आदि )दोनों उसी एक ईश्वर की शक्तियां हैं। वह ईश्वर जो एक साथ आगे पीछे ,अतीत ,वर्तमान ,भविष्य में एक साथ हो सकता है ,जिसे जान लेने के बाद फिर कुछ जान ना शेष नहीं रहता है। ही इज़ थ्योरी आफ एवरीथिंग। फिर दोहरा दें -राम और सीता दो हैं ही नहीं। एक ईश्वर का नर रूप है दूसरा स्त्रैण बस। दोनों में एकत्व है क्योंकि वह दोनों ही नहीं है। ईश्वर कहते ही उसे हैं जो एक साथ विरोधों गुणों का अधिष्ठान है। डाइकोटॉमी है -सुख और दुःख की ,पाप और पुण्य की उसके बाहर कुछ है ही नहीं। सब यौनियों की वही योनि है। बीज भी वही है फल भी वही है अंकुर भी वही है।

कबीर कहते हैं -डाली फूल जगत की माहीं जहां देखूं वहां तू का तू।इट इज़ यू ओनली यू वेअर एवर आई लुक। 



4 टिप्‍पणियां:

kuldeep thakur ने कहा…

जय मां हाटेशवरी...
अनेक रचनाएं पढ़ी...
पर आप की रचना पसंद आयी...
हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
इस लिये आप की रचना...
दिनांक 01/11/2016 को
पांच लिंकों का आनंद
पर लिंक की गयी है...
इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

फ़िलासफ़ी की विवेचना और उसे समझना दोनो बड़ी टेढ़ी खीर हैं .

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

फ़िलासफ़ी की विवेचना और उसे समझना दोनो बड़ी टेढ़ी खीर हैं .

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

दीपावली की शुभकामनाएं ।