सोमवार, 23 जनवरी 2012

ललचाते क्षुधा वर्धक अपेताइज़र्स के विज्ञापन बढ़ा रहें हैं मोटापे की महामारी .

ललचाते क्षुधा वर्धक अपेताइज़र्स के विज्ञापन बढ़ा रहें हैं मोटापे की महामारी .
बरसों पहले आकाशवाणी रोहतक से प्रसारित एक विचार गोष्ठी का विषय था -विज्ञापन में नारी .विमर्श में एक वार्ताकार के रूप में मैं भी शामिल था .मेरे आलेख का पहला वाक्य था जैसे डाइनिंग टेबिल पर सजी हुई इन्द्रधनुषी सलाद खाने को ललचाती है वैसे ही विज्ञापन में नारी की छवि परोसी जाती है .आज बरसों बाद भी मुझे यही लगता है .खाने की प्रक्रिया खाने से पहले एंजाइम शुरू कर देतें हैं सजी हुई सलाद को देख कर .अब एक रिसर्च का स्वर भी कुछ कुछ ऐसा ही है .फर्क सिर्फ यह है अब क्षुधा वर्धक सिद्ध हो रहें हैं कथित स्टार्टर्स,एपेताईजार्स ,एपेताइज़िन्ग खाद्यों के लुभाऊ विज्ञापन .
Appetizing food ads to blame for obesity epidemic/THE TIMES OF INDIA ,MUMBAI ,P 17,JANUARY 23 ,2012 /TIMES TRENDS
हालाकि इस बाबत संदेह बहुतों को था लेकिन अब रिसर्च इसके पक्ष में खड़ी है साक्ष्य लेकर .मनभावन खाने के आकर्षक विज्ञापनों को देखके सच मुच मुंह में पानी भर आता है .सारी करामत रहती है इस नयनाभिराम दृश्य को देखकर बनने वाले एक किण्वक (हारमोन )Ghrelin की जिसका स्तर बढ़ जाता है इन विज्ञापनों को देखके .भूख पर नियंत्रण और क्षुधा का विनियमन यही हारमोन करता है .
इस शोध को अंजाम तक पहुंचाया है मेक्स प्लांक मनोरोग संस्थान की एक रिसर्च टीम ने.बस विज्ञापन देखने की देर है लोगों के पेट में चूहे कूदने लगतें हैं .भूख खुलके खेलने लगती है .अखबार डेली मेल ने भी इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया है .असर इस विज्ञापनी मायाजाल का इतना सशक्त होता है की ब्रेकफास्ट के दो घटा बाद ही आप केक टूंगने को लालायित हो जातें हैं .आपको दोबारा भूख लग आती है .तस्वीर वास्तव में खुलके बोलती हैं इन विज्ञापनों में .आपने देखा होगा ईट्रीज़ भी रेस्तरा की दीवारों पर खाद्य सामिग्री ,छप्पन भोग थाल में सजाती है प्रदर्शित करती है . बस यही जादू सर चढ़के बोलने लगता है .
सामग्री की तस्वीरें दिखाने के बाद उनकी प्रतिक्रया दर्ज़ करने के बाद .इन ललचाऊ तस्वीरों को दिखाने के बाद इनके हारमोन स्तर जांचे मापे गएँ .तस्वीरें तमाम क्षुधा वर्धक खाद्यों की प्रदर्शित की गई थीं .पता चला Ghrelin harmon के स्तर बढ़ गएँ हैं इन तस्वीरों को देखने के बाद .
पतायह भी चला बाहरी कारक भी हमारे रक्त संचरण में घ्रेलिन के स्तर का विनियमन करतें हैं रेग्युलेट करतें हैं इन हामोनों के स्तरों को .
इसके बाद ही हमारा मस्तिष्क इन दृश्य उद्दीपनों का संशाधन करता है .अब वे तमाम भौतिक क्रियाएं जो हमारे भूख सम्बन्धी नजरिये को प्रभावित करती हैं स्वयम संपन्न हो जाती हैं हमारे अनजाने ही .हमारा उनपर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता है .
RAM RAM BHAI ! RAM RAM BHAI !

आज का नीतिपरक दोहा :-
सीख वाको दीजिये ,जाको सीख सुहाय ,
सीख न दीजे वानरा ,बैया का घर जाए .
यहाँ वानरा माने बन्दर और बैया, बया पक्षी के लिए आया है .अब बेचारे दिग्विजय गुरु तो अच्छे हैं लेकिन चेले को सीख देके उमाजी से भिड़ा दिया .'बाहरी ' का मुद्दा तो चेले ने चला दिया लेकिन बुआ के ज़वाब से चकरा गया .अपनी अम्मा का क्या करे जो इटली से चलके यहाँ चुनाव लडती है .चर्च द्वारा प्रतारोपित है भारत की राजनितिक काया पर .

7 टिप्‍पणियां:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

विज्ञापन बनाने वाले भी कितना पैसा खर्च करते हैं रिसर्च पे ... फिर मज़ा लूटते हैं लोगों का ...

डॉ टी एस दराल ने कहा…

टेबल पर सजा सलाद , ज्यों विज्ञापन में नारी ।
एपेटाईज़र्स ! :)

रेखा ने कहा…

आपके नीतिपरक दोहे बहुत ही अच्छे लगे ...आभार

मनोज कुमार ने कहा…

भगवान बचाए ऐसे भोजन से।

SM ने कहा…

lol
like the last lines of guru chela

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

लार आने पर मोटापा बढ़ जाता है।

ajit gupta ने कहा…

बहुत सार्थक पोस्‍ट। आकर्षक खाना ललचाता भी है और भूख भी बढ़ा देता है। बढिया। दोहा भी समसामयिक है।