शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

माँ शिशु रागात्मक सम्बन्ध दूर तलक जाता है .

माँ शिशु रागात्मक सम्बन्ध दूर तलक जाता है .भावी जीवन के संबंधों की दिशा तय करता है .जिन नौनिहालों को जीवन के इस शुरूआती चरण में (०-१८ माह की अवधि तक )माँ के स्पर्श की सात्विक आंच वात्सल्य की छाया मिलती है वे आगे चलके प्रणय व्यापार में भी कामयाब रहतें हैं .साथी के साथ सकारात्मक सम्बन्ध बनाए वे समस्याओं के हल ढूंढ लेतें हैं .जबकि माँ के अनुराग और तवज्जो से वंचित शिशु (०-२ साल )आगे चलके एक बचावी तर्क में अपने आप को फंसा हुआ पातें हैं .अपना बचाव ही करते रहतें हैं . माँ की बद मिजाजी और बद सुलूकी आगे की दिशा का निर्धारण गलत तरीके से करती है इनके भावी जीवन की .
आखिर जीवन कोशाओं का गुंफन गुडन- फल ही तो है .कोशा ही कोशा को जन्म देती है .माँ की कोशा में बंद होता है उसका अनुराग उसका प्राणिक शरीर .इसलिए केवल दैहिक ही नहीं मानसिक भी सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिए जीवन के शुरूआती डेढ़ बरस में माँ की तवज्जो हर शिशु को मिले यह उसके भावी जीवन में संबंधों के निर्वाह और पल्लवन के लिए भी ज़रूरी है .सवाल है क्या ऐसा हो पाता है .कामकाजी महिलाओं के अनगिन तकाज़े ऐसा होने देते हैं ?.यह रिसर्च रिपोर्ट यह सब रुक कर सोचने विचारने का एक अवसर मुहैया करवाती है .
University of Minnesota के रिसर्चरों ने अपने एक अध्ययन में कम आय वर्ग वाली माताओं की ७५ संतानों का उनके तीस साला हो जाने तक जायजा लिया है .अपने खासुल ख़ास दोस्तों के साथ उनके रिश्तों और व्यवहार पर नजर रखी है .उनके रूमानी संबंधों और साथियों के साथ उनके रागात्मक व्यवहार की भी पड़ताल की है .मुसीबतों में विपरीत परिश्थितियों में वह अपने हमजोलियों के साथ मिलके कैसे समस्याओं को सुलझातें हैं . यह भी समझने की कोशिश इस अध्ययन के दरमियान की गई है .
विपरीत परिश्थितियों से बाहर आने का सामर्थ्य भी जांचा परखा गया .
बतौर शिशु के माँ के आलिगन की सुरक्षा /असुरक्षा ,आंच और वात्सल्य बीस बरस बाद किसी और के आलिंगन में ये तलाशते दिखे .बचपन की अनुभूतियों का संसार इनके साथ था .अच्छे बुरे तजुर्बे भी .
ज़ाहिर है आदमी सिर्फ कोशाओं का जमा जोड़ नहीं है .माँ का स्नेह उसके साथ स्नेह्बंधन दूर तलक जाता है जीवन के हर मोड़ पे काम आता है .
शिशु काल में माँ का आलिंगन चुम्बन स्नेह बंधन एक साँचा एक मोडल साबित होता है .जीवन का पहला रागात्मक अनुभव होता है जो शेष जीवन में विधाई भूमिका निभाता है .विश्वास और आश्था तर्क
शक्ति इसी दौर में बीज रूप विकसित हो जाती है .
शिशु काल में विकसते नन्ने दिमाग ,विकासशील बाल मष्तिष्क में तेज़ी से सीखने संजोने की क्षमता रहती है .सूचना का संग्रह करने की कूवत भी .
यदि माँ के साथ बचपन में शिशु का भावात्मक आबंध और स्नेह बंधन सशक्त रहा है तब भावी जीवन में भी संवेगात्मक विनियमन रागात्मक सम्बन्ध कामयाब रहतें हैं .रिश्ते संतोष देने वाले बनतें हैं .यही कहना है रिसर्चर जेफ्री सिम्पसन जो इस अधययन के अगुवा रहें हैं .
जीवन के प्रभात में पहले १२-१८ महीनों में अंतर -वैयक्तिक सम्बन्ध माँ के साथ कैसा रहा है वह आपके बीस साल बाद के व्यवहार की प्रागुक्ति कर सकता है भविष्य कथन बन सकता है यही कहना है आपका .आपके शब्दों में -"What happens to you as a baby affects the adult you become ".
शिशु का माँ के साथ रिश्ता स्नेह आबंध ही भावी जीवन की डोर बनता है .
सन्दर्भ -सामिग्री :-Newborn's bond with mom key to love life later .Kids More Attached To Mothers In First 18 Months Likely To Have Successful Relationship In Future/TIMES TRENDS /TIMES OF INDIA ,MUMBAI ,JANUARY 18,2012,P19
RAM RAMM BHAI ! RAM RAM BHAI !
सेहत के नुश्खे :सेहत के मुफीद प्रो -बायोटिक्स का ,सेहत के लिए लाभदायक रहने वाले जीवाणुओं का अच्छा स्रोत है भिन्डी .यह तरकारी (भिन्डी जिसे अंग्रेजी में कहतें हैं OKRAS) VITAAMIN बी के संस्लेषण में मददगार रहती है .
Okras are a provider of good bacteria or probiotics ,which helps in the biosynthesis of vitamin B.
लौह तत्व की शरीर द्वारा ज़ज्बी (अवशोषण )में चुकंदर (Beetroot) मददगार सिद्ध होता है .ऑक्सीजन के वहन के लिए एक कोशा दर कोशा ऑक्सीजन पहुंचाने में लौह तत्व (आयरन )एहम भूमिका में रहता है .शाकाहारी खुराक से इसकी ज़ज्बी और भी मुश्किल सिद्ध होती है जिसमे अनाजों से प्राप्त ऐसे प्रोटीन हैं जो आयरन की शरीर द्वारा ज़ज्बी को दुष्कर बना देतें हैं .गुड चने भी आयरन का अच्छा स्रोत हैं .
Beet root aids in absorption of iron ,which is required to transport oxigen in the body.
खाने में लाल मिर्ची का योग मेटाबोलिज्म (अपचयन )की दर को बढा देता है .पाचन में मदगार रहता है .बाड़ी नाशक हैं लाल मिर्ची पाउडर .
Chillies increase the metabolism and help in the digestion of food .
पाचन के लिए अच्छा है अनानास :ताज़ा पका हुआ अनानास (पाइन -एपिल )Bromelain का एक अच्छा स्रोत है .bromelain एक ऐसा एंजाइम एक ऐसा किण्वक है जो पाचन में मदद करता है .अलावा इसके एक एंटी -इन्फ्लेमेत्री (anti-inflammatory) एजेंट की भूमिका निभाता है .
Fresh Pineapple is a good source of Bromelain ,an enzyme which helps in digestion ,and acts as an anti -inflammatory agent.Inflammation is swelling ,redness ,heat ,and pain produced in an area of the body as a reaction to injury or infection .AN AGENT OR DRUG SUCH AS ASPIRIN WHICH REDUCES INFLAMMATION IS CALLED AN ANTI -INFLAMMATRORY DRUG OR AGENT .
आज का नीतिपरक दोहा :-
मूरख को हित के वचन ,सुनी उपजत है कोप ,
सांपहि दूध पिलाइए ,वाके विष मुख ओप .
यहाँ ओप शब्द का एक अर्थ व्याप्ति है ,दूसरा चमक : सांप को जितना मर्जी दूध पिलाओ उसके मुख में विष की ही व्याप्ति रहती है विष ही चमकता है इसी प्रकार मूर्ख व्यक्ति को अपनी हित की बात सुनके क्रोध आ जाता है .हित अहित का अज्ञान रहता है .

5 टिप्‍पणियां:

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

मूरख को हित के वचन ,सुनी उपजत है कोप ,
सांपहि दूध पिलाइए ,वाके विष मुख ओप .

..दोहा शिक्षाप्रद है...बहुत बढ़िया जानकारी उपलब्ध कराई है आपने...धन्यवाद!

रेखा ने कहा…

बहुत अच्छी और उपयोगी जानकारी दी है आपने ...

Amrita Tanmay ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Amrita Tanmay ने कहा…

नीति परक दोहा के साथ साथ सेहत का नुस्खा तो अनमोल है ही और माँ -शिशु का नैसर्गिक सम्बन्ध की विवेचना भी सुन्दर है . हार्दिक आभार..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

माँ का प्रभाव तो बच्चों में जीवन भर रहता है।